Friday, February 26, 2016

हम पक्षियों की तरह क्यों नहीं उड़ सकते?

मनुष्य धरती पर रहने के लिए ही बना है. दूसरे शब्दों में उसका विकास धरती के प्राणी के रूप में ही हुआ है. मनुष्य के पक्षी के रूप में उड़ने के लिए काफी बड़े पंख, मजबूत हड्डियों और दमदार मांसपेशियों की जरूरत होगी. यदि आप तुलनात्मक रूप से देखें तो एक पक्षी के वजन और उसके पंखों के आकार में एक अनुपात होता है. प्राकृतिक विकास इसी रूप में हुआ है इसलिए पक्षी एक सीमा से बड़े या भारी नहीं मिलते. अतीत में लगभग सात करोड़ साल पहले जब डायनोसौर धरती पर विचरण करते थे, उड़ने वाले क्वेजाकोटलस होते थे. वे विशाल प्राणी थे, पर उनके वजन और पंखों का अनुपात देखें तो पता लगेगा कि वे सामान्य डायनोसौरों के मुकाबले काफी हल्के थे. इनके पंखों का विस्तार 10 से 16 मीटर यानी 33 से 52 फुट तक था, जबकि वजन 70 से 200 किलोग्राम तक था. आज भी पक्षियों की कई श्रेणियाँ जैसे बत्तख, मुर्गी, मोर और शतुरमुर्ग वगैरह पंख और वजन के असंतुलन और हड्डियों तथा मांसपेशियों की संरचना के कारण उड़ने में असमर्थ हैं.

बादल फटना क्या होता है?

बादल फटने का मतलब एक छोटे से इलाके में कुछ मिनटों के भीतर भारी बरसात होना है. मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा पहाड़ी क्षेत्रों में बादल ज्यादा फटते हैं. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रति घंटा 100 मिली मीटर (3.94 इंच) के बराबर या उससे ज्यादा बारिश होना बादल फटना है. इस दौरान जो बादल बनता है वह जमीन से 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक जा सकता है. बादल फटने के दौरान कुछ मिनटों में 20 मिली मीटर से ज्यादा बरसात हो सकती है. जब वातावरण में बहुत ज्यादा नमी हो और बादलों को आगे बढ़ने की जगह न मिले तब ऐसा होता है. भारी मात्रा के साथ क्यूम्यूलोनिम्बस या कपासी वर्षी बादल जब ऊपर उठते हैं और उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिलता तो उनमें मौजूद पानी नीचे गिर जाता है. यह एक तरीके से पानी भरे बैलून का फटना है. इसकी दूसरी वजहें भी होती हैं. जैसे कि सर्द और गर्म हवाओं का टकराना. 26 जुलाई 2005 को मुम्बई में इसी तरह से बादल फटा था.

कीड़े-मकौड़े पानी पर बिना डूबे कैसे चलते रहते हैं?

आमतौर पर कीड़ों का वजन इतना कम होता है कि वे पानी के पृष्ठ तनाव या सरफेस टेंशन को तोड़ नहीं पाते. पानी और दूसरे द्रवों का एक गुण है जिसे सरफेस टेंशन कहते हैं. इसी गुण के कारण किसी द्रव की सतह किसी दूसरी सतह की ओर आकर्षित होती है. पानी का पृष्ठ तनाव दूसरे द्रवों के मुकाबले बहुत ज्यादा होता है. इस वजह से बहुत से कीड़े मकोड़े आसानी से इसके ऊपर टिक सकते हैं. इन कीड़ों का वजन पानी के पृष्ठ तनाव को भेद नहीं पाता. सरफेस टेंशन एक काम और करता है. पेन की रिफिल या कोई महीन नली लीजिए और उसे पानी में डुबोएं. आप देखेंगे कि पानी नली में काफी ऊपर तक चढ़ आता है. पेड़ पौधे ज़मीन से पानी इसी तरीके से हासिल करते है? उनकी जड़ों से बहुत पतली-पतली नलियां निकलकर तने से होती हुई पत्तियों तक पहुंच जाती हैं. सन 1995 में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की खबर फैली थी. वस्तुतः पृष्ठ तनाव के कारण चम्मच का दूध पत्थर की प्रतिमा में ऊपर चढ़ जाता था.

पानी या ओस की बूँदें गोल क्यों होती हैं?

पानी की बूँदों के गोल होने का कारण भी पृष्ठ तनाव है. यों तो पानी जिस पात्र में रखा जाता है उसका आकार ले लेता है, पर जब वह स्वतंत्र रूप से गिरता है तो धार जैसा लगता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण जैसे–जैसे उसकी मात्रा धरती की ओर जाती है उसी क्रम में आकार लेती है. इसके अलावा पानी के मॉलीक्यूल एक-दूसरे को अपनी ओर खींचते हैं और यह क्रिया केन्द्र की ओर होती है, इसलिए पानी टूटता नहीं. जैसे-जैसे पानी की बूँद का आकार छोटा होता है, वह गोल होती जाती है. यों आपने कुछ बड़ी बूँद को हल्का सा नीचे की ओर लटका हुआ भी पाया होगा.

कॉकटेल शब्द का अर्थ क्या है?

कॉकटेल ऐसी शराब है जिसमें कई तरह की शराब, फलों के रस और शर्बत मिलाए जाते हैं. इस शब्द का सबसे पुराना लिखित प्रमाण 20 मार्च 1798 के लंदन के द मॉर्निंग पोस्ट एंड गजेटियर में मिलता है. ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसार इस शब्द का जन्म अमेरिका में हुआ. इसे ऐसे पेय के रूप में पेश किया जाता है, जिसे पीने के बाद इंसान कुछ भी पी सकता है. पर इसका नाम ऐसा क्यों पड़ा? कुछ लोग कहते हैं कि जो शराब का मिश्रण बनाया जाता था उसे मुर्गे की पूँछ से हिलाकर मिलाया जाता था. इसे नाम पड़ा कॉकटेल. ऐसा भी कहा जाता है कि यह शब्द फ्रांसीसी शब्द कॉकते से बना है जिसका मतलब था अंडे का कप. फ्रांस में किसी ने इसी किस्म के मिश्रित पेय को अंडों के कप में ढालकर दिया और कप ने पेय का नाम ले लिया. बहरहाल अब यह किसी किस्म की मिली-जुली चीज का पर्याय बन गया है. विभिन्न तेजाबों और विस्फोटकों से बने बम का नाम है मोलोतोव कॉकटेल.

रोमन संख्या 7 को लिखते समय ज्यादातर बीच से काट क्यों दिया जाता है? हिन्दी के अंकों में नहीं काटा जाता.

यूरोप और खासतौर से फ्रांस में 7 की संख्या के बीच में एक छोटी सी क्षैतिज रेखा खींच दी जाती है. इसका कारण 7 को 1 से अलग दिखाना है. फ्रांस में 1 की संख्या सिखाते समय बच्चों को शीर्ष से एक छोटी सी रेखा जो 45 अंश का कोण बनाती हुई नीचे की ओर खींचना सिखाते हैं. इसके साथ ही 7 की संख्या के मध्य में काटती हुई रेखा खींचते हैं ताकि दोनों भिन्न लगें. 1 के शिखर पर छोटी सी रेखा उसे सात जैसा बना देती है. फ्रांस के अलावा जर्मनी, रोमानिया, पोलैंड और रूस के स्कूलों में बच्चों को हाथ से गिनती लिखने का अभ्यास कराते समय यह रेखा खींचने का अभ्यास भी कराया जाता है. 

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Thursday, February 25, 2016

जानिए क्या होता है संसद सत्र

सामान्यतः हर साल संसद के तीन सत्र होते हैं। बजट (फरवरी-मई), मॉनसून (जुलाई-अगस्त) और शीतकालीन (नवंबर-दिसंबर)।  बजट अधिवेशन को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया जाता है। इन दोनों के बीच तीन से चार सप्ताह का अवकाश होता है। इस दौरान स्थायी समितियाँ विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान माँगों पर विचार करती हैं।

राष्ट्रपति दोनों सदनों को बैठक के लिए आमंत्रित करते हैं। हरेक अधिवेशन की अंतिम तिथि के बाद छह मास के भीतर आगामी अधिवेशन के लिए सदनों को बैठक के लिए आमंत्रित करना होता है। सदनों को बैठक के लिए आमंत्रित करने की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, पर व्यवहार में इस आशय के प्रस्‍ताव की पहल सरकार द्वारा की जाती है।
राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट में प्रकाशित

Wednesday, February 24, 2016

शक संवत क्या है?

राष्ट्रीय शाके अथवा शक संवत भारत का राष्ट्रीय कलैण्डर है। इसका प्रारम्भ यह 78 वर्ष ईसा पूर्व माना जाता है। यह संवत भारतीय गणतंत्र का सरकारी तौर पर स्वीकृत अपना राष्ट्रीय संवत है। ईसवी सन 1957 (चैत्र 1, 1879 शक) को भारत सरकार ने इसे देश के राष्ट्रीय पंचांग के रूप में मान्यता प्रदान की थी। इसीलिए राजपत्र (गजट), आकाशवाणी और सरकारी कैलेंडरों में ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ इसका भी प्रयोग किया जाता है। विक्रमी संवत की तरह इसमें चन्द्रमा की स्थिति के अनुसार काल गणना नहीं होती, बल्कि सौर गणना होती है। यानी महीना 30 दिन का होता है। इसे शालिवाहन संवत भी कहा जाता है। इसमें महीनों का नामकरण विक्रमी संवत के अनुरूप ही किया गया है, लेकिन उनके दिनों का पुनर्निर्धारण किया गया है। इसके प्रथम माह (चैत्र) में 30 दिन हैं, जो अंग्रेजी लीप ईयर में 31 दिन हो जाते हैं। वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण एवं भाद्रपद में 31-31 दिन एवं शेष 6 मास में यानी आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन में 30-30 दिन होते हैं। ईसवी सन 500 के बाद संस्कृत में लिखित अधिकतर ज्योतिष ग्रन्थ शक संवत का प्रयोग करने लगे। इस संवत का यह नाम क्यों पड़ा, इस विषय में विभिन्न मत हैं। इसे कुषाण राजा कनिष्क ने चलाया या किसी अन्य ने, इस विषय में अन्तिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सका है।

एनालॉग सिग्नल्स और डिजिटल सिग्नल्स में क्या अंतर होता है?
हिन्दी में एनालॉग को अनुरूप और डिजिटल को अंकीय सिग्नल कहते हैं। दोनों सिग्नलों का इस्तेमाल विद्युतीय सिग्नलों के मार्फत सूचना को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए किया जाता है। दोनों में फर्क यह है कि एनालॉग तकनीक में सूचना विद्युत स्पंदनों के मार्फत जाती है। डिजिटल तकनीक में सूचना बाइनरी फॉर्मेट (शून्य और एक) में बदली जाती है। कम्प्यूटर द्वयाधारी संकेत (बाइनरी) ही समझता है। इसमें एक बिट दो भिन्न दिशाओं को व्यक्त करती है। इसे आसान भाषा में कहें तो कम्प्यूटर डिजिटल है और पुराने मैग्निटक टेप एनाल़ॉग। एनालॉग ऑडियो या वीडियो में वास्तविक आवाज या चित्र अंकित होता है जबकि डिजिटल में उसका बाइनरी संकेत दर्ज होता है, जिसे प्ले करने वाली तकनीक आवाज या चित्र में बदलती है। टेप लीनियर होता है, यानी यदि आपको कोई गीत सुनना है जो टेप में 10वें मिनट में आता है तो आपको बाकायदा टेप चलाकर 9 मिनट, 59 सेकंड पार करने होंगे। इसके विपरीत डिजिटल सीडी या कोई दूसरा फॉर्मेट सीधे उन संकेतों पर जाता है। पुराने रिकॉर्ड प्लेयर में सुई जब किसी ऐसी जगह आती थी जहाँ आवाज में झटका लगता हो तो वास्तव में वह आवाज ही बिगड़ती थी। डिजिटल सिग्नल में आवाज सुनाने वाला उपकरण डिजिटल सिग्नल पर चलता है। मैग्नेटिक टेप में जेनरेशन लॉस होता है। यानी एक टेप से दूसरे टेप में जाने पर गुणवत्ता गिरती है। डिजिटल प्रणाली में ऐसा नहीं होता।


पोस्टकार्ड कब से चलन में आए और पहला पोस्टकार्ड किसने-किसको भेजा था?
दुनिया में पोस्टकार्ड का चलन इंग्लैंड से शुरू हुआ है। पहला पोस्टकार्ड फुलहैम, लंदन से लेखक थियोडोर हुक को भजा गया था, जो लेखक ने खुद अपने नाम लिखा था। शायद यह उसी समय शुरू हुई डाकसेवा पर व्यंग्य था। इसपर ‘पेनी ब्लैक’ डाक टिकट लगा था, जो दुनिया का पहला डाक टिकट था। पर इसे पहला पोस्टल कार्ड कहना सही नहीं होगा। पोस्टल कार्ड और पोस्ट कार्ड में अंतर समझना चाहिए। पोस्ट कार्ड सामान्य कार्ड है, जिसपर डाक टिकट लगाकर भेजा जाता है, जबकि पोस्टल कार्ड किसी डाक विभाग द्वारा जारी कार्ड होता है, जिसपर डाक की कीमत छपी होती है। पोस्ट कार्ड का इस्तेमाल आज पिक्चर पोस्ट कार्ड तथा व्यावसायिक संदेशों के ले भी होता है। बहरहाल पहला पोस्टल कार्ड 1 अक्तूबर 1869 में ऑस्ट्रिया-हंगरी के डाक विभाग ने जारी किया। इसके बाद दूसरे देशों में इसकी शुरूआत हुई। पोस्टकार्ड आज संग्रह की वस्तु भी हैं। इनके अध्ययन और संग्रह को डेल्टायलॉजी कहा जाता है।







राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Thursday, February 18, 2016

बजट को बजट क्यों कहते हैं?

ब्रिटिश संसद संसदीय परंपराओं की जननी. 'बजट' शब्द भी वहीं से आया है. 1733 में जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री (चांसलर ऑफ एक्सचेकर) रॉबर्ट वॉलपोल संसद में देश की माली हालत का लेखा-जोखा पेश करने आए, तो अपना भाषण और उससे संबद्ध दस्तावेज चमड़े के एक बैग (थैले) में रखकर लाए. चमड़े के बैग को फ्रेंच भाषा में बुजेट कहा जाता है. बस, इसीलिए इस परंपरा को पहले बुजेट और फिर कालांतर में बजट कहा जाने लगा. जब वित्त मंत्री चमड़े के बैग में दस्तावेज लेकर वार्षिक लेखा-जोखा पेश करने सदन में पहुंचता तो सांसद कहते - 'बजट खोलिए, देखें इसमें क्या है.' या 'अब वित्त मंत्री जी अपना बजट खोलें.' इस तरह 'बजट' नामकरण साल दर साल मजबूत होता गया

रेल बजट अलग क्यों होता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-112 के अनुसार राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के सम्बंध में संसद के दोनों सदनों के सामने भारत सरकार की उस वर्ष के लिए प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाएंगे, जिसे वार्षिक वित्तीय विवरण कहा गया है. यह बजट सामान्यतः फरवरी की अंतिम तिथि को पेश किया जाता है और 1 अप्रेल से लागू होता है. भारतीय रेल भी सरकार का उपक्रम है. इसका अलग बजट बनाने की परम्परा सन 1924 से शुरू हुई है. इसके लिए 1920-21 में बनाई गई विलियम एम एकवर्थ कमेटी ने रेल बजट को सामान्य बजट से अलग पेश करने का सुझाव दिया था. 1920-21 में सरकार का कुल बजट 180 करोड़ का था, जबकि इसमें 82 करोड़ रु का रेल बजट था. अकेला रेल विभाग देश की अकेली सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि संचालित करता था. इसलिए उसका बजट अलग तैयार करने का सुझाव दिया गया. अब अनेक विशेषज्ञ रेल बजट को आम बजट का हिस्सा बनाने का सुझाव देते हैं.

हम इंग्लिश कैलेंडर को ही क्यों फॉलो करते हैं? और फरवरी में ही सबसे कम दिन क्यों होते हैं?

फॉलो करने की वजह तो सरकारी है. सन 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन स्थापित होने की शुरूआत हो गई और तभी अंग्रेजी कैलेंडर का चलन शुरू हो गया. उसके पहले तक भारत में या तो विक्रमी पंचांग चलता था या इस्लामी काल पद्धति.

लीप वर्ष का अतिरिक्त दिन 29 फ़रवरी महत्त्वपूर्ण है. यह प्रकृति द्वारा सौर मंडल और इसके नियमों से आता है. यह धरती के सूर्य की परिक्रमा करने से जुड़ा हुआ है. पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर लगाने में 365.242 दिन लगते हैं अर्थात एक कैलेंडर वर्ष से चौथाई दिन अधिक. अतः प्रत्येक चौथे वर्ष कैलेंडर में एक दिन अतिरिक्त जोड़ना पड़ता है. इस बढ़े दिन वाले साल को लीप वर्ष या अधिवर्ष कहते हैं. ये अतिरिक्त दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर में लीप वर्ष का 60वाँ दिन बनता है अर्थात 29फ़रवरी.

यदि 29 फ़रवरी की व्यवस्था न हो तो हम प्रत्येक वर्ष प्रकृति के कैलेंडर से लगभग छह घंटे आगे निकल जाएँगे, यानी एक सदी में 24 दिन आगे. यदि ऐसा होता तो मौसम को महीने से जोड़ कर रखना मुश्किल हो जाता. यदि लीप वर्ष की व्यवस्था ख़त्म कर दें तो आजकल जिसे मई-जून की सड़ी हुई गर्मी कहते हैं वैसी स्थिति 500 साल बाद दिसंबर में आएगी.

दुनिया का सबसे बड़ा हाइवे कहाँ है? उसकी लम्बाई कितनी है?
ऑस्ट्रेलिया का हाइवे नम्बर वन दुनिया का सबसे लम्बा हाइवे माना जाता है. इसकी लम्बाई 14,500 किलोमीटर है. और यह इस महाद्वीप सागर तट से लगकर चलता है. यानी पूरे महाद्वीप का चक्कर लगाता है.

रेलवे स्टेशनों पर समुद्र तल से उनकी ऊँचाई क्यों लिखी जाती है?
यह एक जानकारी है जो वहाँ भी दी जाती है जहाँ रेलगाड़ियाँ नहीं जातीं वहाँ भी शहर के नाम के साथ ऐसी जानकारी दी जाती है. भारतीय रेलवे ने इस प्रकार की जानकारी शहर के नाम पट पर देने का निर्णय जनता की जानकारी बढ़ाने के लिए किया है. अलबत्ता रेल के ड्राइवरों को इस आशय की सूचना दी जाती है कि उनके रास्ते पर पड़ने वाले स्थानों की ऊँचाई क्या है. इससे उन्हें गाड़ी चलाने में आवश्यक सावधानी बरतने में सुविधा होती है. यदि आगे ढलान है तो गाड़ी की गति अलग होगी और यदि चढ़ाई है तो इंजन की शक्ति का दूसरे तरीके से इस्तेमाल होगा.

उल्लू रात में देखता कैसे है?
उल्लू बहुत कम रोशनी में भी देख लेता है. उल्लुओं की अधिकतर प्रजातियाँ रात में देखने वाली हैं. उनकी आंखों में कई प्रकार की अनुकूलन क्षमता होती है. खासतौर से आँखों का आकार दूसरे पक्षियों के मुकाबले काफी बड़ा होता है. उनके रेटिना में प्रकाश संवेदनशील कोशिकाएं होती हैं. कॉर्निया भी बड़ा होता हैं. पर वे दूरदर्शी होते हैं. पास की कई चीजें अच्छी तरह देख नहीं पाते.प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Thursday, February 11, 2016

रेडियो एक्टिव तत्व रेडियम क्या होता है? इसका आविष्कार किसने किया था?

रेडियम नमक जैसा अयस्क है जो पृथ्वी पर बहुत कम मात्रा में पाया जाता है. वस्तुतः यह यूरेनियम अयस्क में मिलता है, पर उसमें इसकी मात्रा बहुत कम होती है. एक टन यूरेनाइट या पिचब्लेंड में एक ग्राम के सातवां अंश रेडियम होता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि शुद्ध रेडियम से लगभग 1,600 वर्ष तक लगातार प्रकाशित होता रहता है. फिर धीरे-धीरे क्षीण होकर लगभग दो हजार वर्ष बाद यह शीशे में बदल जाता है. रेडियो एक्टिव तत्वों में इसका मुख्य स्थान है. पिचब्लेंड अयस्क मुख्यत: अफ्रीका में कांगो के कटैंगा प्रांत में तथा कनाडा और पश्चिम अमेरिका  में मिलता है. इसके अतिरिक्त यूरोप के कुछ स्थानों में, दक्षिणी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा मैडागास्कर में भी इसके अयस्क मिलते हैं. भारत के केरल राज्य में मोनोजाइट अयस्क बहुत मात्रा में मलता है. हुई. रेडियम क्लोराइड के रूप में इसकी खोज का श्रेय पेरिस के वैज्ञानिक दम्पति मैरी क्यूरी और पियरे क्यूरी को जाता है. 1898 में उन्होंने पिचब्लेंड अयस्क से इसे अलग किया. 1902 में इसका विशुद्ध यौगिक बना और 1910 में रेडियम धातु का निर्माण हुआ.

ग्रेट विक्टोरिया रेगिस्तान कहाँ है?
द ग्रेट विक्टोरिया रेगिस्तान ऑस्ट्रेलियन रेगिस्तानों में से एक है. इस रेगिस्तान का क्षेत्रफल 338,000 वर्ग किमी है. इस विशाल रेगिस्तान में रेतीले टीलों की भरमार है. इस रेगिस्तान की यह विशेषता है कि यहाँ वनस्पति बहुतायत से होती है. ब्रिटेन ने 1952 में जब एटम बम बनाया तो उसका परीक्षण यहाँ आकर किया.

तिल्लाना क्या है?
तिल्लाना: उत्तरी भारत में प्रचलित तराना के समान ही कर्नाटक संगीत में तिल्लाना शैली होती है. यह भक्ति प्रधान गीतों की गायन शैली है. प्राचीन समय में जिस गान में सार्थक शब्दों के स्थान पर निरर्थक या शुष्काक्षरों का प्रयोग होता था वह निर्गीत या बहिर्गीत कहलाता था. तनोम, तननन या दाड़ा दिड़-दिड़ जैसे निरर्थक अक्षरों वाला गान निर्गीत कहलाता था. आजकल का तराना निर्गीत की कोटि में आएगा.

मूँछ रखने की प्रथा पुरुषों में कब से शुरू हुई?
प्रश्न मूँछ रखने का नहीं बल्कि न रखने का या उन्हें सजाने का है. मनुष्य ने पत्थर युग में पत्थर को घिसकर उस्तरे बना लिए थे और दाढ़ी बनाना शुरू कर दिया था. दाढ़ी बनाने का मतलब यह है कि उसने मूँछ को भी तरतीब दी होगी. ईसा के तीन सौ साल पहले के एक प्राचीन ईरानी चित्र में घोड़े पर सवार एक व्यक्ति दिखाया गया है, जिसके मूँछ है. हमारी ज्यादातर प्राचीन प्रतिमाओं में शेव किए हुए चेहरे नजर आते हैं. इसका मतलब सभ्यता के जन्म से पहले इनसान ने शेविंग शुरू कर दी थी. पर मूँछों और दाढ़ी दोनों को पुराने वक्त से ही रौब-दाब के साथ जोड़ा गया था.
नाम से जाहिर है इसका रिश्ता मूँछ से है. कुछ साल पहले से पुष्कर के मेले में एक ऐसी ही प्रतियोगिता होने लगी है. जैसलमेर के मरु महोत्सव में ऐसी एक प्रतियोगिता होती है. सन 1990 से 'व‌र्ल्ड बियर्ड ऐंड मुस्टैश चैंपियनशिप' भी चल रही है जो पिछले साल यानी 2013 में नवंबर में जर्मनी में हुई थी. अगली चैंपियनशिप सितंबर 2014 में पोर्टलैंड अमेरिका में और 2015 की लियोगैंग, ऑस्ट्रिया में हुई.  

एंटोमॉलोजी क्या है?
कीट विज्ञान (एंटोमॉलोजी Entomology) प्राणिविज्ञान का एक अंग है जिसके अंतर्गत कीटों अथवा षट्पादों का अध्ययन आता है. षट्पाद (षट्=छह, पाद=पैर) श्रेणी को ही कभी-कभी कीट की संज्ञा देते हैं.

गरम पानी अभयारण्य का क्या इतिहास है?
गरम पानी अभयारण्य असम के कारबी आंगलोंग जले में है. यह गोलाघाट से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर है. यह देश के सबसे पुराने अभयारण्यों में से एक है. आकार में यह सिर्फ 6.05 वर्ग किलोमीटर में बसा है. यहाँ हाथी, जंगली भैंसा, बघेरा, कई प्रकार के लंगूर और पक्षियों तथा साँपों की कई प्रजातियाँ निवास करती है. ऑर्किड फूलों की 51 प्रजातियाँ यहाँ हैं, इनमें कुछ दुर्लभ प्रजातियाँ हैं. इसकी आधिकारिक रूप से स्थापना 1952 में की गई. पर प्रकृति ने इसे लाखों साल से अभयारण्य बना रखा था. इसे अभयारण्य बनाने का एक कारण यह भी था कि यहाँ मनुष्यों की बस्तियाँ बसाना सम्भव ही नहीं था. सन 1994 में यहाँ प्रोजेक्ट टाइगर भी शुरू किया गया. इसका नाम गरम पानी इसलिए है, क्योंकि यहाँ गरम पानी के झरने है और चश्मे हैं. 


प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Wednesday, February 10, 2016

थ्री-डी प्रिंटर : इंजीनियरी कल्पना से परे

आप एक मेज की कल्पना करें. उसके पाए लकड़ी को काटकर बनाए जाते हैं. फिर ऊपर का तख्ता अलग से काटा जाता है. इसी तरह उसके अलग-अलग हिस्से काटकर बनाए जाते हैं. फिर उन्हें जोड़ा जाता है. इसी मेज को छोटे से आकार में लकड़ी के बजाय मोम से बनाना हो तो आप एक सांचा बनाएंगे, फिर उसमें गर्म करके मोम भरेंगे. फिर ठंडा होने के बाद सांचे को हटा देंगे तो मोम की मेज बनी मिलेगी. सवाल है कि क्या लकड़ी की मेज इसी तरह नहीं बनाई जा सकती? इसके कई जवाब हैं. यदि लकड़ी को मोम की तरह पिघलाया जा सकता तो बन सकती थी. या फिर लकड़ी के बड़े टुकड़े को काट-तराश कर मेज निकाली जा सकती है. जैसे मूर्तिकार पत्थर से तराश कर मूर्ति बनाते हैं.
विज्ञान इसके आगे सोचना शुरू करता है. क्या मेज को पेड़ की तरह उगाया जा सकता है? पेड़ उगता है तो उसका आकार उसी तरह से बनता जाता है जैसा प्रकृति ने तय किया. उसके जैसे ज्यादातर पेड़, पौधे, फूल इसी तरह जन्म लेते हैं. वैज्ञानिकों ने अपने ज्ञान का इस्तेमाल करके इन पेड़-पौधों के साथ प्रयोग करके उनके रंग-रूप और शक्लो-सूरत में भी बदलाव कर लिया. पर यह उगाना था. किसी चीज को उगाने के लिए जिस सामग्री की जरूरत होती है उसे परिभाषित किया जाए तो वह आपकी इच्छानुसार उग सकती है.

Sunday, February 7, 2016

क्या कुछ लोगों को मच्छर ज्यादा काटते हैं? ऐसा क्यों?

हाँ ऐसा देखा गया है कि मच्छर कुछ लोगों के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं। वैज्ञानिक 300 से 400 ऐसी गंधों को खोज रहे हैं जो हमारे शरीर से निकलती हैं और जिनके प्रति मच्छर आकर्षित होते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि मच्छरों के सिर या उनके बदन पर बने एंटेना जैसे अंगों पर ऐसे प्रोटीन होते हैं जो मनुष्य की त्वचा से निकलने वाले कुछ खास रसायनों या गंध के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं। ये रसायन हमारे शरीर की स्वाभाविक क्रिया के कारण बनते हैं, पर ये मच्छरों के लिए ऐसे नियॉन साइन जैसा काम करते हैं जो अंधेरे में भी चमकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी साँस से निकलने वाली कार्बन डाई ऑस्काइड, शरीर के तापमान, गर्भवती स्त्रियों, नशे का सेवन करने वालों और रक्त के प्रति भी मच्छर आकर्षित होते हैं। रक्त के अलग-अलग वर्गों से निकलने वाली गंध भी अलग-अलग होती है। गर्भवती स्त्रियाँ सामान्य स्त्री की तुलना में ज्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड साँस से छोड़ती हैं। इसके कारण मच्छर ज्यादा आकर्षित होते हैं। इस प्रकार के अध्ययन अभी चल ही रहे हैं। 

प्रॉक्सी युद्ध क्या होता है?

प्रॉक्सी माने किसी के बदले काम करना। मुख्तारी, किसी का प्रतिनिधित्व। वह चाहे वोट देना हो या युद्ध लड़ना। दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर लड़ना या लड़ाना। यह युद्ध दो गुटों के बीच हो सकता है। या एक किसी का प्रॉक्सी युद्ध दूसरे से लड़ा जाए।

ब्रॉडबैंड के ज़रिए इंटरनेट कैसे काम करता है?

ब्रॉडबैंड से आशय इंटरनेट ट्रांसमिशन की बैंडविड्थ से है। यानी एक स्थान से दूसरे स्थान तक डेटा भेजने की ऊँची दर। शुरू में इंटरनेट 56 किलोबिट्स प्रति सेकंड की दर से काम करने वाली डायल-अप टेलीफोन लाइन से चलता था। जबकि जबकि ब्रॉडबैंड तकनीक टेलीफोन के उपयोग को छेड़े बगैर इस दर से कई गुना ज्यादा प्रदान करती हैं। हमारे देश में मोटे तौर पर 256 किलोबिट्स से ज्यादा की दर ब्रॉडबैंड के दायरे में आती है, पर अमेरिका में 768 किलोबिट्स प्रति सेकंड या उससे अधिक की दर को ब्रॉडबैंड कहते हैं। यो जैसे-जैसे तेज सेवाएं बढ़ रहीं है ब्रॉडबैंड की परिभाषा बदल रही है। मोटे तौर पर इसका मतलब है ऊँची स्पीड पर इंटरनेट का संचालन। आज किसी भी देश के आर्थिक विकास को उस देश में उपलब्ध ब्रॉडबैंड की स्पीड से भी आँका जाता है।

बर्गर की शुरूआत कब, कहाँ और कैसे हुई?

कहा जाता है कि सन 1904 में सेंट लुई के वर्ल्ड फेयर में पहली बार हैम्बर्गर नज़र आया। पर यह खाद्य पदार्थ उसके पहले से दुनिया में मौजूद था। अठारहवीं सदी में जर्मनी के प्रसिद्ध बंदरगाह से गुजरने वाले नाविक हैम्बर्ग स्टीक लाते थे। इसमें कई तरह के गोश्त के कीमे की परतें होतीं थी। दरअसल बर्गर का नाम ही उस हैम्बर्गर पर पड़ा है। इसके बारे में कुछ कहानियाँ और है। कहते हैं कि किसी के दिमाग में आया कि गोश्त को ब्रैड के दो पीसों के बीच रखकर खाया जाए तो आसानी होगी। और देखते ही देखते यह लोकप्रिय हो गया। सैंडविच और पैटी जैसी इस चीज़ में अलग-अलग किस्म के स्वाद भी पैदा किए जा सकते थे। अमेरिका की ह्वाइट कैसल हैम्बर्गर चेन को इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है। ह्वाइट कैसल के अनुसार जर्मनी के ओटो क्लॉस ने 1881 में हैम्बर्गर का आविष्कार किया। पर उनके अलावा भी चार्ली नेग्रीन, तुईस लासेन और ऑस्कर वैबर बिल्बी जैसे नाम भी हैं, जिन्हें इसका आविष्कारक माना जाता है। बहरहाल आज के फास्टफूड के ज़माने में इसका आविष्कार सहज था। हमारे देश में वैजीटेबल बर्गर की तमाम प्रजातियाँ विकसित हुईं हैं। मैक्डॉनल्ड का आलू टिक्की बर्गर भारतीय आविष्कार ही माना जाएगा।

फॉरेस्ट हिल नामक स्टेडियम किस खेल से सम्बंधित है?

फॉरेस्ट हिल न्यूयॉर्क सिटी के क्वींस बोरो का इलाका है। वहाँ है फॉरेस्ट हिल टेनिस स्टेडियम। विश्व प्रसिद्ध वेस्टसाइड टेनिस क्लब के पास अनेक स्टेडियम हैं उनमें यह भी एक है। सन 1923 में बना यह स्टेडियम कुछ साल पहले तक खस्ताहाल हो गया था। सन 1975 तक यहाँ अमेरिकी ओपन टेनिस प्रतियोगिता होती थी। हाल में इस स्टेडियम का जीर्णोद्धार किया गया है और अब यहाँ संगीत कार्यक्रम होने लगे हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Thursday, February 4, 2016

मिस्र के पिरामिडों का निर्माण कैसे हुआ?

मिस्र के पिरामिड वहां के तत्कालीन फराऊन (सम्राट) के लिए बनाए गए स्मारक स्थल हैं. इनमें राजाओं और उनके परिवार के लोगों के शवों को दफनाकर सुरक्षित रखा गया है. इन शवों को ममी कहा जाता है. उनके शवों के साथ भोजन सामग्री, पेय पदार्थ, वस्त्र, गहने, बर्तन, वाद्य यंत्र, हथियार, जानवर एवं कभी-कभी तो सेवक सेविकाओं को भी दफना दिया जाता था.

मिस्र के सबसे पुराने पिरामिड एक पुराने प्रांत की राजधानी मैम्फिस के पश्चिमोत्तर में स्थित सक्कारा में मिले हैं. इनमें सबसे पुराना जोसर का पिरामिड है, जिसका निर्माण ईसा पूर्व 2630 से 2611 के बीच हुआ होगा. पिरामिडों को देखकर उन्हें बनाने की तकनीक, सामग्री और इस काम में लगे मजदूरों की संख्या की कल्पना करते हुए हैरत होती है. एक बड़े पिरामिड का निर्माण करने में पचास हजार से एक लाख लोग तक लगे हों तब भी आश्चर्य नहीं. मिस्र में 138 पिरामिड हैं. इनमें काहिरा के उप नगर गीज़ा का ‘ग्रेट पिरामिड’ शानदार है. यह प्राचीन विश्व के सात अजूबों की सूची में है. उन सात प्राचीन आश्चर्यों में यही एकमात्र ऐसा स्मारक है जिसे समय के थपेड़े खत्म नहीं कर पाए. यह पिरामिड 450 फुट ऊंचा है. 43 सदियों तक यह दुनिया की सबसे ऊंची इमारत रही. 19वीं सदी में ही इसकी ऊंचाई का कीर्तिमान टूटा. इसका आधार 13 एकड़ में फैला है जो करीब 16 फुटबॉल मैदानों जितना है. यह 25 लाख शिला खंडों से निर्मित है जिनमें से हर एक का वजन 2 से 30 टन के बीच है. ग्रेट पिरामिड को इतनी गणितीय परिशुद्धता से बनाया गया है कि आज भी इसे बनाना आसान नहीं है. कुछ साल पहले तक (लेसर किरणों से माप-जोख का उपकरण ईजाद होने तक) वैज्ञानिक इसकी सूक्ष्म सममिति (सिमिट्रीज) का पता नहीं लगा पाए थे. ऐसा दूसरा पिरामिड बनाने की बात छोडिए. प्रमाण बताते हैं कि इसका निर्माण करीब 2560  वर्ष ईसा पूर्व मिस्र के शासक खुफु के चौथे वंश ने कराया था. इसे बनाने में करीब 23 साल लगे.

पिरामिड कैसे बनाए गए होंगे यह हैरानी का विषय है. इसमें लगे विशाल पत्थर कहाँ से लाए गए होंगे, कैसे लाए गए होंगे और किस तरस से उन्हें एक-दूसरे के ऊपर रखा गया होगा? यहाँ आसपास सिर्फ़ रेत है. यह माना जाता है कि पहले चारों ओर ढालदार चबूतरे बनाए गए होंगे, जिनपर लट्ठों के सहारे पत्थर ऊपर ले जाए गए होंगे. पत्थरों की जुड़ाई इतनी साफ है कि नोक भर दोष नजर नहीं आता.

खिलाफत आंदोलन क्या था? भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, कांग्रेस या गांधीजी का इससे क्या सम्बन्ध था?

आजादी से बहुत पहले 1919-1924 के बीच चला था खिलाफत आंदोलन. यह आंदोलन दक्षिण एशियाई मुसलमानों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ चलाया था. पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य भी पराजित शक्तियों में शामिल था. उधर तुर्की के भीतर इस बात को लेकर आंदोलन था कि धार्मिक राज्य की स्थापना हो या नहीं. ब्रिटेन ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य के खलीफा के साथ किया गया वादा पूरा नहीं किया. खलीफा मुसलमानों के मजहबी नेता थे. आन्दोलन का उद्देश्य तुर्की में खलीफा के पद की पुनर्स्थापना के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाना था. भारत में उस समय आजादी की लड़ाई चल रही थी और महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया. उन्हें लगता था कि इससे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में मुसलमानों का सहयोग मिलेगा.

ब्रिटिश शासन के प्रति नाराज़गी को अबुलकलाम आजाद, ज़फर अली खाँ तथा मुहम्मद अली ने अपने समाचारपत्रों अल-हिलाल, जमींदार तथा कॉमरेड और हमदर्द के मार्फत व्यापक रूप दिया. तहरीके खिलाफत ने जमीयत-उल-उलेमा के सहयोग से खिलाफत आंदोलन का गठन किया तथा मुहम्मद अली ने 1920 में खिलाफत घोषणापत्र जारी किया. गांधी जी के प्रभाव से खिलाफत आंदोलन तथा असहयोग आंदोलन एकरूप हो गए. मई, 1920 तक खिलाफत कमेटी ने महात्मा गांधी की अहिंसात्मक असहयोग योजना का समर्थन किया. सितंबर में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन ने असहयोग आंदोलन के दो ध्येय घोषित किए-स्वराज्य तथा खिलाफत की माँगों की स्वीकृति. इधर भारत में यह आंदोलन चल रहा था उधर तुर्की में आधुनिकतावादी मुस्तफा कमाल पाशा ने नवंबर, 1922 में सुल्तान खलीफा मुहम्मद चतुर्थ को पदच्युत कर दिया. सन 1924 में उन्होंने खलीफा का पद समाप्त कर दिया. वहाँ एक धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था की स्थापना हो गई. इसके साथ भारत का खिलाफत आंदोलन भी अपने आप खत्म हो गया. एक खलीफा होने के नाते, तुर्क सम्राट नाममात्र के लिए ही सही दुनिया भर में सभी मुसलमानों की सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता थे. पर उस ताकत को तुर्की के भीतर ही समर्थन नहीं मिला. अलबत्ता इस आंदोलन ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को अनेक मुसलमान नेता दिए. हालांकि यह आंदोलन मुसलमानों का धार्मिक आंदोलन था, पर इसमें हिन्दुओं का समर्थन भी मिला.

ट्यूबलाइट में चोक का क्या इस्तेमाल होता है?
ट्यूबलाइट मूलतः मर्करी वैपर लैम्प है. इसमें मर्करी वैपर को चार्ज करने के लिए बिजली के हाई वोल्टेज प्रवाह की जरूरत होती है. चोक और स्टार्टर प्रेरक या inductor or a reactor का काम करते हैं. प्रेरक को साधारण भाषा में 'चोक' (choke) और 'कुण्डली' (coil) भी कहते हैं. ट्यूबलाइट आदि को जलाने के लिए हाई वोल्ट पैदा करने एवं जलने के बाद उससे बहने वाली धारा को सीमित रखने के लिए इसका इस्तेमाल होता है. पुरानी कारों एवं स्कूटरों आदि में स्पार्क पैदा करने के लिए इग्नीशन क्वायल की भी यही भूमिका होती है.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित



Monday, February 1, 2016

यमुना नदी का इतिहास क्या है?

करीब सात करोड़ साल पहले सुपर महाद्वीप गोंडवाना यानी इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट उत्तर की ओर बढ़ी और यूरेशियन प्लेट से टकराई. इससे ज़मीन का काफी हिस्सा उठ गया. यही उभरी हुई ज़मीन हिमालय है. इस टकराव को पूरा होने में करीब दो करोड़ साल लगे. जिस इलाके में कभी समुद्र था वहाँ दुनिया के सबसे ऊँचे पहाड़ बन गए. यह बात अब से करीब पाँच करोड़ साल पहले की है. इसके दो करोड़ साल बाद पहला हिमयुग आया. हिमयुगों अंतिम दौर करीब 20 हजार साल पहले तक चला. ग्लेशियरों के पिघलने के साथ ही नदियों का जन्म भी हुआ. यमुना नदी यमुनोत्री से निकलती है, पर उसके काफी पहले ग्लेशियरों की पिघली बर्फ का पानी सतह पर या ज़मीन के नीचे से होता हुआ यमुनोत्री तक आता है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यमुना सूर्य की पुत्री और यमराज की बहन हैं. जिस पहाड़ से निकलतीं हैं उसका एक नाम कालिंद है इसलिए यमुना को कालिंदी भी कहते हैं.

भारत में थिएटर, रंगमंच के इतिहास पर रोशनी डालिए.

ऐसा समझा जाता है कि नाट्यकला का विकास प्राचीन भारत में हुआ. ऋग्वेद के सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं. इन संवादों में लोग नाटक के विकास का चिह्न पाते हैं. अनुमान किया जाता है कि इन्हीं संवादों से प्रेरणा ग्रहण कर साहित्य में नाटक एक शैली बनी. भरतमुनि ने उसे शास्त्रीय रूप दिया. उनके अनुसार देवताओं ने ब्रह्मा से मनोरंजन का कोई साधन उत्पन्न करने की प्रार्थना की. उन्होंने ऋग्वेद से कथोपकथन, सामवेद से गायन, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर, नाटक का निर्माण किया. विश्वकर्मा ने रंगमंच बनाया.

नाटकों का विकास चाहे जिस प्रकार हुआ हो, संस्कृत साहित्य में नाट्य ग्रंथ उससे जुड़े अनेक शास्त्रीय ग्रंथ लिखे गए. कालिदास, भास, भट्ट नारायण और भवभूति संस्कृत नाटक उत्कृष्ट कोटि के हैं और वे अधिकतर अभिनय करने के उद्देश्य से लिखे गए थे. अग्नि पुराण, शिल्प रत्न, काव्य मीमांसा तथा संगीतमार्तंड में भी राजप्रसाद के नाट्यमंडपों के विवरण प्राप्त होते हैं. इसी प्रकार महाभारत में रंगशाला का उल्लेख है और हरिवंश पुराण तथा रामायण में नाटक खेले जाने का वर्णन है. भरत का नाट्यशास्त्र पहली या दूसरी सदी में संकलित हुआ समझा जाता है. भरत ने आदिवासियों तथा आर्यों दोनों के नाट्यमंडपों के आकार को अपनाया है. इन दोनों के सम्मिश्रण से इन्होंने नाट्यमंडपों के जो रूप निर्धारित किए, वे सर्वथा भारतीय हैं. भरत ने तीन प्रकार के नाट्यमंडपों का विधान बताया है : विकृष्ट (अर्थात् आयताकार), चतुरस्र (वर्गाकार) तथा त्रयस्र (त्रिभुजाकार). उन्होंने इन तीनों के फिर तीन भेद किए हैं : ज्येष्ठ (देवताओं के लिए), मध्यम (राजाओं के लिए), तथा अवर (औरों के लिए).

आधुनिक भारतीय नाट्य साहित्य का इतिहास एक शताब्दी से अधिक पुराना नहीं है. राम लीला आदि की तरह लोक कला के माध्यम से भारतीय थिएटर जीवित रही अंग्रेजों का प्रभुत्व देश में व्याप्त होने पर उनके देश की अनेक वस्तुओं ने हमारे देश में प्रवेश किया. उनके मनोरंजन के निमित्त पाश्चात्य नाटकों का भी प्रवेश हुआ. उन लोगों ने अपने नाटकों के अभिनय के लिए यहाँ अभिनय शालाओं का संयोजन किया, जो थिएटर के नाम से अधिक विख्यात हैं. दूसरी ओर बंबई में पारसी लोगों ने इन विदेशी अभिनयशालाओं के अनुकरण पर भारतीय नाटकों के लिए, एक नए ढंग की अभिनयशाला को जन्म दिया. पारसी नाटक कंपनियों ने रंगमंच को आकर्षक और मनोरंजक बनाकर अपने नाटक उपस्थित किए.

विश्व का सबसे ऊँचा पेड़ कौन सा है?
दुनिया का सबसे ऊँचा जीवित पेड़ है रेडवुड नेशनल पार्क, कैलिफोर्निया में खड़ा कोस्ट रेडवुड जिसकी ऊँचाई है 115.66 मीटर यानी 379 फुट. कुतुब मीनार से भी ऊँचे इस पेड़ की तुलना कुछ और चीजों से करें तो पाएंगे कि यह अमेरिकी संसद भवन और स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ज्यादा ऊँचा है. और सबसे बड़ा यानी सबसे ज्यादा जगह घेरने वाला सिंगल स्टैम पेड़ है जनरल शर्मन. आसानी से समझने के लिए सबसे ज्यादा लकड़ी देने वाला पेड़. जनरल शर्मन पेड़ अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के सेक्योवा नेशनल पार्क में मौजूद है. यह इतिहास में ज्ञात जीवित पेड़ों में सबसे ऊँचा नहीं है. दरअसल यह मनुष्यों को ज्ञात सबसे विशाल वृक्ष भी नहीं है. ट्रिनिडाड, कैलिफोर्निया के पास क्रैनेल क्रीक जाइंट पेड़ जनरल शर्मन के मुकाबले 15 से 25 प्रतिशत ज्यादा बड़ा था. पर उस पेड़ को 1940 के दशक में काट डाला गया.

अहिंसा सिल्क क्या है?

महात्मा गांधी सिल्क पहनने का विरोध करते थे, क्योंकि इसे तैयार करने में रेशम के कीड़े की हत्या की जाती है. पर दुनिया में सिल्क तैयार करने की केवल एक विधि ही नहीं है. अहिंसा सिल्क अलग ढंग के कीड़ों से बनाई जाती है. इसमें जब कीड़ा सिल्क छोड़ देता है तब उसे एकत्र किया जाता है. इसे वाइल्ड सिल्क भी कहा जाता है. दुनिया में वाइल्ड सिल्क के कीड़ों की 500 प्रजातियाँ हैं. इस सिल्क में एक धागा नहीं मिलता, बल्कि कपास की तरह की रुई मिलती है इससे धागा बनाया जाता है.

दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा कौन सी है और कहाँ है?

चीन के हेनान प्रांत के लुशान में बनी बुद्ध प्रतिमा, जो 128 मीटर ऊँची है. कुतुब मीनार (72.5) से भी ऊँची

एटीएम मशीन का पूरा मतलब क्या है?
एटीएम का अर्थ है ऑटोमेटेड टैलर मशीन. टैलर को सामान्यत: क्लर्क या कैशियर के रूप में पहचानते हैं. एटीएम की ज़रूरत पश्चिमी देशों में वेतन बढ़ने तथा प्रशिक्षित कर्मियों की संख्या में कमी होने के कारण पैदा हुई. काम को आसान और सस्ता बनाने के अलावा यह ग्राहक के लिए सुविधाजनक भी है. व्यावसायिक संस्थानों में सेल्फ सर्विस की अवधारणा बढ़ रही है. इसके आविष्कार का श्रेय आर्मेनियाई मूल के अमेरिकी लूथर जॉर्ज सिमियन को जाता है. उसने 1939 में इस प्रकार की मशीन तैयार कर ली थी, जिसे शुरू में उसने बैंकमेटिक नाम दिया. पर इस मशीन को किसी ने स्वीकार नहीं किया. बैंक अपने कैश को लेकर संवेदनशील होते हैं. वे एक मशीन के सहारे अपने कैश को छोड़ने का जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं थे. लूथर इसके विकास में लगा रहा और 21 साल बाद जून 1960 में उसने इसका पेटेंट फाइल किया. फरवरी 1963 में उसे पेटेंट मिला. इस बीच उसने सिटी बैंक ऑफ न्यूयॉर्क (आज का सिटी बैंक) को इसे प्रयोगात्मक रूप से इस्तेमाल करने के लिए राज़ी कर लिया. छह महीने के ट्रायल में यह मशीन लोकप्रिय नहीं हो पाई. साठ के दशक में ही क्रेडिट कार्ड का चलन शुरू होने के कारण जापान में इस तरीके की मशीन की ज़रूरत महसूस की गई. तब तक कुछ और लोगों ने मशीनें तैयार कर ली थीं. जापान में 1966 में एक कैश डिस्पेंसर लगाया गया, जो चल निकला. उधर 1967 में लंदन में बार्कलेज़ बैंक ने ऐसी मशीन लगाने की घोषणा की. उस मशीन को तैयार किया था भारत में जन्मे स्कॉटिश मूल के जॉन शै़फर्ड ने. इस मशीन में तब से काफी बदलाव हो चुके हैं. इलेक्ट्रॉनिक्स और इंस्ट्रूमेंटेशन के बुनियादी तौर-तरीकों में काफी बदलाव हो चुका है. मैग्नेटिक स्ट्रिप के कारण इसकी कार्य-पद्धति बदल गई है. प्लास्टिक मनी की संस्कृति विकसित होने के कारण इसका चलन बढ़ता ही जा रहा है. अब तो आप भारतीय बैंक के कार्ड से अमेरिका में भी पैसा निकाल सकते हैं.