Friday, September 13, 2019

ईईएफ क्या है?


ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम एक अंतरराष्ट्रीय फोरम है, जिसका सालाना अधिवेशन रूस के व्लादीवोस्तक में होता है. यह फोरम रूस के सुदूर पूर्व इलाके में विदेशी निवेश और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए गठित किया गया है. इसकी शुरूआत सितंबर 2015 में हुई थी. इसकी शुरूआत से ही रूस के राष्ट्रपति और जापान के प्रधानमंत्री इसमें शामिल होते रहे हैं. इस साल 4 से 6 सितंबर तक हुए इसके पाँचवें सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए. इस फोरम का आयोजन रूस का सरकारी संगठन रोसकांग्रेस करता है, जो रूस के ही सेंट पीटर्सबर्ग फोरम का आयोजक भी है. इस साल इसके शिखर सम्मेलन में भारत, मलेशिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया, मंगोलिया और दक्षिण कोरिया शामिल हुए. यों चीन और वियतनाम जैसे अनेक देशों ने इस क्षेत्र में निवेश किया है. चीन, दक्षिण कोरिया और जापान के एकदम करीब पड़ने वाला यह क्षेत्र एशिया-प्रशांत के बढ़ते महत्व के कारण दुनिया का ध्यान खींच रहा है. पिछले साल इस सम्मेलन में 60 से ज्यादा देशों के 6000 से ज्यादा प्रतिनिधि यहाँ आए थे.
सम्मेलन में क्या हुआ?
भारत ने इस क्षेत्र के विकास के लिए एक अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन की घोषणा की है. क्रेडिट लाइन का मतलब है कि भारत से सामग्री मंगाने के लिए रूस इस राशि का इस्तेमाल कर सकता है. दोनों देश व्लादीवोस्तक और चेन्नई के बीच एक समुद्री लिंक निर्माण के लिए सहमत हुए हैं. चेन्नई के पास रूसी सहयोग से कुडानकुलम का नाभिकीय संयंत्र चल रहा है. व्लादीवोस्तक-चेन्नई लिंक का मतलब है कि भारत रूस के साथ अपने साझा हितों के समीकरण को मजबूत कर रहा है. यह मार्ग रूस के साथ कारोबार के काम आएगा. यह लिंक चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड परियोजना का जवाब है. जिस तरह चीन ने हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति बनाई है, उसी तरह भारत भी चीन के आसपास के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाएगा.
भारतीय दृष्टि से महत्व?
इस नीति के कारोबारी और सामरिक दोनों पहलू हैं. भारत अपनी विदेश नीति का संतुलन स्थापित कर रहा है. हमारे अमेरिका के साथ रिश्ते सुधर रहे हैं, पर वह अपने परंपरागत मित्र का साथ भी बनाए रखना चाहता है. रक्षा-तकनीक में रूस हमारा सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है. यों जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ मिलकर भारत इस क्षेत्र में चतुष्कोणीय सुरक्षा परियोजना पर भी काम कर रहा है. भारत ने इसके भू-रणनीतिक महत्व को देखते हुए 1992 में व्लादीवोस्तक में अपना वाणिज्य दूतावास खोला था. ऐसा करने वाला वह दुनिया का पहला देश है. रूस का सुदूर पूर्व प्राकृतिक संसाधन संपन्न क्षेत्र है. यह अन्य संसाधनों के बीच तेल, प्राकृतिक गैस, लकड़ी, सोना और हीरे से समृद्ध है. भारत को इन सभी की आवश्यकता है.












Tuesday, September 3, 2019

एफएटीएफ का मामला क्या है?


आतंकी गतिविधियों के आर्थिक साधनों की निगरानी रखने वाली वैश्विक संस्था ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स' (एफएटीएफ) के एशिया-प्रशांत समूह (एपीजी) ने पाकिस्तान को एनहांस्ड एक्सपेडाइटेड फॉलो अप (ईईएफयूपी) लिस्ट में डाल दिया है. एफएटीएफ एपीजी बैठक ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में 22 और 23 अगस्त को हुई. एपीजे ने पाया कि धन शोधन और आतंकियों की मदद से जुड़े 40 अनुपालन मानकों में से 32 पर और 11 प्रभावी मानकों में से 10 पर पाकिस्तान खरा नहीं उतरा. अक्टूबर में एफएटीएफ काली सूची में भी उसे डाला जा सकता है. वह एफएटीएफ की ग्रे सूची में जून 2018 से है. उस वक्त पाकिस्तान और एफएटीएफ ने 10 सूत्री कार्यक्रम के तहत 27 सूचकांकों पर नजर रखने का कार्यक्रम बनाया. उद्देश्य यह था कि इस कार्य योजना को सफलतापूर्वक लागू करके पाकिस्तान को ग्रे सूची से बाहर निकाला जा सकेगा. ऐसा नहीं हुआ, तो अब अक्तूबर में पेरिस में होने वाली बैठक में पाकिस्तान को काली सूची में डाला जा सकता है. पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर करने के लिए एफएटीएफ के 37 सदस्यों में से कम से कम 15 के समर्थन की जरूरत होगी. उसे काली सूची से बचाने के लिए कम से कम तीन वोटों की जरूरत होगी. यदि वह काली सूची में आ गया, तो उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से छह अरब डॉलर का कर्ज मिलना मुश्किल हो जाएगा.
क्या यह संरा की संस्था है?
नहीं, इसे जी-7 देशों ने बनाया है. यह संगठन सन 1989 में जी-7 देशों के पेरिस शिखर सम्मेलन की देन है. शुरू में तो यह मनी लाउंडरिंग रोकने के लिए बना था, पर 11 सितम्बर 2001 के आतंकवादी हमले के बाद से इसने सन 2001 में आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन उपलब्ध कराने के खिलाफ भी सिफारिशें देना शुरू किया और अब यह जन-संहार के हथियारों के प्रसार के विरुद्ध भी नीति-निर्देश दे रहा है. इसकी सिफारिशों में व्यवस्था को पारदर्शी बनाने और भ्रष्टाचार को रोकने से जुड़ी सिफारिशें भी शामिल हैं. इसके गठन के वक्त 16 देश इसके सदस्य थे, जिनकी संख्या अब 37 है. भारत एफएटीएफ और एपीजी दोनों का सदस्य है और इसके संयुक्त समूह का संयुक्त सभापति भी है. भारत के वित्तीय इंटेलिजेंस यूनिट के डायरेक्टर जनरल इसमें देश का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसके सदस्यों में यूरोपियन कमीशन और खाड़ी सहयोग परिषद भी शामिल हैं. संगठन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है इसकी महासभा, जिसकी साल में तीन बैठकें होतीं हैं. 
इसकी वॉच लिस्ट का मतलब?
अपनी स्थापना के बाद इसने अपनी पहली रिपोर्ट में मनी लाउंडरिंग को रोकने के लिए 40 सिफारिशें की थीं. सन 2003 में इन सिफारिशों में संशोधन किया गया. इन 40 सिफारिशों के अलावा आतंकवादियों को मिल रहे धन पर रोक लगाने वाली 9 विशेष सिफारिशें इनमें जोड़ी गईं. सन 2000 में इसने नॉन कोऑपरेटिव कंट्रीज़ ऑर टेरिटरीज़ (एनसीसीटी) नाम से 15 देशों की एक सूची भी जारी की. इसके बाद 2001 में इसमें आठ और देशों के नाम शामिल हो गए. इसे आमतौर पर एफएटीएफ की काली सूची कहा जाता है. यह सूची संशोधित होती रहती है.

Thursday, August 22, 2019

‘नो फर्स्ट यूज़’ नीति क्या होती है?


नो फर्स्ट यूज़ संकल्प का इस्तेमाल नाभिकीय शस्त्रों के संदर्भ में किया जाता है. इसका अर्थ है कि जिस देश के पास नाभिकीय शस्त्र हैं, वह उनका तब तक इस्तेमाल नहीं करेगा, जब तक उस पर नाभिकीय शस्त्रों से हमला न किया जाए. इसके पहले यह अवधारणा रासायनिक और जैविक अस्त्रों पर भी लागू होती थी. चूंकि अब दुनिया भर में रासायनिक और जैविक अस्त्रों पर पाबंदियाँ हैं, इसलिए उनका इस्तेमाल युद्ध अपराध माना जाता है. सन 1972 की जैविक अस्त्र संधि के तहत रासायनिक अस्त्रों का निर्माण, संग्रह और इस्तेमाल अपराध है. जहाँ तक नाभिकीय अस्त्रों के इस्तेमाल का प्रश्न है अलग-अलग देश अलग-अलग तरीके से अपनी नीतियाँ बनाते हैं. दुनिया में नो फर्स्ट यूज़ की नीति को सबसे पहले सन 1964 में चीन ने अपने नाभिकीय विस्फोट के साथ ही घोषित किया था. चीन ने अपनी इस नीति को बार-बार दोहराया है और अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह भी इस नीति को घोषित करे और चीन के साथ नो फर्स्ट यूज़ की संधि करे, पर अमेरिका इस पर सहमत नहीं है. इसी तरह नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नेटो) भी इस नीति के पक्ष में नहीं है. उसका कहना है कि रूस को परंपरागत शस्त्रास्त्र में काफी बढ़त हासिल है, इसलिए हम नाभिकीय अस्त्रों के किसी भी समय इस्तेमाल का अधिकार अपने पास रखेंगे. 
भारत की नीति क्या है?
भारत ने पहले 1974 में और फिर 1998 में नाभिकीय विस्फोट करके अपनी नाभिकीय क्षमता का प्रदर्शन कर दिया था. अगस्त 1999 में भारत ने अपनी नाभिकीय नीति के मसौदे को जारी किया, जिसमें कहा गया था कि हम केवल जवाबी हमले में नाभिकीय अस्त्रों का इस्तेमाल करेंगे. हम नाभिकीय अस्त्र का पहला वार नहीं करेंगे. देश की सामरिक नाभिकीय कमान का गठन 2003 में किया गया, जिसके पहले प्रमुख बनाए गए, एयर मार्शल तेज मोहन अस्थाना. देश की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी को नाभिकीय अस्त्र के इस्तेमाल की अनुमति देने का अधिकार है. सन 2010 में देश के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने देश की नीति को कुछ और स्पष्ट किया. उन्होंने कहा, हम गैर-नाभिकीय देशों के खिलाफ पहला प्रहार नहीं करेंगे. हाल में 16 अगस्त को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि अभी तक हमारी नीति नो फर्स्ट यूज़ की है, पर भविष्य की नीति परिस्थितियों पर निर्भर करेगी.
अन्य देशों की नीति क्या है?
पाकिस्तान, रूस, यूके, अमेरिका और फ्रांस की घोषित नीति यह है कि जब उन पर या उनके सहयोगी देशों पर हमला होगा तब वे नाभिकीय अस्त्रों का इस्तेमाल कर सकते हैं. सन 1999 में जर्मनी ने नेटो से नो फर्स्ट यूज़ नीति अपनाने का आग्रह किया था, पर उसे स्वीकार नहीं किया गया. सन 1982 में सोवियत संघ के प्रमुख लियोनिद ब्रेझनेव ने संकल्प व्यक्त किया कि हम नो फर्स्ट यूज़ सिद्धांत पर चलेंगे, पर सोवियत संघ के विघटन के बाद 1993 में रूस ने उस सिद्धांत को त्याग दिया. अमेरिका ने एटम बम के इस्तेमाल के अधिकार अपने पास रखे हैं. पाकिस्तान भी नो फर्स्ट यूज़ को नहीं मानता.




Thursday, August 8, 2019

क्या है कुलभूषण जाधव का मामला?



हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने गत 17 जुलाई को कहा था कि पाकिस्तान कुलभूषण जाधव वाले मामले की समीक्षा करे तुरंत कौंसुलर एक्सेस की व्यवस्था करे. पाकिस्तान ने कहा था कि कुलभूषण जाधव को 3 मार्च, 2016 को गिरफ्तार किया गया था और भारत को इसकी सूचना 25 मार्च को दी गई थी. अप्रेल 2017 में एक फौजी अदालत ने उन्हें मौत की सजा दी. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने अपने फैसले में स्वीकार किया कि इस मामले में पाकिस्तान ने कौंसुलर रिश्तों पर सन 1963 के वियना संधि की अनदेखी की. कौंसुलर एक्सेस का मतलब है किसी दूसरे देश में अपने नागरिकों के साथ जरूरत पड़ने पर सम्पर्क. दो देशों के बीच सामान्यतः दूतावासों के मार्फत सम्पर्क होता है. इन दूतावासों के अधीन कौंसल होते हैं, जो दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों को बेहतर बनाने के अलावा अपने देश के नागरिकों के हितों की रक्षा का काम भी करते हैं. राजनयिक सम्पर्कों के नियमन के लिए सन 1963 में वियना में एक अंतरराष्ट्रीय संधि हुई थी, जिसमें उन परिस्थितियों का विवरण दिया गया है, जब दूसरे देश में रह रहे अपने किसी नागरिक को कौंसल की मदद की जरूरत पड़े तो उसका निर्वहन किस प्रकार होगा. इस संधि में 79 अनुच्छेद हैं, जिसके अनुच्छेद 5 में कौंसल के 13 कार्यक्रमों की सूची दी गई है. दुनिया के 170 देशों ने इस संधि को स्वीकार किया है.
अब क्या होगा?
पाकिस्तान सरकार ने वियना संधि के अनुच्छेद 36 के तहत कुलभूषण जाधव को यह जानकारी दे दी है कि उन्हें कौंसुलर एक्सेस प्रदान की जाएगी. इसके साथ ही पाकिस्तान ने भारत के सामने कौंसुलर एक्सेस का प्रस्ताव रखा है. भारत सरकार ने कहा है कि हम इस प्रस्ताव का अध्ययन कर रहे हैं. दोनों देशों के राजनयिक इस प्रश्न पर विचार कर रहे हैं कि कुलभूषण जाधव के साथ भारतीय राजनयिकों की मुलाकात किस प्रकार की होगी, कितने राजनयिक मिलेंगे, कहाँ होगी और किस रूप में होगी. इस मुलाकात के समय क्या पाकिस्तानी प्रतिनिधि भी उपस्थित रहेंगे, इसके बाद की प्रक्रिया क्या होगी, यह भी तय होगा. चूंकि अदालत ने मामले की समीक्षा का निर्देश दिया है, इसलिए देखना होगा कि पाकिस्तान सरकार मुकदमे को किस रूप में चलाएगी.
संधि के मुख्य कार्य
इस संधि अनुच्छेद 23 के तहत मेजबान देश को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी कौंसुलर स्टाफ को गैर-जरूरी घोषित करके  वापस जाने को कह सके. अनुच्छेद 31 के तहत मेजबान देश की जिम्मेदारी है कि वह कौंसुलेट में प्रवेश न करे और उसकी रक्षा करे. अनुच्छेद 36 के तहत किसी विदेशी नागरिक की गिरफ्तारी होने पर उसके दूतावास या कौंसुलेट को तत्काल इत्तला दी जानी चाहिए, जिसमें गिरफ्तारी के कारणों को बताया गया हो. भारत का कहना है कि हमारे उच्चायोग को न कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी की न तो तत्काल जानकारी दी गई और न सम्पर्क करने दिया गया.
 


Sunday, August 4, 2019

उच्च सदन क्यों होते हैं?


दुनिया के काफी देशों में एक सदन वाली संसदीय व्यवस्था काम करती है. हमारे पड़ोस में श्रीलंका और बांग्लादेश में एक सदनात्मक व्यवस्था है. पश्चिम एशिया और अफ्रीका के देशों में बड़ी संख्या में एक सदन ही हैं. इंडोनेशिया में एक सदन है और स्कैंडिनेवियाई देशों में भी. दुनिया में एक सदन वाले देशों की संख्या ज्यादा है, करीब दो तिहाई. पर इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में द्विसदनात्मक व्यवस्था है. अतीत में कुछ देशों ने तीन सदनों वाली व्यवस्था भी शुरू की थी. दो सदन होने पर एक को उच्च सदन और दूसरे को निम्न सदन कहते हैं. सामान्यतः निम्न सदनों का आकार और प्रतिनिधित्व प्रत्यक्ष होता है. उसके पास अधिकार भी ज्यादा होते हैं. कार्यपालिका की जवाबदेही उनके प्रति होती है. उच्च सदन की भूमिका प्रायः सलाह देने की होती है. कुछ देशों में उच्च सदन काफी प्रभावशाली होता है. अमेरिकी सीनेट के पास प्रशासन को चलाने की काफी शक्तियाँ होती हैं. नीदरलैंड्स में उच्च सदन किसी प्रस्ताव को रोक सकता है. भारत में राज्यसभा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में सीनेट, युनाइटेड किंगडम में लॉर्डसभा, मलेशिया में दीवान नेगारा, जर्मनी में बुंडेसराट और फ्रांस में सीने उच्च सदन हैं. इटली की सीनेट के पास वही अधिकार होते हैं, जो निम्न सदन के पास हैं.
राज्यसभा की पृष्ठभूमि क्या है?
भारत में द्वितीय सदन का प्रारम्भ 1918 के मोन्टेग-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन से हुआ. भारत सरकार अधिनियम, 1919 में तत्कालीन विधानमंडल के द्वितीय सदन के तौर पर काउंसिल ऑफ स्टेट्स का सृजन करने का उपबंध किया गया जिसका विशेषाधिकार सीमित था और जो वस्तुत: 1921 में अस्तित्व में आया। गवर्नर-जनरल तत्कालीन काउंसिल ऑफ स्टेट्स का पदेन अध्यक्ष होता था। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के माध्यम से इसके गठन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया. संविधान सभा ने भी 1950 तक केन्द्रीय विधानमंडल के रूप में कार्य किया, फिर इसे 'अनंतिम संसद' के रूप में परिवर्तित कर दिया गया. इस अवधि में केन्द्रीय विधानमंडल जिसे 'संविधान सभा' (विधायी) और आगे चलकर 'अनंतिम संसद' कहा गया, 1952 में पहले चुनाव कराए जाने तक, एक-सदनी रहा.
इसकी भूमिका क्या है?
द्वितीय सदन की उपयोगिता को लेकर संविधान सभा में विस्तृत बहस हुई और अन्ततः द्विसदनीय विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्य रूप से इसलिए किया गया क्योंकि संघीय प्रणाली को अपार विविधताओं वाले इतने विशाल देश के लिए सर्वाधिक सहज स्वरूप की सरकार माना गया. इसका आशय ऐसी सभा से था जिसका निर्वाचन राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया गया. निर्वाचित सदस्यों के अलावा, राष्ट्रपति द्वारा बारह सदस्यों के नामनिर्देशन का भी उपबंध किया गया. नामनिर्देशित सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है. यह स्थायी सदन है और भंग नहीं होता, तथापि, प्रत्येक दो वर्ष बाद राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्य सेवा-निवृत्त हो जाते हैं. संविधान के अनुच्छेद 75 (3) के अधीन, मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति जिम्मेदार होती है. यानी कि राज्यसभा सरकार को बना या गिरा नहीं सकती है, तथापि सरकार पर नियंत्रण रख सकती है.


Friday, July 26, 2019

दल-बदल कानून पर चर्चा?



इन दिनों कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन से जुड़े कुछ सदस्यों के इस्तीफों के कारण दल-बदल कानून का मसला फिर से उठा है. इन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया है, पर पीठासीन अधिकारी ने इन इस्तीफों पर अपना कोई फैसला नहीं सुनाया है. देश में दल-बदल की बीमारी भी उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना हमारा लोकतंत्र है. सन 1950 में जब भारतीय लोकतंत्र जन्म ही ले रहा था, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के 23 विधायकों ने पार्टी छोड़कर जन कांग्रेस के नाम से अलग पार्टी बनाई, पर यह समस्या के रूप में बड़े स्तर पर पहली बार यह बात 1967 के आम चुनाव के बाद सामने आई. उस साल जिन 16 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हुए, उनमें से 8 में कांग्रेस ने बहुमत खो दिया और 7 में सरकार बनाने में असमर्थ रही. इसके साथ गठबंधन राजनीति की शुरुआत भी हुई, पर सबसे महत्वपूर्ण बात थी दल-बदल की प्रवृत्ति. सन 1967 से 1971 के बीच के चार वर्षों में देश की संसद में दल-बदल के 142 और राज्यों की विधानसभाओं में 1969 मामले हुए. 32 सरकारें गिरीं और बनीं और 212 दल-बदलुओं को मंत्रिपद मिले. मुख्यमंत्री पद पाने तक के लिए दल-बदल हुए. हरियाणा विधानसभा के एक सदस्य गया लाल ने एक पखवाड़े में तीन बार दल बदला और भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ की प्रसिद्ध लोकोक्ति उनके कारण ही जुड़ी.

कानून कब बना?

लम्बे समय तक देश में चर्चा के बाद सन 1985 में 52वें संविधान संशोधन के तहत दल-बदल कानून लाया गया, जिसके अंतर्गत संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें दल परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की निरर्हता के बारे में प्रक्रिया बताई गई है. पहले इस कानून के तहत व्यवस्था की गई थी कि यदि किसी दल के सदस्यों में से एक तिहाई दल छोड़कर दूसरे दल में जाना चाहें, तो उसे विलय माना जा सकता है. सन 2003 में संविधान के 91 वें संशोधन के बाद पार्टियों के विलय के लिए एक तिहाई के बजाय दो तिहाई सदस्यों वाली व्यवस्था लागू हो गई.

अदालती हस्तक्षेप?

मूल कानून में व्यवस्था थी कि इस सिलसिले में पीठासीन अधिकारी के निर्णय को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. पर सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में किहोता होलोहन बनाम जाचिल्हू मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि इन मामलों की न्यायिक समीक्षा सम्भव है. साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि जब तक पीठासीन अधिकारी आदेश जारी नहीं करते, अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी. पीठासीन अधिकारी अपना फैसला करने में कितना समय लेंगे, इसकी कोई समय सीमा नहीं है. हाल में कर्नाटक में सदस्यों के इस्तीफे का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक गया है. अदालत ने सदस्यों के इस्तीफे पर फैसला करने के स्पीकर के अधिकार को स्वीकार किया है, पर 17 जुलाई को फैसला किया कि शक्ति परीक्षण के दौरान बागी विधायक अनुपस्थित रह सकते हैं.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित




Friday, July 19, 2019

जीरो बजट क्या है?


सबसे पहले यह समझ लिया जाना चाहिए कि जीरो बजट और जीरे बेस्ड बजट दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं. भारत के संदर्भ में जीरो बजटशब्द का इस्तेमाल हाल में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में किया. तकनीकी दृष्टि से इसे जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (शून्य बजट प्राकृतिक खेती) कहना उचित होगा. यानी कि ऐसी खेती जो रासायनिक उर्वरकों, हाइब्रिड बीजों और कीटनाशकों पर आधारित नहीं है. जिसमें किसान को कोई भी चीज बाहर से खरीदनी न पड़े. परम्परागत खेती की वापसी. इस अवधारणा को महाराष्ट्र के कृषि विज्ञानी सुभाष पालेकर ने जन्म दिया. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने इसे जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (शून्य बजट प्राकृतिक खेती) नाम देकर मान्यता भी प्रदान की है. सुभाष पालेकर को सन 2016 में अपनी अवधारणाओं के कारण पद्मश्री से अलंकृत किया गया. सन 2017 में उन्हें आंध्र प्रदेश सरकार ने जीरो बजट फार्मिंग के लिए अपना सलाहकार नियुक्त किया. हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की राज्य सरकारों ने भी जीरो बजट फार्मिंग में दिलचस्पी दिखाई है.
इसे महत्व क्यों मिला?
किसानों की आत्महत्या की खबरें बढ़ने के कारण खेती की इस पद्धति को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है. सुभाष पालेकर ने कर्नाटक राज्य रैयत संघ के साथ मिलकर इसे आंदोलन के रूप में चलाया. इसमें सफलता भी मिली. दक्षिण के दूसरे राज्यों में भी इसका प्रसार हुआ है. इस पद्धति में किसान देशी खाद बनाते हैं जिसका नाम ‘घनजीवामृत’ रखा है. यह खाद गाय के गोबर, गोमूत्र, चने के आटे, गुड़, मिट्टी तथा पानी से बनती है. रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर नीम, गोबर और गोमूत्र से बने ‘नीमास्त्र’ का इस्तेमाल करते हैं. इससे फसल में कीड़ा नहीं लगता है. संकर प्रजाति के बीजों के स्थान पर देशी बीज डालते हैं. सिंचाई, मड़ाई और जुताई का सारा काम बैलों की मदद से किया जाता है. डीजल से चलने वाले संसाधनों का प्रयोग नहीं होता. इससे खर्च बचते हैं.
क्या यह सफल है?
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि देश के 1,63,034 किसान ऐसी खेती कर रहे हैं, जबकि सुभाष पालेकर का अनुमान है कि यह संख्या 50 लाख से ज्यादा है. भारत में आज भी पश्चिमी औद्योगिक तर्ज पर खेती नहीं होती. छोटे और मझोले किसान ही खेती करते हैं. राजस्थान में सीकर जिले के प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने प्राकृतिक खेती में सफलता हासिल की है. पहले वे रासायनिक एवं जैविक खेती करते थे, लेकिन जीरो बजट खेती फायदेमंद साबित हो रही है. पालेकर के अनुसार ऑर्गेनिक खेती, रासायनिक खेती से भी खतरनाक है. फसल की बुवाई से पहले वर्मिकम्पोस्ट और गोबर खाद खेत में डाली जाती है. उसमें निहित 46 प्रतिशत कार्बन हमारे देश के 36 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान में खाद से मुक्त हो वायुमंडल में उड़ जाते हैं. हमारे यहाँ दिसम्बर से फरवरी केवल तीन महीने ही ऐसे है, जब तापमान उस  खाद के लिए ठीक रहता है. वर्मिकम्पोस्ट बनाने में आयातित जीव केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा है, जो काष्ठ पदार्थ और गोबर खाता है, जबकि देशी केंचुआ मिट्टी और जमीन में मौजूद कीटाणु एवं जीवाणुओं को खाकर खाद में बदलता है.


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