Monday, October 26, 2015

अंपायर और रैफरी में क्या अंतर है?


अंपायर तथा रैफरी के मध्य अगर अंतर है तो वह क्या है?
एम.पी. वर्मा, एम.आई.जी-11, पदमनाभपुर, दुर्ग-491004 (छत्तीसगढ़) 


यह केवल खेल की शब्दावली का मामला है। इसका कोई सीधा कारण नहीं है। कुछ खेलों में जज भी होते हैं। खेल के विकास के साथ जो शब्द इस्तेमाल में आया वह चलता चला गया। मूलतः निर्णायक यह दो स्पर्धियों के बीच तटस्थ भाव से निर्णय तक पहुँचने में मददगार व्यक्ति रैफरी या अंपायर होते हैं। एक धारणा है कि हॉकी और फुटबॉल जैसे कॉण्टैक्ट गेम्स में रैफरी और क्रिकेट या बेसबॉल जैसे नॉन कॉण्टैक्ट गेम्स में, जिनमें खिलाड़ी एक-दूसरे से सीधे नहीं भिड़ते अंपायर होते हैं। पर यह बात भी पूरी तरह किसी एक खेल पर लागू नहीं होती। लॉन टेनिस में कुर्सी पर बैठने वाले अंपायर और लाइन पर खड़े रैफरी होते हैं। अमेरिकन फुटबॉल, जो हमारे देश में खेली जाने वाली फुटबॉल से अलग होती है रैफरी के साथ-साथ अंपायर भी होते हैं। इसी तरह क्रिकेट में जब अम्पायरों के अलावा एक और निर्णायक की जरूरत हुई तो उसे मैच रेफरी कहा गया। यह अंतर काम के आधार पर है और हरेक खेल के साथ बदलता रहता है।

नाटक को आगे बैठकर और फिल्म को पीछे बैठकर क्यों देखा जाता है?
अंशुला अग्रवाल, जैसमीनियम अपार्टमेंट्स, सेक्टर-45, फ्लैट नं.: 505, देहली पब्लिक स्कूल के पीछे, गुड़गांव-122003 (हरियाणा)


नाटक में आगे बैठे दर्शक अभिनेताओं की भाव-भंगिमा को बेहतर ढंग से देख सकते हैं। उनके संवाद भी आगे से ज्यादा आसानी से सुने जाते हैं। इसलिए रंगमंच में आगे की सीटें बेहतर मानी जाती हैं। सिनेमा के बड़े प्रेक्षागृह में दूर तक बैठे सभी दर्शकों तक तस्वीर और आवाज पहुँचाने के लिए जो व्यवस्था की जाती है, उसमें आगे बैठने वाले दर्शकों को पर्दे की तेज रोशनी, अस्वाभाविक रूप से बड़े चित्र और तेज आवाज मिलती है। यह असुविधाजनक होता है, इसलिए सिनेमा हॉल में पीछे की सीटें बेहतर मानी जाती हैं।

स्वतंत्रता के बाद पहले आम चुनाव में कितनी राजनीतिक पार्टियाँ मान्यता प्राप्त थीं। अब इनकी संख्या कितनी है?
कविता जैन, 19 अबुल फजल रोड, बंगाली मार्केट, नई दिल्ली-110001


सन 1951 के चुनाव में हमारे यहाँ 14 राष्ट्रीय और 39 अन्य मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं। सन 2009 के लोकसभा चुनाव में 363 पार्टियाँ उतरीं थीं। इनमें 7 राष्ट्रीय, 34 प्रादेशिक और 242 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं। सन 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग की 10 मार्च 2014 की अधिसूचना के अनुसार देश में मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियों की संख्या 6 थी और राज्य स्तर की मान्यता प्राप्त पार्टियों की संख्या 53 थी। इनके अलावा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों की संख्या 1593 थी।

कार्बन कॉपी की शुरुआत कब, क्यों और किसलिए हुई। इनके दैनिक जीवन में प्रयोग के बारे में बताइए?
मेवा लाल शर्मा, ग्राम: बीमापार हडवरिया चौक, पोस्ट: मेहदावल, जिला: संत कबीर नगर-272271


कार्बन कॉपी का मतलब है किसी दस्तावेज को तैयार करते वक्त उसके नीचे कार्बन पेपर लगाकर उसकी एक और प्रति तैयार करना। कार्बन का आविष्कार एक दौर तक दुनिया का महत्वपूर्ण आविष्कार था और उस जमाने में कार्बन पेपर को, जिसे कार्बोनेटेड पेपर भी कहते थे, स्टेशनरी में सबसे महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ था। हाथ से लिखने में और बाद में टाइपराइटर के इस्तेमाल के कारण कार्बन पेपर ने कम से कम दो सदी तक दुनिया पर राज किया। इस पेपर का आविष्कार इंग्लैंड के रैल्फ वैजवुड ने किया था। इसके लिए उन्होंने सन 1806 में पेटेंट हासिल किया था। उन्होंने इस पेपर को स्टाइलोग्रैफिक राइटर कहा। सन 1808 में इटली के पैलेग्रीनो तुर्री ने टाइपराइटिंग मशीन की ईज़ाद कर ली थी। टाइप मशीन में लगाने के लिए उन्होंने इसी किस्म के पेपर की ईजाद कर ली थी। वस्तुतः उन्होंने और वैजवुड ने भी नेत्रहीनों की लिखने में मदद करने के लिए आस तरह के कागज को बनाया था जो बाद में दस्तावेजों की प्रतियाँ बनाने के काम में आया। कागज के एक तरफ स्याही लगाकर उसे सुखाया। फिर किसी तख्ती पर नीचे कागज और उसके ऊपर कार्बन पेपर लगाकर और धातु की पट्टियों या तार क्षैतिज लगाकर उनके बीच धातु के या सैकड़ों साल से चले आ रहे परम्परागत कलम यानी पक्षियों के पंख के पीछे वाले कड़े हिस्से की मदद से नेत्रहीनों से लिखवाना उनका उद्देश्य था। तकरीबन यह योजना टाइपिंग मशीन में थी। पैलेग्रीनो तुर्री की प्रेमिका युवावस्था में किसी कारण से अपनी आँखें खो बैठी थी। उसकी मदद करने के प्रयास में यह मशीन बनी। इस प्रक्रिया में कार्बन पेपर भी तैयार हो गया।


कादम्बिनी के अक्तूबर 2015 अंक में प्रकाशित

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