Tuesday, July 22, 2014

सूर्य प्रातः एवं सायंकाल ही सिंदूरी क्यों दिखाई देता है?

सूर्य प्रातः एवं सायंकाल ही सिंदूरी क्यों दिखाई देता है? दोपहर में क्यों नहीं?
कनुप्रिया शर्मा, जी-24, सुभाष नगर, कुन्हाड़ी, कोटा-324008 (राजस्थान)
आसमान का रंग नीला क्यों?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए पहले यह समझना होगा कि आसमान का रंग नीला या आसमानी क्यों होता है। धरती के चारों ओर वायुमंडल यानी हवा है। इसमें कई तरह की गैसों के मॉलीक्यूल और पानी की बूँदें या भाप है। गैसों में सबसे ज्यादा करीब 78 फीसद नाइट्रोजन है और करीब 21 फीसद ऑक्सीजन। इसके अलावा ऑरगन गैस और पानी है। इसमें धूलराख और समुद्री पानी से उठा नमक वगैरह है। हमें अपने आसमान का रंग इन्हीं चीजों की वजह से आसमानी लगता है। दरअसल हम जिसे रंग कहते हैं वह रोशनी है। रोशनी वेव्स या तरंगों में चलती है। हवा में मौजूद चीजें इन वेव्स को रोकती हैं। जो लम्बी वेव्स हैं उनमें रुकावट कम आती है। वे धूल के कणों से बड़ी होती हैं। यानी रोशनी की लालपीली और नारंगी तरंगें नजर नहीं आती। पर छोटी तरंगों को गैस या धूल के कण रोकते हैं। और यह रोशनी टकराकर चारों ओर फैलती है। रोशनी के वर्णक्रम या स्पेक्ट्रम में नीला रंग छोटी तरंगों में चलता है। यही नीला रंग जब फैलता है तो वह आसमान का रंग लगता है। दिन में सूरज ऊपर होता है। वायुमंडल का निचला हिस्सा ज्यादा सघन है। आप दूर क्षितिज में देखें तो वह पीलापन लिए होता है। कई बार लाल भी होता है। सुबह और शाम के समय सूर्य नीचे यानी क्षितिज में होता है तब रोशनी अपेक्षाकृत वातावरण की निचली सतह से होकर हम तक पहुँचती है। माध्यम ज्यादा सघन होने के कारण वर्णक्रम की लाल तरंगें भी बिखरती हैं। इसलिए आसमान अरुणिमा लिए नज़र आता है। कई बार आँधी आने पर आसमान पीला भी होता है। आसमान का रंग तो काला होता है। रात में जब सूरज की रोशनी नहीं होती वह हमें काला नजर आता है। हमें अपना सूरज भी पीले रंग का लगता है। जब आप स्पेस में जाएं जहाँ हवा नहीं है वहाँ आसमान काला और सफेद सूरज नजर आता है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए नेताजी शब्द कब, किसने और क्यों इस्तेमाल किया?

रविप्रकाश, एजी-584, शालीमार बाग़, समीप रिंग रोड, दिल्ली-110088
कुछ लोग कहते हैं कि अनुसार सुभाष बोस को सबसे पहले रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने नेताजी का संबोधन दिया। इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। उनके नाम का प्रचलन 1942 में हुआ, जबकि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का निधन 1941 में हो गया था। सन 1940 के अंत में सुभाष बोस के मन में देश के बाहर जाकर स्वतंत्रता दिलाने की योजना तैयार हो चुकी थी। वे पेशावर और काबुल होते हुए इतालवी दूतावास के सहयोग से अनेक 28 मार्च 1941 को बर्लिन (जर्मनी) पहुँचे। बर्लिन में उन्होंने स्वतंत्र भारत केन्द्र की स्थापना की। यहाँ उन्होंने सिंगापुर तथा उत्तर अफ्रीका से लाए गए भारतीय युद्धबंदियों को एकत्र करके सैनिक दल का गठन किया। इस सैनिक दल के सदस्य सुभाष को ‘नेताजी’ के नाम से संबोधित करते थे। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हिटलर ने उन्हें यह संबोधन दिया। पर भारतीय नाम नेताजी तो कोई भारतीय ही दे सकता है। सुभाष ने नियमित प्रसारण हेतु आज़ाद हिंद रेडियो की शुरुआत करवाई। अक्तूबर 1941 से इसका प्रसारण प्रारम्भ हुआ, यहाँ से भारतवासियों तथा पूर्वी एशिया के भारतीयों के लिए अंग्रेजी, हिन्दुस्तानी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, फ़ारसी व पश्तो इन सात भाषाओं में संस्था की गतिविधियों का प्रसारण किया जाता था। उधर फरवरी 1942 में अंग्रेज सेना ने सिंगापुर में जापानी सैनिकों के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इनमें भारतीय सेना के अधिकारी और पाँच हज़ार सैनिक थे जिन्हें जापानी सेना ने बंदी बना लिया था। इन्हीं सैनिकों ने आजाद हिंद फौज तैयार की। सुभाष जर्मनी बोस को तार भेजकर जर्मनी से पूर्वी एशिया में आकर भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व स्वीकार करने हेतु बुलाया गया। 8 फरवरी 1943 को जर्मनी से आबिद अली हसन के साथ एक पनडुब्बी में सवार होकर 90 दिन की खतरनाक यात्रा कर 6 मई को सुमात्रा के पेनांग फिर वहाँ से 16 मई 1943 को तोक्यो पहुँचे। 21 जून 1943 को नेताजी ने तोक्यो रेडियो से भाषण दिया। देश का सबसे प्रसिद्ध नारा जैहिन्द नेताजी ने ही दिया था।


दामोदर घाटी निगम के विषय में विस्तार से जानकारी दीजिए।
अशोक कुमार ठाकुर, ग्राम-मालीटोल, पोस्ट-अदलपुर, जिला-दरभंगा (बिहार)
दामोदर घाटी निगम देश की पहली बहु उद्देश्यीय नदी घाटी परियोजना है। यह निगम 7 जुलाई, 1948 को अस्तित्व में आया। दामोदर नदी तत्कालीन बिहार जो अब झारखंड है और पश्चिम बंगाल से होकर तकरीबन 25,000 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैली है। दामोदर नदी झारखंड के लोहरदगा और लातेहार जिले की सीमा पर बसे बोदा पहाड़ के चूल्हापानी नामक स्थान से निकलकर पश्चिम बंगाल के गंगा सागर से कुछ पहले गंगा में हुगली के पास मिलती है। झारखंड में इसकी लंबाई करीब 300 किलोमीटर और पश्चिम बंगाल में करीब 263 किलोमीटर है। दामोदर बेसिन का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 16,93,380 हेक्टेयर है।
आजादी के पूर्व इस नदी को 'बंगाल का शोक' कहा जाता था। झारखंड में यह नदी पहाड़ी और खाईनुमा स्थलों से होकर गुजरती है लेकिन बंगाल में इसे समतल भूमि से गुजरना पड़ता है। बाढ़ आने पर झारखंड को तो खास नुकसान नहीं होता था, लेकिन बंगाल में इसके आसपास की सारी फसलें बरबाद हो जाती थी। 1943 में आई भयंकर बाढ़ ने बंगाल को हिलाकर रख दिया। इस स्थिति से निपटने के लिए वैज्ञानिक मेघनाथ साहा की पहल पर अमेरिका की 'टेनेसी वैली अथॉरिटी' के तर्ज पर 'दामोदर घाटी निगम' की स्थापना की गई। इसके बाद पश्चिम बंगाल का प्रभावित इलाका जल प्रलय से मुक्त होकर उपजाऊ जमीन में परिवर्तित हो गया। झारखंड में इसी नदी पर चार बड़े जलाशयों के निर्माण के बाद यहां विस्थापन की समस्या तो बढ़ी ही ,उपयोगी व उपजाऊ जमीन डूब गई। इस नदी के दोनों किनारे अंधाधुंध उद्योगों का विकास हुआ और इससे नदी का जल प्रदूषित होने लगा। नदी को नियंत्रित करने की योजना अंग्रेजी शासन काल में ही बन गई थी। अप्रैल 1947 तक योजना के क्रियान्वयन के लिए केन्द्रीय, पश्चिम बंगाल तथा बिहार सरकारों के बीच करार हो गया था। मार्च 1948 में दामोदर घाटी निगम के गठन के उद्देश्य हेतु भारत सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और बिहार (अब झारखंड) की संयुक्त सहभागिता को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय विधानमंडल ने दामोदर घाटी निगम अधिनियम (1948 ) पास किया। इस योजना के प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित हैं- बाढ़ नियंत्रण व सिचाई, विद्युत उत्पादन, पारेषण व वितरण, पर्यावरण संरक्षण तथा वनीकरण, दामोदर घाटी के निवासियों का सामाजिक-आर्थिक कल्याण
औद्योगिक और घरेलू उपयोग हेतु जलापूर्ति। कोयला, जल तथा तरल र्इंधन तीनों स्रोतों से बिजली पैदा करने वाला भारत सरकार का यह पहला संगठन है। मैथन में भारत का पहला भूमिगत पन बिजली केन्द्र है।

बंदूक चलाने पर पीछे की तरफ झटका क्यों लगता है?
परी चतुर्वेदी. ए-1103, आईडीपीएल कॉलोनी, ऋषिकेश-249201 (उत्तराखंड)
न्यूटन का गति का तीसरा नियम है कि प्रत्येक क्रिया की सदैव बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। जब बंदूक की गोली आगे बढ़ती है तब वह पीछे की ओर भी धक्का देती है। गोली तभी आगे बढ़ती है जब बंदूक का बोल्ट उसके पीछे से प्रहार करता है। इससे जो शक्ति जन्म लेती है वह आगे की और ही नहीं जाती पीछे भी जाती है। तोप से गोला दगने पर भी यही होता है। आप किसी हथौड़े से किसी चीज पर वार करें तो हथौड़े में भी पीछे की और झटका लगता है।

रेव पार्टी शब्द आजकल खासा प्रचलन में है। यह शब्द किस अर्थ में आता है?
धीरज कुमार, 38, बैचलर्स आश्रम, निकट आईटी कॉलेज, निराला नगर, लखनऊ-226020
अंग्रेजी शब्द रेव का मतलब है मौज मस्ती। टु रेव इसकी क्रिया है यानी मस्ती मनाना। पश्चिमी देशों में भी यह शब्द बीसवीं सदी में ही लोकप्रिय हुआ। ब्रिटिश स्लैंग में रेव माने वाइल्ड पार्टी। इसमें डिस्क जॉकी, इलेक्ट्रॉनिक म्यूज़िक का प्राधान्य होता है। अमेरिका में अस्सी के दशक में एसिड हाउस म्यूज़िक का चलन था। रेव पार्टी का शाब्दिक अर्थ हुआ 'मौज मस्ती की पार्टी'। इसमें ड्रग्स, तेज़ पश्चिमी संगीत, नाचना, शोर-गुल और सेक्स का कॉकटेल होता है। भारत में ये मुम्बई, दिल्ली से शुरू हुईं। अब छोटे शहरों तक पहुँच गई हैं, लेकिन नशे के घालमेल ने रेव पार्टी का उसूल बदल दिया है। पहले यह खुले में होती थीं अब छिपकर होने लगी हैं।

महामहिम और महामना शब्द से क्या तात्पर्य है?
एसपी बिस्सा, एफ-250, मुरलीधर व्यास नगर, भैरव मंदिर के पास, बीकानेर-334004 (राजस्थान)
शब्दकोश के अनुसार महामना (सं.) [वि.] बहुत उच्च और उदार मन वाला; उदारचित्त; बड़े दिलवाला। [सं-पु.] एक सम्मान सूचक संबोधन। और महामहिम (सं.) [वि.] 1. जिसकी महिमा बहुत अधिक हो; बहुत बड़ी महिमा वाला; महामहिमायुक्त 2. अति महत्व शाली। [सं-पु.] एक सम्मान सूचक संबोधन। आधुनिक अर्थ में हम राजद्वारीय सम्मान से जुड़े व्यक्तियों को महामहिम कहने लगे हैं। मसलन राष्ट्रपति और राज्यपालों को। अब तो जन प्रतिनिधियों के लिए भी इस शब्द का इस्तेमाल होने लगा है। इस शब्द से पुरानी सामंती गंध आती है और शायद इसीलिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को अपने पदनाम से पहले 'महामहिम ' जोड़ना पसंद नहीं है, इसलिए पिछले कुछ समय से उनके कार्यक्रमों से जुड़े बैनर,पोस्टर या निमंत्रण पत्रों में 'महामहिम' नहीं लिखा गया। यहाँ तक, कि उनके स्वागत-सम्मान वाले भाषणों में भी 'महामहिम' संबोधन से परहेज किया गया। अंग्रेजी में भी उनके नाम से पहले 'हिज़ एक्सेलेंसी' नहीं जोड़ा गया। कुछ राज्यपालों ने भी इस दिशा में पहल की है। महामना शब्द के साथ सरकारी पद नहीं जुड़ा है। इसका इस्तेमाल भी ज्यादा नहीं होता। यह प्रायः गुणीजन, उदार समाजसेवियों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है और इसका सबसे बेहतरीन इस्तेमाल महामना मदन मोहन मालवीय के लिए होते देखा गया है।

ई-कचरा क्या है? इसका निपटारा कैसे होगा?
सीमा सिंह, ग्रा व पो जलालपुर माफी (चुनार), जनपद-मीरजापुर-231304 (उत्तर प्रदेश)
आपने ध्यान दिया होगा कि घरों से निकलने वाले कबाड़ में अब पुराने अखबारों, बोतल, डिब्बों, लोहा-लक्कड़ के अलावा पुराने कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, सीडी, टीवी, अवन, रेफ्रिजरेटर, एसी जैसे तमाम इलेक्ट्रॉनिक आइटम जगह बनाते जा रहे हैं। पहले बड़े आकार के कम्प्यूटर, मॉनिटर आते थे, जिनकी जगह स्लिम और फ्लैट स्क्रीन वाले छोटे मॉनिटरों ने ले ली है। माउस, की-बोर्ड या अन्य उपकरण जो चलन से बाहर हो गए हैं, वे ई-वेस्ट की श्रेणी में आते हैं। फैक्स, मोबाइल, फोटो कॉपियर, कम्प्यूटर, लैप-टॉप, कंडेंसर, माइक्रो चिप्स, पुरानी शैली के कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, टेलीविजन और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों तथा अन्य उपकरणों के बेकार हो जाने के कारण इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। अमेरिका में हरेक घर में साल भर में औसतन छोटे-मोटे 24 इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खरीदे जाते हैं। इन पुराने उपकरणों का फिर कोई उपयोग नहीं होता। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका में कितना इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकलता होगा। बदलती जीवन शैली और बढ़ते शहरीकरण के कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का ज्यादा प्रयोग होने लगा है। इससे पैदा होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे के दुष्परिणाम से हम बेखबर हैं। ई-कचरे से निकलने वाले रासायनिक तत्त्व लीवर, किडनी को प्रभावित करने के अलावा कैंसर, लकवा जैसी बीमारियों का कारण बन रहे हैं। उन इलाकों में रोग बढ़ने का अंदेशा ज्यादा है जहाँ अवैज्ञानिक तरीके से ई-कचरे की रीसाइक्लिंग की जा रही है। ई-वेस्ट से निकलने वाले जहरीले तत्व और गैसें मिट्टी व पानी में मिलकर उन्हें बंजर और जहरीला बना देते हैं। फसलों और पानी के जरिए ये तत्व हमारे शरीर में पहुंचकर बीमारियों को जन्म देते हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने कुछ साल पहले जब सर्किट बोर्ड जलाने वाले इलाके के आसपास शोध कराया तो पूरे इलाके में बड़ी तादाद में जहरीले तत्व मिले थे, जिनसे वहां काम करने वाले लोगों को कैंसर होने की आशंका जताई गई, जबकि आसपास के लोग भी फसलों के जरिए इससे प्रभावित हो रहे थे।

भारत सहित कई अन्य देशों में हजारों की संख्या में महिला पुरुष व बच्चे इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निपटान में लगे हैं। इस कचरे को आग में जलाकर इसमें से आवश्यक धातु आदि भी निकाली जाती हैं। इसे जलाने के दौरान जहरीला धुआँ निकलता है, जो घातक होता है। सरकार के अनुसार 2004 में देश में ई-कचरे की मात्रा एक लाख 46 हजार 800 टन थी जो बढ़कर वर्ष 2012 तक आठ लाख टन से ज्यादा हो गई है। विकसित देश अपने यहाँ के इलेक्ट्रॉनिक कचरे की गरीब देशों को बेच रहे हैं। गरीब देशों में ई-कचरे के निपटान के लिए नियम-कानून नहीं बने हैं।  इस कचरे से होने वाले नुकसान का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें 38 अलग प्रकार के रासायनिक तत्व शामिल होते हैं जिनसे काफी नुकसान भी हो सकता है। इस कचरे को आग में जलाकर या तेजाब में डुबोकर इसमें से आवश्यक धातु आदि निकाली जाती है।
यों ई-वेस्ट के सही निपटान के लिए जब तक व्यवस्थित ट्रीटमेंट नहीं किया जाता, वह पानी और हवा में जहर फैलता रहेगा। कुछ समय पहले दिल्ली के एक कबाड़ी बाजार में एक उपकरण से हुए रेडिएशन के बाद इस खतरे की और ध्यान गया है।


Monday, July 21, 2014

खर्राटे क्यों आते हैं?

खर्राटे क्यों आते हैंक्या यह कोई बीमारी है या उसका कोई लक्षण है?
सोते समय गले का पिछला हिस्सा थोड़ा सँकरा हो जाता है। साँस जब सँकरी जगह से जाती है तो आसपास के टिशुओं में स्पंदन होता है, जिससे आवाज आती है। यही हैं खर्राटे। यह सँकरापन नाक एवं मुँह में सूजन के कारण भी हो सकता है। यह सूजन एलर्जी, संक्रमण, धूम्रपान, शराब पीने या किसी दूसरे कारण से हो सकती है। इससे फेफड़ों को कम आक्सीजन मिलती हैजिससे मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर ज्यादा ऑक्सीजन माँगने लगते हैं। ऐसे में नाक एवं मुँह ज्यादा सक्रिय हो जाते हैंजिससे खर्राटे की आवाज आने लगती है। बच्चों में एडीनॉयड ग्रंथि में सूजन एवं टांसिल से भी खर्राटे आते हैं। मोटापे के कारण भी गले की नली में सूजन से रास्ता संकरा हो जाता हैऔर सांस लेने में आवाज आने लगती है। जीभ का बढ़ा आकार भी खर्राटे का बड़ा कारण है। ब्राज़ील में हुए एक शोध के अनुसार भोजन में नमक की अध‌िकता शरीर में ऐसे फ्लूइड का निर्माण करती है जिससे नाक के छिद्र में व्यवधान होता है।

बहरहाल खर्राटे या तो खुद बीमारी हैं या बीमारी का लक्षण हैं। खर्राटे से अचानक हृदय गति रुकने का खतरा रहता है। मधुमेह एवं मोटापे की बीमारी के कारण खर्राटे के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। खर्राटे के दौरान शरीर में रक्त संचार अनियमित हो जाता हैजो दिल के दौरे का बड़ा कारण है। दिमाग में रक्त की कम आपूर्ति से पक्षाघात तक हो सकता है। इससे फेफड़ों पर भी दबाव पड़ता है। खर्राटे के रोगियों को पॉलीसोमनोग्राफी टेस्ट करवाना चाहिए। यह टेस्ट व्यक्ति के सोते समय की शारीरिक स्थितियों की जानकारी देता है।
भारत का नाम भारत कैसे पड़ा?
भारतवर्ष का नामकरण कैसे हुआ इस संबंध में मतभेद हैं। भारतवर्ष में तीन भरत हुए एक भगवान ऋषभदेव के पुत्र, दूसरे राजा दशरथ के और तीसरे दुश्यंत- शकुंतला के पुत्र भरत। भारत नाम की उत्पति का संबंध प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट राजा मनु के वंशज भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत से है। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के पश्चात ब्रह्मा के मानस पुत्र मनु ने व्यवस्था सम्हाली। ऋषभदेव मनु से पांचवीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वयंभू मनु, प्रियव्रत, आग्नीध्र, नाभि और फिर ऋषभ। वृद्धावस्था में आग्नीध्र ने अपने नौ पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न नौ स्थानों का शासन दायित्व सौंपा। इन नौ पुत्रों में सबसे बड़े थे नाभि जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला। इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम अजनाभ से जोड़कर अजनाभवर्ष प्रचारित किया। राजा नाभि के पुत्र थे ऋषभ। पहले भारतवर्ष का नाम ॠषभदेव के पिता नाभिराज के नाम पर अजनाभवर्ष प्रसिद्ध था। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे। विष्णु पुराण में उल्लेख आता है "ततश्च भारतवर्ष तल्लो केषु गीयते" अर्थात् "तभी से इस देश को भारत वर्ष कहा जाने लगा"। वायु पुराण भी कहता है कि इससे पहले भारतवर्ष का नाम हिमवर्ष था। पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना 'महाभारत' में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। कालिदास कृत महान संस्कृत ग्रंथ 'अभिज्ञान शाकुंतलम' के एक वृत्तांत अनुसार राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष का नामकरण हुआ।

थ्री-डी फिल्म की शुरूआत कैसे हुई? कम्प्यूटर से या कैमरा से थ्री-डी इफेक्ट कैसे दिया जाता है?
थ्री-डी फिल्म मूवी की एक तकनीक है, जिसमें छवियां वास्तविक लगती हैं। इसमें चित्रों को रिकॉर्ड करने के लिए विशेष मोशन पिक्चर कैमरे का प्रयोग किया जाता है। यह तकनीक नई नहीं है। सन 1890 के दौरान भी इनका प्रदर्शन होता था, पर उस समय के इन फिल्मों को थिएटर पर दिखाया जाना काफी महंगा काम होता था। मुख्यत: 1950 से 1980 के बीच अमेरिकी सिनेमा में ये फिल्में प्रमुखता से दिखने लगी।
मोशन पिक्चर का स्टीरियोस्कोपिक युग 1890 के दशक के अंतिम दौर में आरंभ हुआ जब ब्रिटिश फिल्मों के पुरोधा विलियम ग्रीन ने थ्री-डी प्रक्रिया का पेटेंट फाइल किया। फ्रेडरिक युजीन आइव्स ने स्टीरियो कैमरा रिग का पेटेंट 1900 में कराया। इस कैमरे में दो लैंस लगाए जाते थे जो एक दूसरे से तीन-चौथाई इंच की दूरी पर होते थे। 27 सितंबर, 1922 को पहली बार दर्शकों को लॉस एंजेलस के एंबेसडर थिएटर होटल में द पावर ऑफ लव का प्रदर्शन आयोजित किया गया था। सन 1952 में पहली कलर स्टीरियोस्कोपिक फीचर, वान डेविल बनाई गई। इसके लेखक, निर्माता और निर्देशक एमएल गुंजबर्ग थे। स्टीरियोस्कोपिक साउंड में बनी पहली थ्री-डी फीचर फिल्म हाउस ऑफ वैक्स थी।
सिनेमा में तीसरा आयाम जोड़ने के लिए उसमें अतिरिक्त गहराई जोड़ने की जरूरत होती है। वैसे असल में यह केवल छद्म प्रदर्शन मात्र होता है। फिल्मांकन के लिए प्रायः 90 डिग्री पर स्थित दो कैमरों का एक-साथ प्रयोग कर चित्र उतारे जाते हैं और साथ में दर्पण का भी प्रयोग किया जाता है। दर्शक थ्री-डी चश्मे के साथ दो चित्रों को एक ही महसूस करते हैं और वह उसे त्रि-आयामी या थ्री-डायमेंशनल लगती है। ऐसी फिल्में देखने के लिए कुछ समय पहले तक एक खास तरीके के चश्मे को पहनने की आवश्यकता होती है। हाल ही निर्माता-निर्देशक स्टीवन स्पीलर्ब ने एक ऐसी तकनीक का पेटेंट कराया है, जिसमें थ्री-डी फिल्म देखने के लिए चश्मे की कोई जरूरत नहीं रहेगी। भारत में भी कई थ्री-डी फिल्में बन चुकी हैं। सन 1985 में छोटा चेतन और शिवा का इन्साफ रिलीज़ हुई थी। रंगीन चश्मे के साथ फिल्म देखने का अनुभव एकदम नया था। भारत में अब 20-25 पुरानी फिल्मों को थ्री-डी में बदला जा रहा है। 
  
पहला टेस्ट ट्यूब बेबी कितने साल का है? आजकल क्या कर रहा है?
कर रहा है नहीं कर रही है। पुरुष पहले आया या स्त्री इसका पता नहीं, पर टेस्ट ट्यूब बेबी के रूप में सबसे पहले लड़की का जन्म हुआ था। 25 जुलाई 1978 को ग्रेट ब्रिटेन में लेज़्ली ब्राउन ने दुनिया के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी को जन्म दिया था। इस बेबी का नाम है लुइज़ जॉय ब्राउन। इनके पिता का नाम है जॉन ब्राउन। इनके माता-पिता के विवाह के नौ साल बाद तक संतान नहीं होने पर उन्होंने डॉक्टरों से सम्पर्क किया। डॉक्टर रॉबर्ट जी एडवर्ड्स कई साल से ऐसी तकनीक विकसित करने के प्रयास में थे, जिसे इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन कहा जाता है। डॉक्टर एडवर्ड्स को बाद में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार भी दिया गया। टेस्ट ट्यूब बेबी लुइज़ आज 34 वर्ष की हैं और वे एक बच्चे की माँ हैं। उनके बेटे का नाम केमरन है, जिसकी उम्र पाँच साल है। लुइज़ का विवाह सन 2004 में वेस्ली मलिंडर से हुआ था। और 20 दिसम्बर 2006 को केमरन का जन्म सामान्य तरीके से हुआ।

हमारे राष्ट्रीय ध्वज को किसने डिजाइन किया?
तिरंगे झंडे का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए। इसका विकास हुआ है और इसमें कई लोगों का योगदान है। माना जाता है कि सबसे पहले आंध्र प्रदेश के देशभक्त कृषि विज्ञानी पिंगली वैंकैया ने इसकी परिकल्पना की थी। उन्होंने गांधी जी को एक राष्ट्रीय ध्वज का सुझाव दिया था। गांधी जी ने सबसे पहले 1921 में कांग्रेस के अपने झंडे की बात की थी। इस झंडे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। इसमें दो रंग थे लाल रंग हिन्दुओं के लिए और हरा रंग मुस्लिमों के लिए। बीच में एक चक्र था। बाद में इसमें अन्य धर्मों के लिए सफेद रंग जोड़ा गया। कांग्रेस के ध्वज में बीच में चरखा था। ध्वज को उसके वर्तमान रूप में 15 अगस्त 1947 के कुछ ही दिन पूर्व 22 जुलाई, 1947 को आयोजित भारतीय संविधान-सभा की बैठक में अपनाया गया था। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र ने ली। इस नए झंडे की देश के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने फिर से व्याख्या की।
इससे भी पहले 1904  में स्वामी विवेकानन्द की शिष्या भगिनी निवेदिता ने एक ध्वज बनाया था। 7 अगस्त, 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम् लिखा गया था। द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों ने फहराया था। कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार यह 1905 की बात है। यह भी पहले ध्वज के समान था; सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, किंतु सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था। 1917 में डॉ. एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान एक और ध्वज फहराया। इस ध्वज में ५ लाल और ४ हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के प्रतीक रूप में सात सितारे बने थे। ऊपरी किनारे पर बाईं ओर यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
ऐ मेरे वतन के लोगो, गीत किसने लिखा? इस गाने के कितने वर्ष हो गए?
सबसे पहले लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप के लिखे इस गाने को गाया था 27 जनवरी 1963 को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने। 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की बुरी हार हुई थी। पूरे देश का मनोबल गिरा हुआ था. ऐसे में सबकी निगाहें फ़िल्म जगत और कवियों की तरफ़ जम गईं कि वे कैसे सबके उत्साह को बढ़ाने का काम कर सकते हैं। कवि प्रदीप ने एक जगह बताया है कि उस दौर में तीन महान आवाज़ें हुआ करती थीं. मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और लता मंगेशकर. उसी दौरान नौशाद भाई ने तो मोहम्मद रफ़ी से 'अपनी आज़ादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं', गीत गवा लिया, जो बाद में फ़िल्म 'लीडर' में इस्तेमाल हुआ। राज साहब ने मुकेश से 'जिस देश में गंगा बहती है' गीत गवा लिया. तो इस तरह से रफ़ी और मुकेश तो पहले ही रिज़र्व हो गए. अब बचीं लता जी. उनकी मखमली आवाज़ में कोई जोशीला गाना फिट नहीं बैठता। यह बात मैं जानता था। तो मैंने एक भावनात्मक गाना लिखने की सोची। इस तरह से 'ऐ मेरे वतन के लोगों' का जन्म हुआ, जिसे लता ने पंडित नेहरू के सामने गाया और उनकी आंखों से भी आंसू छलक आए।

वॉट्सएप की शुरूआत किसने की और कब की?

वॉट्सएप की शुरूआत किसने की और कब की? इस एप का कोई फुल फॉर्म है?
वॉट्सएप स्मार्टफोन पर इंटरनेट के मार्फत संदेश भेजने की सेवा है। इसमें टेक्स्ट के अलावा फोटो, ऑडियो और वीडियो फाइलें भी भेजी जा सकती हैं। यह गूगल एंड्रॉयड, ब्लैकबेरी, एपल, नोकिया सीरीज़ 40 और माइक्रोसॉफ्ट विंडो प्लेटफॉर्म पर काम करता है। वॉट्सएप इनकॉरपोरेट की स्थापना सन 2009 में अमेरिकी ब्रायन एक्टन और यूक्रेन के जैन काऊम ने की थी। ये दोनों याहू के पूर्व कर्मचारी थे। यह कम्पनी माउंटेन व्यू, सेंटा क्लारा काउंटी, कैलिफोर्निया में है। वॉट्सएप के मुकाबले कुछ और सेवाएं इस बीच आ गईं हैं। इनमें लाइन, काकाओ टॉक, वीचैट और ज़ालो भी शामिल हैं। जो काम एसएमएस ने मोबाइल फोन पर और स्काइप ने कम्प्यूटर पर किया, तकरीबन वैसा ही काम वॉट्सएप ने किया है। यह नाम रखने के पीछे मंशा वॉट्सअप और एप्लीकेशंस के एप को जोड़ने की रही होगी। वॉट्सएप आमतौर पर अंग्रेजी में क्या चल रहा है के लिए कहा जाता है।

Sunday, July 20, 2014

कौन सा देश स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाता?

विश्व में कहाँ पर स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया जाता?
स्वतंत्रता दिवस वही देश मनाएगा, जो कभी परतंत्र रहा हो। यूके, रूस, फ्रांस, नेपाल, थाईलैंड, जापान, चीन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे अनेक देश नहीं मनाते। फिर भी फ्रांसीसी क्रांति की याद में बास्तील दिवस मनाता है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका पर बाहर से आए लोगों का शासन है। पर वे अब भी इन देशों के निवासी हैं, इसलिए स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाते। चीन 1 अक्तूबर को कम्युनिस्ट शासन की शुरूआत को मनाता है। नेपाल 29 मई 2008 को संप्रभुता सम्पन्न गणतंत्र बना। इस दिन यहाँ से राजशाही का खात्मा हुआ। नेपाल में लोकतंत्र दिवस हर साल फाल्गुन सप्तमी को मनाया जाता है। इस रोज सन 1951 में राजा त्रिभुवन ने देश को राणाशाही के हाथों से निकाल कर लोकतंत्र की स्थापना की थी। पर देश में लोकतंत्र 1960 में आया जब राजा महेन्द्र ने पंचायत प्रणाली की स्थापना की।

ग्रेट विक्टोरिया रेगिस्तान कहाँ है?
ग्रेट विक्टोरिया रेगिस्तान ऑस्ट्रेलियन रेगिस्तानों में से एक है। इस रेगिस्तान का क्षेत्रफल 338,000 वर्ग किमी है। इस विशाल रेगिस्तान में रेतीले टीलों की भरमार है। इस रेगिस्तान की यह विशेषता है कि यहाँ वनस्पति बहुतायत से होती है। ब्रिटेन ने 1952 में जब एटम बम बनाया तो उसका परीक्षण यहाँ आकर किया।

ट्यूबलाइट में चोक का क्या इस्तेमाल होता है?
ट्यूबलाइट मूलतः मर्करी वैपर लैम्प है। इसमें मर्करी वैपर को चार्ज करने के लिए बिजली के हाई वोल्टेज प्रवाह की जरूरत होती है। चोक और स्टार्टर प्रेरक या inductor या reactor का काम करते हैं। प्रेरक को साधारण भाषा में 'चोक' (choke) और 'कुण्डली' (coil) भी कहते हैं। ट्यूबलाइट आदि को जलाने के लिए हाई वोल्ट पैदा करने एवं जलने के बाद उससे बहने वाली धारा को सीमित रखने के लिए इसका इस्तेमाल होता है। पुरानी कारों एवं स्कूटरों आदि में स्पार्क पैदा करने के लिए इग्नीशन क्वायल की भी यही भूमिका होती है।

प्रकृति में सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करने वाला पेड़ या पौधा कौन सा है?
पेड़ या पौधे ऑक्सीजन तैयार नहीं करते बल्कि वे फोटो सिंथेसिस या प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करते हैं और उसके दो बुनियादी तत्वों को अलग करके ऑक्सीजन को वातावरण में फैलाते हैं। एक माने में वातावरण को इंसान के रहने लायक बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। कौन सा पेड़ सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करते है? इसे लेकर अधिकार के साथ कहना मुश्किल है, पर तुलसी, पीपल, नीम और बरगद के पेड़ काफी ऑक्सीजन तैयार करते हैं और हमारे परम्परागत समाज में इनकी पूजा होती है। यों पेड़ों के मुकाबले काई ज्यादा ऑक्सीजन तैयार करती है।
प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है जिसमें पौधे अपने हरे रंग वाले अंगों जैसे पत्तीद्वारा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बन डाइऑक्साइड तथा भूमि से जल लेकर जटिल कार्बनिक खाद्य पदार्थों जैसे कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं। इस प्रक्रिया में आक्सीजन एवं ऊर्जा से भरपूर कार्बोहाइड्रेट (सूक्रोजग्लूकोजस्टार्च आदि) का निर्माण होता है तथा आक्सीजन गैस बाहर निकलती है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रियाओं में से एक है। सीधे या परोक्ष रूप से दुनिया के सभी सजीव इस पर आश्रित हैं। 

शीशे का आविष्कार कब और कैसे हुआ और इसका पहली बार किस रूप में उपयोग किया गया?
शीशे से आपका आशय दर्पण से है तो वह प्रकृति ने हमें ठहरे हुए पानी के रूप में दिया था। पत्थर युग में चिकने पत्थर में भी इंसान को अपना प्रतिबिंब नज़र आने लगा था। इसके बाद यूनान, मिस्र, रोम, चीन और भारत की सभ्यताओं में धातु को चमकदार बनाकर उसका इस्तेमाल दर्पण की तरह करने की परंपरा शुरू हुई। पर प्रकृति ने उससे पहले उन्हें एक दर्पण बनाकर दे दिया था। यह था ऑब्सीडियन। ज्वालामुखी के लावा के जमने के बाद बने कुछ काले चमकदार पत्थर एकदम दर्पण का काम करते थे। बहरहाल धातु युग में इंसान ने ताँबे की प्लेटों को चमकाकर दर्पण बना लिए। प्राचीन सभ्यताओं को शीशा बनाने की कला भी आती थी। ईसा की पाँचवीं सदी में चीन के लोगों ने चाँदी और मरकरी से शीशे के एक और कोटिंग करके दर्पण बना लिए थे। हमारे यहाँ स्त्रियों के गहनों में आरसी भी एक गहना है, जो वस्तुतः चेहरा देखने वाला दर्पण है।

एंटी ऑक्सीडेंट क्या होते हैं और ये शरीर पर क्या प्रभाव डालते हैं?
हमारे शरीर की खरबों कोशिकाओं को पोषण की कमी और संक्रमण का ही खतरा नहीं होता हैबल्कि फ्री रेडिकल्स भी कोशिकाओं को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। यह फ्री रेडिकल्स भोजन को ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया में उप-उत्पाद के रूप में निकलते हैं। इसके अलावा कुछ उस भोजन में होते हैं जो हम खाते हैंकुछ उस हवा में तैरते रहते हैं जो हमारे आसपास मौजूद होती है। फ्री रेडिकल्स अलग-अलग आकारमाप और रासायनिक संगठन के होते हैं। फ्री रेडिकल्स कोशिकाओं को नष्ट करके हृदय रोगोंकैंसर और दूसरी बीमारियों की आशंका बढ़ा सकते हैं। एंटी ऑक्सीडेंट फ्री रेडिकल्स के प्रभाव से कोशिकाओं को बचाते हैं। भोजन को पचाने में कई क्रियाएं होती हैं। शरीर भोजन से अपने लिए जरूरी तत्वों को ले लेता है लेकिन उन तत्वों को अलग कर देता है जो नुकसानदेह हैं। ये विषैले तत्व कई बार शरीर से आसानी से नहीं निकलते। ऐसे में एंटी ऑक्सीडेंट उन्हें शरीर से बाहर करता है और शरीर की सफाई करता है।
एंटी ऑक्सीडेंट वह अणु होते हैं जो दूसरे अणुओं के ऑक्सीडेशन को रोकते हैं। सैकड़ों नहीं हजारों पदार्थ एंटी ऑक्सीडेंट की तरह कार्य करते हैं। यह विटामिनमिनरल्स और दूसरे कई पोषक तत्व होते हैं। बीटा कैरोटिनल्युटिन लाइकोपीनफ्लैवोनाइडलिगनान जैसे एंटी ऑक्सीडेंट हमारे लिए बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण हैं। इनके अलावा मिनरल सेलेनियम भी एक एंटी ऑक्सीडेंट की तरह कार्य करता है। विटामिन एविटामिन सी और विटामिन ई की एक एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में हमारे शरीर में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

एंटी ऑक्सीडेंट ताजे फल और सब्जियों में सबसे अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इन्हें स्कैवेंजर भी कहते हैंक्योंकि यह फ्री रेडिकल्स को खाकर शरीर की सफाई करते हैं। गाजर शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट बीटा-कैरोटिन से भरपूर होती है। यह शकरकंदशलजम और पीली एवं नारंगी रंग की सब्जियों में होता है। टमाटर में लाइकोपीन होता है। यह फेफड़ेबड़ी आंत और स्तन कैंसर से बचाता है और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखता है। चाय हमें कैंसरहृदय रोगोंस्ट्रोक और दूसरी बीमारियों से बचाती है। हरी और काली दोनों चाय काफी लाभदायक होती हैं। लहसुन एंटी ऑक्सीडेंट से भरपूर होता है जो कैंसर और हृदय रोगों से लड़ने में मददगार होता है और बढ़ती उम्र के प्रभावों को कम करता है।

नक्षत्र क्या होते हैं? क्या हम नक्षत्रों तक जा सकते हैं, जैसे कि चाँद पर?
नक्षत्र यानी स्टार या सितारे जो ऊर्जा पैदा करते हैं। जैसे हमारा सूर्य। संपूर्ण सूर्य के गोले में 13 लाख पृथ्वियां समा सकती है। सूर्य की सतह का तापमान 6000 डिग्री सैल्शियस है और केंद्र में 1.5 डिग्री सैल्शियस है। किसी भी प्राणी या यंत्र का वहाँ तक पहुँचना सम्भव नहीं। उनका अध्ययन दूर से करते हैं।


दुनिया का सबसे ऊँचा पेड़

विश्व का सबसे ऊँचा पेड़ कौन सा है?

दुनिया का सबसे ऊँचा जीवित पेड़ है रेडवुड नेशनल पार्क, कैलिफोर्निया में खड़ा कोस्ट रेडवुड जिसकी ऊँचाई है 115.66 मीटर यानी 379 फुट। कुतुब मीनार से भी ऊँचे इस पेड़ की तुलना कुछ और चीजों से करें तो पाएंगे कि यह अमेरिकी संसद भवन और स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ज्यादा ऊँचा है। और सबसे बड़ा यानी सबसे ज्यादा जगह घेरने वाला सिंगल स्टैम पेड़ है जनरल शर्मन। आसानी से समझने के लिए सबसे ज्यादा लकड़ी देने वाला


पेड़। जनरल शर्मन पेड़ अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के सेक्योवा नेशनल पार्क में मौजूद है। यह इतिहास में ज्ञात जीवित पेड़ों में सबसे ऊँचा नहीं है। दरअसल यह मनुष्यों को ज्ञात सबसे विशाल वृक्ष भी नहीं है। ट्रिनिडाड, कैलिफोर्निया के पास क्रैनेल क्रीक जाइंट पेड़ जनरल शर्मन के मुकाबले 15 से 25 प्रतिशत ज्यादा बड़ा था। पर उस पेड़ को 1940 के दशक में काट डाला गया।





Wednesday, July 2, 2014

दुनिया की सबसे बड़ी इमारत

बुर्ज खलीफा 
विश्व की सबसे बड़ी इमारत कहाँ पर है?
सऊदी अरब के मक्का शहर में अब्राज अल बेयत टावर्स दुनिया की सबसे बड़ी इमारत है जिसमें तकरीबन 15 लाख वर्ग मीटर एरिया है। यह इमारत ऊँचाई के लिहाज से दुनिया की दूसरी सबसे ऊँची इमारत है। इसकी ऊँचाई 601 मीटर या 1972 फुट है। दुनिया की सबसे ऊँची इमारत है दुबई की बुर्ज खलीफा जो 828 मीटर ऊँची है। चीन के सिचुआन प्रांत के चेंगदू शहर में न्यू सेंचुरी ग्लोबल सेंटर बनाया गया है। चीन का दावा है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी इमारत है। इसके अंदर कई शॉपिंग मॉल और होटल हैं। इस बिल्डिंग में सिडनी के 20 ऑपेरा हाउस या तीन पैंटागन आ सकते हैं। यह 400 मीटर चौड़ी और 1500 मीटर लंबी और 100 मीटर ऊंची है। इस साल 28 जून को पब्लिक के लिए खोली गई इस इमारत को बनाने में 3 साल लगे। इमारत में एक आर्टीफिशल सूर्य बनाया गया है जो 24 घंटे रोशनी और गर्मी देगा।







भारत में चंदन के पेड़ कहाँ पाए जाते हैं?
भारतीय चंदन का संसार में सर्वोच्च स्थान है। इसका आर्थिक महत्व भी है। यह पेड़ मुख्यत: कर्नाटक के जंगलों में मिलता है तथा देश के अन्य भागों में भी कहीं-कहीं पाया जाता है। भारत के 600 से लेकर 900 मीटर तक कुछ ऊँचे स्थल और मलयद्वीप इसके मूल स्थान हैं। वृक्ष की आयुवृद्धि के साथ ही साथ उसके तनों और जड़ों की लकड़ी में सुगंधित तेल का अंश भी बढ़ने लगता है। इसकी पूर्ण परिपक्वता में 60 से लेकर 80 वर्ष तक का समय लगता है। इसके लिए ढलवाँ जमीन, जल सोखने वाली उपजाऊ चिकनी मिट्टी तथा 500 से लेकर 625 मिमी. तक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है।
किसी की उंगलियों के निशान से कोई अपराधी कैसे ठहराया जा सकता है?

फोरेंसिक विज्ञान के तहत अंगुलियों के निशानों से कई प्रकार के सबूत तैयार होते हैं। प्रकृति ने सभी जीवधारियों को अलग-अलग सांचों से ढालकर निकाला है। दो व्यक्तियों के हाथों और पैरों की अंगुलियों के निशान या उभार समान नहीं होते। इन्हें एपिडर्मल रिज कहते हैं। हमारी त्वचा जब दूसरी वस्तुओं के साथ सम्पर्क में आती है तब ये उभार उसे महसूस करने में मददगार होते हैं। साथ ही ये ग्रिप को बनाने में मददगार भी होते हैं। किसी भी वस्तु के साथ सम्पर्क होने पर ये निशान उसपर छूट जाते हैं। इसकी वजह वह पसीना है जो हमारी त्वचा को नर्म बनाकर रखता है। अकसर इन निशानों को हम अपनी आँख से देख नहीं पाते। ये निशान किसी खास स्थान पर व्यक्ति की उपस्थिति को साबित करते हैं। इससे अपराधी के विरुद्ध साक्ष्य बनता है। तमाम दस्तावेजों में जहाँ व्यक्ति दस्तखत नहीं कर पाता उसकी उंगलियों के निशान लिए जाते हैं। विज्ञान के विस्तृत होते दायरे में अब दूध का दूध और पानी का पानी अलग करना कहीं ज्यादा आसान हो गया है। इसके लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है उसे क्रिमिनोलॉजी कहते हैं। इसके तहत फोरेंसिक जांच की जाती है जिसके फलस्वरूप इसमें संदेह की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं रहती। फोरेंसिक साइंस विज्ञान की ही एक शाखा है जिसमें जीव विज्ञान के अतिरिक्त भौतिक, रसायन आदि के सिद्धांतों का भी उपयोग चीजों को विश्लेषित करने में किया जाता है। विज्ञान के अनुसार भले ही ये निशान फौरी तौर पर लगभग एक जैसे दिखाई पड़े, पर उनमें समानता नहीं होती बल्कि जमीन आसमान का अंतर होता है। इस अंतर का पता सूक्ष्म विश्लेषण द्वारा ही लगाया जा सकता है।

फरीदकोट हाउस कहाँ पर है?

दिल्ली के कोपरनिकस मार्ग पर फरीदकोट हाउस है। फरीदकोट पंजाब की एक पुरानी देशी रियासत थी। अंग्रेजी राज में दिल्ली में देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के रहने की व्यवस्था थी। दिल्ली में हैदराबाद हाउस, बड़ौदा हाउस, धौलपुर हाउस, बीकानेर हाउस, कपूरथला हाउस जैसे अन्य भवन भी हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब की रिहाइश पर रोशनी डालें।

मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” (27 दिसंबर 1796–15फरवरी 1869) उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। इनको उर्दू का सार्वकालिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का भी श्रेय दिया जाता है। ग़ालिब (और असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। उन्होंने अपना ज्यादातर वक्त आगरा, दिल्ली और कलकत्ता में गुज़ारा। उनका जन्म आगरा मे एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था। अपने पिता और चाचा को उन्होंने बचपन मे ही खो दिया था। उनका जीवनयापन मूलत: अपने चाचा की पेंशन से होता था। उनके चाचा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी मे सैन्य अधिकारी थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा के बारे मे कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन ग़ालिब के अनुसार उन्होंने 11 साल की उम्र से ही उर्दू एवं फ़ारसी मे गद्य तथा पद्य लिखने आरम्भ कर दिया था। 13 साल की आयु मे उनका विवाह नवाब इलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था। विवाह के बाद वह दिल्ली आ गए थे जहाँ उनकी तमाम उम्र बीती। अपनी पेंशन के सिलसिले मे उन्हें कोलकाता की लम्बी यात्रा भी करनी पड़ी थी। इसका ज़िक्र उनकी ग़ज़लों में जगह–जगह पर मिलता है। सन 1850 में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र उन्हें "दबीर-उल-मुल्क" और "नज़्म-उद-दौला" के खिताब से नवाज़ा।

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,

डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता!

हुआ जब गम से यूँ बेहिश तो गम क्या सर के कटने का,

ना होता गर जुदा तन से तो जहानु पर धरा होता!

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,

वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता!

बरमूडा ट्राएंगिल क्या है? लोग कहते हैं कि यहाँ जाकर लोग गुम हो जाते हैं। क्या यह सच है?
बरमूडा त्रिकोण को शैतान के त्रिकोण का नाम भी दिया गया है। यह उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर का एक क्षेत्र है जिसमें कुछ विमान और गायब हो गए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है 5 दिसम्बर 1945 को अमेरिकी नौसेना के पाँच टीबीएम एवेंजर बमवर्षक विमानों की गुमशुदगी। ये विमान फ्लोरिडा के एक नौसैनिक बेस से उड़े थे। इनका पता नहीं लगा। इनपर सवार 14 नौसैनिकों का पता भी नहीं लगा। इन्हें खोजने गया विमान भी दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें 13 नौसैनिक थे। इसके बाद इस इलाके से कई विमान और पोत लापता हो गए। त्रिकोण के बारे में उल्लेख करने वाला पहला व्यक्ति क्रिस्टोफर कोलंबस था, जिसने सन 1492 के अपने दस्तावेजों में लिखा कि उसने और उसके चालक दल ने, " क्षितिज पर नृत्य करती अद्भुत रोशनी देखी।" अपनी लॉग बुक में एक अन्य स्थान पर उसने लिखा, आकाश में आग की लपटें थी। बरमूडा ट्रायंगल के बारे में तमाम अवधारणाएं हैं, पर वैज्ञानिक मानते हैं कि ये सामान्य दुर्घटनाएं भी हो सकतीं हैं। सागर में तूफान वगैरह के कारण या दूसरे कारणों से उनका पता नहीं लग पाया। सन 1854 से इस क्षेत्र में कुछ ऐसी घटनाएं होती रही हैं कि इसे 'मौत के त्रिकोण' के नाम से जाना जाता है।


यह सब किन कारणों से हो रहा है, यह कोई भी निर्णयात्मक रूप से कोई बता नहीं पाया है। चार्ल्‍स बर्लिट्ज ने 1974 में अपनी एक पुस्‍तक के द्वारा इस रहस्‍य की पर्तों को खोजने का दावा किया था। उसने अपनी पुस्‍तक 'दा बरमूडा ट्राइएंगिल मिस्‍ट्री सॉल्‍व्‍ड' में लिखा था कि यह घटना जैसी बताई जाती है, वैसी है नहीं। पायलट अनुभवी नहीं थे। सम्‍भवतः उनके दिशा सूचक यंत्र में खराबी होने के कारण खराब मौसम में एक दूसरे से टकरा कर नष्‍ट हो गए। कुछ रसायन शास्त्रियों का मत है कि इस क्षेत्र में 'मीथेन हाइड्रेट' नामक रसायन इन दुर्घटनाओं का कारण है। समुद्र में बनने वाला यह हाइड्राइट जब अचानक ही फटता है, तो अपने आसपास के सभी जहाजों को चपेट में ले सकता है। हाइड्राइट के विस्‍फोट के कारण डूबा हुआ जहाज जब समुद्र की अतल गहराई में समा जाता है, तो वहॉं पर बनने वाले हाइड्राइट की तलछट के नीचे दबकर गायब हो जाता है। अमेरिकी भौ‍गोलिक सर्वेक्षण के अनुसार बरमूडा की समुद्र तलहटी में मीथेन का अकूत भण्‍डार हुआ है।

हिन्दुस्तान में हीरे की खानें कहाँ है?

भारत में आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा और तमिलनाडु के कोल्लूर तथा मध्य प्रदेश के पन्ना और बुंदर में हीरा खानें हैं। भारत के हीरे क ज़माने में विश्व प्रसिद्ध थे। गोलकुंडा से 185 कैरेट का दरिया-ए नूर हीरा ईरान गया था। भारत के सबसे बड़े हीरे की बात करें तो नाम आता है ग्रेट मुगल का । गोलकुंडा की खान से 1650 में जब यह हीरा निकला तो इसका वजन 787 कैरेट था। यानी कोहिनूर से करीब छह गुना भारी। कहा जाता है कि कोहिनूर भी ग्रेट मुगल का ही एक अंश है। 1665 में फ्रांस के जवाहरात के व्यापारी ने इसे अपने समय का सबसे बड़ा रोजकट हीरा बताया था। यह हीरा आज कहां है किसी को पता नहीं। लंबे समय से गुमनाम भारतीय हीरों की सूची में आगरा डायमंड और अहमदाबाद डायमंड भी शामिल हैं। अहमदाबाद डायमंड को बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई के बाद ग्वालियर के राजा विक्रमजीत को हराकर हासिल किया था। तब 71 कैरेट के इस हीरे को दुनिया के 14 बेशकीमती हीरों में शुमार किया जाता था। हल्की गुलाबी रंग की आभा वाले 32.2 कैरेट के आगरा डायमंड को हीरों की ग्रेडिंग करने वाले दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका ने वीएस-2 ग्रेड दिया है। द रीजेंट की कहानी भी कुछ ऐसी ही हैं। 1702 के आसपास यह हीरा गोलकुंडा की खान से निकला। तब इसका वजन 410 कैरेट था। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर विलियम पिट के हाथों से होता हुआ द रीजेंट फ्रांसीसी क्रांति के बाद नेपोलियन के पास पहुंचा। नेपोलियन को यह हीरा इतना पसंद आया कि उसने इसे अपनी तलवार की मूठ में जड़वा दिया। अब 140 कैरेट का हो चुका यह हीरा पेरिस के लूव्र म्यूजियम में रखा गया है। गुमनाम भारतीय हीरों की लिस्ट में अगला नाम है ब्रोलिटी ऑफ इंडिया का। 90.8 कैरेट के ब्रोलिटी को कोहिनूर से भी पुराना बताया जाता है। 12वीं शताब्दी में फ्रांस की महारानी में इसे खरीदा। कई सालों तक गुमनाम रहने के बाद यह हीरा 1950 में सामने आया। जब न्यूयॉर्क के जूलर हेनरी विन्सटन ने इसे भारत के किसी राजा से खरीदा। आज यह हीरा यूरोप में कहीं है।


शादियों या पार्टियों के कार्ड में नीचे लिखा रहता है RSVP. इसका मतलब क्या है?

रेस्पांदे सी वु प्ले (Respondez Sil Vous Plait)। इस फ्रेंच वाक्यांश में विनम्रता से पूछा गया है कृपया बताएं आ रहे हैं या नहीं।

मिस्र यानी इजिप्ट में अभी जो क्रांति आई थी, उसे सोशल मीडिया की क्रांति कहा गया ऐसा क्यों?

सन 2011 के जनवरी महीने में ट्यूनीशिया से उठी क्रांति की आग की चिनगारियाँ मिस्र पहुँची थीं। बाद में आग की लपटें यमन, जॉर्डन होते हुए दूसरे अरब देशों में पहुँचीं। इसे बढ़ाने में सोशल मीडिया की जबरदस्त भूमिका थी। दशकों से तानाशाही झेल रही अफ्रीकी और मध्य पूर्वी देशों की जनता ने इंटरनेट और मोबाइल फोन को बेड़ियां काटने का औजार बना डाला है। फेसबुक पर कैंपेन छिड़ गया। मिस्र में जब मोबाइल सेवाएं रोकी गईं तो ट्वीट और फेसबुक के जरिए प्रदर्शन की तैयारियां की गईं। सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों ने मिलकर आंदोलन की हर पल की खबर दुनिया तक पहुंचाई। इसके पहले 2005 में लेबनॉन में ब्लॉगिंग की ताकत दिखी थी।

विश्व की सबसे लम्बी कविता कौन सी है?

माना जाता है कि महाभारत दुनिया की सबसे लम्बी कविता है। इसमें एक लाख से ज्यादा श्लोक हैं और लगभग बीस लाख शब्द हैं। प्रसिद्ध ग्रीक महाकाव्य इलियाड और ओडिसी को एक साथ मिला लें तब भी महाभारत उनका दस गुना ग्रंथ साबित होगा।

फैट जीन क्या है?

ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने ‘एफटीओ’ नामक विशेष कोशिका खोज निकाली है, जिसकी वजह से खासकर भारतीय मूल के लोगों में मोटापा, हृदयघात और मधुमेह जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं। इस खास जीन से यह भी जानकारी मिलेगी कि एक प्रकार की जीवनशैली के बावजूद कुछ लोगों का शरीर दुरुस्त रहता है, लेकिन कुछ मोटे हो जाते हैं। “जिनके शरीर में यह खास किस्म का जीन पाया जाता है, उन्हें अगर एक प्रकार का आहार दिया जाए, तो वह उन लोगों के मुकाबले अपना वजन बढ़ा हुआ महसूस करते है, जिनके शरीर में यह जीन नहीं होता है।” मोटापे का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर में चर्बी बढ़ने के लिए जीन जिम्मेदार है। वैज्ञानिकों का यह भी दावा है कि इस जीन को खोज लिया गया है, जो कोशिकाओं में चर्बी जमा होने के लिए जिम्मेदार हैं। खोज से अनेक बीमारियों के उपचार और छुटकारा पाने की संभावना जताई गई है। फिट-1 व फिट-2 (फैट इंड्यूसिंग ट्रांसक्रिप्ट 1-2) नामक जीन की पहचान की है। इन दोनों जीनों में 50 प्रतिशत तक समानता है।

भारत में सबसे पहली ट्रेन यात्रा कहाँ से शुरू हुई थी?

16 अप्रैल 1853 को मुम्बई और ठाणे के बीच जब पहली रेल चली, उस दिन सार्वजनिक अवकाश था। ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के 14 डिब्बों वाली उस गाड़ी के आगे एक छोटा फॉकलैंड नाम का भाप इंजन लगा था। पहली ट्रेन ने 34 किलोमीटर का सफर किया। भारत में रेल की शुरुआत की कहानी अमेरिका के कपास की फसल की विफलता से जुड़ी हुई है, जहां वर्ष 1846 में कपास की फसल को काफी नुकसान पहुंचा था| इसके कारण ब्रिटेन के मैनचेस्टर और ग्लासगो के कपड़ा कारोबारियों को वैकल्पिक स्थान की तलाश करने पर विवश होना पड़ा था| ऐसे में भारत इनके लिए मुफीद स्थान था| अंग्रेज़ों को प्रशासनिक दृष्टि और सेना के परिचालन के लिए भी रेलवे का विकास करना तर्क संगत लग रहा था| ऐसे में 1843 में लॉर्ड डलहौजी ने भारत में रेल चलाने की संभावना तलाश करने का कार्य शुरु किया| डलहौजी ने बम्बई, कोलकाता, मद्रास को रेल सम्पर्क से जोड़ने का प्रस्ताव किया। इस पर अमल नहीं हो सका| इस उद्देश्य के लिए साल 1849 में ग्रेट इंडियन पेंनिनसुलर कंपनी कानून पारित हुआ और भारत में रेलवे की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बारिश सवालों की कार्यक्रम में शामिल