Sunday, April 22, 2018

एकसाथ चुनाव की अवधारणा क्या है?


गत 29 जनवरी को बजट सत्र के अभिभाषण में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्य विधानसभाओं के और लोकसभा के चुनाव एकसाथ कराने की वकालत करते हुए कहा कि इस विषय पर चर्चा और संवाद बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के किसी न किसी हिस्से में लगातार हो रहे चुनाव से अर्थव्यवस्था और विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे मानव संसाधन पर बोझ तो बढ़ता ही है, आचार संहिता लागू होने से देश की विकास प्रक्रिया भी बाधित होती है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में कहा कि विधानसभाओं और लोकसभा के चुनावों के साथ स्थानीय निकाय-चुनावों को भी शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही इस विषय पर देश में बहस चल पड़ी है। इस अवधारणा के विरोधियों का कहना है कि देश की भौगोलिक और राजनीतिक विविधता को देखते हुए ऐसा करना उचित नहीं होगा। पिछले कुछ समय में संसद की स्थायी समिति और नीति आयोग ने दो अलग-अलग रिपोर्टों में साथ-साथ चुनाव कराने का समर्थन किया है।

देश के पहले आम चुनाव 1951-52 में हुए थे। उस वक्त सभी विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव साथ-साथ ही हुए। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 तक साथ-साथ चुनाव हुए। सन 1967 में कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। कुछ राज्यों में समय से पहले ये सरकारें गिरीं और वहाँ चुनाव हुए, जिससे एकसाथ चुनावों का चक्र टूट गया। इसके बाद सन 1970 में पहली बार केन्द्र सरकार ने समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया और 1971 में केवल लोकसभा के चुनाव हुए।

पकौड़ा कहाँ से आया?

पकौड़ा, पकौड़ी, फक्कुरा, भजिया, भाजी और पोनाको दक्षिण एशिया में प्रचलित नमकीन व्यंजन है, जो खासतौर से भारत, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में गली-गली बनता मिलेगा। दुनिया में जबसे डीप फ्राई व्यंजनों का चलन शुरू हुआ है पकौड़ा किसी न किसी रूप में हमेशा हाजिर रहा है। यह शब्द सम्भवतः पक्व+वट से मिलकर बना है। वट, वटक और वड़ा इसके दूसरे रूप हैं। आंध्र प्रदेश में पकौडा है तो उत्तर भारत के कुछ इलाकों में पकौरा भी चलता है।

दक्षिण भारत का बोंडा और मुम्बई में पाव के साथ मिलने वाला वड़ा इस पकौड़े का ही एक रूप है। बांग्लादेश के कुछ इलाकों में फक्कुरा। र और ड़ के उच्चारण की भिन्नता के कारण भी ऐसा है। कर्नाटक में भाजी है, तो अफ्रीका के सोमालिया में बजिए। दक्षिण अफ्रीका के कुछ इलाकों में ढाल्टी नाम से पकौड़ों जैसा व्यंजन बनता है, जो मुस्लिम इलाकों में रोजों के दौरान इफ्तार में खाया जाता है। दक्षिण एशिया में यह आमतौर पर बेसन या चने की दाल को पीसकर तैयार पेस्ट में सब्जियाँ मिलाकर बनाया जाता है।

मूँग की दाल से बनता है, तो मुँगौड़ा और उरद की दाल से वड़ा। देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-लग ढंग से बनने वाली कढ़ी में भी इसे जगह मिली है। पुर्तगाली डिश टेम्पूरा, जापान में जाकर काफी लोकप्रिय हुआ है। इसी तरह दुनियाभर में मिलने वाले तरह-तरह के फ्रिटर्स भी पकौड़े ही हैं। इसमें अंडे और सीफूड को भी जगह मिल गई। भारत में सामान्यतः यह बेसन से बनता है, पर आटे, सूजी और मैदा की मिलावट के साथ इसके नाम भी बदलते जाते हैं। राजस्थान का मिर्ची वड़ा, दिल्ली का ब्रेड पकौड़ा, अंडा पकौड़ा, प्याज पकौड़ा, पनीर पकौड़ा से लेकर चिकन पकौड़ा और फिश पकौड़ा तक इसके तमाम रूप हैं।

Thursday, April 19, 2018

सीरिया में लड़ाई क्यों?

सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ पिछले सात साल से विद्रोह चल रहा है, जिसका इसरायल, सउदी अरब, तुर्की, अमेरिका और पश्चिमी देश अपने-अपने तरीके से समर्थन कर रहे हैं. दूसरी तरफ बशर-अल-असद की सरकार को ईरान और रूस का समर्थन प्राप्त है. यह बगावत गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है. इसमें अब तक 3 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल असद की जगह ली थी. सन 2011 में कई अरब देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था, जिसने गृहयुद्ध का रूप ले लिया है.

सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. यह संघर्ष साम्प्रदायिक रूप ले चुका है, जिसमें जेहादी ग्रुपों को पनपने का मौका मिला. इसी दौरान इराक में इस्लामिक स्टेट उभार शुरू हुआ, जिसने उत्तरी और पूर्वी सीरिया के काफी हिस्सों पर क़ब्ज़ा कर लिया. दूसरी तरफ ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरिया की सेना की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे हैं. सीरिया, इराक़ और तुर्की की सीमा पर बड़ी संख्या में कुर्दों की आबादी भी है. वे एक स्वतंत्र देश बनाने के लिए अलग लड़ रहे हैं.

इस प्रकार इस इलाके में कई तरह की ताकतें, कई तरह की ताकतों से लड़ रहीं हैं. पश्चिमी देशों का आरोप है कि सीरिया की सेना विद्रोहियों का दमन करने के लिए रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है. सीरिया पर पश्चिमी देशों के नवीनतम हमलों की वजह यह बताई जा रही है कि गत 7 अप्रैल को पूर्वी गोता इलाके के डूमा में सीरिया की सेना ने विद्रोहियों और राहत-कर्मियों पर रासायनिक हथियारों से हमला किया, जिसमें 40 लोग मारे गए.

बोआओ फोरम क्या है?

बोआओ फोरम एशिया (बीएफए) व्यापारिक सहयोग और विमर्श का फोरम है, जिसे दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तर्ज पर गठित किया गया है. इसका मुख्यालय चीन के हैनान प्रांत के बोआओ में है. सन 2001 से यहाँ एशिया की सरकारों और उद्योगों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हो रहा है. यह फोरम क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के इरादे से गठित किया गया है. इसमें एशिया के देशों को आर्थिक-विकास की राह पर चलते हुए अपनी अर्थ-व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का मौका मिलता है. इसे शुरू करने का विचार मूलतः फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वी रैमोस, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री बॉब हॉक और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री मोरीहीरो होसोकावा ने बनाया था.

इसका उद्घाटन 27 फरवरी 2001 को हुआ था. इसके लिए चीन ने खासतौर से पहल की. इसकी शुरूआत 26 देशों की भागीदारी के साथ हुई थी. इस वक्त इसके 29 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल हैं. इससे जुड़े संगठन की पहली बैठक 12-13 अप्रैल 2002 को हुई. हाल में 8 से 11 अप्रैल 2018 को फोरम का सालाना सम्मेलन हुआ. इसमें चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी भावी आर्थिक नीतियों की ओर इशारा किया. हालांकि भारत की ओर से इस सम्मेलन में कोई बड़ी राजनीतिक हस्ती उपस्थित नहीं थी. केवल उद्योग-व्यापार संगठन फिक्की के प्रतिनिधि इसमें उपस्थित थे.

बोआओ फोरम में आर्थिक एकीकरण के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय-प्रश्नों पर भी विचार किया जाता है. यह फोरम एक तरह से चीन और वैश्विक-व्यापार के बीच की कड़ी बना. सन 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य भी बना था.

डब्लूटीओ में कितने सदस्य हैं?

विश्व व्यापार संगठन में 164 सदस्य और 23 पर्यवेक्षक देश हैं. 14 जुलाई 2016 को लाइबेरिया इसका 163वाँ और 29 जुलाई 2016 को अफ़ग़ानिस्तान इसका 164वाँ सदस्य बना.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Saturday, April 14, 2018

मैराथन दौड़ की कहानी क्या है?


मैराथन दुनिया में सबसे लम्बी दूरी की दौड़ है. आधिकारिक रूप से इसकी लम्बाई 42.195 किलोमीटर (26 मील 385 गज) होती है. सामान्यतः यह सड़क पर होने वाली दौड़ है, जिसका छोटा सा हिस्सा ही स्टेडियम के भीतर होता है. सन 1896 में जब आधुनिक ओलिम्पिक खेल शुरू हुए तब मैराथन दौड़ भी उसका हिस्सा थी. पर उस वक्त इसकी लम्बाई का मानकीकरण नहीं हुआ था. इसकी लम्बाई का निर्धारण सन 1921 में हुआ.

दुनिया में आज 800 से ज्यादा ऐसी मैराथन प्रतियोगिताएं होती हैं, जो किसी न किसी रूप में खेल संघों से सम्बद्ध होती हैं. इन्हें स्वास्थ्य तथा अन्य सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों से भी जोड़ा जाता है. इनमें सैकड़ों और कई बार हजारों शौकिया धावक भी हिस्सा लेते हैं. तमाम लोग इस दौड़ के छोटे से हिस्से को ही पूरा करते हैं. कई जगह हाफ मैराथन भी होती हैं.

आधुनिक युग में मैराथन दौड़ यूनान की एक दंतकथा से प्रेरित है. इसकी कहानी फ़ेडिप्पिडिस नामक यूनानी धावक से जुड़ी है. दंतकथा के अनुसार फ़ेडिप्पिडिस एक हरकारा था, जिसे मैराथन से एथेंस यह घोषित करने के लिए भेजा गया था कि मैराथन के युद्ध में (जिसमें वह खुद भी लड़ रहा था) फारसियों की पराजय हो गई है. यह ई.पू. 490 के अगस्त या सितंबर की घटना है. कहा जाता है कि फ़ेडिप्पिडिस पूरे रास्ते पर बिना रुके दौड़ा और फिर सभा में प्रवेश करके बोला नेनिकेकामेन, ‘हम जीत गए. और फिर वह गिर पड़ा और मर गया.

मैराथन से एथेंस की दौड़ का पहला वृत्तांत प्लूटार्क की एथेंस कीर्ति में मिलता है, जो पहली सदी में लिखी गई थी और हेराक्लाइडस पॉण्टिकस की लुप्त कृति को संदर्भित करते हुए धावक का नाम एर्चियस या यूक्लस का थेर्सिपस बताया गया था. एक और लेखक समोसाता के लूशियन (दूसरी सदी) ने भी इस कथा को लिखा है, पर धावक का नाम फ़ेलिप्पिडिस बताया है, फ़ेडिप्पिडिस नहीं। बहरहाल यह किंवदंती है. इसका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. यूनानी-फ़ारसी युद्धों के प्रमुख स्रोत, यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस, फ़ेडिप्पिडिस को एक हरकारे के रूप में वर्णित करते हैं जो मदद का संदेश लेकर एथेंस से स्पार्टा और वापस गए, एक तरफ से यह दूरी 240 किलोमीटर (150 मील) से भी ज़्यादा है.

भारोत्तोलन की दो तकनीकें

भारोत्तोलन प्रतियोगिता में ताक़त और तकनीक की परीक्षा होती है. इसमें प्रतियोगियों के भार के हिसाब से कई वर्ग बनाए जाते हैं. मुक्केबाज़ी, कुश्ती और जूडो, कराते और भारोत्तोलन जैसी प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों के शरीर का वज़न भी महत्वपूर्ण होता है. इसलिए इनमें खिलाड़ियों को अलग-अलग वज़न के आधार पर वर्गीकृत करते हैं. ऊँचे दर्जे के भारोत्तोलक अपने वज़न से तीन गुना ज़्यादा तक भार उठा लेते हैं.

इन दिनों हो रहे कॉमनवैल्थ खेल में भारत की मीराबाई चानू ने 48 किलो वर्ग में भाग लेते हुए कुल 196 किलोग्राम भार उठाया. यह भार दो बार में अलग-अलग तकनीकों के तहत उठाया गया था. भारोत्तोलन में प्रतियोगी को दो तरह की तकनीकों से भार उठाने के लिए कहा जाता है. पहली तकनीक है स्नैच, जिसमें भार को सीधे एकबारगी सिर के ऊपर तक उठाना होता है. दूसरी तकनीक क्लीन एंड जर्क कहलाती है. इसमें भार को दो चरणों में सिर के ऊपर तक उठाना होता है. सफलतापूर्वक भार उठाने के लिए भारोत्तोलक के हाथ सिर के ऊपर तक जाने चाहिए और शरीर का सीधा रहना जरूरी होता है. हर भारोत्तोलक को भार उठाने के लिए तीन अवसर मिलते हैं.

कहाँ और कब बनी पहली कार?                                            

हालांकि शुरू में भाप से चलने वाली गाड़ियाँ बनी थीं, पर इंटरनल कॉम्बुशन इंजन से चलने वाली पहली कार सन 1870 में ऑस्ट्रिया के वियना शहर में सिग्फ्राइड मार्कस ने तैयार की. वह गैसोलीन से चलती थी. इसे फर्स्ट मार्कस कार कहते हैं. मार्कस ने ही 1888 में सेकंड मार्कस कार तैयार की जिसमें कई तरह के सुधार किए गए थे. इस बीच जर्मनी के मैनहाइम में कार्ल बेंज ने सन 1885 में तैयार की.

नॉटिकल मील क्या होता है?

नॉटिकल मील का इस्तेमाल आमतौर पर समुद्री और हवाई नेवीगेशन में होता है. लम्बाई के हिसाब से यह करीब 1852 मीटर या 6076 फुट होता है. सागर और आकाश के नेवीगेशन में आमतौर पर अक्षांश-देशांतर का इस्तेमाल होता है. भूमध्य रेखा और उससे उत्तर या दक्षिण में इसकी दूरी में मामूली फर्क भी आता रहता है.


Sunday, April 1, 2018

कॉमनवैल्थ खेल क्या हैं?


कॉमनवैल्थ गेम्स हर चार साल में होने वाला अंतरराष्ट्रीय खेल समारोह है जो ओलिम्पिक खेलों के तर्ज़ पर होता है. इसमें भाग लेने देश कॉमनवैल्थ के सदस्य हैं. कॉमनवैल्थ एक अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं जिसके 53 सदस्य हैं. ज्यादातर देश किसी न किसी रूप में ब्रिटिश साम्राज्य के अंग रहे थे. कॉमनवैल्थ का विकास सन 1887 से शुरू हुई कॉलोनियल कांफ्रेंसों से हुआ था, जिनका नाम 1911 से इम्पीरियल कांफ्रेंस हो गया. 1926 की बालफोर घोषणा के बाद इसे ब्रिटिश कॉमनवैल्थ ऑफ नेशंस कहा जाने लगा. 

सन 1891 में रेवरेंड एस्ले कूपर ने द टाइम्स, लंदन में लेख लिखकर सुझाव दिया कि ब्रिटिश साम्राज्य में सौहार्द कायम रखने के लिए हर चार साल में एक अखिल ब्रितानी-आंग्ल समारोह होना चाहिए. इस समारोह के बारे में चर्चा चलती रही और इस सुझाव के बीस साल बाद 1911 में जब जॉर्ज पंचम का राज्याभिषेक हो रहा था, अंतर-साम्राज्य चैम्पियनशिप हुई. इसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और यूके की टीमों ने हिस्सा लिया. इसके बाद इन खेलों को लेकर विचार चलता रहा और अंतत: 1928 में मेल्विल मार्क्स रॉबिनसन नाम के सज्जन को जिम्मेदारी दी गई कि वे इन खेलों का आयोजन करें. 1930 में कनाडा के हैमिल्टन शहर में पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स हुए.

1954 में इन खेलों का नाम ब्रिटिश एम्पायर एंड कॉमनवैल्थ गेम्स रखा गया. 1970 में इनका नाम ब्रिटिश कॉमनवैल्थ गेम्स और 1978 में कॉमनवैल्थ गेम्स हो गया. इन खेलों की खासियत है कि 53 सदस्य देशों की 71 के आसपास टीमें इनमें शामिल होतीं हैं. युनाइटेड किंगडम के चारों गृह देश इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड इनमें शामिल होते हैं. ऑस्ट्रेलिया की टीम के अलावा उसके नोरफॉक आयलैंड की अलग टीम इनमें शामिल होती है. न्यूजीलैंड के अलावा कुक आइलैंड्स और नियू फ्री एसोसिएशन की टीमें अलग से शामिल होती हैं. सन 2010 में दिल्ली में न्यूज़ीलैंड के अधीनस्थ तोकेलू की टीम ने भी हिस्सा लिया. इस तरह अनेक ऐसी टीमें भी इन खेलों में आती हैं, जो पूरी तरह स्वतंत्र देश नहीं हैं.

अब ये खेल कहाँ हो रहे हैं?

इस साल 21 वे कॉमनवैल्थ गेम्स ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड प्रांत के गोल्ड कोस्ट में 4 से 15 अप्रैल तक होंगे. यह पाँचवाँ मौका है, जब ऑस्ट्रेलिया में ये खेल हो रहे हैं. सन 2010 में दिल्ली में 19वें गेम्स हुए. उसके बाद 2014 में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 20वें खेल हुए. गोल्ड कोस्ट के बाद 2022 के खेल इंग्लैंड के बर्मिंघम में होंगे. एशिया के दो देशों में ये खेल हो चुके हैं. सन 2010 में दिल्ली के पहले 1998 में क्वालालम्पुर में ये खेल हुए थे.

गोल्ड कोस्ट शहर की क्या खासियत है?

गोल्ड कोस्ट ऑस्ट्रेलिया के अपेक्षाकृत नए शहरों में एक है. यह ब्रिसबेन से करीब 66 किलोमीटर दूर है. सन 2016 की जनगणना में इस शहर की आबादी 6,38,090 थी. यह ऑस्ट्रेलिया का छठा सबसे बड़ा शहर है. शुरू में इस इलाके में रहने के लिए युरोपियन लोग नहीं आए थे. सन 1823 में जॉन ओक्सले नामक एक अंग्रेज मरमेड बीच पर आए. यहाँ के लाल देवदार ने लोगों का ध्यान खींचा. सन 1875 में साउथ पोर्ट का सर्वे हुआ और यह छुट्टियाँ बिताने की जगह के रूप में विकसित होने लगा. आज यह पर्यटकों का शहर है. यहाँ के बीच पर सर्फिंग का आनंद लोग लेते हैं. देश के मनोरंजन उद्योग ने यहाँ अड्डा जमाया है. अब फिल्म और म्यूजिक उद्योग के लिए इस शहर को जाना जाता है.

चुनाव पांच साल बाद ही क्यों होते हैं?

हमारे संविधान के अनुच्छेद 63(2) के अनुसार लोकसभा का कार्यकाल पाँच वर्ष है। इसलिए चुनाव पाँच साल में होते हैं। विधानसभाओं के साथ भी ऐसा ही है। लोकसभा पाँच साल के पहले भी भंग की जा सकती है और आपत् काल में उसका कार्यकाल बढ़ाया भी जा सकता है। राज्यसभा में एक सदस्य का कार्यकाल छह साल होता है, पर चुनाव हर दो साल में होते हैं।






Saturday, March 31, 2018

वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से क्यों शुरू होता है?

ऐसा ब्रिटिश परम्परा के कारण है. ईस्ट इंडिया कम्पनी से ब्रिटिश सरकार को भारत की सत्ता हस्तांतरण होने के बाद 1860 में पहली बार बजट प्रणाली प्रारम्भ की गई. 1867 में 1 अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधि का पहला बजट प्रस्तुत किया गया. इंग्लैंड में इसे 1 जनवरी से 31 दिसंबर तक इसलिए नहीं रखा जाता, क्योंकि साल के अंत में क्रिसमस के त्योहार की वजह से लोग व्यस्त रहते हैं. उस वक्त आर्थिक हिसाब-किताब के लिए समय नहीं होता, क्योंकि सर्दी की छुट्टियाँ होती हैं.
दुनिया के सभी देशों में वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू नहीं होता. अमेरिका का वित्तीय वर्ष पहली अक्तूबर से 30 सितंबर तक होता है, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मिस्र, पाकिस्तान में यह पहली जुलाई को शुरू होकर 30 जून तक रहता है. चीन, ब्राजील, जर्मनी, नीदरलैंड, दक्षिण कोरिया, पुर्तगाल, रूस, स्पेन, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, ताइवान एवं अन्य 60 देशों में 1 जनवरी  से 31 दिसम्बर तक अर्थात् कैलेंडर वर्ष को वित्त वर्ष भी माना जाता है.
संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, आईएमएफ एवं विश्व के बड़े वित्तीय संस्थान कैलेंडर वर्ष को अपने वित्त वर्ष के रूप में अपनाते हैं. भारत में भी 1 जनवरी से 31 दिसम्बर तक के कैलेंडर वर्ष को वित्त वर्ष में अपनाने के लिए समय-समय पर सुझाव दिए जाते रहे हैं किन्तु अभी तक वित्त वर्ष की तारीखों में बदलाव नहीं आ पाया. हाल में भारत में नए वित्त वर्ष की जरूरत और बदलाव की संभावनाओं पर विचार के लिए भारत सरकार ने पूर्व आर्थिक सलाहकार डॉ. शंकर आचार्य की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय समिति ने भी वित्त वर्ष 1 जनवरी से रखने का सुझाव दिया है. दिसम्बर 2016 में इस समिति ने वित्त मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी.  
समिति ने नीति आयोग का समर्थन करते हुए कहा है कि मॉनसून और फसली मौसम के हिसाब से यह कदम अनुकूल रहेगा. समिति ने शेयर बाजार द्वारा अपनाए जाने वाले संवत कैलेंडर, जुलाई से शुरू होने वाले फसली चक्र के कैलेंडर पर भी गौर किया, लेकिन जनवरी से दिसंबर के कैलेंडर को उपयुक्त माना. हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था खेती से भी प्रभावित होती है. मॉनसून की अनियमितता का असर अर्थ-व्यवस्था पर पड़ता है. कुछ अर्थशास्त्रियों ने जुलाई से जून के वित्त वर्ष की सलाह भी दी. भारत सरकार ने 1984 में डॉ. एलके झा की अध्यक्षता में वित्त वर्ष में बदलाव के लिए समिति का गठन किया था. उस समिति ने जनवरी से दिसम्बर को वित्त वर्ष अपनाने का सुझाव दिया था. पर सरकार ने बदलाव करना ठीक नहीं समझा. 
साउंडप्रूफ प्रणाली क्या है?
साउंडप्रूफिंग से तात्पर्य है आवाज़ के दबाव को संतुलित करना. इसके कई अर्थ हो सकते हैं. एक अर्थ है कमरे से आवाज़ बाहर न जाने देना. दूसरा अर्थ है बाहर की आवाज़ अन्दर न आने देना. तीसरा अर्थ है कमरे में अनुगूँज या ईको को रोकना. चौथा अर्थ है कि आवाज़ की सभी आवृत्तियों की अनुमति देना और निरर्थक आवाज़ों को रद्द करना या जज़्ब करना. आमतौर पर दीवारों पर एकाउस्टिक बोर्ड और फोम लगाकर ध्वनि को बेहतर बनाया जाता है. ज़रूरत के अनुसार एकाउस्टिक ट्रांसमिशन, रिसेप्शन, माइक्रोफोन, स्पीकर आदि का इस्तेमाल होता है. अब ऐसे कम्प्यूटर बेस सिस्टम आते हैं, जो ध्वनि का तत्काल विश्लेषण करके निरर्थक ध्वनियों को रद्द कर देते हैं.
तितली की कितनी आँखें होती हैं?
तितली की भी दो आँखें होती हैं, पर उसकी आँखें कम्पाउंड यानी संयुक्त होती हैं. उसके अनेक फोटोरिसेप्टर होते हैं. इस तरह देखें तो उसके हजारों आँखें होती हैं. मोटे तौर पर करीब बारह से बीस हजार आँखें. तितलियाँ देख तो सकती हैं लेकिन उनकी यह क्षमता सीमित होती है. इनकी आँखें बड़ी और गोलाकार होती हैं. इनमें हज़ारों सैंसर होते हैं जो अलग- अलग कोण में लगे रहते हैं. तितलियां ऊपर, नीचे, आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ सभी दिशाओं में एक साथ देख सकती हैं. इसका यह नुक़सान भी होता है कि वे किसी चीज़ पर अपनी दृष्टि एकाग्र नहीं कर पातीं और उन्हें धुंधला सा दिखाई देता है. पर वे किसी भी प्रकार की गति को भाँप जाती हैं. इसीलिए जब कोई उन्हें पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाता है तो उन्हें फौरन पता चल जाता है और वे उड़ जाती हैं.
भारत में कुल कितने गाँव हैं?
सन 2011 की जनगणना के अनुसार देश में गाँवों की संख्या 6,40,867  है. 2001 की जनगणना में यह संख्या 6,38,588 थी.
http://epaper.prabhatkhabar.com/1605606/Awsar/Awsar#page/6/1

Monday, March 26, 2018

अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस क्या है?


हाल में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा के दौरान जब अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का पहला सम्मेलन हुआ, तब दुनिया का ध्यान इस नए उदीयमान संगठन की ओर गया, जो ऊर्जा की वैश्विक जरूरतों के लिए एक नया संदेश लेकर आया है. नवम्बर 2015 में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लंदन के वैम्ब्ले स्टेडियम में इस अवधारणा को प्रकट किया था और सौर-ऊर्जा के लिहाज से धनी देशों को सूर्यपुत्र कहा था. इसके बाद इस गठबंधन की शुरुआत 30 नवम्बर 2015 को पेरिस में हुई थी. यह गठबंधन कर्क और मकर रेखा पर स्थित देशों को नई ऊर्जा के विकल्प लेकर आया है. इस इलाके में सौर ऊर्जा इफरात से मिलती है.

इस संगठन का उद्देश्य है, इन देशों के बीच सहयोग बढ़ाना. इसका सचिवालय दिल्ली के करीब गुरुग्राम में बनाया गया है. इसके भवन की आधारशिला 25 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने रखी. सन 2016 के मराकेश जलवायु सम्मेलन में इस संधि का प्रारूप पेश किया गया था. पहले दिन इसपर 15 देशों ने दस्तखत किए. अब चीन और अमेरिका भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं. दोनों ने अभी इससे जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन दोनों ही जल्द इससे जुड़ सकते हैं. चीन और अमेरिका के साथ आने से फायदा होगा, क्योंकि दोनों के पास इससे जुड़ी पर्याप्त तकनीक है.

इस समझौते के तहत उष्णकटिबंधीय देशों में सोलर पावर के इस्तेमाल को बढ़ाया दिया जाएगा. फिलहाल 62 देशों ने इसके शुरुआती ढांचे पर रजामंदी जताते हुए दस्तखत किए हैं. भारत ने लक्ष्य रखा है कि वह 2022 तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा का उत्पादन करने लगेगा. इसमें 100 गीगावॉट सोलर और 75 गीगावॉट पवन ऊर्जा होगी. भारत दुनिया में सौर ऊर्जा का वरण करने वाले देशों में बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है. इस साल फरवरी में देश की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता 20 गीगावॉट की थी. सन 2014 में यह क्षमता 2.6 गीगावॉट थी. जो 20 गीगावॉट क्षमता हासिल की गई है, वह 2022 तक पाने का हमारा लक्ष्य था.

प्रशंसक के अर्थ में फैन शब्द कैसे बना?

दो साल पहले फिल्म 'फैन' के नायक थे शाहरुख खान. व्यक्तिगत बातचीत में कहीं शाहरुख ने कहा, फैन शब्द मुझे पसंद नहीं. उनका कहना था, फैन शब्द फैनेटिक (उन्मादी) से निकला है. यह कई बार नकारात्मक भी होता है. आप ने अक्सर लोगों को यह कहते सुना होगा कि मैं अमिताभ का फैन हूँ या सचिन तेंदुलकर, रेखा या विराट कोहली का फैन हूँ. कुछ लोग मज़ाक में कहते हैं कि मैं आपका पंखा हूँ, क्योंकि फैन का सर्वाधिक प्रचलित अर्थ पंखा ही है.

फैन का अर्थ उत्साही समर्थक या बहुत बड़ा प्रशंसक भी होता है, पर इसका यह अर्थ हमेशा से नहीं था. इसका जन्म अमेरिका में बेसबॉल के मैदान में हुआ. इसका पहली बार इस्तेमाल किया टेड सुलीवॉन ने, जो सेंट लुईस ब्राउन्ज़ बेसबॉल टीम के मैनेजर थे. सन 1887 में फिलाडेल्फ़िया की एक खेल पत्रिका ‘स्पोर्टिंग लाइफ़’ में इस शब्द के बारे में जानकारी दी गई. इसमें बताया गया कि फैन शब्द ‘फैनेटिक’ का संक्षिप्त रूप है.

टेड सुलीवॉन ने बताया,मैं टीम के मालिक क्रिस से बात कर रहा था. क्रिस के निदेशक मंडल में बेसबॉल के दीवाने भी थे जो मेरे कामों में हमेशा दखल देते रहते और क्रिस को यह बताते रहते कि टीम को कैसे चलना चाहिए. मैंने क्रिस से कहा कि मुझे इतने सारे फैनेटिक्स की सलाह की ज़रूरत नहीं है. इसी बातचीत में संक्षेप में फैन्ज़ शब्द बन गया. मैंने कहा कि क्रिस यहां बहुत सारे फैन्ज़ हैं. बाद में अखबारों में यह शब्द चल निकला. 

पहले यह शब्द अमेरिकी खेल प्रेमियों के लिए ही प्रयोग होता रहा, लेकिन बाद में यह दूसरे खेलों और फिर जीवन के सभी क्षेत्रों में छा गया. इस शब्द से फैनडम शब्द बना. फिर फैन मेल, फैन लेटर और फैन क्लब तक बन गए.

रोबोट शब्द कब बना?

रोबोट शब्द चेकोस्लोवाकिया के नाट्य लेखक कारेल चापेक ने 1921 में गढ़ा. उन्होंने एक नाटक लिखा आरयूआर यानी कि रोज़म्स युनीवर्सल रोबोट्स. इस वैज्ञानिक फैंटेसी में मशीनी सेवक हैं, जो मनुष्यों के लिए काम करते हैं. चेक भाषा में रोबोटा का मतलब होता है श्रमिक. इससे बना रोबोट शब्द. पर यहाँ से रोबोट की अवधारणा का जन्म नहीं हुआ. यदि हम मनुष्यों की तरह काम करने वाली मशीन की अवधारणा का इतिहास खोजें तो पाएंगे कि इससे पहले ऑटोमेटा की अवधारणा ने जन्म ले लिया था. ऑटोमेटा सन1700 के आसपास बनाए गए खिलौने थे, जो घड़ीसाज़ी में काम आने वाली मशीनरी के सहारे चलते थे. इतने चलते-फिरते पुतले कह सकते हैं. पिछले चार दशकों में कम्प्यूटर और कृत्रिम मेधा (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) के विकास के साथ रोबोट का मतलब काफी बदल गया है. 

पूरी दुनिया में कुल कितनी भाषाएं हैं?

पूरी दुनिया में अनुमान है कि भाषाओं की संख्या तीन से आठ हजार के बीच है. वस्तुतः यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप भाषा को किस तरह से परिभाषित करते हैं. अलबत्ता दुनिया की भाषाओं के एथनोलॉग कैटलॉग के अनुसार दुनिया में इस वक्त 6909 जीवित भाषाएं हैं. इनमें से केवल 6 फीसदी भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या दस लाख या ज्यादा है. एथनोलॉग कैटलॉग के बारे में जानकारी यहाँ मिल सकती है https://www.ethnologue.com/statistics/size.

Sunday, March 25, 2018

‘रोबोट’ शब्द कब बना?

रोबोट शब्द चेकोस्लोवाकिया के नाट्य लेखक कारेल चापेक ने गढ़ा। उन्होंने 1921 में एक नाटक लिखा आरयूआर यानी कि रोज़म्स युनीवर्सल रोबोट्स। इस वैज्ञानिक फैंटेसी में मशीनी सेवक हैं, जो मनुष्यों के लिए काम करते हैं। चेक भाषा में रोबोटा का मतलब होता है श्रमिक। इससे बना रोबोट शब्द। पर यहाँ से रोबोट की अवधारणा का जन्म नहीं हुआ। यदि हम मनुष्यों की तरह काम करने वाली मशीन की अवधारणा का इतिहास खोजें तो पाएंगे कि इससे पहले ऑटोमेटा की अवधारणा ने जन्म ले लिया था। ऑटोमेटा सन1700 के आसपास बनाए गए खिलौने थे, जो घड़ीसाज़ी में काम आने वाली मशीनरी के सहारे चलते थे। इतने चलते-फिरते पुतले कह सकते हैं। पिछले चार दशकों में कम्प्यूटर और कृत्रिम मेधा (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) के विकास के साथ रोबोट का मतलब काफी बदल गया है। 
वीडियोबॉम्बिंग किसे कहते हैं?
यह शब्द टीवी पत्रकारिता के विकास के साथ एक नई तरह की संस्कृति को व्यक्त करता है। अक्सर टीवी पत्रकार किसी विशिष्ट व्यक्ति से कैमरा पर बात करते हैं तो आसपास लोग जमा हो जाते हैं और कैमरा में अपनी शक्ल दिखाने की कोशिश करते हैं। कोशिश ही नहीं हाथों से इशारे वगैरह भी करते हैं, ताकि उनकी तरफ ध्यान जाए। किसी बड़े खिलाड़ी, नेता, अभिनेता या सेलिब्रिटी के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश करना वीडियोबॉम्बिंग है। हाल के वर्षों में खेल के जीवंत प्रसारण के साथ ऐसे दर्शकों की तस्वीरें भी दिखाई जाने लगी है, जो अपने पहनावे, रंगत या हरकतों की वजह से अलग पहचाने जाते हैं। भारतीय क्रिकेट टीम के साथ कुछ दर्शक दुनियाभर की यात्रा करते हैं और हरेक मैच में नजर आते हैं। अमेरिका के रॉलेन फ्रेडरिक स्टीवर्ट ने सत्तर के दशक में अमेरिकी खेल के मैदानों में इंद्रधनुषी रंगों के एफ्रो-स्टाइल विग पहनकर इसकी शुरुआत की थी, जिसके कारण उन्हें ‘रेनबो मैन’ कहा जाता था।
फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स
दुनिया में मनी लाउंडरिंग रोकने के लिए ग्रुप-7 की पहल है जिसे उसके संक्षेप नाम FATF से पहचाना जाता है। सन 1989 में शुरू हुए इस अंतर-शासन संगठन के जिम्मे सन 2001 में आतंकवादी संगठनों को मिल रही वित्तीय मदद पर रोक लगाने का काम भी आ गया। यह संगठन दुनिया के देशों पर नजर रखता है कि वे इस दिशा में क्या कर रहे हैं। इन दिनों यहाँ पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डालने पर विचार किया जा रहा है। इस संगठन का सचिवालय पेरिस में है। इस संगठन में सन 1989 में 16 सदस्य थे, जो सन 2016 तक बढ़कर 37 हो गए। भारत भी इसका सदस्य है।
नीम कड़वा क्यों होता है?
नीम के तीन कड़वे तत्वों को वैज्ञानिकों ने अलग किया है, जिन्हें निम्बिन, निम्बिडिन और निम्बिनिन नाम दिए हैं। सबसे पहले 1942 में भारतीय वैज्ञानिक सलीमुज़्ज़मा सिद्दीकी ने यह काम किया। वे बाद में पाकिस्तान चले गए थे। यह कड़वा तत्व ही एंटी बैक्टीरियल, एंटी वायरल होता है और कई तरह के जहरों को ठीक करने का काम करता है।
ख़ाकी माने क्या?
ख़ाकी शब्द फारसी के ख़ाक से बना है। यानी मिट्टी का। मटमैला रंग, भूरा, मिट्टी से संबंधित, मृण्मय। इसके अलावा बिना सींची हुई भूमि। मुहावरे के रूप में इसका इस्तेमाल होता है खाकी अंडा। यानी ऐसा अंडा, जो भीतर से बिगड़ गया हो और जिसमें से बच्चा न निकले, बयंडा, गंदा अंडा। भारत में अंग्रेज सेना ने घुड़सवार दस्तों की वर्दी के रूप में ख़ाकी रंग को चुना, क्योंकि यह रंग दूर से जमीन के रंग से मिलता था। उन्नीसवीं सदी में यह शब्द अंग्रेजी के शब्दकोशों में भी शामिल हो गया। एक प्रकार के वैष्णव साधुओं को भी ख़ाकी कहते हैं, जो तमाम शरीर में राख लगाया करते हैं। मुसलमान फकीरों का एक संप्रदाय, जो ख़ाकी शाह का अनुयायी है।