Thursday, May 16, 2019

सूर्य सबसे पहले किस देश में उगता है?


इस सवाल का जवाब समझना आसान नहीं है, क्योंकि धरती घूमती रहती है। इसलिए सबसे पहले कौन सा इलाका सूर्य के सामने सबसे पहले आता है कहना मुश्किल है। मनुष्य ने धरती को अक्षांश, देशांतर के मार्फत विभाजित किया है। धरती के गोले पर उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक जो काल्पनिक देशांतर रेखाएं हैं, उनमें जो देश सुदूर पूर्व में 180 देशांतर पर पड़ेंगे, वहाँ सबसे पहले सूर्योदय मानना चाहिए। साथ ही दुनिया को अलग-अलग टाइम ज़ोन में विभाजित किया है। इस टाइम ज़ोन से तय होता है कि सबसे पहले सूर्योदय किस देश में होता है। सामान्यतः हम मानते हैं कि दुनिया में जापान का मिनामी तोरीशीमा धुर पूर्व में है। इसलिए वहाँ सबसे पहले सूर्योदय मान सकते हैं। इसका दूसरा तरीका यह है कि डेटलाइन को आधार मानें। ग्रीनविच मीन टाइम को यदि हम आधार मानते हैं तो जापान के समय में नौ घंटे जोड़ने होंगे। यानी जब ग्रीनविच मान टाइम शून्य होगा, यानी रात के बारह बजे होंगे तब जापान में सुबह के नौ बजे होंगे। वास्तव में जीएमटी से ठीक बारह घंटे का फर्क फिजी, तुवालू, न्यूजीलैंड और किरिबाती के मानक समयों में है, जबकि इन सबकी स्थिति में फर्क है। इस लिहाज से दुनिया का सबसे पूर्व में स्थित क्षेत्र किरिबाती का कैरलिन द्वीप है, जहाँ के सूर्योदय को धरती का पहला सूर्योदय मान सकते हैं।
ओलिम्पिक गोल्ड मेडल में कितना सोना होता है?
पहले यह बताना बेहतर होगा कि 1896 और 1900 के ओलिम्पिक खेलों में गोल्ड मेडल नहीं दिए गए। उनमें चाँदी और ताँबे के मेडल क्रमशः विजेता और उप विजेता को दिए गए। 1904 में अमेरिका के मिज़ूरी में तीन मेडल का चलन शुरू हुआ। ओलिम्पिक के गोल्ड मेडल का आकार, डिजाइन और वज़न बदलता रहता है। लंदन ओलिम्पिक में काफी बड़े आकार के मेडल दिए गए जो 85 मिमी व्यास के थे। इनकी मोटाई 7 मिमी थी। सोने का मेडल भी चाँदी में ढाला जाता है और उसके ऊपर लगभग 6 ग्राम सोने की प्लेटिंग होती है। चाँदी का मेडल .925 शुद्धता की चाँदी का होता है और कांस्य पदक में ताँबे, टिन और ज़स्ते की मिलावट होती है।
गैस का गुब्बारा कितना ऊपर जाता है?
गैस के गुब्बारे में हीलियम गैस भरी जाती है। यह गुब्बारा इसलिए ऊपर उठता है क्योंकि हीलियम गैस हवा से हल्की होती है। चूंकि हमारे वायुमंडल में आप जैसे-जैसे ऊपर जाएंगे हवा हल्की होती जाएगी। आमतौर पर एक छोटा गुब्बारा चार पाँच सौ मीटर से ज्यादा ऊँचाई तक जाता है। साथ ही वह हवा के प्रवाह के साथ बहने लगता है। धीरे-धीरे गुब्बारे में भरी हीलियम निकलती जाती है और वह नीचे आने लगता है।

जुगनू क्यों चमकता है?
जुगनू एक प्रकार का उड़ने वाला कीड़ा है, जिसके पेट में रासायनिक क्रिया से रोशनी पैदा होती है। इसे बायोल्युमिनेसेंस कहते हैं। यह कोल्ड लाइट कही जाती है इसमें इंफ्रा रेड और अल्ट्रा वॉयलेट देनों फ्रीक्वेंसी नहीं होतीं।



Thursday, May 9, 2019

आतंक-विरोधी अंतरराष्ट्रीय संधि?

आतंकवाद के खिलाफ दुनिया में कई तरह के समझौते और संधियाँ हैं, पर संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पिछले कई साल से ‘कांप्रिहैंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म (सीसीआईटी)’ को लेकर चल रहा विमर्श पूरा नहीं हो पा रहा है. संयुक्त राष्ट्र महासभा की सालाना बैठकों में करीब-करीब हर साल भारत की और से इस संधि को अंतिम रूप देने की अपील की जाती है. इस संधि का प्रस्ताव भारत ने सन 1996 में किया था, पर अमेरिका और इस्लामिक देशों के संगठन की पारस्परिक आपत्तियों के कारण इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका. प्रस्ताव 51/210 के अंतर्गत 17 दिसम्बर, 1996 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक तदर्थ समिति बनाई गई थी. हालांकि इस संधि की अंतिम रूपरेखा नहीं बन पाई है, पर इस सिलसिले में हुए विचार-विमर्श की रोशनी में आतंकवाद के खिलाफ तीन प्रोटोकॉल जरूर पास हो गए हैं. 1.आतंकवादी बमबारी रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (संधि) जो 15 दिसम्बर,1997 को स्वीकार हुआ, 2. आतंकवाद की वित्तीय सहायता रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि, जो 9 दिसम्बर, 1999 को स्वीकार की गई और 3.एटमी आतंकवादी गतिविधियाँ रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि, जो 13 अप्रैल, 2005 को स्वीकार की गई.

संधि का उद्देश्य?

संधि का मूल उद्देश्य यह है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के सभी 193 सदस्य आतंकवाद की स्वीकृत परिभाषा को अपने देश के आपराधिक कानूनों का हिस्सा बनाएं. इसके तहत सभी आतंकवादी ग्रुपों को बैन करें और उनके कैम्पों को बंद करें। सभी आतंकवादियों के खिलाफ विशेष कानूनों के तहत मुकदमे चलाएं. सीमा पार आतंकवाद को प्रत्यर्पणीय (एक्स्ट्राडिटेबल) अपराध घोषित करें. भारत ने 26 नवम्बर, 2008 के मुम्बई हमले के बाद से इस संधि के लिए तेजी से प्रयास किए हैं और इसके उद्देश्यों के अनुरूप पाकिस्तान से कार्रवाई करने का आग्रह भी किया है.

संधि क्यों नहीं हो पाई?

मुख्य संधि पर विमर्श गतिरोधों का शिकार होता रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है आतंकवाद की परिभाषा पर आमराय का नहीं बन पाना. मसलन ‘आतंकी संगठन’ और ‘मुक्ति संगठन’ के बीच फर्क क्या होगा? साथ ही क्या देशों की सेनाओं की गतिविधियों को भी राज्य आतंकवाद की संज्ञा दी जा सकेगी? अमेरिका का कहना है कि राज्य की सेना के ऑपरेशंस को इसको दायरे से बाहर रखा जाए, जबकि इस्लामिक देशों का संगठन (ओआईसी) राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों को इसके दायरे से बाहर रखना चाहता है. राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों से उसका तात्पर्य खासकर इसराइल-फलस्तीन संघर्ष से है. पाकिस्तान इसमें कश्मीर को भी शामिल करता है. कानूनी विशेषज्ञ चाहते हैं कि इसकी परिभाषा ऐसी हो, जिसे कानूनी शब्दावली में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जा सके, पर यह मसला राजनीतिक शब्दावली के कारण अटका पड़ा है.





Saturday, April 27, 2019

ब्लैक बॉक्स क्या होता है?

हवाई जहाज की उड़ान के दौरान उसके बारे में तमाम जानकारियाँ एक जगह दर्ज होती जाती हैं। विमान की गति, ऊँचाई, इंजन तथा अन्य यंत्रों की ध्वनि, यात्रियों और पायलटों की बातचीत आदि, दर्ज होती रहती है। इन सूचनाओं के विश्लेषण द्वारा विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में दुर्घटना के कारणों की पहचान की जाती है। इसे फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर या फ़्लाइट रिकॉर्डर कहते हैं। इसके अलावा कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर भी होता है। दोनों उपकरणों से बनता है ब्लैक बॉक्स। सन 1953-54 में हवाई हादसों की श्रृंखला के बाद हवाई जहाज में एक ऐसा उपकरण लगाने की जरूरत महसूस की गई थी जो कि दुर्घटना के समय या उससे तुरंत पहले वायुयान में होने वाले हलचलों और आँकड़ों को संग्रहीत कर रख सके तथा जो दुर्घटनाओं में सुरक्षित रहे। इसका रंग काला नहीं लाल या नारंगी होता है। इसीलिए शुरू में इसे ‘रेड एग’ कहा जाता था. इसके शुरुआती प्रारूपों में उसकी भीतरी दीवार को काला रखा जाता था, क्योंकि उसमें फोटो फिल्म आधारित जानकारी भी दर्ज होती थी। वहीं से इसका नाम ब्लैक बॉक्स पड़ा। इसमें क्रैश-प्रूफ मेमरी यूनिट्स होते हैं। इसे इस तरह बनाया जाता है कि तेज आग, भीषण विस्फोट और कई टन मलबे के दबाव के बावजूद नष्ट नहीं होता।

ह्वाइट कॉलर जॉब क्या है?

ह्वाइट कॉलर शब्द एक अमेरिकी लेखक अपटॉन सिंक्लेयर ने 1930 के दशक में गढ़ा। औद्योगीकरण के साथ शारीरिक श्रम करने वाले फैक्ट्री मजदूरों की यूनीफॉर्म डेनिम के मोटे कपड़े की ड्रेस हो गई। शारीरिक श्रम न करने वाले कर्मचारी सफेद कमीज़ पहनते। इसी तरह खदानों में काम करने वाले ब्लैक कॉलर कहलाते। सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े कर्मियों के लिए अब ग्रे कॉलर शब्द चलने लगा है।

टाटा-बाय-बाय माने?

अंग्रेजी में विदाई के वक्त टाटा कहने का चलन है। यह शब्द बोली का है। इसका प्रचलन उन्नीसवीं सदी से हुआ है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार यह गुडबाय का नर्सरी संस्करण है। इसका इस्तेमाल पहली बार 1837 में दर्ज है। सन 1941 में बीबीसी के एक रेडियो प्रोग्राम में इस्तेमाल किया गया संक्षिप्त प्रयोग टीटीएफएन काफी लोकप्रिय हुआ था जिसका मतलब था टाटा फॉर नाउ।

‘इंडो-चायना’ किसे कहते हैं?

इंडो-चायना या हिन्द-चीन प्रायद्वीप दक्षिण पूर्व एशिया का एक इलाका है। यह इलाक़ा चीन के दक्षिण-पश्चिम और भारत के पूर्व में पड़ता है। इन दोनों देशों की संस्कृतियों का इस इलाके पर असर है। आमतौर पर अंतर्गत कम्बोडिया, लाओस और वियतनाम को इन देशों की श्रेणी में रखा जाता है। ये तीनों फ्रांसीसी उपनिवेश थे। इस इलाके में बड़ी संख्या में चीन से आए लोग रहते हैं, पर सांस्कृतिक रूप से भारत का यहाँ जबर्दस्त प्रभाव है। इंडो-चायना नाम का श्रेय डेनिश-फ्रेंच भूगोलवेत्ता कोनराड माल्ट-ब्रन को दिया जाता है, जिन्होंने सन 1804 में इस इलाके को इंडो-चिनॉय कहा। उनके बाद 1808 में स्कॉटिश भाषा विज्ञानी जॉन लेडेन ने इस इलाके को इंडो-चायनीस कहा।




Thursday, April 25, 2019

चुनावी बॉण्ड क्या हैं?


चुनावी बॉण्ड एक प्रकार की हुंडी हैं, जिन्हें वित्त विधेयक, 2017 के मार्फत देशी कम्पनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया है. यह योजना 2 जनवरी, 2018 से लागू है. केवल वही राजनीतिक दल चुनावी बॉण्ड प्राप्त कर सकते हैं, जो जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 के अनुच्छेद 29ए के तहत पंजीकृत हों और जिन्होंने लोकसभा चुनाव या राज्य विधानसभा चुनाव में डाले गए वोटों के कम से कम एक प्रतिशत या ज्यादा वोट हासिल किए हों. इन्हें किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा किसी अधिकृत बैंक खाते के माध्यम से ही भुनाया जा सकेगा. इन्हें हरेक वित्त वर्ष की हरेक तिमाही में दस दिन के एक खास निर्धारित समय में ही खरीदा जा सकता है. ये बॉण्ड 1,000, 10,000, एक लाख, दस लाख, एक करोड़ रुपये या इनकी गुणक राशि के रूप में खरीदे जा सकते हैं. राजनीतिक दलों को इन्हें प्राप्ति के 15 दिन के भीतर भुनाना होता है. इन बॉण्डों को खरीदारों को अपना पूरा परिचय देना होता है, पर राजनीतिक दलों को इस बात की जानकारी देने की जरूरत नहीं कि उन्हें किसने ये बॉण्ड दिए हैं.

इन्हें किसने चुनौती दी है?

सुप्रीम कोर्ट में सितम्बर, 2017 में पहली चुनौती एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) ने चुनौती दी थी, फिर इसके बाद जनवरी, 2018 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इन्हें चुनौती दी. इनका कहना है कि इन बॉण्डों के साथ राजनीतिक दलों को कॉरपोरेट हाउसों से असीमित मात्रा में पैसा प्राप्त करने का रास्ता खुल गया है. इससे हमारे लोकतंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. इन्होंने चार मुख्य आधारों पर चुनौती दी है. 1.सामान्य नागरिक को इस बात की जानकारी नहीं होगी कि किसने किस पार्टी को कितना धन दिया. 2.कम्पनियों के लाभ-हानि खाते में उन राजनीतिक दलों का नाम नहीं होगा, जिन्हें चंदा दिया गया है. 3.पहले कम्पनियों पर पिछले तीन वर्षों के शुद्ध लाभ के 7.5 फीसदी तक के चंदे की सीमा थी. अब कोई सीमा नहीं है. 4.ये बॉण्ड आयकर कानून की धारा 13ए के तहत आयकर से मुक्त हैं. देश के चुनाव आयोग ने भी इन बॉण्डों पर आपत्ति व्यक्त की है.

अदालत का फैसला क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने इन बॉण्डों पर स्थगनादेश नहीं दिया है. अलबत्ता गत 12 अप्रैल को इस मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद अपने अंतरिम आदेश में सभी दलों से कहा है कि वे सीलबंद लिफाफे में इन बॉण्डों की पूरी जानकारी चुनाव आयोग को दें. कोर्ट ने कहा है कि सभी दलों को 15 मई तक मिले चुनावी चंदे की जानकारी देनी होगी. जानकारी सौंपने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई तक का समय निर्धारित किया है. अदालत के अनुसार इस महत्वपूर्ण विषय पर गहराई से जाकर विचार करना होगा.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित





Monday, April 15, 2019

वीवीपैट क्या है?


https://epaper.prabhatkhabar.com/2110431/Awsar/Awsar#page/6/2
वोटर वैरीफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) या वैरीफाइड पेपर रिकार्ड (वीपीआर) इलेक्ट्रॉनिक वोटर मशीन का उपयोग करते हुए मतदाताओं को फीडबैक देने का एक तरीका है. यह एक स्वतंत्र सत्यापन प्रणाली है, जिससे मतदाताओं को जानकारी मिल जाती है कि उनका वोट सही ढंग से डाला गया है. इसमें वोट का बटन दबने के बाद एक पर्ची छपकर बाहर आती है. मतदाता सात सेकंड तक यह देख सकता है कि उसने जिस प्रत्याशी को वोट दिया है उसका नाम और चुनाव चिह्न क्या है. भारत में, 2014 के चुनाव में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में 543 में से 8 संसदीय क्षेत्रों में वीवीपैट प्रणाली की शुरुआत की गई थी. ये क्षेत्र थे लखनऊ, गांधीनगर, बेंगलुरु दक्षिण, चेन्नई सेंट्रल, जादवपुर, रायपुर, पटना साहिब और मिजोरम. इनका पहली बार इस्तेमाल सितंबर 2013 में नगालैंड के नोकसेन विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र हुआ था. सन 2017 में गोवा विधानसभा चुनाव में संपूर्ण राज्य में इनका इस्तेमाल किया गया था. चुनाव आयोग ने इस वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में हरेक संसदीय क्षेत्र के हरेक विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट के इस्तेमाल का निर्देश जारी किया है. 

इनकी जरूरत क्यों पड़ी?

भारत में सन 1999 के लोकसभा चुनाव में आंशिक रूप से और 2004 के चुनाव में पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल किया गया था. उस चुनाव में 10 लाख से ज्यादा वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल किया गया. इन मशीनों के इस्तेमाल के पहले हमारे देश में कागज के बैलट पेपरों का इस्तेमाल होता था. उन चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की शिकायतें आती थीं. उनकी गिनती में काफी समय लगता था और मानवीय त्रुटि की सम्भावनाएं भी थीं. वोटिंग मशीनें बनाने की कोशिशें उन्नीसवीं सदी से चल रहीं थीं. अमेरिका में वोटिंग मशीन का पेटेंट भी कराया गया था. वह वोटिंग मशीन इलेक्ट्रॉनिक मशीन नहीं थी. पंचिंग मशीन थी. भारत में चुनाव आयोग ने वोटिंग मशीन का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद की मदद से किया था. सन 1980 में पहली वोटिंग मशीन बनाई गई थी. पहली बार इसका इस्तेमाल सन 1981 में केरल के उत्तरी पारावुर विधानसभा क्षेत्र के 50 पोलिंग स्टेशनों पर किया गया था.

यह खबरों में क्यों है?

ईवीएम के इस्तेमाल के बाद उन्हें लेकर भी शिकायतें आईं हैं. इन शिकायतों के निवारण के लिए वीवीपैट बनाई गई है. इन मशीनों में भी गड़बड़ी की शिकायतें आती हैं. दूसरे इनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है. संसदीय क्षेत्र के हरेक विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट के इस्तेमाल के विरोध में देश के 21 राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. इसपर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि ज्यादा पोलिंग स्टेशनों पर वीवीपैट के इस्तेमाल में क्या दिक्कत है? इसपर चुनाव आयोग ने जवाब दिया है कि यदि किसी संसदीय क्षेत्र के 50 फीसदी वोटों के लिए वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाए, तो मतगणना में छह दिन का विलम्ब होगा. बहरहाल अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि हरेक लोकसभा क्षेत्र में आने वाले पाँच विधानसभा क्षेत्रों के एक-एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाए. 



Saturday, April 6, 2019

चुनाव कब शुरू हुए?


http://epaper.patrika.com/2100072/Me-Next/Me-Next#page/2/1
व्यापक स्तर पर यह व्यवस्था 18वीं सदी में बड़े स्तर पर सामने आई, जब यूरोप और उत्तरी अमेरिका में सांविधानिक व्यवस्थाओं के तहत प्रतिनिधियों के चुनाव की जरूरत महसूस की गई। यों चुनाव-पद्धति का विकास हो ही रहा है और तकनीकी-विकास के साथ इसका रूप बदल रहा है। चुनाव प्राचीन यूनान, रोम और भारत में भी होते थे, पर वे आधुनिक चुनाव जैसे नहीं थे। बादशाह और धर्मगुरु यानी पोप के चुनाव होते थे। वैदिक युग में भारत में गण (यानी जनजाति) के प्रमुख के रूप में राजा के चुनाव का वर्णन मिलता है। पाल राजा गोपाल (750-770 के बीच शासन) का चुनाव सामंतों ने किया था। शब्द-व्युत्पत्ति पर लिखने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार हिंदी में निर्वाचन की जगह चुनाव शब्द का इस्तेमाल ज्यादा होता है। चुनाव शब्द बना है चि धातु से जिससे चिनोति, चयति, चय जैसे शब्द बनते हैं, जिनमें उठाना, चुनना, बीनना, ढेर लगाना जैसे भाव हैं।
निश्चय, निश्चित जैसे शब्द भी इसी कड़ी के हैं जो निस् उपसर्ग के प्रयोग से बने हैं जिनमें तय करना, संकल्प करना, निर्धारण करना शामिल है। संस्कृत में निर्वचन शब्द का मतलब है व्याख्या, व्युत्पत्ति या अभिप्राय लगाना। गूढ़ वचनों में छिपे संदेश को चुनना। स्पष्ट है कि निर्वचन में चुनने का भाव ही प्रमुख है।
जनमत-संग्रह और चुनाव में अंतर?
दोनों प्रक्रियाएं जनता की राय से जुड़ी हैं, पर दोनों के उद्देश्यों में बुनियादी अंतर है। सामान्यतः चुनाव एक समयबद्ध सांविधानिक-प्रक्रिया है, जबकि जनमत-संग्रह प्रश्न-विशेष या विषय पर केन्द्रित है। जैसे कि सन 2015 में ब्रिटेन की जनता ने यूरोपियन यूनियन से हटने का फैसला जनमत-संग्रह के माध्यम से किया। शुरू में सांविधानिक-व्यवस्थाओं को स्वीकार करने के लिए व्यापक स्तर पर जनमत-संग्रह की व्यवस्था ने भी जन्म लिया। ऑस्ट्रेलिया और स्विट्ज़रलैंड में अब तक दर्जनों जनमत-संग्रह हो चुके हैं।
जनमत-संग्रह के लिए अंग्रेजी में रेफरेंडम (Referendum) शब्द का इस्तेमाल होता है। कई बार इसके लिए प्लेबिसाइट (Plebiscite) शब्द का इस्तेमाल भी होता है। कई जगह इन दोनों में अंतर किया जाता है। मसलन ऑस्ट्रेलिया में संविधान में बदलाव के लिए होने वाले जनमत-संग्रह को रेफरेंडम कहते हैं, और जो जनमत-संग्रह संविधान को प्रभावित नहीं करता, उसे प्लेबिसाइट। आयरलैंड में संविधान को अंगीकार करने के लिए जो पहला जनमत-संग्रह हुआ, उसे रेफरेंडम कहा गया। फिर संविधान में बदलाव के लिए जो हुआ, उसे प्लेबिसाइट।

मताधिकार क्या है?
वोट देने का अधिकार भी सबको एक साथ नहीं मिला। नागरिकों के बीच श्वेत-अश्वेत, स्त्री-पुरुष, आयु और सम्पत्ति के आधार पर भेद को खत्म होने में भी लम्बा समय लगा। आधुनिक चुनाव-पद्धतियों में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को मान्यता दी जाती है, पर इस अधिकार को बीसवीं सदी में ही मान्यता मिल पाई। ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों को सन 1962 में मताधिकार मिला। महिलाओं को मताधिकार देने वाला पहला देश न्यूजीलैंड था, जहाँ 1893 में महिलाओं को वोट का अधिकार मिला। यूरोप में स्विट्ज़रलैंड आखिरी देश था, जहाँ 1971 में स्त्रियों को वोट देने का अधिकार मिला। 
दूरबीन क्या है?
दूरबीन यानी दूर तक दिखाने वाला यंत्र। इसके आविष्कार का श्रेय हॉलैंड के चश्मा बनाने वालों को जाता है। इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीली ने इसमें बुनियादी सुधार किए। आधुनिक इटली के पीसा नामक शहर में 15 फरवरी 1564 को गैलीलियो गैलीली का जन्म हुआ। ज्यादातर लोग गैलीलियो को एक खगोल विज्ञानी के रूप में याद करते हैं जिसने दूरबीन में सुधार कर उसे अधिक शक्तिशाली तथा खगोलीय प्रेक्षणों के लिए उपयुक्त बनाया और साथ ही अपने प्रेक्षणों से ऐसे चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए जिसने खगोल विज्ञान को नई दिशा दी और आधुनिक खगोल विज्ञान की नींव रखी।





Friday, April 5, 2019

फ्रिज के आइस क्यूब का आविष्कार कैसे हुआ?


http://epaper.patrika.com/1997463/Me-Next/Me-Next#page/2/1
आइस क्यूब के पहले आइस या बर्फ का आविष्कार हुआ था। यों तो बर्फ प्राकृतिक रूप से हमें मिलती है। उसके आविष्कार की बात सोची नहीं जा सकती। पर खाने-पीने की चीज़ों को सुरक्षित रखने के लिए और गर्म इलाकों में कमरे को ठंडा रखने के लिए बर्फ की ज़रूरत हुई। शुरू के दिनों में सर्दियों की बर्फ को जमीन के नीचे दबाकर या मोटे कपड़े में लपेट कर उसे देर तक सुरक्षित रखने का काम हुआ। फिर आइस हाउस बनाने का चलन शुरू हुआ। ज़मीन के नीचे तहखाने जैसे बनाकर उनमें बर्फ की सिल्लियाँ रखी जाती थीं, जो या तो सर्दियों में सुरक्षित कर ली जाती थीं या दूर से लाई जाती थीं। उधर चीन में आइसक्रीम बनाने की कला का जन्म भी हो गया था। सन 1295 में जब मार्को पोलो चीन से वापस इटली आया तो उसने आइस क्रीम का जिक्र किया। आइस हाउस के बाद आइस बॉक्स बने। फिर कृत्रिम बर्फ बनाने की बात सोची गई। इसके बाद रेफ्रिजरेटर की अवधारणा ने जन्म लिया। सन 1841 में अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन गोरी ने बर्फ बनाने वाली मशीन बना ली। आइस क्यूब ट्रे बीसवीं सदी की देन है। इस ट्रे ने आइस क्यूब को जन्म दिया। 
एस्ट्रोनॉट्स स्पेस में क्या या कैसा खाना खाते हैं?

अब अंतरिक्ष यात्राएं काफी लम्बी होने लगी हैं। कई-कई महीने तक यात्रियों को अंतरिक्ष स्टेशन पर रहना पड़ता है। उनके लिए खाने की व्यवस्था करने के पहले देखना पड़ता है कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मुक्त स्पेस में उनके शरीर को किस प्रकार के भोजन की जरूरत है। साथ ही उसे स्टोर किस तरह से किया जाए। सबसे पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गागारिन को भोजन के रूप में टूथपेस्ट जैसी ट्यूब में कुछ पौष्टिक वस्तुएं दी गईं थीं। उन्हें गोश्त का पेस्ट और चॉकलेट सॉस भी दिया गया। 1962 में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री जॉन ग्लेन ने भारहीनता की स्थिति में भोजन करने का प्रयोग किया था। शुरू में लगता था कि भारहीनता में इंसान भोजन को निगल पाएगा या नहीं। इसके बाद अंतरिक्ष यात्रियों के लिए टेबलेट और तरल रूप में भोजन बनाया गया। धीरे-धीरे उनके भोजन पर रिसर्च होती रही। उन्हें सैंडविच और टोस्ट दिए जाने लगे। अब उन्हें कई तरह के पेय पदार्थ और खाने की चीजें भेजी जाती हैं। अलबत्ता वहाँ स्वाद की समस्या होती है। भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स हाल में जब कुछ साल पहले भारत आईं थी तो उन्होंने बताया था कि वे अंतरिक्ष में समोसे लेकर गई थीं। साथ ही वे पढ़ने के लिए उपनिषद और गीता भी लेकर गईं थी।


महात्मा गांधी के बेटे थे या नहीं?

गांधी जी के चार बेटे थे। हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास गांधी। एक शिशु का बचपन में निधन हो गया था।


दुनिया का सबसे छोटा हवाई अड्डा?

कैरीबियन सागर के द्वीप सबा का हवाई अड्डा दुनिया का सबसे छोटा हवाई अड्डा माना जाता है। इसका रनवे 400 मीटर लम्बा है। इस हवाई अड्डे पर जेट विमान नहीं उतरते क्योंकि उनके लिए कुछ लम्बा रनवे चाहिए। 


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