Thursday, February 23, 2017

ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल में क्या फर्क है?

मतदान के पहले वह सर्वेक्षण जिसमें वोटरों से पूछा जाता है कि आप किस पार्टी को देंगे, ओपीनियन पोल कहलाता है. मतदान के दिन जब वोटर वोट डाल कर निकलता है तो सर्वे करने वाले उससे यह पूछते हैं कि आपने किसे वोट दिया है. इस सर्वे को एग्जिट पोल कहते हैं.
भारत में एक लम्बे समय तक दोनों होते रहे, पर धीरे-धीरे यह महसूस किया गया कि इन सर्वेक्षणों से चुनाव में मतदाता का फैसला प्रभावित होता है. इन बातों को लेकर 22-23 दिसम्बर 1997 को पहली बार तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ एमएस गिल ने राजनीतिक दलों के साथ बैठकर इस विषय पर विचार-विमर्श किया. फरवरी में लोकसभा और कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले थे.
इनपर पहली बार रोक कब लगी?
इस बैठक के बाद 11 जनवरी 1998 को चुनाव आयोग ने एक दिशा निर्देश जारी किया, जिसके अंतर्गत 14 फरवरी को शाम के पाँच बजे के बाद से लेकर 7 मार्च को शाम पाँच बजे तक चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल के प्रकाशन पर रोक लगा दी गई. इस दिशा निर्देश को अदालतों में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को स्थगित नहीं किया और सन 1998 के चुनाव देश के अकेले चुनाव थे, जब किसी प्रकार का सर्वे प्रकाशित नहीं हुआ.
एग्जिट पोल पर पाबंदी का कानून कब बना?
इसके बाद 1999 में फिर से लोकसभा चुनाव हुए. चुनाव आयोग ने फिर से वही आदेश जारी किया, पर देश के अनेक मीडिया हाउसों ने इस आदेश को नहीं माना. इसपर आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी. अदालत ने इसके लिए संविधान पीठ का गठन किया. पीठ ने कहा कि आयोग को इस प्रकार का आदेश जारी करने का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है. सन 2004 में चुनाव आयोग ने विधि मंत्रालय से निवेदन किया कि जन प्रतिनिधित्व कानून में बदलाव करके ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल पर रोक लगाई जाए.
इस सुझाव को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया और फरवरी 2010 में उपरोक्त अधिनियम की धारा 126 (ए) में संशोधन करके एग्जिट पोल पर रोक लगा दी गई. इसके बाद नवम्बर 2013 में चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के साथ फिर से विमर्श किया कि ओपीनियन पोल पर भी रोक लगाई जाए. इसपर भाजपा को छोड़कर सभी दलों ने राय दी कि चुनाव की घोषणा होने के बाद ओपीनियन पोल पर पाबंदी लगा दी जाए. यह सुझाव विधि मंत्रालय को दिया गया, पर उसके बाद इस विषय में कोई कार्यवाही नहीं हुई.
विदेश में क्या व्यवस्था है?
यूरोपीय संघ के 16 देशों में मतदान के 24 घंटे से लेकर एक महीना पहले तक ओपीनियन पोल पर रोक है. फ्रांस में सन 1977 में 7 दिन पहले की रोक लगाई गई थी, जिसपर वहाँ की एक अदालत ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक मानते हुए खारिज कर दिया. फ्रांस में यह रोक अब 24 घंटे पहले की है. इंग्लैंड में ओपीनियन पोल पर कोई रोक नहीं है. वहाँ एग्जिट पोल मतदान पूरा होने के बाद ही प्रकाशित किए जा सकते हैं। अमेरिका में ओपीनियन पोल लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा माने जाते हैं.
अन्नाद्रमुक पार्टी कब बनी?
अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम की स्थापना 17 अक्तूबर 1972 को एमजी रामचंद्रन ने की थी. इसके पहले वे द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम के सदस्य थे. पार्टी के नेता के करुणानिधि के साथ व्यक्तिगत मतभेदों के कारण उन्होंने एक नया संगठन बनाया. अन्नाद्रमुक शुरुआती दिनों में कांग्रेस पार्टी के करीब थी. सन जून 1975 में देश में इमर्जेंसी लगाए जाने का पार्टी ने स्वागत किया था. दिसम्बर 1987 में एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद कुछ समय तक आंतरिक सत्ता-संघर्ष चला. अंततः सन 1989 में जे जयललिता इस पार्टी की एकछत्र नेता बनने में कामयाब हुईं. 5 दिसम्बर 2016 को जयललिता के निधन के बाद वीके शशिकला पार्टी की महासचिव मनोनीत हुईं.  
तमिलनाडु राज्य कब बना?
अंग्रेजी राज में यह प्रांत मद्रास प्रेसीडेंसी का भाग था. स्वतन्त्रता के बाद मद्रास प्रेसीडेंसी को विभिन्न भागों में बाँट दिया गया. इसके बाद इस राज्य का बड़ा हिस्सा मद्रास कहलाया. सन 1968 में मद्रास राज्य का नाम बदलकर तमिलनाडु कर दिया गया. तमिलनाडु शब्द तमिल भाषा के तमिल तथा नाडु यानी देश या वास-स्थान, से मिलकर बना है जिसका अर्थ तमिलों का घर या तमिलों का देश होता है.
जीडीपी क्या है?

जीडीपी है ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट अर्थात सकल घरेलू उत्पाद. पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों को एक साथ जोड़कर एक जगह रखें तो जो हिसाब बनेगा वह है जीडीपी. आर्थिक गतिविधियों में उत्पादन और सेवाएं दोनों शामिल हैं. उत्पादन में उद्योगों, खेती और तमाम छोटे धंधों का काम शामिल है. सेवाएं मुख्यत: चिकित्सा, शिक्षा, हॉस्पिटैलिटी यानी होटल और टेलीफोन आदि की हैं. देश के निजी और सरकारी उपभोग, पूँजी निवेश और सभी गतिविधियों का वास्तविक मूल्य जोड़कर प्राप्त राशि को देश की जनसंख्या से भाग देने पर जो राशि प्राप्त होती है वह औसत प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद है. इसमें होने वाली वृद्धि के प्रतिशत के आधार पर हम अपनी प्रगति को आँकते हैं.  
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Sunday, February 19, 2017

जेनेटिक इंजीनियरिंग क्या है?

जेनेटिक इंजीनियरी को समझने के लिए पहले जेनेटिक्स या अनुवांशिकी के मतलब को समझना चाहिए। यह विज्ञान की एक शाखा है, जिसमें गुणसूत्रों और डीएनए का अध्ययन किया जाता है। यह जीव-विज्ञान का ही हिस्सा है। इसके अंतर्गत जीवधारियों और वनस्पतियों में होने वाली आनुवंशिक विविधताओं का अध्ययन किया जाता है। जेनेटिक इंजीनियरी जींस की सहायता से पेड़-पौधे, जानवर और इंसानों के सेल में बदलाव करने का प्रयास करती है। चिकित्सा, कृषि विज्ञान और पशुपालन में काफी काम हुआ है। इसके जरिए पेड़-पौधे और जानवरों में ऐसे गुण विकसित किए जाते हैं, जिसकी मदद से उनमें बीमारियों से लड़ने की क्षमता विकसित होती है। इस तरह के पेड़-पौधे जीएम यानी जेनेटिकली मोडिफाइड फूड के रूप में जाने-जाते हैं।
संस्कार से क्या अभिप्राय है?
संस्कार शब्द के अनेक अर्थ हैं। एक अर्थ है शुद्ध करना, परिष्कार करना, सुधारना। एक और अर्थ है तहज़ीब, मानसिक शिक्षा। मन में अच्छी बातों का जमाना। शिक्षा, उपदेश, संगत, आदि का मन पर पड़ा हुआ प्रभाव । दिल पर जमा हुआ असर। स्वाभाविक है कि सुशिक्षित व्यक्ति मानवीय, दूसरों का सम्मान करने वाला, सभ्य होता है। यह संस्कारवान व्यक्ति का गुण है। इसके विपरीत होना कुसंस्कार है। माता-पिता, गुरु, मित्र और संगति व्यक्ति की बुनियादी मान्यताएं या विश्व-दृष्टि बनाते हैं। यही संस्कार हैं। 
हिन्दू समाज में जीवन के अलग-अलग चरणों में पूरे किए जाने वाले कर्तव्यों को भी संस्कार कहते हैं। शास्त्रों में षोडश संस्कारों का विवरण मिलता है। इनके अनुसार गर्भाधान से लेकर मृतक कर्म तक के 16 संस्कार होते हैं। इनकी सूची के कई रूप हैं। सामान्यतः 16 संस्कार इस प्रकार हैं 1। गर्भाधान, 2। पुंसवन, 3। सीमन्तोन्नयन, 4।जातकर्म, 5। नामकरण, 6। निष्क्रमण, 7। अन्नप्राशन, 8। चूड़ाकर्म, 9। विद्यारम्भ, 10। कर्णवेध, 11। यज्ञोपवीत, 12। वेदारम्भ, 13। केशान्त, 14। समावर्तन, 15। विवाह, 16। अन्त्येष्टि।
भारत में विमान सेवा की शुरुआत कब और कहां से हुई?
भारत में पहली व्यावसायिक असैनिक उड़ान 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद से नैनी के बीच हुई थी। इस उड़ान में विमान ने 6 मील यानी 9।7 किलोमीटर की दूरी तय की थी। उस दिन फ्रांसीसी विमान चालक हेनरी पेके हम्बर-सोमर बाईप्लेन पर डाक के 6,500 पैकेट लेकर गया था। यह दुनिया में पहली आधिकारिक एयरमेल सेवा भी थी।
इसके बाद दिसम्बर 1912 में इंडियन एयर सर्विसेज ने कराची और दिल्ली के बीच पहली घरेलू सेवा की शुरुआत की। उसके तीन साल भारत की पहली निजी वायुसेवा टाटा संस ने कराची और मद्रास के बीच शुरू की। 15 अक्तूबर 1932 को जेआरडी टाटा कराची से जुहू हवाई अड्डे तक हवाई डाक लेकर आए। व्यावसायिक उड़ान का लाइसेंस पाने वे पहले भारतीय थे। उनकी विमान सेवा का नाम ही बाद में एयर इंडिया हुआ।
श्री और सर्वश्री
श्री एक व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होगा। मसलन श्री राजीव कुमार। जब हम कई नाम एकसाथ लिखें तो शुरू में सर्वश्री लिखकर काम चलाते हैं। आशय है कि सभी श्री। मसलन सर्वश्री रमेशसुरेशमहेश और राकेश।

Thursday, February 16, 2017

नैनो सैटेलाइट क्या होते हैं?

नैनो सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले लघु उपग्रहों को कहते हैं. सामान्यतः 500 किलोग्राम से छोटे सैटेलाइट को नैनो की परिभाषा में रखा जाता है. इन छोटे उपग्रहों की अपनी भूमिका है. मसलन अंतरिक्ष के अनेक बिन्दुओं से जानकारी एकत्र करनी हो तो अनेक उपग्रहों की जरूरत होगी. ऐसे में एक बड़े वज़नी उपग्रह के बजाय अनेक छोटे उपग्रहों की सेवाएं ली जाती हैं. कई बार बड़े उपग्रहों की निगरानी के लिए भी इनकी जरूरत होती है. विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को उपग्रह विज्ञान की बुनियादी जानकारी देने के लिए भी इनका इस्तेमाल होता है.
हाल के वर्षों में 1 से 50 किलो वज़न के उपग्रहों का चलन बढ़ा है. एक अनुमान है कि अब से सन 2020 के बीच दुनिया में 500 से ज्यादा उपग्रह इस वर्ग में प्रक्षेपित होंगे. अब अंतरिक्ष प्रक्षेपण कम्पनियाँ छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण में अलग से विशेषज्ञता प्राप्त करने की कोशिश कर रहीं है। भारत का पीएसएलवी हालांकि माध्यमिक भार के उपग्रहों के लिए बनाया गया है, पर उसने बड़ी संख्या में छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण का कार्य करके अपनी उपादेयता साबित की है. अमेरिका की संस्था वर्जिन गैलेक्टिक ने लांचरवन नाम से रॉकेट तैयार किया है जो 100 किलोग्राम तक के वज़न के उपग्रहों का प्रक्षेपण करता है. आने वाले समय में 1 से 10 किलो वज़न के उपग्रहों की संख्या भी बढ़ेगी, जिन्हें माइक्रो सैटेलाइट कहते हैं.
अंतरिक्ष में भेजा सबसे भारी यान कौन सा है?
इस वक्त पृथ्वी की कक्षा में धरती से भेजा गया सबसे भारी उपग्रह अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन है, जिसका वज़न 4,19,455 किलोग्राम है. इस पूरे स्पेस स्टेशन को एकसाथ अंतरिक्ष में नहीं भेजा गया है. इसके सबसे पहले हिस्से को सन 1998 में अंतरिक्ष में स्थापित किया गया था. तबसे  सामान्यतः यह स्टेशन धरती से सामान्यतः 330 से 435 किलोमीटर की दूरी पर रहते हुए अपनी परिक्रमा पूरी करता है. यह हर रोज धरती के 15.54 चक्कर पूरे करता है।
डॉक्टर के पर्चे में BD और OD का मतलब क्या होता है?
डॉक्टर के नुस्खे में कई तरह के संकेत संक्षेप में लिखे होते हैं, जो मूल रूप से लैटिन संकेताक्षर हैं. इनमें से सामान्यतः सबसे ज्यादा BD, OD और TDS का इस्तेमाल होता है. OD का लैटिन में पूरा रूप है ओम्नी डाय. जिसे अंग्रेजी में कहेंगे वंस ए डे यानी दिन में एकबार. BD यानी बिस इन डाय यानी दिन में दो बार. TDS का मतलब है टर्डी सुमेंडम माने दिन में तीन बार. QID माने क्वार्टर इन डाय यानी दिन में चार बार. Q2H मतलब हरेक दो घंटे में. इसी तरह SOS का मतलब है सी ओपस सिट माने जरूरत पड़ने पर. जैसे दर्द हो वगैरह.
हावड़ा ब्रिज का निर्माण कब हुआ?
देश में अंग्रेज सरकार ने सन् 1871 में हावड़ा ब्रिज एक्ट पास किया, पर योजना बनने में बहुत वक्त लगा. पुल का निर्माण सन् 1937 में ही शुरू हुआ और सन् 1942 में यह बनकर पूरा हुआ. इसे बनाने में 26,500 टन स्टील की खपत हुई. इसके पहले हुगली नदी पर तैरता पुल था. पर नदी में पानी बढ़ जाने पर इस पुल पर जाम लग जाता था. इस ब्रिज को बनाने का काम जिस ब्रिटिश कंपनी को सौंपा गया उससे यह ज़रूर कहा गया था ‍कि वह भारत में बने स्टील का इस्तेमाल करेगा. टिस्क्रॉम नाम से प्रसिद्ध इस स्टील को टाटा स्टील ने तैयार किया. इसके इस्पात के ढाँचे का फैब्रिकेशन ब्रेथवेट, बर्न एंड जेसप कंस्ट्रक्शन कम्पनी ने कोलकाता स्थित चार कारखानों में किया. 1528 फुट लंबे और 62 फुट चौड़े इस पुल में लोगों के आने-जाने के लिए 7 फुट चौड़ा फुटपाथ छोड़ा गया था. सन् 1943 में इसे आम जनता के उपयोग के लिए खोल दिया गया. हावड़ा और कोलकाता को जोड़ने वाला हावड़ा ब्रिज जब बनकर तैयार हुआ था तो इसका नाम था न्यू हावड़ा ब्रिज. 14 जून 1965 को गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर इसका नाम रवींद्र सेतु कर दिया गया पर प्रचलित नाम फिर भी हावड़ा ब्रिज ही रहा.
जैरॉक्स मशीन की खोज किसने की?
जैरॉक्स कॉरपोरेशन ग्लोबल डॉक्यूमेंट मैनेजमेंट कम्पनी है. यह 1906 में बनी थी. तब इसका नाम हैलॉइड फोटोग्राफिक कम्पनी था. यह फोटोग्राफिक पेपर और फोटोग्राफी के अन्य उपकरण बनाती थी. 1958 में इस कम्पनी का नाम हैलॉइड जैरॉक्स कॉरपोरेशन हो गया और 1961 में सिर्फ जैरॉक्स. इस कम्पनी ने 1961 में जैरॉक्स 914 के नाम से दुनिया का पहला प्लेन पेपर कॉपियर बनाया. यह एक प्रकार की क्रांति थी. इसने फोटोकॉपी या जैरोग्राफी का एक नया संसार खोल दिया. इसके बाद तमाम कम्पनियों ने पेपर कॉपियर बनाए, पर हम लोग सबको जैरॉक्स बोलते हैं.
भारत में स्पीड पोस्ट सेवा  
भारत में स्पीड पोस्ट सेवा 1 अगस्त, 1986 को शुरू की गई थी. इस सेवा के अंतर्गत पत्रों, दस्तावेजों और पार्सलों की डिलीवरी एक निश्‍चित अवधि के भीतर  की जाती है. यह सेवा अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भी 97 देशों में उपलब्ध है. इंटरनेट आधारित ट्रैक एंड ट्रेस सर्विस स्‍पीड नेट 3 जनवरी, 2002 को शुरू की गई.
श्री और सर्वश्री

श्री एक व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होगा. मसलन श्री राजीव कुमार. जब हम कई नाम एकसाथ लिखें तो शुरू में सर्वश्री लिखकर काम चलाते हैं. आशय है कि सभी श्री. मसलन सर्वश्री रमेश, सुरेश, महेश और राकेश.
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Sunday, February 12, 2017

बजट पूर्व आर्थिक समीक्षा क्या होती है?

आर्थिक समीक्षा भारत सरकार के वित्त मंत्रालय का फ्लैगशिप वार्षिक दस्तावेज होता है. इसे देश की अर्थव्यवस्था पर बजट पूर्व रिपोर्ट कार्ड भी कहा जा सकता है. देश की पहली आर्थिक समीक्षा सन 1950 में पेश की गई थी. सन 1964 के पहले तक इसे बजट के साथ ही रखा जाता था. सन 1964 से इसे हर साल आम बजट से एक दिन रखे जाने की परंपरा शुरू हुई. इसे केंद्रीय वित्तमंत्री संसद में पेश करते हैं.
इसमें गुजरे 12 महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था में आए घटनाक्रमों की समीक्षा होती है, प्रमुख विकास कार्यक्रमों के निष्पादन का सार होता है और सरकार की नीतिगत पहलों तथा अल्पावधि से मध्यावधि में अर्थव्यवस्था की संभावनाओं पर रोशनी डाली जाती है. यह रिपोर्ट निम्नांकित मामलों का सिंहावलोकन करती है: आर्थिक दृष्टिकोण, संभावनाएं और नीतिगत चुनौतियां और राजकोषीय रूपरेखा. यह दस्तावेज नीति निर्धारकों, अर्थशास्त्रियों, नीति विश्लेषकों, व्यवसायियों, सरकारी एजेंसियों, छात्रों, अनुसंधानकर्ताओं, मीडिया तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी होता है.
बजट को बजट क्यों कहते हैं?
'बजट' शब्द ब्रिटिश संसद से आया है. सन 1733 में जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री (चांसलर ऑफ एक्सचेकर) रॉबर्ट वॉलपोल संसद में देश की माली हालत का लेखा-जोखा पेश करने आए, तो अपना भाषण और उससे संबद्ध दस्तावेज चमड़े के एक बैग (थैले) में रखकर लाए. चमड़े के बैग को फ्रेंच भाषा में बुजेट कहा जाता है. बस, इसीलिए इस परंपरा को पहले बुजेट और फिर कालांतर में बजट कहा जाने लगा. जब वित्त मंत्री चमड़े के बैग में दस्तावेज लेकर वार्षिक लेखा-जोखा पेश करने सदन में पहुंचते तो सांसद कहते-'बजट खोलिए, देखें इसमें क्या है.' या 'अब वित्त मंत्री जी अपना बजट खोलें.' इस तरह 'बजट' नामकरण साल दर साल मजबूत होता गया
भारत का पहला बजट कब और किसने पेश किया?
देश का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को आरके शण्मुगम चेट्टी ने पेश किया था. वे देश के पहले वित्तमंत्री थे और इस पद पर सन 1949 तक रहे.
बजट का हलवा समारोह क्या होता है?
यह बजट दस्तावेजों की छपाई से पहले की एक रस्‍म है. भारत में हर शुभ काम मीठे के साथ शुरू होता है, वैसा ही इसके साथ है. परंपरा के मुताबिक हलवा खुद वित्त मंत्री बजट से जुड़े सभी लोगों को बांटते हैं. इस रस्‍म के तहत एक बड़ी सी कढ़ाई में हलवा तैयार किया जाता है जिसे मंत्रालय के सभी कर्मचारियों के बीच बांटा जाता है. हलवा बांटे जाने के बाद मंत्रालय के ज्यादातर अधिकारियों और कर्मचारियों को मंत्रालय में ही पूरी दुनिया से कट कर रहना होता है. हलवा समारोह के बाद ‘लॉक इन’ बजट तैयार करने की प्रक्रिया को गोपनीय रखने के लिए ऐसा किया जाता है. ये वे कर्मचारी बजट बनाने से लेकर उसकी छपाई तक की प्रक्रिया से जुड़े होते हैं. लोकसभा में बजट पेश किए जाने तक ये कर्मचारी अपने परिवार से फोन पर भी संपर्क नहीं कर सकते. इस रस्‍म के बाद मंत्रालय के केवल वरिष्ठतम अधिकारी ही अपने घर जा पाते हैं. इस साल हलवा समारोह 19 जनवरी को हुआ.
मिर्च से मुँह क्यों जलता है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके तीखेपन के पीछे कैपसाईपिनोइडपदार्थ है जो मिर्च को फफूंद से बचाता है. मिर्च में अमीनो एसिड, एस्कॉर्बिक एसिड, फॉलिक एसिड, सिट्रिक एसिड, ग्लीसरिक एसिड, मैलिक एसिड जैसे कई तत्व होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के साथसाथ शरीर की त्वचा के लिए भी काफी फायदेमंद होते हैं.
रेलगाड़ी या बस में चलते हुए बिजली के तार ऊपर-नीचे होते क्यों लगते है?
तार अपनी जगह पर ही होते हैं. पर धरती की सतह पर वे समान ऊँचाई पर नहीं होते. सामान्य स्थिति में या धीरे-धीरे चलने पर हमें उनके उतार-चढ़ाव का ज्ञान नहीं हो पाता. हम तेज गति से चलते हैं तो उन तारों का ऊँच नीच हमें तेजी से दिखाई पड़ता है.
जानवरों के कलर ब्लाइंड होने का मतलब क्या है?
जो देखता है उसे कोई न कोई रंग तो दीखता ही है. इसलिए कलर ब्लाइंड का मतलब है कुछ जानवरों को सारी चीजें एक रंग में या दो रंगों में नजर आती हैं. चमगादड़ को ध्वनि की तरंगे बेहतर तरीके से समझ आती है. पर वे कलर ब्लाइंड होते हैं. बंदरों में तीन रंग देखने की क्षमता होती है. इंसान एक करोड़ तक रंगों को अलग-अलग पहचान सकता है. कुछ तो इससे ज्यादा रंगों का भेद कर पाते हैं. कुछ पक्षियों में रंग देखने की बेहतरीन क्षमता होती है वे अल्ट्रा वॉयलेट रंग भी देख लेते हैं.
क्या चीटियाँ अंधी और साँप बहरे होते हैं?
चींटियों की कई प्रजातियाँ होती हैं. सभी पूरी तरह दृष्टिहीन नहीं होतीं. उनकी आँख होती है, पर ज्यादातर की नजर कमजोर होती है. ऑस्ट्रेलिया में मिलने वाली बुलडॉग चींटी की नजर खासी अच्छी होती है. जमीन के नीचे ही रहने वाली कुछ चींटियाँ पूरी तरह अंधी भी होती हैं. दरअसल उनका काम देखे बगैर चल जाता है. साँप के बाहरी कान नहीं होते. पर वे जमीन पर पैदा होने वाली तरंगों को ग्रहण करते हैं. पानी के अंदर रहने वाले साँप पानी के मार्फत तरंगों को ग्रहण करते हैं.
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रिमोट कंट्रोल क्या होता है?


रिमोट कंट्रोल क्या होता है और इसका आविष्कार किसने किया?
अभय कुमार, एजी कॉलोनी, मनं : ए/62, पोस्ट: आशियाना नगर, पटना-800025


रिमोट कंट्रोल से आपका तात्पर्य टीवी या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को इंफ्रारेड मैग्नेटिक स्पेक्ट्रम से संचालित करना है। यों आज सुदूर अंतरिक्ष में घूम रहे यानों को भी दूर से ही नियंत्रित किया जाता है, पर हम जिन रिमोट कंट्रोल गैजेट्स की बात कर रहे हैं वे कुछ दूरी यानी पाँच मीटर के आसपास तक काम करते हैं। आजकल के रिमोट कंट्रोलर प्रायः इंफ्रारेड का उपयोग करके दूर से ही ऐसे काम करने का आदेश देते हैं, जिनकी व्यवस्था मूल उपकरण में होती है। सत्तर के दशक से पहले के रिमोट कंट्रोलर अल्ट्रासोनिक तरंगों का इस्तेमाल करते थे। आजकल 'यूनिवर्सल कंट्रोलर' भी मिलने लगे हैं जो कई उत्पादकों के टीवी आदि को नियंत्रित कर सकते हैं। यानी एक ही रिमोट कंट्रोल से आप टीवी, होम थिएटर, सीडी प्‍लेयर के अलावा कई दूसरी रिमोट कंट्रोल डिवाइसेस कंट्रोल कर सकते हैं। रेडियो तकनीक का आविष्कार होने के बाद रेडियो तरंगों के मार्फत संदेश भेजने की शुरुआत भी हो गई थी। शुरूआती रिमोट कंट्रोल रेडियो तरंगों के मार्फत संचालित होते थे। सन 1898 में निकोला टेस्ला ने अमेरिका में पहला रिमोट पेटेंट कराया जो पानी पर चल रहे नाव को दूर से संचालित कर सकता था।

‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’-यह श्लोकांश ‘वाल्मीकि रामायण’ के किस सर्ग/कांड में आया है। उस सर्ग/कांड में इसका क्रमांक क्या है?

चित्रलेखा अग्रवाल द्वारा: श्रीराज शंकर गर्ग, डीसीएम. स्टोर, चौमुखा पुल, मुरादाबाद-244001 (उ.प्र.)


यह श्लोक का एक हिस्सा है, पूरा श्लोक नहीं। इसके बारे में जो जानकारी मैं हासिल कर पाया हूँ उसका सार लिख रहा हूँ। बेहतर जानकार और विद्वान इस विषय पर रोशनी डालेंगे तो मुझे खुशी होगी। सामान्य धारणा है कि यह श्लोकांश वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड से लिया गया है। इसके अनुसार रावण के निधन के बाद राम लक्ष्मण से कहते है:- अपि स्वर्णमयी लंका मे लक्ष्मण न रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।

रावण के निधन के बाद लक्ष्मण ने राम से कहा कि कुछ दिन और लंका में रहें क्योंकि यह अत्यंत रमणीय स्थान है। तब राम ने कहा, हालांकि लंका स्वर्णमयी और सुंदर है, पर मुझे रुचिकर नहीं लगती। मुझे अपनी जन्मभूमि वापिस जाना है क्योंकि जननी और जन्मभूमि दोनों स्वर्ग से भी महान हैं। वाल्मीकि रामायण के तीन सौ के आसपास संस्करण हैं। इस ग्रंथ में 24,000 श्लोक और पाँच सौ सर्ग हैं। हरेक संस्करण में एकरूपता नहीं है। सभी संस्करणों में यह श्लोक नहीं मिलता। हिन्दी प्रचार प्रेस, मद्रास से 1930 में प्रकाशित वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में यह श्लोकांश है। पूरा श्लोक इस प्रकार है- मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव| जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ||(6-124-17)

अर्थात संसार में मित्रों, धनवानों और धन-धान्य का बहुत सम्मान होता है, पर माँ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक सम्मानित होते हैं। युद्ध कांड के 124 वें सर्ग के 17वें श्लोक को नीचे लिखे लिंक में जाकर पढ़ा जा सकता है-


कुछ सरकारी गाड़ियों पर लाल बत्ती और कुछ पर नीली बत्ती लगी रहती है। इन बत्तियों को सरकार के कौन से पद के लोग लगाते हैं और इन दोनों बत्तियों में क्या फर्क होता है?

शबीब अहमद, डी-30, जीटीबी नगर, करैली, इलाहाबाद-211016


आपने अक्सर देखा होगा कि कोई एम्बुलेंस खास तरीके का सायरन बजाती आती है और लोग उसे रास्ता देते हैं। इसे आपातकालीन सेवा संकेत कहते हैं। एम्बुलेंस की छत पर रंगीन बत्तियाँ भी लगी रहती हैं। इसी तरह की व्यवस्था फायर ब्रिगेड के साथ भी होती है। पुलिस की गश्ती गाड़ियों पर भी। इसका उद्देश्य ज़रूरी काम पर जा रहे लोगों को पहचानना और मदद करना है। महत्वपूर्ण सरकारी अधिकारियों, फौजी और नागरिक पदाधिकारियों के लिए भी ज़रूरत के अनुसार ऐसी व्यवस्थाएं की जाती हैं।

भारत में सेंट्रल मोटर ह्वीकल्स रूल्स 1989 के नियम 108(3) के अंतर्गत गाड़ियों पर बत्ती लगाने के जो निर्देश दिए हैं उनके अंतर्गत आने वाले कुछ पदाधिकारियों की सूची नीचे दे रहे हैं। ये केन्द्रीय निर्देश हैं। इनके अलावा राज्य सरकारों के निर्देश भी होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दिसम्बर 2013 में सभी राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों को अपने नियम युक्तिसंगत बनाने का निर्देश दिया था। इन नियमों में आवश्यकतानुसार बदलाव होता रहता है।

लाल बत्ती फ्लैशर के साथ

राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा स्पीकर, कैबिनेट मंत्री, हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीश, पूर्व प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष, राज्यों के मुख्यमंत्री आदि।

लाल बत्ती बिना फ्लैशर के

मुख्य चुनाव आयुक्त, सीएजी, लोकसभा उपाध्यक्ष, राज्य मंत्री, सचिव स्तर के अधिकारी आदि।

पीली बत्ती

कमिश्नर इनकम टैक्स, रिवेन्यू कमिश्नर, डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक।

नीली बत्ती

एम्बुलेंस, पुलिस की गाड़ियाँ

इसी तरह गाड़ियों में सायरन लगाने के नियम भी हैं। दिल्ली मोटर ह्वीकल्स रूल्स 1993 के अनुसार सिर्फ इमरजेंसी वाहन जैसे फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस, पुलिस कंट्रोल रूम की वैन में चमकने वाली या घूमने वाली लाल बत्ती के साथ सायरन लगा सकते है। वीआईपी की पायलट गाड़ी पर भी सायरन लगाया जा सकता है। दूसरे राज्यों में भी इसी प्रकार के नियम हैं।

कादम्बिनी के अक्तूबर 2016 अंक में प्रकाशित

Monday, February 6, 2017

‘ज्ञ’ का सही उच्चारण क्या है?

‘ज्ञ’ का सही उच्चारण क्या है? (ज्ञान/ग्यान/ज्यान)

अमर परमार, त-14, अंबेडकर कॉलोनी, कुन्हाड़ी, कोटा-324008 (राज.)

हिन्दी व्याकरण के शुरुआती विद्वान कामता प्रसाद गुरु के अनुसार हिन्दी में ‘ज्ञ’ का उच्चारण बहुधा ‘ग्यँ’ के सदृश होता है। मराठी लोग इसका उच्चारण ‘द्न्यँ’ के समान करते हैं। पर इसका उच्चारण प्रायः ‘ज्यँ’ के समान है। श्याम सुन्दर दास के ‘हिंदी शब्दसागर’ में ‘ज्ञ’ की परिभाषा में कहा गया है, ज और ञ के संयोग से बना हुआ संयुक्त अक्षर। केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने जो मानक वर्तनी तैयार की है उसमें देवनागरी वर्णमाला के लिए उच्चारणों को स्पष्ट करते हुए कहा है, “क्ष, त्र, ज्ञ और श्र भले ही वर्णमाला में दिए जाते हैं किंतु ये एकल व्यंजन नहीं हैं। वस्तुत : ये क्रमशः: क् + ष, त् + र, ज् + ञ और श् + र के व्यंजन – संयोग हैं।” इसके अनुसार ‘ज्ञ’ को ज् + ञ का संयोग माना जाए।

इंटरनेट पर इस विषय पर बहस चलती रहती है। विज्ञान के साथ हिंदी और संस्कृत के विदवान योगेन्द्र जोशी के अनुसार, आम तौर पर हिंदीभाषी इसे ‘ग्य’ बोलते हैं, जो अशुद्ध किंतु सर्वस्वीकृत है। तदनुसार इसे रोमन में gya लिखा जाएगा जैसा आम तौर पर देखने को मिलता है। दक्षिण भारत (jna) तथा महाराष्ट्र (dnya) में स्थिति कुछ भिन्न है। संस्कृत के अनुसार होना क्या चाहिए यदि इसका उत्तर दिया जाना हो तो किंचित् गंभीर विचारणा की आवश्यकता होगी। उन्होंने लिखा है, मेरी टिप्पणी वरदाचार्यरचित ‘लघुसिद्धांतकौमुदी’ और स्वतः अर्जित संस्कृत ज्ञान पर आधारित है। मेरी जानकारी के अनुसार ‘ज्ञ’ केवल संस्कृत मूल के शब्दों/पदों में प्रयुक्त होता है। मेरे अनुमान से ऐसे शब्द/पद शायद हैं ही नहीं, जिनमें ‘ञ’ स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो।...‘ज्ञ’ वस्तुतः ‘ज’ एवं ‘ञ’ का संयुक्ताक्षर है। ये दोनों संस्कृत व्यंजन वर्णमाला के ‘चवर्ग’ के क्रमशः तृतीय एवं पंचम वर्ण हैं। जानकारी होने के बावजूद मेरे मुख से ‘ज्ञ’ का सही उच्चारण नहीं निकल पाता है। पिछले पांच दशकों से ‘ग्य’ का जो उच्चारण जबान से चिपक चुका है उससे छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। आपको हिंदी शब्दकोशों में ‘ज्ञ’ से बनने वाले शब्द प्रायः ‘ज’ के बाद मिलेंगे।

हिन्दी भाषा के विवेचन पर लिखने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार देवनागरी के ‘ज्ञ’ वर्ण ने अपने उच्चारण का महत्व खो दिया है। मराठी में यह ग+न+य का योग हो कर ग्न्य सुनाई पड़ती है तो महाराष्ट्र के ही कई हिस्सों में इसका उच्चारण द+न+य अर्थात् द्न्य भी है। गुजराती में ग+न यानी ग्न है तो संस्कृत में ज+ञ के मेल से बनने वाली ध्वनि है। दरअसल इसी ध्वनि के लिए मनीषियों ने देवनागरी लिपि में ज्ञ संकेताक्षर बनाया मगर सही उच्चारण बिना समूचे हिन्दी क्षेत्र में इसे ग+य अर्थात ग्य के रूप में बोला जाता है। ज+ञ के उच्चार के आधार पर ज्ञान शब्द से जान अर्थात जानकारी, जानना जैसे शब्दों की व्युत्पत्ति हुई। अनजान शब्द उर्दू का जान पड़ता है मगर वहां भी यह हिन्दी के प्रभाव में चलने लगा है। मूलतः यह हिन्दी के जान यानी ज्ञान से ही बना है जिसमें संस्कृत का अन् उपसर्ग लगा है। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की धातु gno का ग्रीक रूप भी ग्नो ही रहा मगर लैटिन में बना gnoscere और फिर अंग्रेजी में ‘ग’ की जगह ‘क’ ने ले और gno का रूप हो गया know हो गया। बाद में नॉलेज जैसे कई अन्य शब्द भी बने। रूसी का ज्नान (जानना), अंग्रेजी का नोन (ज्ञात) और ग्रीक भाषा के गिग्नोस्को (जानना),ग्नोतॉस(ज्ञान) और ग्नोसिस (ज्ञान) एक ही समूह के सदस्य हैं। गौर करें हिन्दी-संस्कृत के ज्ञान शब्द से इन विजातीय शब्दों के अर्थ और ध्वनि साम्य पर।

विश्व हिन्दी सम्मेलन एवं अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में क्या अंतर है तथा इनका संचालन किस प्रकार होता है?

ऊषा गुप्ता, महाराजा रेजीडेंसी, फ्लैट नं.-102, बिचूरकर की गोठ, चावड़ी बाजार, ग्वालियर-474001 (म.प्र.)

विश्व हिन्दी सम्मेलन हिन्दी भाषा का सबसे बड़ा अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन है, जिसे भारत सरकार का समर्थन भी प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के दो अर्थ हैं। एक अर्थ में कोई भी सम्मेलन जो हिन्दी के संदर्भ में हो और उसका स्वरूप अंतरराष्ट्रीय हो तो उसे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन कहा जा सकता है। पर संगठनात्मक दृष्टि से पिछले तीन साल से अमेरिका में एक अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन हो रहा है, जिसने स्थायी रूप ग्रहण कर लिया है। यह सम्मेलन सबसे पहले अप्रैल 2014 न्यूयॉर्क विवि में हुआ था। उसके बाद अप्रैल 2015 और मई 2016 में रटजर्स विवि, न्यूजर्सी में दूसरे और तीसरे सम्मेलन का आयोजन हुआ।

विश्व भर से हिन्दी विद्वान, साहित्यकार, पत्रकार, भाषा विज्ञानी, विषय विशेषज्ञ तथा हिन्दी प्रेमी विश्व हिन्दी सम्मेलन में जुटते हैं। आचार्य विनोबा भावे की प्रेरणा से शुरू हुए इस सम्मेलन को कई राज्य सरकारों और भारत सरकार का सहयोग प्राप्त है। सन 1975 में विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शृंखला शुरू हुई। इस बारे में पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने पहल की थी। पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सहयोग से नागपुर में हुआ जिसमें विनोबा भावे ने अपना सन्देश भेजा। शुरू में इस सम्मेलन की समयावधि स्थिर नहीं थी। कुछ समय बाद इसे हरेक चौथे साल में आयोजित करने की कोशिश की गई। अब हर तीन साल बाद आयोजित करने का प्रयास है। सितम्बर 2015 में दसवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में हुआ था। ये सम्मेलन मॉरिशस, नई दिल्ली, फिर मॉरिशस, त्रिनिडाड व टोबेगो, लन्दन, सूरीनाम, न्यूयॉर्क और जोहानेसबर्ग और भोपाल में हो चुके हैं।

1975 में नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान मॉरिशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम ने विश्व स्तर पर हिन्दी सम्बद्ध गतिविधियों के समन्वयन के लिए एक संस्था की स्थापना का विचार रखा। विचार ने मंतव्य का रूप धारण किया और लगातार कई विश्व हिन्दी सम्मेलनों में मंथन के बाद मॉरिशस में विश्व हिंदी सचिवालय स्थापित करने पर भारत और मॉरिशस सरकारों के बीच सहमति हुई। दोनों सरकारों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किए गए तथा मॉरिशस की विधान सभा में अधिनियम पारित किया गया। 11 फ़रवरी, 2008 को विश्व हिंदी सचिवालय ने आधिकारिक रूप से काम शुरू किया। सचिवालय का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिन्दी का प्रचार करना तथा हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए एक वैश्विक मंच तैयार करना है।

(कादम्बिनी के सितम्बर 2016 के अंक में उपरोक्त उत्तर छपने के बाद मुझे श्री जयप्रकाश मानस का यह फेसबुक संदेश मिलाः-
जोशी जी नमस्कार. आपका उत्तर पढ़ा अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के बारे में ....इसके अलावा 'अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन' 13 देशों में हो चुका है, इस सम्मेलन के पहले मनोनीत अध्यक्ष डॉ. सुप्रसिद्ध गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र थे, वर्तमान अध्यक्ष हैं सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर, उपाध्यक्ष द्वय अशोक माहेश्वरी (दिल्ली) व डॉ. रंजना अरगड़े (गुजरात विवि) मैं समन्वयक. देश विदेश के हज़ारों रचनाकार, प्रोफेसर, शोधार्थी, हिन्दी सेवी आदि सदस्य हैं . आपकी सहज जानकारी के लिए :अगला यानी 13 वाँ सम्मेलन बाली/इंडोनेशिया में 2 से 9 फरवरी 2017 तक हो रहा है... आप भी सहभागिता हेतु आमंत्रित हैं.) यह अतिरिक्त जानकारी मैं यहाँ दे रहा हूँ।

Rx (आरएक्स) यह चिह्न-निशान किस बात का है, इसका क्या आशय है? यह निशान अक्सर डॉक्टर क्यों बनाते हैं?

मुहम्मद आसिफ सिद्दीकी, शिक्षामित्र, मलेसेमऊ, गोमती नगर, लखनऊ-226010

दरअसल यह निशान Rx (आरएक्स) नहीं होता बल्कि R की अंतिम रेखा को आगे बढ़ाते हुए उसपर क्रॉस लगाकर ℞ बनता है। आमतौर पर माना जाता है कि यह लैटिन शब्द रेसिपी का निशान है। यानी डॉक्टरी हिदायत की इलाज के लिए इस तरह लें। कुछ लोग इसे यूनानी जुपिटर के चिह्न जियस के रूप में लेते हैं।

कादम्बिनी के सितम्बर 2016 के अंक में प्रकाशित

Sunday, February 5, 2017

बजट को बजट क्यों कहते हैं?

'बजट' शब्द ब्रिटिश संसद से आया है। सन 1733 में जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री (चांसलर ऑफ एक्सचेकर) रॉबर्ट वॉलपोल संसद में देश की माली हालत का लेखा-जोखा पेश करने आए, तो अपना भाषण और उससे संबद्ध दस्तावेज चमड़े के एक बैग (थैले) में रखकर लाए। चमड़े के बैग को फ्रेंच भाषा में बुजेट कहा जाता है। बस, इसीलिए इस परंपरा को पहले बुजेट और फिर कालांतर में बजट कहा जाने लगा। जब वित्त मंत्री चमड़े के बैग में दस्तावेज लेकर वार्षिक लेखा-जोखा पेश करने सदन में पहुंचते तो सांसद कहते-'बजट खोलिए, देखें इसमें क्या है।' या 'अब वित्त मंत्री जी अपना बजट खोलें।' इस तरह 'बजट' नामकरण साल दर साल मजबूत होता गया
भारत का पहला बजट कब और किसने पेश किया?
देश का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को आरके शण्मुगम चेट्टी ने पेश किया था। वे देश के पहले वित्तमंत्री थे और इस पद पर सन 1949 तक रहे।
मोबाइल ‘सिम’ कैसे कार्य करता है?
मोबाइल फोन को काम करने के लिए एक छोटे से माइक्रोचिप की आवश्यकता होती है, जिसे ग्राहक पहचान मापदंड (सब्स्क्राइबर आइडैंटिफ़िकेशन मॉड्यूल) या सिम कार्ड कहा जाता है। लगभग डाक टिकट के आकार के सिम कार्ड पर एक सिलिकन चिप लगी होती है। इस चिप पर ही सारी जानकारी डाली जाती है, जिससे मोबाइल नेटवर्क सिम कार्ड की पहचान कर सके। हर सिम कार्ड का अपना एक अलग पहचान कोड होता है जिससे फोन कंपनी का केंद्रीय डेटाबेस पहचान कर सके। सिम कार्ड सामान्यतया बैटरी के नीचे यूनिट के पीछे रखा जाता है और फोन के डेटा तथा फोन के बारे में जानकारी को संग्रहीत करता है। जब ग्राहक सिम कार्ड को हटा देता है, तो इसे पुन: दूसरे फोन में डाल कर सामान्य रूप से उपयोग किया जा सकता है। हर सिम कार्ड पर अलग-अलग जानकारी होती है और अलग नंबर होता है।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल वसूली क्यों की जाती है?
राजमार्ग पर खर्च की गई राशि को हासिल करने के लिए। रास्तों ने इंसान को प्रगति करना सिखाया। एक जगह से दूसरी जगह जाकर उसने न कई तरह की बातें सीखीं, बल्कि कमाई की। पर रास्ते बनाने में श्रम और साधन लगते हैं। आमतौर पर सरकारें रास्ते बनातीं हैं, पर उसके पास इतने साधन नहीं होते कि यह काम वह मुफ्त में कर सके। टोल एक प्रकार से रास्ते की कीमत है। इसे टैक्स भी कह सकते हैं जो उन लोगों से वसूला जाता है, जो उसका इस्तेमाल करते हैं। भारत में अब ज्यादातर राजमार्ग सरकार और निजी कम्पनियों के संयुक्त प्रयास से बनाए जा रहे हैं। ऐसे में निजी कम्पनियों को एक निश्चित अवधि तक टोल वसूलने की अनुमति दी जाती है। यह प्रथा दुनियाभर में है। केवल राजमार्गों पर ही नहीं पुलों और सुरंगों से गुजरने वालों से भी टोल वसूला जाता है।
इंदिरा गांधी को प्रियदर्शिनी क्यों कहा जाता है?
इंदिरा गांधी का पूरा नाम था इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू। कहते हैं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें प्रियदर्शिनी नाम दिया था। फीरोज़ गांधी से विवाह के कारण उनके नाम के साथ गांधी शब्द जुड़ गया।