Thursday, April 30, 2015

दुनिया में सबसे पहला उपन्यास कब लिखा गया?

यों तो विश्व साहित्य की शुरुआत किस्सों-कहानियों से हुई और वे महाकाव्यों के युग से आज तक के साहित्य की बुनियाद रही हैं. उपन्यास को आधुनिक युग की देन कहना बेहतर होगा. साहित्य में गद्य का प्रयोग जीवन के यथार्थ चित्रण की कोशिश है. आमतौर पर गेंजी मोनोगतारी या ‘द टेल ऑफ गेंजी’ को दुनिया का पहला आधुनिक उपन्यास मानते हैं. जापानी लेखिका मुरासाकी शिकिबु ने इसे सन 1000 से सन 1008 के बीच कभी लिखा था. बेशक यह दुनिया के श्रेष्ठतम ग्रंथों में से एक है, पर इस बात पर एक राय नहीं है कि यह पहला उपन्यास था या नहीं. इसमें 54 अध्याय और करीब 1000 पृष्ठ हैं. इसमें प्रेम और विवेक की खोज में निकले एक राजकुमार की कहानी है. अलबत्ता हमें पहले यह समझना चाहिए कि उपन्यास होता क्या है. उपन्यास गद्य में लिखा गया लम्बा आख्यान है, जिसकी एक कथावस्तु होती है और चरित्र-चित्रण होता है. कथावस्तु को देखें तो महाभारत, रामायण और तमाम भाषाओं में महाग्रंथ हैं. पर वे सब प्रायः महाकाव्य हैं. अलबत्ता संस्कृत में दंडी के ‘दशकुमार चरित्र’ और वाणभट्ट के ‘कादम्बरी’ को भी दुनिया का पहला उपन्यास माना जा सकता है. यूरोप का प्रथम उपन्यास सेर्वैन्टिस का ‘डॉन क्विक्ज़ोट’ माना जाता है जो स्पेनी भाषा का उपन्यास है. इसे 1605 में लिखा गया था. अनेक विद्वान 1678 में जोन बुन्यान द्वारा लिखे गए “द पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस” को पहला अंग्रेजी उपन्यास मानते हैं. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार ‘परीक्षा गुरु’ हिन्दी का पहला उपन्यास है, जो 1882 में प्रकाशित हुआ. इसके लेखक लाला श्रीनिवास दास हैं. हालांकि इसके पहले सन 1870 में 'देवरानी जेठानी की कहानी' (लेखक -पंडित गौरीदत्त) और श्रद्धाराम फिल्लौरी के ‘भाग्यवती’ को भी हिन्दी के प्रथम उपन्यास होने का श्रेय दिया जाता है. पर ये पुस्तकें मुख्यतः शिक्षात्मक और अपरिपक्व हैं.

खबर है कि इस साल मॉनसून सामान्य से कम होगा. यह मॉनसून क्या होता है?
अंग्रेज़ी शब्द मॉनसून पुर्तगाली शब्द ‘मॉन्सैओ’ से निकला है। यह शब्द भी मूल अरबी शब्द मॉवसिम (मौसम) से बना है. यह शब्द हिन्दी एवं उर्दू एवं विभिन्न उत्तर भारतीय भाषाओं में भी प्रयोग किया जाता है. आधुनिक डच शब्द मॉनसून से भी मिलता है. मानसून मूलतः हिन्द महासागर एवं अरब सागर की ओर से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर आनी वाली हवाओं को कहते हैं जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में भारी वर्षा करातीं हैं. यह ऐसी मौसमी पवन होती हैं, जो दक्षिणी एशिया क्षेत्र में जून से सितंबर तक, प्रायः चार महीने तक सक्रिय रहती है.

इस शब्द का पहला इस्तेमाल अंग्रेजों के भारत आने के बाद बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से चलने वाली बड़ी मौसमी हवाओं के लिए हुआ था. हाइड्रोलॉजी में मानसून का व्यापक अर्थ है- कोई भी ऐसी पवन जो किसी क्षेत्र में किसी ऋतु-विशेष में ही वर्षा कराती है. मॉनसून हवाओं का अर्थ अधिकांश समय वर्षा कराने से नहीं लिया जाना चाहिए. इस परिभाषा को देखते हुए संसार के अन्य क्षेत्र, जैसे- उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, उप-सहारा अफ़्रीका, आस्ट्रेलिया एवं पूर्वी एशिया को भी मॉनसून क्षेत्र की श्रेणी में रखा जा सकता है.

बादल क्यों और कैसे फटता है?
बादल फटना, बारिश का एक चरम रूप है। इस घटना में बारिश के साथ कभी-कभी गरज के साथ ओले भी पड़ते हैं. सामान्यत: बादल फटने के कारण सिर्फ कुछ मिनट तक मूसलधार बारिश होती है लेकिन इस दौरान इतना पानी बरसता है कि क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है. बादल फटने की घटना अमूमन पृथ्वी से 15 किलोमीटर की ऊंचाई पर घटती है. इसके कारण होने वाली वर्षा लगभग 100 मिलीमीटर प्रति घंटा की दर से होती है. कुछ ही मिनट में 2 सेंटी मीटर से अधिक वर्षा हो जाती है, जिस कारण भारी तबाही होती है.

मौसम विज्ञान के अनुसार जब बादल भारी मात्रा में पानी लेकर आसमान में चलते हैं और उनकी राह में कोई बाधा आ जाती है, तब वे अचानक फट पड़ते हैं, यानी संघनन बहुत तेजी से होता है. इस स्थिति में एक सीमित इलाके में कई लाख लीटर पानी एक साथ पृथ्वी पर गिरता है, जिसके कारण उस क्षेत्र में तेज बहाव वाली बाढ़ आ जाती है. भारत के संदर्भ में देखें तो हर साल मॉनसून के समय नमी को लिए हुए बादल उत्तर की ओर बढ़ते हैं. हिमालय पर्वत एक बड़े अवरोधक के रूप में इसके सामने पड़ता है. इसके कारण बादल फटता है.

पहाड़ ही नहीं कभी गर्म हवा का झोंका ऐसे बादल से टकराता है तब भी उसके फटने की आशंका बढ़ जाती है. उदाहरण के तौर पर 26 जुलाई 2005 को मुंबई में बादल फटे थे, तब वहां बादल किसी ठोस वस्‍तु से नहीं बल्कि गर्म हवा से टकराए थे.

अंटार्कटिका की खोज किसने और कब की?
अंटार्कटिका के होने की संभावना करीब दो हजार साल पहले से थी. इसे ‘टेरा ऑस्ट्रेलिस’ यानी दक्षिणी प्रदेश के नाम के एक काल्पनिक इलाके के रूप में जानते थे. यह भी माना जाता था कि ऑस्ट्रेलिया का दक्षिणी इलाका दक्षिण अमेरिका से जुड़ा है. यूरोपीय नक्शों में इस काल्पनिक भूमि का दर्शाना लगातार तब तक जारी रहा जब तक कि 1773 में ब्रिटिश अन्वेषक कैप्टेन जेम्स कुक ने अपने दो जहाजों के साथ अंटार्कटिक सर्किल को पार करके उस सम्भावना को खारिज कर दिया. पर जबर्दस्त ठंड के कारण कैप्टेन कुक को अंटार्कटिक के सागर तट से 121 किलोमीटर दूर से वापस लौटना पड़ा. इसके बाद सन 1820 में रूसी नाविकों और ने अंटार्कटिक को पहली बार देखा. उसके बाद कई नाविकों को इस बर्फानी ज़मीन को देखने का मौका मिला. 27 जनवरी 1820 को रूसी वॉन फेबियन गॉतिलेब वॉन बेलिंगशॉसेन और मिखाइल पेत्रोविच लजारोव जो दो-पोत अभियान की कप्तानी कर रहे थे, अंटार्कटिका की मुख्य भूमि के अन्दर पानी पर 32 किलोमीटर तक गए थे और उन्होंने वहाँ बर्फीले मैदान देखे थे. प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार अंटार्कटिका की मुख्य भूमि पर पहली बार पश्चिम अंटार्कटिका में अमेरिकी सील शिकारी जॉन डेविस 7 फ़रवरी 1821 को उतरा था, हालांकि कुछ इतिहासकार इस दावे को सही नहीं मानते.

प्रभात खबर के सप्लीमेंट अवसर में प्रकाशित

Sunday, April 26, 2015

दुनिया में सबसे पहले कपड़े कहाँ पहने गए?

एफ़एममोबाइल और वायरलेस तथा अन्य तरंगों का इंसानों और पशु पक्षियों पर क्या प्रभाव पड़ता है
आपने जो बातें पूछी हैं उनके अलावा कॉर्डलेस हैडफोन, वाइ-फाई, माइक्रोवेव अवन और ऑप्टिक फाइबर तक से स्वास्थ्य के लिए पैदा होने वाले खतरों को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है। मोबाइल टावरों से रेडिएशन हो सकता है, पर उनके लिए सीमा निर्धारित है। वस्तुतः ज्यादा धूप, गर्मी, सर्दी, पानी से भी स्वास्थ्य के लिए खतरा होता है, पर सीमा के भीतर रहें तो नहीं होता।

पानी में भँवर कैसे बनते हैं? और चक्रवात किसे कहते हैं? 
भँवर आमतौर पर एक-दूसरे से विपरीत दिशाओं से आ रही लहरों के टकराने से बनते हैं। इसके कई रूप हैं। जब आप किसी पानी के बर्तन में ऊपर से पानी गिराएं तो दबाव के कारण पानी नीचे जाता है और इसके चारों ओर गोल घेरा बन जाता है यह भी एक प्रकार का भँवर है। आप किसी पानी की भरी बोतल की तली में छेद कर दें और उसे देखें तो पता लगेगा कि पानी के बीचोबीच घूमते चक्रवात जैसा एक खड़ा स्तम्भ बन जाता है और सबसे ऊपर पानी की सतह पर भँवर जैसा बन जाता है। सागर के ऊपर या धरती की सतह पर जब हवाएं टकराकर गोल- गोल घूमने लगती हैं तब उसे हम चक्रवात कहते हैं।

ट्रैफिक सिग्नल की शुरुआत सबसे पहले कहां हुई?
ट्रैफिक सिग्नल की शुरूआत रेलवे से हुई है। रेलगाड़ियों को एक ही ट्रैक पर चलाने के लिए बहुत ज़रूरी था कि उनके लिए सिग्नलिंग की व्यवस्था की जाए। 10 दिसम्बर 1868 को लंदन में ब्रिटिश संसद भवन के सामने रेलवे इंजीनियर जेपी नाइट ने ट्रैफिक लाइट लगाई। पर यह व्यवस्था चली नहीं। सड़कों पर व्यवस्थित रूप से ट्रैफिक सिग्नल सन 1912 में अमेरिका के सॉल्ट लेक सिटी यूटा में शुरू किए गए। सड़कों पर बढ़ते यातायात के साथ यह व्यवस्था दूसरे शहरों में भी शुरू होती गई।

दुनिया में सबसे पहले कपड़े कहाँ पहने गए?
पुरातत्ववेत्ताओं और मानव-विज्ञानियों के अनुसार सबसे पहले परिधान के रूप में पत्तियोंघास-फूस,जानवरों की खाल और चमड़े का इस्तेमाल हुआ था। दिक्कत यह है कि इस प्रकार की पुरातत्व सामग्री मिलती नहीं है। पत्थरहड्डियाँ और धातुओं के अवशेष मिल जाते हैंजिनसे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैंपर परिधान बचे नहीं हैं। पुरातत्ववेत्ताओं को रूस की गुफाओं में हड्डियों और हाथी दांत से बनी सिलाई करने वाली सूइयाँ मिली हैंजो तकरीबन 30,000 साल ईपू की हैं। मानव विज्ञानियों ने कपड़ों में मिलने वाली जुओं का जेनेटिक विश्लेषण भी किया हैजिसके अनुसार इंसान ने करीब एक लाख सात हजार साल पहले बदन ढकना शुरू किया होगा। इसकी ज़रूरत इसलिए हुई होगी क्योंकि अफ्रीका के गर्म इलाकों से उत्तर की ओर गए इंसान को सर्द इलाकों में बदन ढकने की ज़रूरत हुई होगी। कुछ वैज्ञानिक परिधानों का इतिहास पाँच लाख साल पीछे तक ले जाते हैं। बहरहाल अभी इस विषय पर अनुसंधान चल ही रहा है।

राष्ट्रपति भवन और संसद भवन का निर्माण कब हुआ?
सन 1911 में घोषणा की गई कि भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाई जाएगी। मशहूर ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लैंडसीयर लुट्यन्स ने दिल्ली की ज्यादातर नई इमारतों की रूपरेखा तैयार की। इसके लिए उन्होंने सर हरबर्ट बेकर की मदद ली। जिसे आज हम राष्ट्रपति भवन कहते हैं उसे तब वाइसरॉयस हाउस कहा जाता था। इसके नक्शे 1912 में बन गए थेपर यह बिल्डिंग 1931में पूरी हो पाई। संसद भवन की इमारत 1927 में तैयार हुई।
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Friday, April 24, 2015

क्रिकेट के एक ओवर में छह गेंदें ही क्यों होती हैं, चार या पाँच क्यों नहीं?

सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सन 1979-80 के बाद से ही सारी दुनिया में छह गेंदों के मानक ओवर का चलन शुरू हुआ है. उसके पहले अलग-अलग समय और अलग-अलग देशों में चार, पाँच और आठ गेंदों के ओवर भी होते रहे हैं. क्रिकेट के ज्ञात इतिहास में इंग्लैंड में सन 1889 तक चार गेंदों का एक ओवर होता था। उसके बाद 1899 तक पाँच गेंद का ओवर हो गया. इसके बाद सन 1900 में एक पहल के बाद छह गेंदों के ओवर की शुरूआत हुई. शुरूआती वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में भी चार गेंद का ओवर होता था. इसके बाद जब इंग्लैंड में छह गेंद का ओवर हुआ तो वहाँ भी छह गेंद का ओवर हो गया। पर 1922-23 के सीज़न से ऑस्ट्रेलिया ने आठ गेंदों का एक ओवर करने का फैसला किया.

Monday, April 20, 2015

Land Use in India


Land use in India

   Total area20143 287 260km2
   Density of population2011361.8persons per km2map
   Total area per 1000 population20112.8km2 per 1000 populationmap
Land area20142 973 190km2
   Land area per 1000 population20112.5km2 per 1000 populationmap
   Land area (percentage of total area)201490.4% of total areamap
Water surface2014314 070km2
   Water surface per 1000 population20110.3km2 per 1000 populationmap
   Water surface (percentage of total area)20149.6% of total areamap
Agricultural land20071 799 000km2
   Agricultural land per 1000 population20071.5km2 per 1000 populationmap
   Agricultural land (percentage of total area)200754.7% of total areamap
   Agricultural land (percentage of land area)200760.5% of land areamap
Arable land20071 586 500km2
   Arable land per 1000 population20071.3km2 per 1000 populationmap
   Arable land (percentage of total area)200748.3% of total areamap
   Arable land (percentage of land area)200753.4% of land areamap
   Arable land (percentage of agricultural land)200788.2% of agricultural areamap
Permanent crops2007108 500km2
   Permanent crops per 1000 population20070.1km2 per 1000 populationmap
   Permanent crops (percentage of total area)20073.3% of total areamap
   Permanent crops (percentage of land area)20073.6% of land areamap
   Permanent crops (percentage of agricultural land)20076.0% of agricultural areamap
Permanent meadows and pastures2007104 000km2
   Permanent meadows and pastures per 1000 population20070.1km2 per 1000 populationmap
   Permanent meadows and pastures (percentage of total area)20073.2% of total areamap
   Permanent meadows and pastures (percentage of land area)20073.5% of land areamap
   Permanent meadows and pastures (percentage of agricultural land)20075.8% of agricultural areamap
Forest area2007677 598km2
   Forest area per 1000 population20070.6km2 per 1000 populationmap
   Forest area (percentage of total area)200720.6% of total areamap
   Forest area (percentage of land area)200722.8% of land areamap
Other land2007496 592km2
   Other land per 1000 population20070.4km2 per 1000 populationmap
   Other land (percentage of total area)200715.1% of total areamap
   Other land (percentage of land area)200716.7% of land areamap
See also:
 Land use of Asia
 Land use of the world
http://en.worldstat.info/Asia/India/Land

Sunday, April 19, 2015

नेट निरपेक्षता माने इंटरनेट पर समान अवसर

नेट न्यूट्रैलिटी क्या है?
नेट न्यूट्रैलिटी तकनीकी जटिलताओं से घिरी वैश्विक-अवधारणा है. इसका वास्ता इंटरनेट के सेवा शुल्क से है. टेलीकॉम ऑपरेटर, फोन कम्पनियाँ और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर इस स्थिति में होते हैं कि वे उपभोक्ता को प्राप्त सेवा को नियंत्रित कर सकें. मसलन आपकी पहुँच किस साइट तक हो, किस स्पीड से हो और आप से किस सेवा का क्या शुल्क वसूला जाए. नेट न्यूट्रैलिटी उस अवधारणा का नाम है जो यह कहती है कि दुनिया को सूचना और जानकारी देने तथा अभिव्यक्ति की निर्बाध स्वतंत्रता तथा ऑनलाइन कारोबार को सहूलियत के साथ चलाने के लिए जरूरी है कि नेट तक यह पहुँच निर्बाध और तटस्थ हो. सभी साइटों तक समान रूप से उपभोक्ता की पहुँच हो. सबकी स्पीड समान हो और प्रति किलोबाइट-मेगाबाइट डेटा-मूल्य समान हो. इंटरनेट कम्पनियों की न तो लाइसेंसिंग जैसी कोई व्यवस्था हो और न गेटवे हों. इसी तरह किसी साइट को निःशुल्क बनाने जैसी विशिष्ट सुविधा भी नहीं हो. उन्हें किसी सेवा को न तो ब्लॉक करना चाहिए और न ही उसकी स्पीड स्लो करनी चाहिए. वैसे ही जैसे सड़क पर हर तरह के ट्रैफिक के साथ समान बर्ताव किया जाए. यह विचार उतना ही पुराना है जितना कि इंटरनेट लेकिन 'इंटरनेट निरपेक्षता' शब्द दस साल पहले चलन में आया.

Thursday, April 16, 2015

काउंटडाउन क्यों होता है? सीधी गिनती क्यों नहीं गिनी जाती?

आपने मुहावरा सुना होगा कि फलां की उलटी गिनती शुरू हो गई. यानी कि अंत करीब है. इस मुहावरे को बने अभी सौ साल भी नहीं हुए हैं, क्योंकि उलटी गिनती की अवधारणा बहुत पुरानी नहीं है. काउंटडाउन सिर्फ रॉकेट छोड़ने के लिए ही इस्तेमाल नहीं होता. फिल्में शुरू होने के पहले शुरुआती फुटेज पर उल्टी गिनतियाँ होती हैं. नया साल आने पर पुराने साल के आखिरी सप्ताह काउंटडाउन शुरू हो जाता है. पिछले साल जब भारत में लोकसभा चुनाव हुए तो कुछ टीवी चैनलों ने बाकायदा स्क्रीन पर घंटों और मिनट में चुनाव परिणाम का काउंटडाउन दिखाया. धीर-धीरे यह शब्द हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है.

काउंटडाउन की शुरुआत कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी में एक नौका प्रतियोगिता में हुई थी. सन 1929 में फ्रिट्ज लैंग की एक जर्मन साइंस फिक्शन मूवी ‘डाई फ्रॉ इम मोंड’ में चंद्रमा के लिए रॉकेट भेजने के पहले नाटकीयता पैदा करने के लिए काउंटडाउन दिखाया गया. पर अब इस काउंटडाउन का व्यावहारिक इस्तेमाल भी होता है. आमतौर पर एक सेकंड की एक संख्या होती है. सिर्फ टक-टक करने से पता नहीं लगता कि कितने सेकंड बाकी है.

Monday, April 13, 2015

क्या दर्द को मापा जा सकता है?

ब्लड प्रेशर, शुगर आदि की तरह क्या शरीर में होने वाले दर्द (जैसे दांत दर्द, पेट दर्द, प्रसव पीड़ा, एक्सीडेंट में होने वाले अंग-भंग आदि के कारण होने वाले दर्द) को मापा जा सकता है?
दर्द एक प्रकार की अनुभूति है जो दो अलग-अलग व्यक्तियों की अलग-अलग हो सकती है। आपने जो अन्य अनुभूतियाँ गिनाईं उनके पैमाने विकसित नहीं हुए हैं। अलबत्ता मस्तिष्क की दशा का अध्ययन करने वाले इन अनुभूतियों का अध्ययन ज़रूर करते हैं। दर्द का पैमाना व्यक्ति स्वयं होता है। उसकी अनुभूति और प्रतिक्रिया से अनुमान लगाया जाता है कि दर्द कितना तीखा है। बहरहाल चिकित्सकों ने अपने पर्यवेक्षण के आधार पर हल्के दर्द, तीखे दर्द, बेतहाशा दर्द और असहनीय दर्द के मानक तैयार किए हैं। इनमें पीड़ित व्यक्ति के चेहरे, हाव-भाव और हाथ-पैर के संचालन तथा अन्य शारीरिक दशाओं से अनुमान लगाया जाता है। इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ पेन ने फेसेज़ पेन स्केल-रिवाइज़्ड (एफपीएस-आर) नाम से एक पैमाना बनाया है, जिसमें शून्य से 10 के बीच दशाओं को प्रकट किया जाता है। शून्य माने दर्द नहीं और 10 माने असहनीय दर्द। ऐसे ही श्मिड्ट स्टिंग पेन इंडेक्स और एडलर हे ट्रायग पेन स्कोर है। इन सबसे ज्यादा प्रचलित डोलोरीमीटर है, जिसमें एक उपकरण के मार्फत मनुष्य की नब्ज़ वगैरह के माध्यम से दर्द के तीखेपन को दर्ज करने की कोशिश की जाती है। इसकी यूनिट डेल है। माना जाता है कि व्यक्ति 45 डेल के आगे दर्द सहन नहीं कर सकता। पर प्रसव के समय एक स्त्री 57 डेल तक के दर्द को सहन कर जाती है। पिछले साल अमेरिका के स्टैनफर्ड विवि और नॉर्थ वेस्टर्न विवि के कुछ विशेषज्ञों ने मिलकर दर्द को मापने के तरीके को विकसित करने के लिए कुछ प्रयोग किए, जिनकी रपट प्लॉस वन नामक जर्नल में प्रकाशित की गई। इसमें 24 व्यक्तियों के हाथों में जलन पैदा की गई और इन सबके एमआरआई किए गए। इनसे प्राप्त तथ्यों की कुछ अन्य व्यक्तियों की पीड़ा अनुभूति से तुलना की गई। सम्भव है वे दर्द का कोई पैमाना बनाने में कामयाब हो जाएं। इस परीक्षण की रपट इस यूआरएल पर जाकर देखी जा सकती है:- http://www.plosone.org/article/info:doi/10.1371/journal.pone.0024124


उल्लू रात में देखता कैसे है? उल्लू बहुत कम रोशनी में भी देख लेता है। उल्लुओं की अधिकतर प्रजातियाँ रात में देखने वाली हैं। उनकी आखों में कई प्रकार की अनुकूलन क्षमता होती है। खासतौर से आँखों का आकार दूसरे पक्षियों के मुकाबले काफी बड़ा होता है। उनके रेटिना में प्रकाश संवेदनशील कोशिकाएं होती हैं। कॉर्निया भी बड़ा होता हैं। पर वे दूरदर्शी होते हैं। पास की कई चीजें अच्छी तरह देख नहीं पाते।

दुनिया का सबसे छोटा हवाई अड्डा कहाँ है?
कैरीबियन सागर के द्वीप सबा का हवाई अड्डा दुनिया का सबसे छोटा हवाई अड्डा माना जाता है। इसका रनवे 400 मीटर लम्बा है। इस हवाई अड्डे पर जेट विमान नहीं उतरते क्योंकि उनके लिए कुछ लम्बा रनवे चाहिए। राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट में प्रकाशित

Thursday, April 9, 2015

कम हो रही है धरती की घूमने की रफ्तार

पृथ्वी अपनी धुरी पर किस गति से घूमती है?
23 घंटे 56 मिनट 4.09 सेकंड में धरती अपनी धुरी पर पूरी तरह घूम जाती है. ऐसा माना जाता है कि धरती की घूमने की रफ्तार धीरे-धीरे कम होती जा रही है. अब से 4.8 अरब साल पहले धरती अपनी धुरी पर लगभग 10 घंटे में एक चक्कर लगा लेती थी. इस प्रकार तब दिन और रात आज के मुकाबले काफी छोटे होते थे. वैज्ञानिकों का आकलन है कि सौ साल में धरती के घूमने की गति में करीब तीस सेकंड का इजाफा हो रहा है. इससे धीरे-धीरे साल के दिनों की संख्या कम होती जाएगी. तकरीबन साठ करोड़ साल पहले 455 दिन का साल होता था. एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि पृथ्वी के कोर में हो रही उथल-पुथल दिनों की लंबाई को प्रभावित करती है. यों पृथ्वी का अपनी धुरी पर दूसरी बातों से भी तय होता है. जैसे हवा के विपरीत पर्वत श्रृंखलाओं का होना भी गति धीमी करता है. ब्रिटेन के लिवरपूल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने वर्ष 1962 से 2010 के दिनों की लंबाई और पृथ्वी के कोर के अध्ययन के दौरान दिन की लंबाई में फर्क देखा. सन 2011 में जापान के भूकंप से धरती कुछ इतनी हिली कि यह कुछ तेज घूमने लगी और इसके कारण दिन सामान्य से थोड़ा छोटा हो गया. उस समय अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के भू-भौतिकी विज्ञानी रिचर्ड ग्रास ने गणना करने के बाद बताया कि पृथ्वी की अपनी धुरी पर चक्कर लगाने की गति 1.6 माइक्रोसेकंड बढ़ गई. यों वर्ष 2004 में सुमात्रा के भूकंप से दिन 6.8 माइक्रोसेकंड छोटा हो गया था. यानी भूकम्पों के कारण गति का बढ़ना और घटना दोनों बातें सम्भव हैं. 

Sunday, April 5, 2015

एटीएम का इस्तेमाल कैसे शुरू हुआ?

एटीएम का पूरा अर्थ क्या है?
एटीएम का अर्थ है ऑटोमेटेड टैलर मशीन। टैलर को सामान्यत: क्लर्क या कैशियर के रूप में पहचानते हैं। एटीएम की ज़रूरत पश्चिमी देशों में वेतन बढ़ने तथा प्रशिक्षित कर्मियों की संख्या में कमी होने के कारण पैदा हुई। काम को आसान और सस्ता बनाने के अलावा यह ग्राहक के लिए सुविधाजनक भी है। व्यावसायिक संस्थानों में सेल्फ सर्विस की अवधारणा बढ़ रही है। इसके आविष्कार का श्रेय आर्मेनियाई मूल के अमेरिकी लूथर जॉर्ज सिमियन को जाता है। उसने 1939 में इस प्रकार की मशीन तैयार कर ली थी, जिसे शुरू में उसने बैंकमेटिक नाम दिया। पर इस मशीन को किसी ने स्वीकार नहीं किया। बैंक अपने कैश को लेकर संवेदनशील होते हैं। वे एक मशीन के सहारे अपने कैश को छोड़ने का जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं थे। लूथर इसके विकास में लगा रहा और 21 साल बाद जून 1960 में उसने इसका पेटेंट फाइल किया। फरवरी 1963 में उसे पेटेंट मिला। इस बीच उसने सिटी बैंक ऑफ न्यूयॉर्क (आज का सिटी बैंक) को इसे प्रयोगात्मक रूप से इस्तेमाल करने के लिए राज़ी कर लिया। छह महीने के ट्रायल में यह मशीन लोकप्रिय नहीं हो पाई। साठ के दशक में ही क्रेडिट कार्ड का चलन शुरू होने के कारण जापान में इस तरीके की मशीन की ज़रूरत महसूस की गई। तब तक कुछ और लोगों ने मशीनें तैयार कर ली थीं। जापान में 1966 में एक कैश डिस्पेंसर लगाया गया, जो चल निकला। उधर 1967 में लंदन में बार्कलेज़ बैंक ने ऐसी मशीन लगाने की घोषणा की। उस मशीन को तैयार किया था भारत में जन्मे स्कॉटिश मूल के जॉन शै़फर्ड ने। इस मशीन में तब से काफी बदलाव हो चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और इंस्ट्रूमेंटेशन के बुनियादी तौर-तरीकों में काफी बदलाव हो चुका है। मैग्नेटिक स्ट्रिप के कारण इसकी कार्य-पद्धति बदल गई है। प्लास्टिक मनी की संस्कृति विकसित होने के कारण इसका चलन बढ़ता ही जा रहा है। अब तो आप भारतीय बैंक के कार्ड से अमेरिका में भी पैसा निकाल सकते हैं।
एमआरपी अधिकतम खुदरा मूल्य तय करने का मानक क्या है?
भारत के उपभोक्ता सामग्री (उत्पादन और अधिकतम मूल्य का अनिवार्य मुद्रण) अधिनियम 2006 के अनुसार देश में बिकने वाली उपभोक्ता सामग्री का अधिकतम मूल्य पैकेट पर छपा होना चाहिए। दुनिया के तमाम देशों में इस आशय के अपने-अपने कानून हैं। इनका उद्देश्य एक ओर उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करना है वहीं छोटे व्यापारियों की बड़े व्यापारियों से प्रतियोगिता में छोटे व्यापारियों और उपभोक्ता के हितों की रक्षा करना भी है। जब इस प्रकार की व्यवस्था नहीं थी, बड़े व्यापारी बाजार में अपने ढंग से कीमत तय करते थे। अब उत्पादक पर यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी उत्पादन लागत के अलावा खुदरा व्यापारी तक उस वस्तु के जाने तक होने वाली मूल्य वृद्धि, माल भाड़े, चुंगी तथा अन्य टैक्स और वाजिब मुनाफे को जोड़कर अधिकतम सम्भावित कीमत तय कर दे। दुकानदार उससे अधिक कीमत पर उसे नहीं बेचेगा और यदि वह डिस्काउंट देगा तो ग्राहक को पता होगा कि कितनी छूट दी गई है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Thursday, April 2, 2015

एंड्रॉयड माने क्या?

एंड्रॉयड माने क्या?
एंड्रॉयड शब्द मोबाइल फोन के ऑपरेटिंग सिस्टम के कारण लोकप्रिय हुआ है. आप जानते हैं कि कम्प्यूटर में हार्डवेयर के अलावा एक ऑपरेटिंग सिस्टम होता है.  लिनक्स पर आधारित एंड्रॉयड टचस्क्रीन स्मार्टफोन और टेबलेट कम्प्यूटरों पर काम करने वाला दुनिया का सर्वाधिक प्रचलित ऑपरेटिंग सिस्टम है. मोबाइल फोन के अलावा टीवी, गेम कंसोल, डिजिटल कैमरा, कार और कलाई-घड़ी के लिए भी एंड्रॉयड उपलब्ध है. 'एंड्रॉयड इनकॉरपोरेटेड' की स्थापना अक्तूबर 2003 में एंडी रूबिन, रिच माइनर, निक सेयर्स और क्रिस ह्वाइट ने की थी. शुरू में इनका इरादा डिजिटल कैमरा के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने का था. बाद में समझ में आया कि उसका बाजार है नहीं तब मोबाइल फोन पर काम शुरू किया. पर इनके सामने पैसे की तंगी थी. उधार लेना पड़ता था. 17 अगस्त 2005 में गूगल ने इसे खरीद लिया. उस समय तक गूगल मोबाइल फोन के कारोबार में था नहीं. बाजार में आने वाला पहला एंड्रॉयड फोन एचटीसी ड्रीम था जिसे 22 अक्टूबर 2008 को लांच किया गया था. एंड्रॉयड के हर वर्ज़न का नाम मिठाई पर होता है. और यह भी कि यह नाम अल्फाबैटिक ऑर्डर में आगे बढ़ रहा है. कपकेक, डोनट, एक्लेयर, फ्रॉयो, जिंजरब्रैड, हनीकॉम्ब, आइसक्रीम सैंडविच, जैलीबीन और किटकैट से होते हुए यह नवीनतम लॉलीपॉप तक सिलसिला तक आ पहुंचा है. गूगल ने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि इसके नामों में यह मिठास क्यों है. अलबत्ता कयास है कि गूगल भारत के महत्व को देखते हुए अगले वर्ज़न का नाम मलाई कुल्फी, नान खताई और पेड़ा तो नहीं रखेगा? 
एंड्रॉयड मूल ग्रीक शब्द एवप में अयड प्रत्यय जोड़ने से बना है. ड्रॉयड शब्द जॉर्ज ल्यूकस की फिल्म स्टारवॉर्स में इस्तेमाल हुआ था. इस फिल्म में स्टारट्रैक में एंड्रॉयड नाम का रोबो था, जो इंसानी पुतले जैसा था. एंड्रॉयड का प्रतीक चिह्न वही रोबो है. गूगल के तमाम एप्लीकेशन जैसे सर्च, गूगल मैप, यू-ट्यूब चलते तो तमाम दूसरे फोन में भी हैं, लेकिन एंड्रॉयड में वे बेहतर होते हैं. एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर 'ओपन सोर्स' है यानी कोई भी इसके लिए एप बना सकता है. एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर गूगल बना कर कंपनियों को मुहैया कराता है लेकिन हर फोन कंपनी अपने फोन को अलग दिखाने के लिए, उसकी अलग पहचान बनाने के लिए, एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर के साथ कुछ बदलाव करके उसे अपने फोन में डालती है. इससे होता यह है कि जब गूगल एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर का नया और बेहतर वर्ज़न लांच होता है तो आप सीधे अपने फोन में इसे डाउनलोड नहीं कर सकते. आपको इंतजार करना होगा कि आपकी फोन कंपनी आपके फोन के मॉडल के हिसाब से सॉफ्टवेयर तैयार करके आपको मुहैया कराए.

आयर्स रॉक कहाँ हैं? क्या ये रंग बदलती हैं?
आयर्स रॉक मध्य ऑस्ट्रेलिया की नॉर्दर्न टैरीटरी में पाई जाती हैं। इनका स्थानीय नाम उलुरु है। बलुआ पत्थरों की इन चट्टानों को यहाँ के अनुंगु मूल निवासी बहुत पवित्र मानते हैं। दूर से ये शिलाएं वनस्पति विहीन ऊँचे मंच जैसी लगती हैं। इनके बीच पानी के झरने छोटी दल धाराएं और गुफाएं भी हैं। इन गुफाओं में प्रागैतिहासिक चित्र भी मिलते हैं। दिन भर में ये शिलाएं कई रंग बदलती हैं। इसकी वजह ये शिलाएं नहीं इन पर पड़ने वाली रोशनी है। सुबह की फीकी धूप में कभी इनका रंग सुनहरा या भूरा होता है, दिन में तीखा लाल हो जाता है। शाम को स्लेटी और नीला हो जाता है। 

अशोक स्तम्भ को राष्ट्रीय चिह्न क्यों बनाया गया?
सारनाथ में अशोक ने जो स्तम्भ बनवाया था उसके शीर्ष भाग को सिंह चतुर्मुख कहते हैं. इस मूर्ति में चार शेर पीठ-से-पीठ सटाए खड़े हैं. इसके आधार के मध्य भाग में बने चार सिंह शक्ति, साहस, शौर्य और विश्वास के प्रतीक हैं. आधार पर बने सिंह, हाथी, घोड़ा और वृषभ चार दिशाओं के रक्षक हैं. आधार के बीचों-बीच बना धर्मचक्र गतिशीलता का प्रतीक है. उसे भारत के राष्ट्रीय ध्वज में बीच की सफेद पट्टी में भी रखा गया है. यह गतिशीलता का प्रतीक है. इसके नीचे लिखा सत्यमेव जयते मुंडक उपनिषद से लिया गया है. 

Wednesday, April 1, 2015

फिटकरी किस चीज से बनती है?

‘पेसमेकर’ क्या होता है और कैसे काम करता है?पेसमेकर के बारे में जानने के पहले यह समझना चाहिए कि हमारे हृदय का एक प्राकृतिक पेसमेकर होता है। इसका काम दिल की धड़कनों को सामान्य गति से बनाए रखना है। मांसपेशियाँ हमारे दिल के संकुचन और फैलाने का काम करती हैं। मांसपेशियों को मस्तिष्क से शिराओं के मार्फत करेंट मिलता है। किसी कारण से यह प्राकृतिक काम कम होने लगता है तब कृत्रिम पेसमेकर लगाकर दिल की धड़कनों को सामान्य किया जाता है। यह भी मांसपेशियों को सक्रिय रखता है।

किसी बीमारी से बचाव के लिए लगाया जाने वाला टीका (वैक्सीन) किस प्रकार कार्य करता है? क्या हर रोग के लिए यह कारगर है?
किसी बीमारी से बचाव के लिए टीका लगता है तो यह शरीर में प्रविष्ट होते ही उस विशिष्ट बीमारी की एंटीबॉडी यानी प्रतिरोधक क्षमता को बनाने के लिए शरीर को प्रेरित करता है जो उस बीमारी के कीटाणु को नष्ट कर देती है। जिन रोगों की रोकथाम के लिए टीका लगता है। (जैसे- डिप्थीरिया, टॉयफाइड, कॉलरा, टी.बी. आदि) सभी की अपनी अलग एंटीबॉडी शरीर में पैदा होती है जो संक्रमित बीमारियों के इलाज में ही कारगर होती है, न कि अन्य बीमारियों में।

ग्रीन टी क्या है? और कैसे उपलब्ध हो?काली चाय और हरी चाय एक ही पौधे की उपज हैं। दोनों ही कैमेलिया साइनेंसिस प्लांट से हासिल होती हैं। हम जिस चाय को आमतौर पर पीते हैं वह प्रोसेस्ड सीटीसी चाय है, जिसका मतलब है कट, टीर एंड कर्ल। इसमें चाय की पत्तियों को तोड़कर मशीन में डालकर सुखाया जाता है। इसे छलनियों की मदद से छानकर अलग-अलग साइज़ में एकत्र कर लिया जाता है, जिसके पैकेट बनाए जाते हैं। चाय की पत्ती को हलका सा क्रश करने और हवा में सूखने के लिए छोड़ने के कारण उनमें ऑक्सीकरण के कारण काला रंग आ जाता है जैसा सेबों को काटने के बाद हो जाता है। ग्रीन टी को इस ऑक्सीकरण से बचाने के लिए एक तो इसे कुचला नहीं जाता बल्कि साबुत पत्ती को हल्की भाप दी जाती है जिससे इनमें मौज़ूद वे एंजाइम खत्म हो जाते हैं, जिनके कारण पत्ती काली होती है। इसके बाद इन पत्तियों को सुखा लिया जाता है, जिससे वे हरे रंग की रह जाती है। काली चाय में कैफीन होती है, हरी चाय में वह नहीं होती। इन दो किस्मों के अलावा एक ऊलांग और एक सफेद चाय भी होती है। यों तो हर प्रकार की चाय शरीर के लिए लाभकर है, पर ग्रीन टी हृदय, दिमाग और पूरे शरीर के लिए लाभकर है। खासतौर से कैंसर को रोकती है। इसमें एंटी ऑक्सीडेंट होते हैं जो शरीर के क्षय को रोकते हैं, कोलेस्ट्रॉल कम करती है और शरीर के वज़न को संतुलित रखती है। इसमें फ्लुओराइड हड्डियों को स्वस्थ रखता है। हरी चाय आसानी से उपलब्ध है।

फिटकरी किस चीज से बनती है, क्या यह भी नमक की तरह समंदर से प्राप्त होती है?
फिटकरी एक प्रकार का खनिज है जो प्राकृतिक रूप में पत्थर की शक्ल में मिलता है। इस पत्थर को एल्युनाइट कहते हैं। इससे परिष्कृत फिटकरी तैयार की जाती है। नमक की तरह है, पर यह सेंधा नमक की तरह चट्टानों से मिलती है। यह एक रंगहीन क्रिस्टलीय पदार्थ है। इसका रासायनिक नाम है पोटेशियम एल्युमिनियम सल्फेट। संसार को इसका ज्ञान तकरीबन पाँच सौ से ज्यादा वर्षों से है। इसे एलम भी कहते हैं। पोटाश एलम का इस्तेमाल रक्त में थक्का बनाने के लिए किया जाता है। इसीलिए दाढ़ी बनाने के बाद इसे चेहरे पर रगड़ते हैं ताकि छिले-कटे भाग ठीक हो जाएं। इसके कई तरह के औषधीय उपयोग हैं।

दूध की अपेक्षा दही खाना अधिक स्वास्थ्यवर्धक कहा जाता है। ऐसा क्यों?
दूध और दही दोनों कैल्शियम के प्रमुख स्रोत हैं। कैल्शियम दांतों और हड्डियों के लिए खासतौर से ज़रूरी है। दही में दूध के मुकाबले कई गुना ज्यादा कैल्शियम होता है। दूध में लैक्टोबैसीलियस होते हैं जो दही जमाते हैं और कई गुना ज्यादा हो जाते हैं। इससे दही में पाचन की शक्ति बढ़ जाती है। दही में प्रोटीन, लैक्टोज़, आयरन और फॉस्फोरस पाया जाता है, जो दूध की तुलना में ज्यादा होता है। इसमें विटैमिन बी6 और बी 12 और प्रोटीन ज्यादा होता है। दही बनने पर दूध की शर्करा एसिड का रूप ले लेती है। इससे भोजन को पचाने में मदद मिलती है। त्वचा को कोमल और स्वस्थ बनाने में भी दही का उपयोग बेहतर है। कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिहाज से भी दही बेहतर है।

राजस्थान पत्रिका में 22 मार्च 2015 को प्रकाशित