Sunday, June 17, 2018

रिम्पैक युद्धाभ्यास क्या है?


रिम ऑफ द पैसिफिक एक्सरसाइज़ (RIMPAC) को संक्षेप में रिम्पैक कहते हैं. दो साल में एकबार होने वाला यह युद्धाभ्यास अमेरिका के पश्चिमी तट पर प्रशांत महासागर में होनोलुलु, हवाई के पास जून-जुलाई में होता है. इसका संचालन अमेरिकी नौसेना का प्रशांत बेड़ा करता है, जिसका मुख्यालय पर्ल हार्बर में है. इसका साथ देते हैं मैरीन कोर, कोस्ट गार्ड और हवाई नेशनल गार्ड फोर्स. हवाई के गवर्नर इसके प्रभारी होते हैं.

हालांकि यह युद्धाभ्यास अमेरिकी नौसेना का है, पर वह दूसरे देशों की नौसेनाओं को भी इसमें शामिल होने का निमंत्रण देते हैं. इसमें प्रशांत महासागर से जुड़े इलाके के देशों के अलावा दूर के देशों को भी बुलाया जाता है. पहला रिम्पैक अभ्यास सन 1971 में हुआ था, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, युनाइटेड किंगडम, और अमेरिका की नौसेनाओं ने भाग लिया. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका ने तबसे अबतक हरेक अभ्यास में हिस्सा लिया है.

इसमें शामिल होने वाले अन्य नियमित भागीदार देश हैं, चिली, कोलम्बिया, फ्रांस, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, नीदरलैंड्स, पेरू, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड. न्यूजीलैंड की नौसेना 1985 तक नियमित रूप से इसमें शामिल होती रही. एक विवाद के कारण कुछ साल तक वह अलग रही, फिर 2012 के बाद से उसकी वापसी हो गई. पिछले कई वर्षों से भारतीय नौसेना भी इसमें शामिल होती है. इस साल 27 जून से यह अभ्यास होगा. इसमें भारत सहित 26 देश शामिल होंगे. इस बार इसमें चीन को नहीं बुलाया गया है.

अगले एशियाई खेल कहाँ होंगे?

अगले एशियाई खेल इंडोनेशिया के दो शहरों में होंगे. ये शहर हैं देश की राजधानी जकार्ता और दक्षिणी सुमात्रा प्रांत की राजधानी पलेमबैंग. इनका आयोजन इस साल 18 अगस्त से 2 सितम्बर तक होगा. इसके उद्घाटन और समापन समारोह जकार्ता में होंगे. यह पहला मौका है, जब एशियाई खेल दो शहरों में आयोजित किए जा रहे हैं. दूसरी खास बात यह है कि इन खेलों का आयोजन मूल रूप से वियतनाम के हनोई शहर में होना था, पर आर्थिक दिक्कतों के कारण वियतनाम ने इनके आयोजन में असमर्थता व्यक्त की, जिसके कारण इंडोनेशिया को ये खेल मिल गए.

17 अप्रैल 2014 को वियतनाम के प्रधानमंत्री एनगुएन तान दुंग ने इन खेलों के आयोजन में असमर्थता व्यक्त की. इंडोनेशिया को 18वें एशियाई खेल मिल जाने के बाद यह सोचा गया कि इनका आयोजन 2019 में किया जाए, पर चूंकि 2019 में इंडोनेशिया में चुनाव हैं, इसलिए इन्हें 2018 में ही कराने का फैसला किया गया. 2022 में 19वें एशियाई खेल चीन के हैंगजाऊ और 2026 के बीसवें खेल जापान के नगोया शहर में होंगे. 

हरी मिर्च से मुँह क्यों जलता है?

मुँह तो लाल मिर्च से भी जलता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके तीखेपन के पीछे कैपसाईपिनोइडपदार्थ है जो मिर्च को फफूंद से बचाता है. इंडियाना यूनिवर्सिटी के डेविड हाक के नेतृत्व में शोध करने वाले दल ने बोलीविया जाकर मिर्च के पौधे में कैपसाइसिन या ‘कैपसाईपिनोइड’ तत्व की जांच की. उन्होंने पाया कि उत्तरी क्षेत्र में मात्र 15 से 20 प्रतिशत मिर्च में ही यह तीखा पदार्थ मौजूद था. वहीं दूसरी ओर दक्षिणी हिस्से में स्थिति अलग थी. इस इलाके में करीब 100 प्रतिशत मिर्च के पौधों में इस तीखे पदार्थ के होने से मिर्च बहुत तीखी थी. यह तीखापन अलग-अलग मिर्चों में अलग-अलग होता है.  मिर्च में अमीनो एसिड, एस्कॉर्बिक एसिड, फॉलिक एसिड, साइट्रिक एसिड, ग्लीसरिक एसिड, मैलिक एसिड जैसे कई तत्व होते है जो हमारे स्वास्थ्य के साथ–साथ शरीर की त्वचा के लिए भी काफी फायदेमंद होते हैं.
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

दलित-प्रतिरोध का रंग नीला क्यों?

सामान्यतः दलित विचार से जुड़े संगठन नीले रंग को प्रतीक रूप से अपनाते हैं, हालांकि सत्तर के दशक में शुरू हुए दलित पैंथर के ध्वज में नीले रंग के साथ लाल रंग भी था, जो दुनिया के वामपंथियों का प्रिय रंग है। डॉ भीमराव आम्बेडकर की प्रतिमाओं में नीले रंग का इस्तेमाल होता है। हाल में उत्तर प्रदेश के बदायूं में बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की एक प्रतिमा को कुछ शरारती लोगों ने भगवा रंग दिया था, जिसे लेकर विवाद हुआ। उस घटना के बाद काफी लोगों ने जानना चाहा कि भीमराव आम्बेडकर के साथ नीला रंग क्यों जुड़ा है? इस सिलसिले में आम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी निर्मल ने कहा, ‘नीला रंग बाबा साहब को प्रिय था।’ रिटायर्ड आईपीएस ऑफिसर और दलित विचारक एसआर दारापुरी ने प्रेस ट्रस्ट को बताया कि सन 1942 में बाबा साहब ने शेड्यूल्‍ड कास्‍ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की स्‍थापना की थी। उसके झंडे का रंग नीला था और उसके बीच में अशोक चक्र था। इसके बाद 1956 में जब पुरानी पार्टी को खत्म कर रिपब्लिकन पार्टी का गठन किया गया तो इसमें भी इसी नीले रंग के झंडे का इस्तेमाल किया।
दारापुरी के अनुसार, नीला रंग आसमान का रंग है। ऐसा रंग जो भेदभाव से रहित दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है। बाबा साहब की भी यही दृष्टि थी। बसपा ने भी इसी रंग को अपनाया। यह दलित अस्मिता का प्रतीक बन गया। बाबा साहब की प्रतिमा हमेशा नीले रंग के कोट में दिखती है। उनके एक हाथ में संविधान की किताब और दूसरे हाथ की एक उंगली उठी रहती है, जो आगे बढ़ने की सूचक है। डॉ आम्बेडकर ने पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों और यहाँ तक कि सूट-बूट को दलितों की चेतना को जगाने का माध्यम बनाया। उन्हें नीले रंग का सूट बहुत पसंद था। वे अमूमन इसी रंग के थ्री पीस सूट पहनते थे। दलित चिंतक मानते हैं कि आम्बेडकर का नीला सूट दलितों के प्रतिरोध और अस्मिता का प्रतीक बन गया है। बौद्ध धर्म में भी नीला रंग महत्वपूर्ण है। अशोक चक्र का रंग नीला है। बौद्ध धम्म चक्र भी नीला है।

राजनीतिक-विचारधाराओं की पहचान रंगों से?

वैश्विक संदर्भों में नीला रंग सामान्यतः सेंटर राइट या कंजर्वेटिव पार्टियों का रंग माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र का ध्वज हल्का नीला या आसमानी है, जो शांति और सद्भाव का प्रतीक है। इसी तरह दुनियाभर में साम्यवाद और व्यापक अर्थ में समाजवाद का प्रतिनिधि रंग लाल है। लाल रंग अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी का प्रतिनिधि रंग भी है, जिसे अनुदारवादी दल माना जाता है। इसके विपरीत डेमोक्रेटिक पार्टी का रंग नीला है। आप गौर करेंगे कि अमेरिकी चुनाव परिणामों के ग्राफिक में अलग-अलग राज्यों में पार्टियों की जीत को लाल और नीले रंग से दिखाया जाता है। भारत में भगवा रंग हिन्दूवादी राजनीति का प्रतिनिधि है, पर पश्चिम में उससे मिलता-जुलता नारंगी रंग क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक दलों का प्रतिनिधित्व करता है। दुनियाभर में हरा रंग इस्लाम के साथ या इस्लामिक राजनीतिक संगठनों के साथ जोड़ा जाता है। इटली में फासी पार्टी का रंग काला था। हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया के इस्लामी स्टेट का झंडा भी काला है। अब्बासी खिलाफत का ध्वज भी काला था। भारत में पेरियार ई रामास्वामी के नेतृत्व में शुरुआती तमिल नास्तिक आंदोलन भी काले झंडे के साथ हुआ था और आज भी ज्यादातर द्रविड़ पार्टियों के झंडे में लाल और काले रंग का इस्तेमाल होता है। कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता के पहले से ही तिरंगे को अपनाया था, जो आज भी उसका रंग है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Sunday, June 3, 2018

बोआओ फोरम क्या है?

बोआओ फोरम एशिया (बीएफए) व्यापारिक सहयोग और विमर्श का फोरम है, जिसे दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तर्ज पर गठित किया गया है। इसका मुख्यालय चीन के हैनान प्रांत के बोआओ में है। सन 2001 से यहाँ एशिया की सरकारों और उद्योगों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हो रहा है। यह फोरम क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के इरादे से गठित किया गया है। इसमें एशिया के देशों को आर्थिक-विकास की राह पर चलते हुए अपनी अर्थ-व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का मौका मिलता है। इसे शुरू करने का विचार मूलतः फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वी रैमोस, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री बॉब हॉक और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री मोरीहीरो होसोकावा ने बनाया था।

इसका उद्घाटन 27 फरवरी 2001 को हुआ था। इसके लिए चीन ने खासतौर से पहल की। इसकी शुरूआत 26 देशों की भागीदारी के साथ हुई थी। इस वक्त इसके 29 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल हैं। इससे जुड़े संगठन की पहली बैठक 12-13 अप्रैल 2002 को हुई। हाल में 8 से 11 अप्रैल 2018 को फोरम का सालाना सम्मेलन हुआ। इसमें चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी भावी आर्थिक नीतियों की ओर इशारा किया। हालांकि भारत की ओर से इस सम्मेलन में कोई बड़ी राजनीतिक हस्ती उपस्थित नहीं थी। केवल उद्योग-व्यापार संगठन फिक्की के प्रतिनिधि इसमें उपस्थित थे।

बोआओ फोरम में आर्थिक एकीकरण के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय-प्रश्नों पर भी विचार किया जाता है। यह फोरम एक तरह से चीन और वैश्विक-व्यापार के बीच की कड़ी बना। सन 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य भी बना था।

जनहित याचिका क्या है?


जनहित याचिका भारतीय न्याय-व्यवस्था की अवधारणा है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक हित के लिए न्यायिक-सहायता लेना है। इसे संसदीय नियमों से नहीं बनाया गया है, बल्कि भारतीय अदालतों ने जनता को ताकतवर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया है। जस्टिस पीएन भगवती और जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर शुरूआती जज थे, जिन्होंने जनहित याचिकाओं को विचारार्थ स्वीकार किया। धीरे-धीरे इसकी व्यवस्था बनती गई। जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग के मामले भी सामने आए हैं और अदालतों ने इनपर कड़ाई से कार्रवाई भी की है।

सत्तर और अस्सी के दशक भारत में न्यायिक सक्रियता का दौर था। इस दौर में हमारी अदालतों ने सार्वजनिक हित में कई बड़े फैसले किए। दिसम्बर 1979 में कपिला हिंगोरानी ने बिहार की जेलों में कैद विचाराधीन कैदियों की दशा को लेकर एक याचिका दायर की। इस याचिका के कारण जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर की अदालत ने बिहार की जेलों से 40,000 ऐसे कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया, जिनके मामले विचाराधीन थे। सन 1981 में एसपी गुप्ता बनाम भारतीय संघ के केस में सात जजों की बेंच में जस्टिस भगवती भी एक जज थे। उन्होंने अपने फैसले में दूसरी बातों के अलावा यह भी लिखा कि अदालत सार्वजनिक हित में मामले को उठाने के लिए अदालत औपचारिक याचिका का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि कोई व्यक्ति एक चिट्ठी भी लिख देगा तो उसे सार्वजनिक हित में याचिका मान लेगी। इस व्यवस्था में भारी न्यायिक शुल्क को जमा किए बगैर सुनवाई हो सकती है।

http://epaper.patrika.com/1682653/Me-Next/Me-Next#dual/2/1

हींग क्या होती है?


हींग एशिया में पाए जाने वाले सौंफ की प्रजाति के फेरूला फोइटिस नामक पौधे का चिकना रस है. ये पौधे-ईरान, अफगानिस्तान, तुर्की, बलूचिस्तान, अफगानिस्तान के पहाड़ी इलाकों में अधिक होते हैं. भारत में हींग की खेती बहुत कम मात्रा में होती है. इस पौधे की टहनियाँ 6 से 10 फ़ुट तक ऊँची हो जाती हैं. इस पर हरापन लिए पीले रंग के फूल निकलते हैं. इसकी जड़ों को काटा जाता है जहाँ से एक दूधिया रस निकलता है. फिर इसे इकट्ठा कर लेते हैं. सूखने पर यह भूरे रंग के गोंद जैसा हो जाता है, यही हींग है. ईरान में लगभग हर तरह के भोजन में इसका प्रयोग किया जाता है. भारत में हींग का काफी इस्तेमाल होता है. इसे संस्कृत में 'हिंगु' कहा जाता है. इसमें ओषधीय गुण भी अनेक हैं. हाजमे के लिए हींग बहुत अच्छी है. यह खाँसी भी दूर करती है.

पीत-पत्रकारिता’ क्या होती है?

पीत पत्रकारिता (Yellow journalism) उस पत्रकारिता को कहते हैं जिसमें सही समाचारों की उपेक्षा करके सनसनी फैलाने वाले या ध्यान-खींचने वाले शीर्षकों का बहुतायत में प्रयोग किया जाता है. इसे समाचारपत्रों की बिक्री बढ़ाने का घटिया तरीका माना जाता है. मूलतः अब इससे आशय अनैतिक और भ्रष्ट पत्रकारिता है. जिन दिनों यह शब्द चला था तब इसका मतलब लोकप्रिय पत्रकारिता था. इसका इस्तेमाल अमेरिका में 1890 के आसपास शुरू हुआ था. उन दिनों जोज़फ पुलिट्जर के अख़बार ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ और विलियम रैंडॉल्फ हर्स्ट के ‘न्यूयॉर्क जर्नल’ के बीच जबर्दस्त प्रतियोगिता चली थी. इस पत्रकारिता को यलो कहने के बीच प्रमुख रूप से पीले रंग का इस्तेमाल है, जो दोनों अखबारों के कार्टूनों का प्रभाव बढ़ाता था. दोनों अखबारों का हीरो पीले रंग का कुत्ता था. यलो जर्नलिज्म शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल उन्हीं दिनों न्यूयॉर्क प्रेस के सम्पादक एरविन वार्डमैन ने किया.

रिमोट-आविष्कार किसने किया?

सन 1898 में निकोला टेस्ला ने अमेरिका में पहला रिमोट पेटेंट कराया जो पानी पर चल रही नाव को दूर से संचालित कर सकता था. रिमोट कंट्रोल से सामान्य तात्पर्य टीवी या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को इंफ्रारेड मैग्नेटिक स्पेक्ट्रम से संचालित करना है. सुदूर अंतरिक्ष में घूम रहे यानों को भी दूर से ही नियंत्रित किया जाता है. तमाम देशों में बगैर ड्राइवर की मेट्रो ट्रेन दूर से संचालित हो रहीं हैं. हम जिन रिमोट कंट्रोल गैजेट्स की बात कर रहे हैं वे कुछ दूरी यानी पाँच मीटर के आसपास तक काम करते हैं. ये रिमोट प्रायः इंफ्रारेड का उपयोग करते हैं. सत्तर के दशक से पहले के रिमोट अल्ट्रासोनिक तरंगों का इस्तेमाल करते थे. रेडियो तकनीक का आविष्कार होने के बाद रेडियो तरंगों के मार्फत संदेश भेजने की शुरुआत भी हो गई थी. शुरूआती रिमोट कंट्रोल रेडियो तरंगों के मार्फत चलते थे. अब इनमें ब्लू टूथ कनेक्टिविटी, मोशन सेंसर और वॉइस कंट्रोल भी शामिल होने लगे हैं. 




Friday, May 25, 2018

इंजेक्शन कब शुरू हुए?


शरीर में चोट लगने पर दवाई सीधे लगाने की परम्परा काफी पुरानी है. शरीर में अफीम रगड़कर या किसी कटे हुए हिस्से में अफीम लगाकर शरीर को राहत मिल सकती है ऐसा विचार भी पन्द्रहवीं सोलहवीं सदी में था. अफीम से कई रोगों का इलाज किया जाने लगा, पर डॉक्टरों को लगता था कि इसे खिलाने से लत पड़ सकती है. इसलिए शरीर में प्रवेश का कोई दूसरा तरीका खोजा जाए. स्थानीय एनिस्थासिया के रूप में भी मॉर्फीन वगैरह का इस्तेमाल होने लगा था. ऐसी भीतर से खोखली सूई सोलहवीं-सत्रहवीं सदी से इस्तेमाल होने लगी थी. पर सबसे पहले सन 1851 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक चार्ल्स गैब्रियल प्रावाज़ ने हाइपोडर्मिक नीडल और सीरिंज का आविष्कार किया. इसमें महीन सुई और सिरिंज होती थी. तबसे इसमें तमाम तरह के सुधार हो चुके हैं. 

आसमान ठोस है, तरल या गैस है?

आप जिस आसमान को देखते हैं वह बाहरी अंतरिक्ष का एक हिस्सा है. धरती से दिन में यह नीले रंग का नजर आता है. इसकी वजह है हमारा वातावरण जिससे टकराकर सूरज की किरणों का नीला रंग फैल जाता है. पर यह आसमान धरती से देखने पर ही नीला लगता है. किसी अन्य ग्रह से देखने पर ऐसा ही नहीं दिखेगा, बल्कि आमतौर पर काला नजर आएगा. यह ठोस नहीं है, पर इसमें ठोस, तरल और गैसीय पदार्थ प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं. यह अनंत है. दुनिया के बड़े से बड़े टेलिस्कोप से भी आप इसका बहुत छोटा हिस्सा देख पाएंगे.

हार्ड वॉटर को सॉफ्ट कैसे बनाते हैं?

सबसे आसान तरीका पानी को उबाल कर डिस्टिलेशन का है. पर वह रोजमर्रा के लिहाज से महंगा होगा. आमतौर पर हम रिवर्स ऑस्मॉसिस के जरिए पानी को पीने लायक बनाते हैं, जिसे छोटे नाम आरओ से ज्यादा पहचाना जाता है. इसमें एक मैम्ब्रेन या झिल्ली के मार्फत पानी के हार्ड तत्व को अलग किया जाता है. दुनिया की सबसे बड़ी डिसैलिनेशन प्रोजेक्ट संयुक्त अरब अमीरात में लगा रस अल-खैर संयंत्र है, जो खारे पानी से हर रोज 10,25,000 घन मीटर मीठा पानी तैयार करती है. अलबत्ता कुवैत ऐसा देश है, जो अपने नागरिकों को शत-प्रतिशत मीठा पानी सप्लाई करता है. 














Tuesday, May 22, 2018

मैराथन दौड़


मैराथन दुनिया में सबसे लम्बी दूरी की दौड़ है। आधिकारिक रूप से इसकी लम्बाई 42.195 किलोमीटर (26 मील 385 गज) होती है। यह सड़क पर होने वाली दौड़ है, जिसका छोटा सा हिस्सा ही स्टेडियम के भीतर होता है। सन 1896 में जब आधुनिक ओलिम्पिक खेल शुरू हुए तब मैराथन दौड़ भी उसका हिस्सा थी। पर उस वक्त इसकी लम्बाई का मानकीकरण नहीं हुआ था। इसकी लम्बाई का निर्धारण सन 1921 में हुआ।

दुनिया में आज 800 से ज्यादा ऐसी मैराथन प्रतियोगिताएं होती हैं, जो किसी न किसी रूप में खेल संघों से सम्बद्ध होती हैं। इन्हें स्वास्थ्य तथा अन्य सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों से भी जोड़ा जाता है। इनमें सैकड़ों और कई बार हजारों शौकिया धावक भी हिस्सा लेते हैं। तमाम लोग इस दौड़ के छोटे से हिस्से को ही पूरा करते हैं। कई जगह हाफ मैराथन भी होती हैं।

मैराथन दौड़ यूनान की एक दंतकथा से प्रेरित है। इसकी कहानी फ़ेडिप्पिडिस नामक यूनानी धावक से जुड़ी है। फ़ेडिप्पिडिस एक हरकारा था, जिसे मैराथन से एथेंस यह घोषित करने के लिए भेजा गया था कि मैराथन के युद्ध में (जिसमें वह खुद भी लड़ रहा था) फारसियों की पराजय हो गई है। यह ई.पू. 490 के अगस्त या सितंबर की घटना है। कहा जाता है कि फ़ेडिप्पिडिस पूरे रास्ते पर बिना रुके दौड़ा और फिर सभा में प्रवेश करके बोला नेनिकेकामेन (हम जीत गए)। और फिर वह गिर पड़ा और मर गया।

मैराथन से एथेंस की दौड़ का पहला वृत्तांत प्लूटार्क की एथेंस कीर्ति में मिलता है, जो पहली सदी में लिखी गई थी और हेराक्लाइडस पॉण्टिकस की लुप्त कृति को संदर्भित करते हुए धावक का नाम एर्चियस या यूक्लस का थेर्सिपस बताया गया था। एक और लेखक समोसाता के लूशियन (दूसरी सदी) ने भी इस कथा को लिखा है, पर धावक का नाम फ़ेलिप्पिडिस बताया है, फ़ेडिप्पिडिस नहीं। बहरहाल यह किंवदंती है। इसका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। यूनानी-फ़ारसी युद्धों के प्रमुख स्रोत, यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस ने फ़ेडिप्पिडिस को एक हरकारे के रूप में वर्णित किया है, जो मदद का संदेश लेकर एथेंस से स्पार्टा और वापस गया। एक तरफ से यह दूरी 240 किलोमीटर (150 मील) से भी ज़्यादा है।

डब्लूटीओ में कितने सदस्य हैं?
विश्व व्यापार संगठन में 164 सदस्य और 23 पर्यवेक्षक देश हैं। 14 जुलाई 2016 को लाइबेरिया इसका 163वाँ और 29 जुलाई 2016 को अफगानिस्तान इसका 164वाँ सदस्य बना।

कहाँ और कब बनी पहली कार?

हालांकि शुरू में भाप से चलने वाली गाड़ियाँ बनी थीं, पर इंटरनल कॉम्बुशन इंजन से चलने वाली पहली कार सन 1870 में ऑस्ट्रिया के वियना शहर में सिग्फ्राइड मार्कस ने तैयार की। वह गैसोलीन से चलती थी। इसे फर्स्ट मार्कस कार कहते हैं। मार्कस ने ही 1888 में सेकंड मार्कस कार तैयार की जिसमें कई तरह के सुधार किए गए थे। इस बीच जर्मनी के मैनहाइम में कार्ल बेंज ने सन 1885 में तैयार की।


Sunday, May 20, 2018

वोट शब्द कहाँ से आया?




वोट शब्द राय देने, चयन करने किसी व्यक्ति या प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के अर्थ में इस्तेमाल होता है. अंग्रेजी में यह संज्ञा और क्रिया दोनों रूपों में चलता है. अंग्रेजी में यह शब्द लैटिन के वोटम (votum) से बना है. इसका मतलब है इच्छा, कामना, प्रतिज्ञा, प्रार्थना, निष्ठा, वचन, समर्पण वगैरह. हिन्दी में इसका इस्तेमाल मत के अर्थ में लिया जाता है. अंग्रेजी की तरह हिन्दी ने भी मतदाता या निर्वाचक के लिए वोटर शब्द का इस्तेमाल स्वीकार कर लिया है. शब्दों का अध्ययन करने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार भाषा विज्ञानी इसे प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द मानते हैं. अंग्रेजी का वाऊ vow इसी श्रृंखला का शब्द है जिसका मतलब होता है प्रार्थना, समर्पण और निष्ठा के साथ अपनी बात कहना.

‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था क्या है?

लोकतंत्र में चुनाव सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. प्रतिनिधि के चयन से लेकर फैसले करने तक सारी बातें वोट से तय होती हैं. चुनाव की अनेक पद्धतियाँ दुनिया में प्रचलित हैं. ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ भी चुनाव की एक पद्धति है. जब एक से ज्यादा प्रत्याशी किसी पद के लिए खड़े हों, तब सबसे ज्यादा वोट पाने वाले व्यक्ति को चुना हुआ माना जाता है. भारत में चुनाव की यही पद्धति है.

चीनी सबसे पहले कहाँ बनी?

मीठे फल और गन्ने के रस का इस्तेमाल इंसान न जाने कब से करता रहा है. पर रस से क्रिस्टल के रूप में चीनी बनाने का काम सबसे पहले भारत में हुआ. इतिहासकारों का मत है कि ईसवी सन 350 के आसपास गुप्तवंश के दौर में चीनी बनती थी. संभव है इससे पहले भी बनती रही हो. संस्कृत के शर्करा से अरब में शक्कर और उससे अंग्रेजी का शुगर शब्द बना. लैटिन में सकारम (succharum) भी भारत से गया. ईसा से साढ़े तीन सदी पहले भारत आई सिकंदर की सेना भारत में बगैर मधुमक्खी के मधु को खाकर हैरान थी. शायद वह गुड़ का कोई रूप था.

http://epaper.prabhatkhabar.com/1659471/Awsar/Awsar#page/6/1