Monday, July 16, 2018

मॉनसून सत्र

इससे आशय भारतीय संसद के मॉनसून सत्र से है. आमतौर पर हर साल हमारी संसद के तीन सत्र होते हैं. बजट (फरवरी-मई), मॉनसून (जुलाई-अगस्त) और शीतकालीन (नवंबर-दिसंबर). इस साल मॉनसून सत्र 18 जुलाई से 10 अगस्त तक चलेगा. इसबार मॉनसून सत्र के दौरान ही राज्यसभा के नए उप-सभापति का चुनाव होना है. पिछले उप-सभापति पीजे कुरियन का कार्यकाल 1 जुलाई को समाप्त हो गया.

संसद के दोनों सदनों की बैठक राष्ट्रपति आमंत्रित करते हैं. हरेक अधिवेशन की अंतिम तिथि के बाद छह मास के भीतर आगामी अधिवेशन के लिए सदनों को बैठक के लिए आमंत्रित करना होता है. सदनों को बैठक के लिए आमंत्रित करने की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, पर व्यवहार में इस आशय के प्रस्‍ताव की पहल सरकार द्वारा की जाती है. इन तीन के अलावा संसद के विशेष सत्र भी बुलाए जा सकते हैं.

संसद भवन
भारत का संसद भवन नई दिल्ली में स्थित है. सन 1911 में घोषणा की गई कि भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाई जाएगी.मशहूर ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लैंडसीयर लुट्यन्स ने दिल्ली की ज्यादातर नई इमारतों की रूपरेखा तैयार की थी. इसके लिए उन्होंने सर हरबर्ट बेकर की मदद ली. संसद भवन की इमारत 1927 में तैयार हुई. इसे बनने में छह वर्ष लगे थे. इसकी आधारशिला 12 फ़रवरी, 1921 को ड्यूक ऑफ कनॉट ने रखी थी.18 जनवरी 1927 को तत्कालीन वायसरॉय और गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया.

यह गोलाकार इमारत 560 फुट (170 मीटर) व्यास यानी कि लगभग 6 एकड़ क्षेत्र पर बनी है. इसके निर्माण पर 83 लाख रुपये की लागत आई. भवन का केन्द्रीय तथा प्रमुख भाग उसका विशाल वृत्ताकार केन्द्रीय कक्ष है. इसके तीन ओर लोक सभा, राज्य सभा और पूर्ववर्ती ग्रंथालय कक्ष (जिसे पहले प्रिंसेस चैम्बर कहा जाता था) हैं. इन तीनों कक्षों के चारों ओर चार मंजिला वृत्ताकार भवन है, जिसमें मंत्रियों, संसदीय समितियों, राजनीतिक दलों, लोक सभा तथा राज्य सभा सचिवालयोंऔर संसदीय कार्य मंत्रालय के दफ्तर हैं.

संसदीय विशेषाधिकार

संसद के दोनों सदनों, उनके सदस्यों और समितियों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्‍त है.इन्हें इसलिए दिया गया है ताकि वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें. सबसे महत्‍वपूर्ण विशेषाधिकार है सदन और समितियों में स्वतंत्रता के साथ विचार रखने की छूट.सदस्य द्वारा कही गई किसी बात के संबंध में उसके विरूद्ध किसी न्यायालय में कार्रवाई कार्यवाही नहीं की जा सकती.कोईसदस्य उस समय गिरफ्तार नहीं किया जा सकता जबकि उस सदन या समिति की बैठक चल रही हो, जिसका वह सदस्य है. अधिवेशन से 40 दिन पहले और उसकी समाप्ति से 40 दिन बाद भी उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता.

संसद परिसर में केवल अध्‍यक्ष/सभापति के आदेशों का पालन होता है. विशेषाधिकार भंग करने या सदन की अवमानना करने वाले को भर्त्सना, ताड़ना या निर्धारित अवधि के लिए कारावास की सज़ा दी जा सकती है. सदस्यों के मामले में सदन अन्य दो प्रकार के दंड दे सकता है. सदन की सदस्यता से निलंबन या बर्खास्तगी. दांडिक क्षेत्र सदनों तक और उनके सामने किए गए अपराधों तक ही सीमित न होकर सदन की सभी अवमाननाओं पर लागू होता है.

Sunday, July 15, 2018

हॉकी चैम्पियंस ट्रॉफी


पिछले रविवार (1 जुलाई 2018) को पुरुषों की हॉकी चैम्पियंस ट्रॉफी प्रतियोगिता का फाइनल मैच खेला गया. इस साल के बाद यह प्रतियोगिता समाप्त की जा रही है. सन 2019 से इसके स्थान पर अंतरराष्ट्रीय हॉकी संघ की हॉकी प्रो-लीग प्रतियोगिता शुरू होगी. चैम्पियंस ट्रॉफी की शुरुआत सन 1978 में हुई थी. इस प्रतियोगिता में शामिल सभी टीमें एक राउंड रॉबिन लीग में एक-दूसरे से खेलती थीं. सबसे ज्यादा अंक अर्जित करने वाली दो टीमों के बीच फाइनल मैच होता था. सन 1987 में पुरुषों की इस प्रतियोगिता के तर्ज पर महिलाओं की द्विवार्षिक प्रतियोगिता भी शुरु हुई. पुरुषों की प्रतियोगिता शुरू में सालाना होती थी, पर 2014 से वह भी द्विवार्षिक हो गई थी.

पुरुष प्रतियोगिता में सबसे पहले साल पाँच टीमों ने भाग लिया. दूसरे साल इन टीमों की संख्या सात हो गई. इसके बाद 2010 तक इसमें छह टीमें भाग लेती थीं. सन 2011 से 2018 तक इसमें छह टीमों ने हिस्सा लिया.

दिन और रात बराबर

इसे हिंदी में विषुव और अंग्रेज़ी में इक्विनॉक्स (Equinox)कहते हैं. यानी ऐसा समय-बिंदु, जिसमें दिन और रात लगभग बराबर होते हैं. किसी इलाके में दिन और रात की लंबाई पर असर डालने वाली कई बातें होतीं हैं. धरती अपनी धुरी पर २३½° झुककर सूर्य के चक्कर लगाती है, इस प्रकार वर्ष में एक बार पृथ्वी इस स्थिति में होती है, जब वह सूर्य की ओर झुकी रहती है, व एक बार सूर्य से दूसरी ओर झुकी रहती है. इसी प्रकार वर्ष में दो बार ऐसी स्थिति भी आती है, जब पृथ्वी का झुकाव न सूर्य की ओर ही होता है, और न ही सूर्य से दूसरी ओर, बल्कि बीच में होता है. इसे इक्विनॉक्स कहा जाता है. इन दोनों तिथियों पर दिन और रात की बराबर लंबाई लगभग बराबर होती है. ऐसा भूमध्य रेखा पर होगा. आजकल ऐसा 20/21 मार्च और 22/23 सितम्बर को होता है. पर यह भी अलग-अलग अक्षांश यानी लैटीट्यूड पर अलग-अलग दिन होता है.

समुद्री पानी खारा क्यों?

जब धरती नई-नई बनी थी, तब इसके वातावरण में कई प्रकार की गैसें थीं, जो ज्वालामुखियों की आग और धुएं से निकली थीं. ये गैसें धीरे-धीरे समुद्र के पानी में घुलीं. दूसरे जमीन पर बारिश का पानी जब नदियों के रास्ते समुद्र तक आता है, जो मिट्टी के साथ कई तरह के लवणों को भी ले आता है. यह भी पानी में घुलता है. समुद्र के पानी में नमक लगातार बढ़ रहा है, पर यह मात्रा इतनी कम है कि उसे मापना सम्भव नहीं.

नदियों और झरनों के पानी में भी प्रकृति के अन्य पदार्थों से आए लवण घुलते हैं. उनकी मात्रा कम होती है इसलिए वह पानी हमें मीठा लगता है. समुद्र में ख़ास दो लवण हैं सोडियम और क्लोराइड. दुनिया के अलग-अलग समुद्रों के पानी में अलग-अलग मात्रा में खारा होता है. सामान्यतः 1000 ग्राम या एक लिटर समुद्री पानी में 35 ग्राम (सात चम्मच) नमक होता है. इसे पार्ट्स पर थाउजैंड (पीपीटी) कहते हैं. सामान्यतः समुद्रों का पानी 34 से 36 पीपीटी नमकीन होता है, पर यूरोप के पास के भूमध्य सागर का पानी 38 पीपीटी है.


Sunday, July 8, 2018

मैक्सिकन वेव


फुटबॉल के मैच के दौरान अक्सर आपने देखा होगा कि स्टेडियम में बैठे दर्शकों को बीच एक लहर उठती है, जो एक किनारे से शुरू होकर दूसरे किनारे तक जाती है. दर्शकों की खुशी व्यक्त करने के इस शैली को मैक्सिकन वेव कहते हैं. इस लहर में दर्शक अपनी कुर्सी से खड़े हो जाते हैं और दोनों हाथ ऊपर उठाते हैं. जैसे ही बराबर वाला दर्शक उठता है उसके बराबर वाला और फिर उसके बराबर वाला उठता है. यह सब इतनी तेजी से होता है कि पूरे स्टेडियम में लहर जैसी उठती है. किसी दर्शक की इच्छा उठने की ना हो, तब भी वह उठता है. एक-दो दर्शकों नहीं उठने से लहर टूटती नहीं. इसे मैक्सिकन वेव इसलिए कहते हैं, क्योंकि सन 1986 की मैक्सिको में हुई फीफा विश्व कप प्रतियोगिता में पहली बार टीवी पर ऐसी लहरें बनती देखी गईं.

टीवी पर दुनिया ने ऐसी लहरें मैक्सिको में हुए विश्व कप में पहली बार देखी जरूर थीं, पर इस बात को लेकर विवाद है कि इनका जन्म मैक्सिको में हुआ या नहीं. मैक्सिको ने इन लहरों को बनाना अमेरिका से सीखा था. 15 अक्तूबर 1981 को अमेरिका के ओकलैंड ए और न्यूयॉर्क यांकीस के बीच बेसबॉल के एक मैच में प्रोफेशनल चीयर लीडर क्रेज़ी जॉर्ज हेंडरसन ने ऐसी लहरें बनाईं थीं. ऐसी लहरें अमेरिकी स्टेडियमों में बनती रहीं हैं, जिन्हें केवल वेव कहा जाता था. फीफा विश्व कप ने इन्हें मैक्सिकन वेव का नाम दिया. 

जम्मू-कश्मीर विधानसभा

जम्मू-कश्मीर विधानसभा की स्थापना सन 1934 में राजा हरिसिंह की देशी रियासत में हुई थी. तब उसका नाम था प्रजा सभा. शुरूआत में इसके 100 सदस्य होते थे. सन 1988 में राज्य के संविधान में किए गए 20वें संशोधन के बाद यह संख्या बढ़ाकर 111 कर दी गई. इनमें से 24 सीटें ऐसी हैं, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पड़ती हैं. इस इलाके पर पाकिस्तान ने 1947 में कब्जा कर लिया था. कश्मीर विधानसभा के चुनावों में ये 24 सीटें हमेशा खाली रहती हैं. इस प्रकार यहाँ 87 सीटों पर चुनाव होते हैं. इन 87 में से 46 सीटें कश्मीर की घाटी में हैं, 37 सीटें जम्मू में और 4 लद्दाख क्षेत्र में. राज्यपाल को यदि लगे कि विधानसभा में महिलाओं की नुमाइंदगी नहीं है, तो वे दो महिला सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं. यहाँ देश की अन्य विधानसभाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल छह साल का होता है. यहाँ पिछले चुनाव दिसम्बर 2014 में हुए थे.

अमरनाथ यात्रा कब शुरू हुई?

अमरनाथ की गुफा कश्मीर में 12,756 फुट की ऊँचाई पर स्थित है. इसके चारों और बर्फ से ढके पहाड़ हैं. गुफा भी बर्फ से ढकी रहती है. गर्मियों में कुछ समय के लिए बर्फ पिघलती है. तभी यह दर्शन के लिए यह खुलती है. गुफा के भीतर छत से पानी टपकने के कारण लगभग 10 फुट ऊँचा शिवलिंग बनता है. श्रावणी पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में होता है. अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है. कल्हण रचित राजतरंगिणी में इसे अमरेश्वर या अमरनाथ कहा गया है. भृगु ऋषि ने भी इसका वर्णन किया है. अबुल फ़जल ने आईन-ए-अकबरी में इसका उल्लेख किया है. इसका विवरण फ्रांसीसी चिकित्सक फ्रांस्वा बर्नियर ने दिया है, जिसने 1663 में बादशाह औरंगज़ेब के साथ कश्मीर की यात्रा की थी. कहा जाता है कि सोलहवीं सदी में गुफा की खोज मुसलमान गडरिए बूटा मलिक ने की थी. आज भी चढ़ावे का एक हिस्सा मलिक परिवार के वंशजों को जाता है. 
http://epaper.prabhatkhabar.com/1713569/Awsar/Awsar#page/6/1

Saturday, July 7, 2018

फीफा विश्व कप


रूस में 14 जून से 21वें फुटबॉल विश्वकप की शुरुआत हो चुकी है. वैश्विक फुटबॉल पर यूरोप का कब्ज़ा है. यूरोप के अलावा लैटिन अमेरिका की टीमें ही इस कप को जीत पाईं हैं. ब्राज़ील ने पाँच बार विश्व कप जीता है. यह एकमात्र टीम है, जो सभी विश्वकप प्रतियोगिताओं में खेली है. सन 2014 में चैम्पियन जर्मनी की टीम थी, जो चार बार इस प्रतियोगिता को जीत चुकी है.

फीफा वर्ल्ड कप 2018 में पहली बार चिप लगी गेंद 'टेलस्टार-18' से खेला जा रहा है. टेलस्टार-18 को एडिडास ने डिजाइन किया है. एडिडास ने लगातार 13वीं बार वर्ल्ड कप की गेंद को डिजाइन किया है. टेलस्टार-18 में चिप लगाई गई है, जिसके जरिए गेंद को स्मार्ट फोन से कनेक्ट कर पैर से लगे शॉट और हैडर सहित अन्य जानकारियां मिलेंगी. सन 1994 में अमेरिका हुए विश्वकप के बाद पहली बार गेंद सिर्फ काले और सफेद रंग में हो रहा है. गेंद में केवल छह पैनल वॉल हैं. पुराने टेलस्टार में 32 पैनल वॉल थे. छह पैनल होने से हवा में उसकी स्थिरता बढ़ेगी. काले और सफेद रंग के कारण बॉल टीवी पर साफ नजर आएगी.

वीडियो रेफरी

इसबार के विश्व कप में क्रिकेट के थर्ड अम्पायर की तरह पहली बार वीडियो असिस्टेंट रेफरी (वार) तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. फुटबॉल के नियमों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ बोर्ड (आईएफएबी) ने 2 मार्च 2018 में इसे मंजूरी दे दी थी. इसके बाद फीफा परिषद ने उसे अंतिम रूप से स्वीकार किया. वार की चार तरह से सहायता ली जाएगी. एक, यह पता करने के लिए कि गोल हुआ या नहीं. दूसरे, पेनल्टी देनी चाहिए या नहीं. इसके अलावा ‘वार’ लाल कार्ड को लेकर भी फैसला करेगा. साथ ही किसी खिलाड़ी को गलती से कार्ड मिला है, तो उसमें सुधार करेगा.

‘वार’ का इस्तेमाल प्रायोगिक तौर पर 2016 से 20 महासंघ कर रहे हैं. इनमें जर्मन बुंडेस्लीगा और इटली की सेरी ए प्रोफेशनल लीग शामिल हैं. करीब एक हजार मैचों में इसे आजमाया जा चुका है. इस विश्वकप से इसे स्वीकृति दिलाने में मदद मिलेगी. इस प्रौद्योगिकी को वैश्विक समर्थन पूरी तरह नहीं मिला है. यहां तक कि यूरोपीय फुटबॉल संस्था यूएफा अभी इसे लेकर आश्वस्त नहीं है.

टेस्ट क्रिकेट

क्रिकेट का सबसे लम्बा मैच टेस्ट मैच होता है. इस खेल का सबसे बड़ा मानक पाँच दिन का टेस्ट मैच है. एक जमाने में यह मैच पाँच दिन से भी ज्यादा लम्बा होता था. इंटरनेशनल क्रिकेट कौंसिल दुनिया के केवल 12 देशों को टेस्ट क्रिकेट खेलने की मान्यता दी है. दो देशों के बीच दुनिया का पहला टेस्ट मैच 15-19 मार्च 1877 को इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर खेला गया था, जिसमें ऑस्ट्रेलिया की टीम 45 रन से जीती थी. टेस्ट क्रिकेट खेलने के लिए मान्यता प्राप्त 12 टीमों के नाम इस प्रकार हैं, 1.इंग्लैंड, 2.ऑस्ट्रेलिया, 3.दक्षिण अफ्रीका, 4.वेस्टइंडीज, 5.न्यूजीलैंड, 6.भारत, 7.पाकिस्तान, 8.श्रीलंका, 9.जिम्बाब्वे, 10.बांग्लादेश, 11.आयरलैंड और 12.अफगानिस्तान. अंतिम दो टीमों ने अपना पहला टेस्ट मैच इस साल ही खेला है. सबसे नई टीम है अफगानिस्तान जिसने 14 जून को बेंगलुरु में अपना पहला टेस्ट मैच भारत के खिलाफ खेला. इसमें भारत ने अफगानिस्तान को एक पारी और 262 रन से हरा दिया. 
http://epaper.prabhatkhabar.com/1704527/Awsar/Awsar#dual/6/1s

Sunday, June 17, 2018

रिम्पैक युद्धाभ्यास क्या है?


रिम ऑफ द पैसिफिक एक्सरसाइज़ (RIMPAC) को संक्षेप में रिम्पैक कहते हैं. दो साल में एकबार होने वाला यह युद्धाभ्यास अमेरिका के पश्चिमी तट पर प्रशांत महासागर में होनोलुलु, हवाई के पास जून-जुलाई में होता है. इसका संचालन अमेरिकी नौसेना का प्रशांत बेड़ा करता है, जिसका मुख्यालय पर्ल हार्बर में है. इसका साथ देते हैं मैरीन कोर, कोस्ट गार्ड और हवाई नेशनल गार्ड फोर्स. हवाई के गवर्नर इसके प्रभारी होते हैं.

हालांकि यह युद्धाभ्यास अमेरिकी नौसेना का है, पर वह दूसरे देशों की नौसेनाओं को भी इसमें शामिल होने का निमंत्रण देते हैं. इसमें प्रशांत महासागर से जुड़े इलाके के देशों के अलावा दूर के देशों को भी बुलाया जाता है. पहला रिम्पैक अभ्यास सन 1971 में हुआ था, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, युनाइटेड किंगडम, और अमेरिका की नौसेनाओं ने भाग लिया. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका ने तबसे अबतक हरेक अभ्यास में हिस्सा लिया है.

इसमें शामिल होने वाले अन्य नियमित भागीदार देश हैं, चिली, कोलम्बिया, फ्रांस, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, नीदरलैंड्स, पेरू, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड. न्यूजीलैंड की नौसेना 1985 तक नियमित रूप से इसमें शामिल होती रही. एक विवाद के कारण कुछ साल तक वह अलग रही, फिर 2012 के बाद से उसकी वापसी हो गई. पिछले कई वर्षों से भारतीय नौसेना भी इसमें शामिल होती है. इस साल 27 जून से यह अभ्यास होगा. इसमें भारत सहित 26 देश शामिल होंगे. इस बार इसमें चीन को नहीं बुलाया गया है.

अगले एशियाई खेल कहाँ होंगे?

अगले एशियाई खेल इंडोनेशिया के दो शहरों में होंगे. ये शहर हैं देश की राजधानी जकार्ता और दक्षिणी सुमात्रा प्रांत की राजधानी पलेमबैंग. इनका आयोजन इस साल 18 अगस्त से 2 सितम्बर तक होगा. इसके उद्घाटन और समापन समारोह जकार्ता में होंगे. यह पहला मौका है, जब एशियाई खेल दो शहरों में आयोजित किए जा रहे हैं. दूसरी खास बात यह है कि इन खेलों का आयोजन मूल रूप से वियतनाम के हनोई शहर में होना था, पर आर्थिक दिक्कतों के कारण वियतनाम ने इनके आयोजन में असमर्थता व्यक्त की, जिसके कारण इंडोनेशिया को ये खेल मिल गए.

17 अप्रैल 2014 को वियतनाम के प्रधानमंत्री एनगुएन तान दुंग ने इन खेलों के आयोजन में असमर्थता व्यक्त की. इंडोनेशिया को 18वें एशियाई खेल मिल जाने के बाद यह सोचा गया कि इनका आयोजन 2019 में किया जाए, पर चूंकि 2019 में इंडोनेशिया में चुनाव हैं, इसलिए इन्हें 2018 में ही कराने का फैसला किया गया. 2022 में 19वें एशियाई खेल चीन के हैंगजाऊ और 2026 के बीसवें खेल जापान के नगोया शहर में होंगे. 

हरी मिर्च से मुँह क्यों जलता है?

मुँह तो लाल मिर्च से भी जलता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके तीखेपन के पीछे कैपसाईपिनोइडपदार्थ है जो मिर्च को फफूंद से बचाता है. इंडियाना यूनिवर्सिटी के डेविड हाक के नेतृत्व में शोध करने वाले दल ने बोलीविया जाकर मिर्च के पौधे में कैपसाइसिन या ‘कैपसाईपिनोइड’ तत्व की जांच की. उन्होंने पाया कि उत्तरी क्षेत्र में मात्र 15 से 20 प्रतिशत मिर्च में ही यह तीखा पदार्थ मौजूद था. वहीं दूसरी ओर दक्षिणी हिस्से में स्थिति अलग थी. इस इलाके में करीब 100 प्रतिशत मिर्च के पौधों में इस तीखे पदार्थ के होने से मिर्च बहुत तीखी थी. यह तीखापन अलग-अलग मिर्चों में अलग-अलग होता है.  मिर्च में अमीनो एसिड, एस्कॉर्बिक एसिड, फॉलिक एसिड, साइट्रिक एसिड, ग्लीसरिक एसिड, मैलिक एसिड जैसे कई तत्व होते है जो हमारे स्वास्थ्य के साथ–साथ शरीर की त्वचा के लिए भी काफी फायदेमंद होते हैं.
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

दलित-प्रतिरोध का रंग नीला क्यों?

सामान्यतः दलित विचार से जुड़े संगठन नीले रंग को प्रतीक रूप से अपनाते हैं, हालांकि सत्तर के दशक में शुरू हुए दलित पैंथर के ध्वज में नीले रंग के साथ लाल रंग भी था, जो दुनिया के वामपंथियों का प्रिय रंग है। डॉ भीमराव आम्बेडकर की प्रतिमाओं में नीले रंग का इस्तेमाल होता है। हाल में उत्तर प्रदेश के बदायूं में बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की एक प्रतिमा को कुछ शरारती लोगों ने भगवा रंग दिया था, जिसे लेकर विवाद हुआ। उस घटना के बाद काफी लोगों ने जानना चाहा कि भीमराव आम्बेडकर के साथ नीला रंग क्यों जुड़ा है? इस सिलसिले में आम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी निर्मल ने कहा, ‘नीला रंग बाबा साहब को प्रिय था।’ रिटायर्ड आईपीएस ऑफिसर और दलित विचारक एसआर दारापुरी ने प्रेस ट्रस्ट को बताया कि सन 1942 में बाबा साहब ने शेड्यूल्‍ड कास्‍ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की स्‍थापना की थी। उसके झंडे का रंग नीला था और उसके बीच में अशोक चक्र था। इसके बाद 1956 में जब पुरानी पार्टी को खत्म कर रिपब्लिकन पार्टी का गठन किया गया तो इसमें भी इसी नीले रंग के झंडे का इस्तेमाल किया।
दारापुरी के अनुसार, नीला रंग आसमान का रंग है। ऐसा रंग जो भेदभाव से रहित दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है। बाबा साहब की भी यही दृष्टि थी। बसपा ने भी इसी रंग को अपनाया। यह दलित अस्मिता का प्रतीक बन गया। बाबा साहब की प्रतिमा हमेशा नीले रंग के कोट में दिखती है। उनके एक हाथ में संविधान की किताब और दूसरे हाथ की एक उंगली उठी रहती है, जो आगे बढ़ने की सूचक है। डॉ आम्बेडकर ने पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों और यहाँ तक कि सूट-बूट को दलितों की चेतना को जगाने का माध्यम बनाया। उन्हें नीले रंग का सूट बहुत पसंद था। वे अमूमन इसी रंग के थ्री पीस सूट पहनते थे। दलित चिंतक मानते हैं कि आम्बेडकर का नीला सूट दलितों के प्रतिरोध और अस्मिता का प्रतीक बन गया है। बौद्ध धर्म में भी नीला रंग महत्वपूर्ण है। अशोक चक्र का रंग नीला है। बौद्ध धम्म चक्र भी नीला है।

राजनीतिक-विचारधाराओं की पहचान रंगों से?

वैश्विक संदर्भों में नीला रंग सामान्यतः सेंटर राइट या कंजर्वेटिव पार्टियों का रंग माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र का ध्वज हल्का नीला या आसमानी है, जो शांति और सद्भाव का प्रतीक है। इसी तरह दुनियाभर में साम्यवाद और व्यापक अर्थ में समाजवाद का प्रतिनिधि रंग लाल है। लाल रंग अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी का प्रतिनिधि रंग भी है, जिसे अनुदारवादी दल माना जाता है। इसके विपरीत डेमोक्रेटिक पार्टी का रंग नीला है। आप गौर करेंगे कि अमेरिकी चुनाव परिणामों के ग्राफिक में अलग-अलग राज्यों में पार्टियों की जीत को लाल और नीले रंग से दिखाया जाता है। भारत में भगवा रंग हिन्दूवादी राजनीति का प्रतिनिधि है, पर पश्चिम में उससे मिलता-जुलता नारंगी रंग क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक दलों का प्रतिनिधित्व करता है। दुनियाभर में हरा रंग इस्लाम के साथ या इस्लामिक राजनीतिक संगठनों के साथ जोड़ा जाता है। इटली में फासी पार्टी का रंग काला था। हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया के इस्लामी स्टेट का झंडा भी काला है। अब्बासी खिलाफत का ध्वज भी काला था। भारत में पेरियार ई रामास्वामी के नेतृत्व में शुरुआती तमिल नास्तिक आंदोलन भी काले झंडे के साथ हुआ था और आज भी ज्यादातर द्रविड़ पार्टियों के झंडे में लाल और काले रंग का इस्तेमाल होता है। कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता के पहले से ही तिरंगे को अपनाया था, जो आज भी उसका रंग है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Sunday, June 3, 2018

बोआओ फोरम क्या है?

बोआओ फोरम एशिया (बीएफए) व्यापारिक सहयोग और विमर्श का फोरम है, जिसे दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तर्ज पर गठित किया गया है। इसका मुख्यालय चीन के हैनान प्रांत के बोआओ में है। सन 2001 से यहाँ एशिया की सरकारों और उद्योगों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हो रहा है। यह फोरम क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के इरादे से गठित किया गया है। इसमें एशिया के देशों को आर्थिक-विकास की राह पर चलते हुए अपनी अर्थ-व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का मौका मिलता है। इसे शुरू करने का विचार मूलतः फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वी रैमोस, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री बॉब हॉक और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री मोरीहीरो होसोकावा ने बनाया था।

इसका उद्घाटन 27 फरवरी 2001 को हुआ था। इसके लिए चीन ने खासतौर से पहल की। इसकी शुरूआत 26 देशों की भागीदारी के साथ हुई थी। इस वक्त इसके 29 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल हैं। इससे जुड़े संगठन की पहली बैठक 12-13 अप्रैल 2002 को हुई। हाल में 8 से 11 अप्रैल 2018 को फोरम का सालाना सम्मेलन हुआ। इसमें चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी भावी आर्थिक नीतियों की ओर इशारा किया। हालांकि भारत की ओर से इस सम्मेलन में कोई बड़ी राजनीतिक हस्ती उपस्थित नहीं थी। केवल उद्योग-व्यापार संगठन फिक्की के प्रतिनिधि इसमें उपस्थित थे।

बोआओ फोरम में आर्थिक एकीकरण के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय-प्रश्नों पर भी विचार किया जाता है। यह फोरम एक तरह से चीन और वैश्विक-व्यापार के बीच की कड़ी बना। सन 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य भी बना था।

जनहित याचिका क्या है?


जनहित याचिका भारतीय न्याय-व्यवस्था की अवधारणा है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक हित के लिए न्यायिक-सहायता लेना है। इसे संसदीय नियमों से नहीं बनाया गया है, बल्कि भारतीय अदालतों ने जनता को ताकतवर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया है। जस्टिस पीएन भगवती और जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर शुरूआती जज थे, जिन्होंने जनहित याचिकाओं को विचारार्थ स्वीकार किया। धीरे-धीरे इसकी व्यवस्था बनती गई। जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग के मामले भी सामने आए हैं और अदालतों ने इनपर कड़ाई से कार्रवाई भी की है।

सत्तर और अस्सी के दशक भारत में न्यायिक सक्रियता का दौर था। इस दौर में हमारी अदालतों ने सार्वजनिक हित में कई बड़े फैसले किए। दिसम्बर 1979 में कपिला हिंगोरानी ने बिहार की जेलों में कैद विचाराधीन कैदियों की दशा को लेकर एक याचिका दायर की। इस याचिका के कारण जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर की अदालत ने बिहार की जेलों से 40,000 ऐसे कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया, जिनके मामले विचाराधीन थे। सन 1981 में एसपी गुप्ता बनाम भारतीय संघ के केस में सात जजों की बेंच में जस्टिस भगवती भी एक जज थे। उन्होंने अपने फैसले में दूसरी बातों के अलावा यह भी लिखा कि अदालत सार्वजनिक हित में मामले को उठाने के लिए अदालत औपचारिक याचिका का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि कोई व्यक्ति एक चिट्ठी भी लिख देगा तो उसे सार्वजनिक हित में याचिका मान लेगी। इस व्यवस्था में भारी न्यायिक शुल्क को जमा किए बगैर सुनवाई हो सकती है।

http://epaper.patrika.com/1682653/Me-Next/Me-Next#dual/2/1