Friday, January 11, 2019

ताइवान क्या स्वतंत्र देश है?




चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने ताइवान के लोगों से कहा है कि उनका हर हाल में चीन के साथ 'एकीकरण' होकर रहेगा. चीन मानता है कि ताइवान उसका टूटा हुआ हिस्सा है. शी चिनफिंग के भाषण के एक दिन पहले 2 जनवरी को ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने कहा कि हम चीन की शर्तों पर एकीकरण के लिए कभी तैयार नहीं होंगे. चीन को 2.3 करोड़ लोगों की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए. चीन सरकार एक चीन नीति को बहुत महत्व देती है. जो देश इसे स्वीकार नहीं करता उससे राजनयिक सम्बन्ध नहीं रखती. उसने धमकी दे रखी है कि यदि यह देश औपचारिक स्वतंत्रता की घोषणा करेगा, तो हम फौजी कार्रवाई करेंगे. भारत भी एक चीन नीति को स्वीकार करता है. दुनिया के केवल 17 देशों के साथ इसके रिश्ते हैं. चीन मानता है कि ताइवान को चीन में शामिल होना होगा, भले ही हमें इसके लिए बल प्रयोग क्यों न करना पड़े.



चीन और इसमें क्या अंतर है?



इसका आधिकारिक नाम है रिपब्लिक ऑफ़ चाइना. सन 1912 से यह मेनलैंड चीन का नाम है, जो 1950 तक सर्वमान्य था. आज मेनलैंड चीन का नाम पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना है, जो 1949 के बाद रखा गया. पहले यह फॉरमूसा नाम से प्रसिद्ध था और 17वीं सदी से पहले चीन से अलग था. 17वीं सदी में डच और स्पेनिश उपनिवेशों की स्थापना के बाद यहाँ चीन से हान लोगों का बड़े स्तर पर आगमन हुआ. सन 1683 में चीन के अंतिम चिंग राजवंश ने इस द्वीप पर कब्जा कर लिया. उन्होंने चीन-जापान युद्ध के बाद 1895 में इसे जापान से जोड़ दिया. उधर चीन में 1912 में चीनी गणराज्य की स्थापना हो गई, पर ताइवान, जापान के अधीन रहा. सन 1945 में जापान के समर्पण के बाद यह चीनी गणराज्य के हाथों में चला गया. उन दिनों चीन में राष्ट्रवादी पार्टी कुओमिंतांग और कम्युनिस्टों के बीच युद्ध चल रहा था. सन 1949 में माओ-जे-दुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने च्यांग काई शेक के नेतृत्व वाली कुओमिंतांग पार्टी की सरकार को परास्त कर दिया. माओ के पास नौसेना नहीं थी, इसलिए वे समुद्र पार करके ताइवान पर कब्जा नहीं कर सके. ताइवान तथा कुछ द्वीप कुओमिंतांग के कब्जे में ही रहे.



ताइवान बचा कैसे रहा?



काफी समय तक दुनिया ने साम्यवादी चीन को मान्यता नहीं दी. पश्चिमी देशों ने ताइवान को ही चीन माना. संयुक्त राष्ट्र के जन्मदाता देशों में वह शामिल था. सन 1971 तक साम्यवादी चीन के स्थान पर वह संरा का सदस्य था. साठ के दशक में इस देश ने बड़ी तेजी से आर्थिक और तकनीकी विकास किया. अस्सी और नब्बे के दशक में कुओमिंतांग के अधीन एक दलीय सैनिक तानाशाही की जगह यहाँ बहुदलीय प्रणाली ने ले ली. यह देश इलाके के सबसे समृद्ध और शिक्षित देशों में गिना जाता है. सन 1971 के बाद से यह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं है. देश की आंतरिक राजनीति में भी चीन में शामिल हों या नहीं हों, इस आधार पर राजनीतिक दल बने हैं.













Thursday, January 3, 2019

बांग्लादेश की शासन-पद्धति?



बांग्लादेश में भारत की तरह संसदीय शासन पद्धति है. देश में बहुदलीय प्रणाली है, जिसके तहत पाँच साल में संसदीय चुनाव होते हैं. इस बार 30 दिसम्बर को चुनाव हुए. 350 सदस्यों वाले सदन को जातीय संसद कहते हैं. देश का संविधान सन 1972 में तैयार हुआ था. इसमें अब तक 16 संशोधन हो चुके हैं. संसद के 350 सदस्यों में से 300 सीधे फर्स्ट पास्ट द पोस्ट की पद्धति से चुने जाते हैं. महिलाओं के लिए आरक्षित 50 सीटों का चुनाव पार्टियों को प्राप्त वोटों के अनुपात में किया जाता है. सन 1973 से अब तक संसद के 10 चुनाव हो चुके हैं. पहले चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग को भारी विजय मिली थी और वे प्रधानमंत्री बने. पर 15 अगस्त 1975 को उनकी हत्या के बाद देश में सैनिक शासन लागू रहा. फिर देश में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली लागू कर दी गई और 1977 में सेनाध्यक्ष जनरल जिया-उर-रहमान राष्ट्रपति बने. सन 1979 में संसदीय चुनाव हुए और अर्ध-अध्यक्षात्मक/अर्ध संसदीय प्रणाली की शुरूआत हुई.
संसदीय प्रणाली की वापसी
सन 1981 में राष्ट्रपति जिया-उर-रहमान की हत्या कर दी गई. उनके स्थान पर अब्दुस सत्तार राष्ट्रपति बने. एक साल बाद उनकी सरकार का तख्ता भी पलट गया. कुछ समय के अंतराल में सेनाध्यक्ष हुसेन मोहम्मद राष्ट्रपति बने. उन्होंने अपनी जातीय पार्टी बनाई. उनके ही नेतृत्व में सन 1988 में देश की संसद ने धर्मनिरपेक्ष-व्यवस्था के स्थान पर इस्लाम को देश का धर्म घोषित किया. सन 1990 में जनांदोलनों के बाद लोकतंत्र की वापसी हुई. सन 1991 में चुनाव के बाद खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनीं. संविधान में 12वाँ संशोधन हुआ, जिसके तहत संसदीय प्रणाली की वापसी हुई. सन 1996 में संसद के दो बार चुनाव हुए. फरवरी 1996 के चुनाव में बीएनपी के मुकाबले पूरे विपक्ष ने चुनाव का बहिष्कार किया. इसके बाद जून में फिर चुनाव हुए, जिनमें अवामी लीग को बहुमत मिला और शेख हसीना पहली बार प्रधानमंत्री बनीं, पर 2001 के चुनाव में खालिदा जिया की वापसी हुई. सन 2006 से 2008 के बीच फिर अराजकता रही. सन 2008 के बाद से शेख हसीना की सरकार वहाँ है.
क्या अब स्थिरता है?
देश में पिछले चुनाव सन 2014 में हुए थे. तब खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया था, जिसके कारण 154 सीटों पर चुनाव ही नहीं हुआ. इन 154 में से 127 पर अवामी लीग के प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए. नव-निर्वाचित सदस्यों ने 9 जनवरी, 2014 को शपथ ली. अवामी लीग की शेख हसीना लगातार दूसरी बार देश की प्रधानमंत्री बनी थीं. इसबार चुनाव में बीएनपी की भागीदारी भी है. सत्तारूढ़ गठबंधन के मुकाबले विरोधी दलों का जातीय ओइक्य (या एक्य) फ्रंट भी चुनाव मैदान में है. 20 दलों के इस फ्रंट में बीएनपी भी शामिल है, पर उसकी नेता खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण जेल की सज़ा मिली है. इस फ्रंट के नेता हैं कमाल हुसेन, जो पहले शेख मुजीबुर्रहमान के सहयोगी हुआ करते थे.


Thursday, December 27, 2018

कैटोविस सम्मेलन क्या है?



पोलैंड के कैटोविस में 2 से 15 दिसम्बर, 2018 तक वैश्विक जलवायु सम्मेलन हुआ, जिसमें सन 2015 में हुई पेरिस संधि को 2020 तक लागू करने के तौर-तरीकों पर विचार हुआ. यह संधि सन 2020 में क्योटो संधि का स्थान लेगी. इस सम्मेलन को कॉप-24 यानी 24वीं कांफ्रेंस ऑफ द पार्टीज टु द यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के नाम से भी पहचाना जाता है. इस सम्मेलन में पेरिस समझौते को लागू करने के लिए 196 देशों ने मिलकर नियम-पुस्तिका तय की है. पेरिस समझौते के बाद अमेरिका ने इस संधि से हाथ खींच लिया था. जब संधि हो रही थी, जब अमेरिका में बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, पर डोनाल्ड ट्रम्प के आने के बाद स्थितियाँ बदल गईं. पेरिस संधि के समय वैश्विक बिरादरी काफी उत्साहित थी. पर पिछले तीन वर्षों में अमीर देश अपनी प्रतिबद्धता से हटते हुए नजर आए.



असहमति किन बातों पर है?

ग़रीब देशों और अमीर देशों के कार्बन उत्सर्जन की सीमा को लेकर शुरू से ही विवाद था. एक सबसे बड़ी असहमति इंटर-गवर्नमेंटल पैनल की जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक रिपोर्ट को लेकर है. कुछ देशों के समूह, जिनमें सऊदी अरब, अमरीका, कुवैत और रूस ने आईपीसीसी की रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया है. नवम्बर के महीने में जारी विश्व मौसम विज्ञान संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 में वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर 405 पीपीएम( पार्ट्स पर मिलियन) हो गया. पृथ्वी में ऐसी स्थिति पिछले तीस से पचास लाख साल में पहली बार आई है. अक्तूबर 2018 में इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने अपनी विशेष रिपोर्ट में कहा है कि धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. आईपीसीसी ने कार्बन उत्सर्जन को लेकर जो सीमा तय की है उस पर कई देशों के बीच मतभेद हैं. भारत ने 2030 तक 30-35 फ़ीसदी कम कार्बन उत्सर्जन करने की बात कही है.



क्या तय हुआ?

सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने 156 पेज का जो दस्तावेज तैयार किया है, उसमें यह बताया गया है कि देश किस प्रकार उत्सर्जन रोकने के प्रयासों को कैसे  मापेंगे, रिपोर्ट करेंगे और पुष्टि करेंगे. पेरिस संधि में देशों के लिए स्वैच्छिक अंशदान तय किया गया था, जिसे नेशनली डिटर्मिंड कंट्रीब्यूशन (एनडीसी) कहा गया. भारत के मामले में एनडीसी संशोधन 2030 में होना है. चूंकि सभी देशों के ग्रीनहाउस गैसों (जीएचसी) के बारे में अपने-अपने मानक और परिभाषाएं थीं, इसलिए परिणाम एक जैसे नहीं हो सकते थे. अब नियम-पुस्तिका के अनुसार हस्ताक्षर करने वाले देश मानकों पर दृढ़ रहेंगे. वित्तीय-व्यवस्था की कुछ विसंगतियों को दूर किया गया है. बावजूद इसके छोटे द्वीपों पर बसे देश परेशान हैं, क्योंकि अमीर देश ग्रीन क्लाइमेट फंड के लिए हर साल 100 अरब डॉलर की धनराशि केवल 2025 तक ही देने को तैयार हैं. पेरिस समझौते में जिस कार्बन मार्केट को बनाने की बात कही गई थी, उसके बारे में कोई रूपरेखा नहीं बनी है. इसपर फैसला कॉप-25 में होगा.  















Saturday, December 22, 2018

कश्मीर में शासन


हालांकि जम्मू-कश्मीर देश के दूसरे राज्यों की तरह एक राज्य है, पर हमारे संविधान ने इसे विशेष राज्य का दर्जा दिया है. इस वजह से यहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था शेष राज्यों से अलग है. देश का यह अकेला राज्य है, जिसका अपना अलग संविधान भी है. संविधान के अनुच्छेद 370 के अनुसार देश की संसद और संघ शासन का जम्मू-कश्मीर पर सीमित क्षेत्राधिकार है. जो मामले संघ सरकार के क्षेत्राधिकार में नहीं हैं, वे राज्य की विधायिका के अधीन हैं. देश के शेष राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर में एक बड़ा अंतर 30 मार्च, 1965 तक और था. जहाँ अन्य राज्यों में राज्यपाल का पद होता था, वहाँ जम्मू-कश्मीर में सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री के स्थान पर वजीर-ए-आज़म (प्रधानमंत्री) का पद होता था. जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 27 के अनुसार सदर-ए-रियासत का चुनाव राज्य की विधायिका के मार्फत जनता करती थी. सन 1965 में जम्मू-कश्मीर के संविधान में हुए छठे संशोधन के बाद सदर-ए-रियासत के पद को राज्यपाल का नाम दे दिया गया और उसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते हैं.



राज्यपाल या राष्ट्रपति शासन?

इस साल जून में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के इस्तीफे के बाद जम्मू-कश्मीर में जब राज्यपाल शासन लागू किया गया, तब यह सवाल उठा था कि क्या यह अन्य राज्यों में लागू होने वाले राष्ट्रपति शासन से अलग है? वास्तव में यह अलग है. जहाँ अन्य राज्यों में राष्ट्रपति शासन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत लागू किया जाता है, वहीं जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत राज्यपाल शासन लागू किया जाता है. यह राज्यपाल शासन छह महीने के लिए लागू होता है. इन छह महीनों के दौरान विधान सभा स्थगित रहती है या राज्यपाल चाहें तो भंग भी की जा सकती है. छह महीने के राज्यपाल शासन के बाद या तो नई विधानसभा चुनकर आ सकती है, अन्यथा वहाँ अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है.



दोनों में अंतर?

बुनियादी तौर पर कोई अंतर नहीं है. दोनों परिस्थितियों में राज्यपाल केन्द्र सरकार के निर्देश पर प्रशासन चलाते हैं. पर जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन फौरन नहीं लगता. पहले राज्यपाल शासन लगता है. यदि राज्यपाल इस दौरान विधानसभा भंग करते हैं, तो उसके छह महीने के भीतर चुनाव होने चाहिए. छह महीने के भीतर चुनाव नहीं होते हैं, तो कारण स्पष्ट करने होते हैं. राज्य में राज्यपाल शासन के छह महीने की अवधि 20 दिसम्बर को पूरी होने वाली है. तबतक वहाँ विधानसभा चुनाव नहीं हो पाएंगे, इसलिए राज्यपाल वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करेंगे. इस सिफारिश पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल विचार करेगा और इसके लिए संसद के दोनों सदनों की मंजूरी लेनी होगी. यह मंजूरी राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद दो महीने के भीतर मिल जानी चाहिए. संसद से मंजूरी के बाद राष्ट्रपति शासन छह महीने तक लागू रह सकता है. इसकी अवधि फिर बढ़ाई जा सकती है. सन 1990 में लागू हुआ राष्ट्रपति शासन छह साल तक चला था. इस दौरान राज्य सूची के 61 विषयों पर कानून देश की संसद बना सकेगी. 




Wednesday, December 19, 2018

‘यलो जैकेट’ आंदोलन क्या है?


फ्रांस में इन दिनों पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन चल रहा है, जो यलो जैकेट (ज़िले ज़ोन) या पीली कमीज आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ है. इसकी शुरूआत 17 नवम्बर को हुई थी, जिसमें तीन लाख से ज्यादा लोगों ने देश के अलग-अलग शहरों में जाम लगाए और रैलियाँ कीं. देखते ही देखते इस आंदोलन ने बगावत की शक्ल ले ली. आंदोलनकारियों ने यातायात रोका, पेट्रोल डिपो घेरे और पुलिस पर हमले किए. कुछ आंदोलनकारियों की मौत भी हुई. आंदोलन उग्र होता गया और 21 नवम्बर तक इस आंदोलन के कारण 585 नागरिकों के और 113 पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबरें आईं. आंदोलन फ्रांस तक ही सीमित नहीं था, बल्कि हिंद महासागर में फ्रांस प्रशासित द्वीप रियूनियन में दंगे हुए. वहाँ तीन दिन के लिए स्कूल बंद कर दिए गए. सेना तैनात करनी पड़ी. आंदोलन के कारण सरकार ने दबाव में आकर टैक्स में वृद्धि वापस ले ली है. मध्य वर्ग का यह गुस्सा फ्रांस में ही नहीं है, यूरोप के दूसरे देशों में भी है. ऐसे ही आंदोलन इटली, बेल्जियम और हॉलैंड में भी शुरु हुए हैं.



यलो जैकेट नाम क्यों?

अंग्रेजी में बर्र या ततैया के लिए यलो जैकेट शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. इस आंदोलन से जुड़े लोगों का व्यवहार बर्र जैसा है. पर केवल इसी वजह से इस आंदोलन को यलो जैकेट नाम नहीं मिला. वस्तुतः सन 2008 से देश में मोटर-चालकों के लिए अपनी गाड़ी में पीले रंग के चमकदार जैकेट रखना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि आपदा की स्थिति में दूर से पहचाना जा सके. आंदोलन में शामिल लोग पीली जैकेट पहनते हैं. अब यह जैकेट आंदोलन प्रतीक बन गया है. पचास के दशक से फ्रांस में मोटर वाहनों की खरीद को बढ़ावा दिया गया. डीजल इंजनों के निर्माण पर सब्सिडी दी गई. कम्पनियों को मोटर-वाहन खरीदने पर टैक्स में छूट दी गई. इस वजह से गाड़ियों की भरमार हो गई. इससे देश में मोटर-वाहन उद्योग को बढ़ावा मिला. समृद्धि भी बढ़ी.



आंदोलन क्यों?

आंदोलन के पीछे बुनियादी तौर पर अपनी व्यवस्था के प्रति रोष है. इनमें सबसे ज्यादा मध्यवर्ग के गोरे लोग हैं, जो मानते हैं कि व्यवस्था ने उन्हें भुला दिया है. उनका कहना है कि हम सबसे ज्यादा टैक्स भरते हैं, फिर भी हमसे ही सारी वसूली की जाती है. उन्हें पूँजीवादी व्यवस्था से भी शिकायत है. संयोग से पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोलियम की कीमतें बढ़ीं और फ्रांस सरकार ने अपने खर्चे पूरे करने के लिए टैक्स बढ़ाए. जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर सन 2014 से सरकार ने जीवाश्म-आधारित तेल की खपत कम करने के लिए भी पेट्रोलियम के उपभोग पर कार्बन टैक्स बढ़ा दिया. इतना ही नहीं सन 2019 में और नए टैक्स लगाने की योजना है. इन सब बातों का मिला-जुला प्रभाव यह हुआ कि नागरिकों के मन में नाराजगी बढ़ने लगी. यह महंगाई पिछले राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के समय में शुरू हो गई थी, पर नाराजगी पिछले महीने भड़की.





Thursday, December 6, 2018

ब्रेक्ज़िट क्या है?

ब्रेक्ज़िट शब्द अंग्रेजी वाक्यांश ब्रिटिश एक्ज़िट (यानी ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना) का संक्षिप्त रूप है. यूरोपीय संघ (ईयू) यूरोप के 28 देशों का राजनीतिक और आर्थिक संघ है. यूरोपीय संघ के विकास की पृष्ठभूमि को अलग से समझना होगा. मोटे तौर पर इतना समझ लें कि सन 1993 की मास्ट्रिख्ट संधि के बाद इस संघ ने व्यावहारिक शक्ल ली. उसके पहले यूरोपीय समुदाय के रूप में एक व्यवस्था थी, जिसमें यूके 1973 में शामिल हुआ था. सत्तर के दशक में देश के वामपंथी दल यूरोपीय समुदाय से अलग होने की माँग भी करते रहे थे. इसके बाद नब्बे के दशक में कुछ दक्षिणपंथी दलों ने भी ऐसी माँग शुरू कर दी. हाल के वर्षों में युनाइटेड किंगडम में माँग की जा रही थी कि इस संघ से हमें अलग हो जाना चाहिए. यह माँग उठती रही और सन 2015 के चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी ने वादा किया कि इस सवाल पर जनमत संग्रह कराएंगे. इसके बाद प्रधानमंत्री डेविड केमरन ने इस माँग पर फैसला करने के लिए देश में 23 जून 2016 को जनमत संग्रह कराया, जिसमें 52 फीसदी लोगों ने अलग होने की माँग का समर्थन किया.
कैसे होगा यह अलगाव?
केमरन व्यक्तिगत रूप से संघ में बने रहने के पक्षधर थे. जनमत संग्रह का परिणाम आने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उनकी जगह टेरेसा में ने ली, जिन्होंने कुछ समय बाद मध्यावधि चुनाव करा लिए. चुनाव में उनकी पार्टी अल्पसंख्या में आ गई. अब उनकी सरकार डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी के समर्थन से चल रही है. जनमत संग्रह के बाद 29 मार्च, 2017 से यूके सरकार ने ईयू संधि के अनुच्छेद 50 के तहत संघ से अलग होने की प्रक्रिया शुरू कर दी. इसके अंतर्गत युनाइटेड किंगडम 29 मार्च, 2019 को यूके के समय के अनुसार रात्रि में 11 बजे ईयू से अलग हो जाएगा. यदि दोनों पक्ष समय को और आगे बढ़ाने पर सहमत नहीं होते हैं, तो यह संघ से अलग होने के संदर्भ में विमर्श की अंतिम सीमा है.
अब विवाद क्या है?
सवाल है कि यह अलगाव बगैर किसी समझौते के होना चाहिए या अलगाव के संधिकाल के लिए कोई समझौता होना चाहिए. प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने जिस समझौते की रूपरेखा बनाई है, उसे लेकर उनके सहयोगियों के बीच भारी मतभेद हैं. यूरोपीय संघ के सदस्यों ने रविवार 25 नवम्बर को ब्रेक्जिट समझौते को मंजूरी दे दी. समझौते को ईयू के 27 नेताओं ने इस संक्षिप्त बैठक में स्वीकार कर लिया. युनाइटेड किंगडम की संसद में इस प्रस्ताव पर 4 दिसंबर से विचार-विमर्श शुरू होगा और 11 दिसंबर को मतदान होगा. लेबर, लिबरल-डेमोक्रेटिक, स्कॉटिश नेशनल पार्टी (एसएनपी), डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी (डीयूपी) और टेरेसा में की अपनी कंजर्वेटिव पार्टी के काफी सांसदों ने पहले से घोषणा कर दी है कि हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे. 


Friday, November 23, 2018

चाबहार बंदरगाह कहाँ है?

चाबहार बंदरगाह ओमान की खाड़ी में ईरान के दक्षिण पूर्व में स्थित है. यह ईरान का गहरे सागर का एकमात्र बंदरगाह है. इसमें दो बंदरगाह हैं. एक है शहीद कलंतारी और दूसरा शहीद बेहश्ती. दोनों में पाँच-पाँच बर्थ हैं. यह बंदरगाह भारत-ईरान और अफ़ग़ानिस्तान तीन देशों के समझौते के अधीन विकसित किया जा रहा है. यह एक दीर्घकालीन परियोजना है, जो बाद में इस इलाके को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर के मार्फत मध्य एशिया के रास्ते यूरोप तक से जोड़ने का कार्य कर सकती है. इस बंदरगाह के विकास की परिकल्पना सन 1973 में ईरान के अंतिम शाह ने की थी. सन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद इसका काम धीमा पड़ गया था. इसका पहला चरण सन 1983 में पूरा हुआ. इस बंदरगाह में ईरान की दिलचस्पी की एक वजह यह थी कि इराक़ के साथ युद्ध के कारण ईरान ने अपने समुद्री व्यापार को पूर्व की तरफ बढ़ाना शुरू कर दिया था. शहीद बेहश्ती बंदरगाह को विकसित करने के लिए भारत और ईरान के बीच समझौता 2003 में हुआ था.

अमेरिकी पाबंदियाँ

सन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते बिगड़ते गए जिनके कारण अमेरिका ने ईरान पर कई बार पाबंदियाँ लगाईं. हाल में अमेरिका ने 5 नवंबर से ईरान पर फिर से बड़ी पाबंदियाँ लगाने का फैसला किया है. पर उसने चाबहार बंदरगाह का विकास करने के भारतीय कार्यक्रम को उन पाबंदियों से छूट दी है. मई 2016 में भारत और ईरान के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत भारत शहीद बेहश्ती बंदरगाह की एक बर्थ के पुनरुद्धार और 600 मीटर लंबे एक कंटेनर क्षेत्र का पुनर्निर्माण करेगा. भारत इस बंदरगाह के कंटेनर रेलवे ट्रेक का निर्माण भी कर रहा है और चाबहार-ज़ाहेदान रेलवे लाइन भी तैयार कर रहा है. इसके बाद ज़ाहेदान से अफ़ग़ानिस्तान के ज़रंज तक रेलवे लाइन का विस्तार होगा. ईरान में भारत अंतरराष्ट्रीय उत्तरी-दक्षिणी कॉरिडोर को बनाने की योजना पर भी काम कर रहा है. यह परिवहन कॉरिडोर 7,200 किलोमीटर लंबा नेटवर्क होगा, जिसमें पोत, रेल और सड़क मार्ग से माल का परिवहन होगा. इस परियोजना पर 16 मई 2002 को भारत, रूस और ईरान के बीच समझौता हुआ था. यह नेटवर्क भारत, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया के रास्ते यूरोप को जोड़ेगा.

अफ़ग़ानिस्तान की भूमिका

अमेरिका मानता है कि युद्ध-प्रभावित अफ़ग़ानिस्तान के हितों की रक्षा के लिए चाबहार बंदरगाह का विकास करना जरूरी है. चूंकि अफ़ग़ानिस्तान के पास समुद्र तट नहीं है, इसलिए यह उसके व्यापार के लिए महत्वपूर्ण बंदरगाह साबित होगा. भारत के सीमा सड़क संगठन ने अफ़ग़ानिस्तान में जंरंज से डेलाराम तक 215 किलोमीटर लम्बे मार्ग का निर्माण पूरा कर लिया है, जो निमरोज़ प्रांत की पहली पक्की सड़क है. पिछले साल अक्तूबर में भारत ने चाबहार के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान को गेहूँ की पहली खेप भेजकर इस व्यापार मार्ग की शुरुआत कर भी दी है.


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