Tuesday, June 2, 2020

What is Antifa?

Antifa, short for anti-fascists, is not a concrete group, rather an amorphous movement. Some in US media believe that it has an organised international background. Few observers term it a terrorist organisation, though terrorism itself is a vague term. Anti-fascists of the movement tend to be grouped on the leftward fringes of the US political spectrum, many describing themselves as socialists, anarchists, communists or anti-capitalists.

While an anti-fascist movement can be traced back to Germany and Italy before the second world war, the first US group to use the word "Antifa" in its branding was the Rose City Antifa (RCA) founded in 2007 in Portland, Oregon, though many groups have held anti-fascist ideology in the US for decades without using the branding.

RCA and other groups like it made it their goal to disrupt - violently if necessary - meetings and organisational efforts of white supremacists and their ilk.

One such effort, in 2012, saw Antifa adherents brandishing hammers, baseball bats and police batons storm a Chicago-area restaurant and assault members of the white supremacist Illinois European Heritage Association gathered there. Five of the attackers received prison sentences for their roles in the melee.

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भारत का पहला विश्वविद्यालय कहाँ स्थापित हुआ?



प्राचीन भारत के तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय दुनिया के प्राचीनतम विश्वविद्यालय हैं। पर आधुनिक विश्वविद्यालयों के अर्थ में भारत का पहला विश्वविद्यालय कोलकाता में स्थापित हुआ था। इसकी स्थापना 24 जनवरी 1857 को हुई। उसी साल मद्रास और मुम्बई की प्रेसीडेंसियों में भी विश्वविद्यालय खुले थे। कोलकाता विश्वविद्यालय से जुड़े चार विद्वानों को नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं। इनके नाम हैं-रोनाल्ड रॉस, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, सीवी रामन और अमर्त्य सेन। इनमें रोनाल्ड रॉस के नाम से काफी लोग अपरिचित होंगे। उत्तरांचल के अल्मोड़ा शहर में जन्मे रोनाल्ड रॉस डॉक्टर थे और कोलकाता में उन्होंने मलेरिया रोग पर काम किया था। इसी काम के आधार पर उन्हें 1902 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला। नोबेल पुरस्कारों का वह दूसरा वर्ष था। कोलकाता विश्वविद्यालय के पहले स्नातकों में जदुनाथ बोस और बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय थे।   

ड्रैगन क्या वास्तव में होते हैं?
ड्रैगन काल्पनिक प्राणी है। ज्यादातर सभी प्राचीन सभ्यताओं में ड्रैगन जैसे विशाल सर्प, अजगर या डायनोसॉर जैसे प्राणी की परिकल्पना मिलती है। ड्रैगन शब्द लैटिन के ड्रैको से बना है। साँप, अजगर जैसे चकत्तेदार खाल वाले, मगरमच्छ और घोड़े जैसे मुख और छिपकली जैसे पैर वाले प्राणी की परिकल्पना यूरोप के अलावा चीनी, जापानी, फारसी और संस्कृत साहित्य में भी मिलती है। यूरोप के ड्रैगन के शरीर में चमगादड़ जैसे डैने भी होते हैं। इधर डायनोसॉर जैसे शरीर वाले ड्रैगनों की तस्वीरों और खिलौनों की बाढ़ आई है। कुछ वास्तविकताओं और कुछ कल्पनाशीलता से बना ड्रैगन सम्भवतः: दुनिया का सबसे लोकप्रिय पात्र है।

Saturday, May 23, 2020

डिग्री एवं डिप्लोमा में अंतर क्या होता है?


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भारत में सामान्यतः एक शैक्षिक कार्यक्रम को सभी परीक्षणों के बाद सफलता के साथ पूरा करने के बाद दिया गया प्रमाणपत्र डिग्री है। आमतौर पर स्नातक स्तर या उससे ऊपर की उपाधि विश्वविद्यालय देते हैं। उससे नीचे के कोर्स विभिन्न संस्थाएं देती हैं। विश्वविद्यालयों के अलावा कुछ दूसरे मान्यता प्राप्त संगठन भी शैक्षिक प्रमाणपत्र देते हैं। इन्हें डिप्लोमा कहते हैं। इसका अर्थ भी शैक्षिक कार्यक्रम को पूरा करने के बाद दिया गया प्रमाणपत्र है। इनका स्तर भी स्नातक या स्नातकोत्तर हो सकता है। पर यदि उनका गठन विश्वविद्यालय के रूप में नहीं है तो वे डिप्लोमा देते हैं।

छातों का रंग काला क्यों होता है?

यह कहना पूरी तरह सही नहीं है, क्योंकि आजकल तो कई तरह के रंगों के छाते आने लगे हैं। अलबत्ता आम इस्तेमाल में आने वाले छाते ज्यादातर काले होते हैं। काला रंग ज्यादा गर्मी को सोखता है, इसलिए भारत जैसे देशों में छातों का रंग सफेद, आसमानी या की हल्का रंग होना चाहिए। भारत में आधुनिक किस्म के छातों का इस्तेमाल अंग्रेजी राज में शुरू हुआ था। अंग्रेजों के परिधान में काला रंग प्रमुखता रखता है। खासतौर से सूट के साथ काला रंग मेल खाता है। यों वहाँ छाता केवल धूप से बचाने के लिए ही नहीं वर्षा और हिमपात से बचाने का काम भी करता है। गर्मी में काला छाता धूप की चमक को भी कम करता है। जिन इलाकों में बर्फ गिरती है वहाँ धूप की चमक भी ज्यादा होती है। इसके अलावा वह जल्द गंदा नजर नहीं आता। इन सब बातों के बावजूद काले के अलावा दूसरे रंग के छातों का चलन बढ़ रहा है। 

Thursday, May 7, 2020

क्यूआर कोड क्या है?


क्यूआर का मतलब है क्विक रेस्पांस या क्विकली रीड कोड। इसे पढ़ने के लिए क्यूआर कोड रीडर और स्मार्टफोन से पढ़ा जा सकता है। फोन के अलग-अलग ओएस के प्लेटफॉर्मों के लिए विभिन्न एप्लीकेशन स्टोर में कई मुफ्त क्यूआर कोड रीडर मिलते हैं। क्यूआर कोड में ब्लैक एंड ह्वाइट पैटर्न के छोटे-छोटे वर्ग होते हैं। इन्हें आप कई जगह देखते है, जैसे कि उत्पादों पर, मैगज़ीन किताबों और अखबारों में। इस कोड को टेक्स्ट, ईमेल, वैबसाइट, फोन नंबर और अन्य से सीधे लिंक किया जाता है। जब आप किसी उत्पाद पर छपे क्यूआर कोड को स्कैन करते है, तब आप इंटरनेट की मदद से सीधे उस साइट पर जा सकते है, जहाँ पर उसके बारे में ज्यादा जानकारी होती है। क्यूआर कोड को 1994 में टयोटा समूह में एक जापानी सहायक, डेन्सो वेव ने बनाया था। तब इसका उद्देश्य था किसी वाहन के निर्माण के दौरान उसे ट्रैक करना। 

सनातन धर्म क्या है?


सनातन धर्म अपने मूल रूप हिन्दू धर्म का नाम है। वैदिक काल में भारतीय भूखंड के धर्म के लिए 'सनातन धर्म' नाम मिलता है। 'सनातन' का अर्थ है-शाश्वत या 'हमेशा बना रहने वाला'। जिसका न आदि है न अन्त। यह मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में वृहत्तर भारत में व्याप्त था। सिन्धु नदी को यूनानियों ने इंडस कहा जिसके आधार पर हमारे देश को यूरोप ने इंडिया नाम दिया। अरबी फारसी में स का उच्चारण ह की तरह करने पर सिन्धु नदी पार के लोगों को हिन्दू और स्थान को हिन्दुस्तान कहा गया। भारत के अपने पुराने साहित्य में हिन्दू शब्द नहीं मिलता।


Sunday, April 19, 2020

गज़ल और नज्म में क्या फर्क है?


ham se puuchho ki Gazal kyaa hai Gazal kaa fan kyaa - Sherनज़्म मोटे तौर पर कविता या पद्य है। उर्दू में गज़ल का एक खास अर्थ है, इसलिए नज़्म माने गज़ल से इतर पद्य है, जो तुकांत भी हो सकता है अतुकांत भी। छंदेतर नज़्म को आज़ाद नज़्म कहते हैं। गज़ल एक ही बहर और वज़न के शेरों का समूह है। एक गज़ल में पाँच या पाँच से ज़्यादा शेर हो सकते हैं।  गज़ल अरबी काव्यशास्त्र की एक शैली है। यह शैली अरबी से फारसी में आई। वहाँ से उर्दू में आई। अब तो दूसरी भारतीय भाषाओं में गज़लें लिखी जाने लगीं हैं। गज़ल का प्रत्येक शेर अपने अर्थ और भाव की दृष्टि से पूर्ण होता है। हरेक शेर में समान विस्तार की दो पंक्तियाँ या टुकडे़ होते हैं, जिन्हें मिसरा कहा जाता है। प्रत्येक शेर के अंत का शब्द प्राय: एक सा होता है और रदीफ कहलाता है। तुक व्यक्त करने वाला शब्द काफिया कहलाता है। 

गज़ल के पहले शेर को मत्ला कहते हैं। गज़ल के आखिरी शेर को जिसमें शायर का नाम या उपनाम आता है उसे मक्ता कहते हैं।  नीचे लिखी गज़ल के मार्फत हम कुछ बातें समझ सकते हैं:-

कोई उम्मीद बर नहीं आती। कोई सूरत नज़र नहीं आती।1।
मौत का एक दिन मुअय्यन है। नींद क्यों रात भर नहीं आती।2।
पहले आती थी हाले दिल पे हँसी। अब किसी बात पर नहीं आती।3।
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी। कुछ हमारी खबर नहीं आती।4।
काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब। शर्म तुमको म़गर नहीं आती।5।

इस गज़ल का काफिया बर, नज़र, भर, खबर, म़गर हैं। रदी़फ है नहीं आती। सबसे आखिरी शेर गज़ल का मक्ता है क्योंकि इसमें त़खल्लुस है। शेर की पंक्तियों की लम्बाई के अनुसार गज़ल की बहर नापी जाती है। इसे वज़न या मीटर भी कहते हैं। हर गज़ल उन्नीस प्रचलित बहरों में से किसी एक पर आधारित होती है। तुकांत गज़लें दो प्रकार की होती हैं। मुअद्दस, जिनके शेरों में रदीफ और काफिया दोनों का ध्यान रखा जाता है। मुकफ्फा, जिनमें केवल काफिया का ध्यान रखा जाता है। 

उत्तर भारत में सबसे पहले ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने गज़ल की रचना की। दक्षिण में बीजापुर के बादशाह इब्राहीम अली आदिलशाह ने गज़लें लिखीं। सबसे ज्यादा लोकप्रियता मुहम्मद कुली कुतुबशाह को मिली। हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने गज़ल लिखने का प्रयास किया। प्रसाद की कविता भूल गज़ल शैली में लिखी गई है। 
गज़ल का मूल विषय प्रेमालाप है। इसमें लौकिक प्रेम के साथ तसव्वुफ यानी भक्ति परक रचनाएं भी होतीं हैं। इनमें प्रेयसी के लिए हमेशा पुल्लिंग का प्रयोग किया जाता है।

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