Saturday, February 24, 2018

खेलो इंडिया कार्यक्रम क्या है?

खेलो इंडिया देश में खेल प्रतिभाओं को सामने लाने की दीर्घकालीन योजना के रूप में यह कार्यक्रम सामने आया है. यह कार्यक्रम चालू वित्त वर्ष में ही शुरू हुआ है. इसके पहले चला आ रहा राजीव गांधी खेल अभियान भी इसमें शामिल कर लिया गया है, जो 2008 में पहले पंचायत युवा क्रीड़ा और खेल अभियान के नाम से शुरू हुआ था. बाद में उसका नाम राजीव गांधी के नाम पर रखा गया था. उस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण स्तर पर खेल सुविधाओं का विकास करना था. अब भारत सरकार स्कूल खेलों की तर्ज पर खेलो इंडिया कॉलेज गेम्स के आयोजन पर भी विचार कर रही है.
अब खेलो इंडिया कार्यक्रम का उद्देश्य खेल प्रतिभा को खोजने के अलावा देश में खेल के इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थापना करना भी है. यानी कि सिंथैटिक एथलीटिक्स ट्रैक्स, सिंथैटिक हॉकी टर्फ, सिंथैटिक फुटबॉल टर्फ, स्टेडियम और मल्टी-पर्पज हॉलों का निर्माण वगैरह भी इसमें शामिल हैं. सन 2017-18 से 2019-20 के लिए इस कार्यक्रम पर 1,756 करोड़ रुपये खर्च आने की आशा है. इस महत्वपूर्ण कदम से ओलिंपिक में भी भारत की रैंकिंग सुधारने का लक्ष्य है. अलबत्ता इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण इलाकों के खिलाड़ियों को प्रोत्साहन एवं सुविधाओं की कमी को पूरा करना है. 20 सितम्बर 2017 को खेलमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने इस कार्यक्रम की घोषणा की थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम के अध्यक्ष हैं.
इस कार्यक्रम के लिए हर साल 1000 खिलाड़ियों का चुनाव किया जाएगा. इस साल चुने गए खिलाड़ियों ने हाल में दिल्ली में हुए खेलो-इंडिया में हिस्सा लिया. इस योजना के तहत चुने गए खिलाड़ियों को आठ साल तक स्कॉलरशिप दी जाएगी, ताकि वे अपनी शिक्षा के साथ खेलों को भी समय दे सकें. इसके अंतर्गत 5 लाख रुपये तक की राशि हर वर्ष एक खिलाड़ी पर खर्च की जाएगी. खेल मंत्रालय खेल प्रशिक्षण के लिए 20 विश्वविद्यालयों का चयन करेगा, जो खेल प्रशिक्षण के साथ साथ शिक्षा सम्बन्धी पाठ्यक्रम भी चलाएंगे. स्कॉलरशिप पाने के लिए आवेदक की उम्र 8 वर्ष से लेकर 18 वर्ष के बीच होनी चाहिए. इस स्कीम के अंतर्गत केवल वही आवेदक चुने जाएंगे जो खेलों से जुड़े होने के साथ अपनी प्रतिभा को सुधारना चाहते है. एक आवेदक खिलाड़ी केवल एक ही खेल का चुनाव कर सकता है.
वीडियोबॉम्बिंग किसे कहते हैं?
यह शब्द टीवी पत्रकारिता के विकास के साथ एक नई तरह की संस्कृति को व्यक्त करता है. अक्सर टीवी पत्रकार किसी विशिष्ट व्यक्ति से कैमरा पर बात करते हैं तो आसपास लोग जमा हो जाते हैं और कैमरा में अपनी शक्ल दिखाने की कोशिश करते हैं. कोशिश ही नहीं हाथों से इशारे वगैरह भी करते हैं, ताकि उनकी तरफ ध्यान जाए. किसी बड़े खिलाड़ी, नेता, अभिनेता या सेलीब्रिटी के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश करना वीडियोबॉम्बिंग है. हाल के वर्षों में खेल के जीवंत प्रसारण के साथ ऐसे दर्शकों की तस्वीरें भी दिखाई जाने लगी है, जो अपने पहनावे, रंगत या हरकतों की वजह से अलग पहचाने जाते हैं. भारतीय क्रिकेट टीम के साथ कुछ दर्शक दुनियाभर की यात्रा करते हैं और हरेक मैच में नदर आते हैं. अमेरिका के रॉलेन फ्रेडिक स्टीवार्ट ने सत्तर के दशक में अमेरिकी खेल के मैदानों में इंद्रधनुषी रंगों के एफ्रो-स्टाइल विग पहनकर इसकी शुरुआत की थी, जिसके कारण उन्हें रेनबो मैन कहा जाता था.
फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स
दुनिया में मनी लाउंडरिंग रोकने के लिए ग्रुप-7 की पहल है जिसे उसके संक्षेप नाम FATF से पहचाना जाता है. सन 1989 में शुरू हुए इस अंतर-शासन संगठन के जिम्मे सन 2001 में आतंकवादी संगठनों को मिल रही वित्तीय मदद पर रोक लगाने का काम भी आ गया. यह संगठन दुनिया के देशों पर नजर रखता है कि वे इस दिशा में क्या कर रहे हैं. इन दिनों यहाँ पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डालने पर विचार किया जा रहा है. इस संगठन का सचिवालय पेरिस में है. इस संगठन में सन 1989 में 16 सदस्य थे, जो सन 2016 तक बढ़कर 37 हो गए. भारत भी इसका सदस्य है.
नीम कड़वा क्यों होता है?

नीम के तीन कड़वे तत्वों को वैज्ञानिकों ने अलग किया है, जिन्हें निम्बिन, निम्बिडिन और निम्बिनिन नाम दिए हैं. सबसे पहले 1942 में भारतीय वैज्ञानिक सलीमुज़्ज़मा सिद्दीकी ने यह काम किया. वे बाद में पाकिस्तान चले गए थे. यह कड़वा तत्व ही एंटी बैक्टीरियल, एंटी वायरल होता है और कई तरह के ज़हरों को ठीक करने का काम करता है. 
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Saturday, February 17, 2018

राष्ट्रीय किसान आयोग

प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग की स्थापना 18 नवम्बर 2004 को की गई थी. देश में किसानों की बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं के कारण इसका गठन किया गया था. यूपीए सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में किसानों की समस्या का समाधान भी शामिल था. आयोग ने पहले दिसम्बर 2004, अगस्त 2005, दिसम्बर 2005 और अप्रेल 2006 में अपनी चार रिपोर्टें दीं. इसके बाद 4 अक्तूबर 2006 को अपनी पाँचवीं और अंतिम रिपोर्ट दी.
आयोग ने खाद्य और पुष्टाहार सुरक्षा के लिए एक मध्यावधि-नणनीति बनाने, कृषि उत्पादकता, लाभ और खेती-बाड़ी की व्यवस्था को सुदृढ़ करने, युवा वर्ग को खेती की तरफ आकर्षित करने, नीतिगत सुधारों, कृषि-अनुसंधान पर निवेश बढ़ाने और समेकित विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सुझाव दिए थे. इनमें से एक सुझाव यह भी था कि गेहूँ और धान के अलावा दूसरी फसलों के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था की जानी चाहिए. आयोग का सुझाव था कि किसान को भारित औसत लागत से 50 प्रतिशत ज्यादा कीमत दी जानी चाहिए.
अन्न का औसत लागत मूल्य क्या होता है?
स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारित औसत लागत को परिभाषित नहीं किया था. अलबत्ता देश के कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) ने भारित लागत को तीन तरह से परिभाषित किया है. इन्हें A2, A2+FL और C2 कहा जाता है. A2 के अंतर्गत किसानों द्वारा बीज, खाद, रसायन, मजदूरों, ईंधन, सिंचाई वगैरह पर हुआ खर्च शामिल होता है. A2+FL में उपरोक्त लागतों के, जिनका भुगतान कर दिया गया है, अलावा परिवार के श्रम को भी शामिल किया जाता है, जिसका भुगतान नहीं किया गया.
C2 लागत और ज्यादा व्यापक है. इसमें उपरोक्त दो लागतों के अलावा जमीन और खेती से जुड़ी दूसरी अचल सम्पदा के किराए और ब्याज वगैरह को भी शामिल किया जाता है. भारत के आम बजट में सरकार ने किसान की लागत के मूल्य पर 50 फीसदी ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की जो घोषणा की है, उसमें यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार का आशय उपरोक्त तीनों में से किस लागत से है.
ब्लू मूनकी गणना कैसे होती है?
ब्लू मून का मतलब है साल में एक अतिरिक्त पूर्णमासी का होना. या किसी महीने में एक के बजाय दो पूर्ण चंद्र. इसी तरह एक मौसम में तीन के बजाय चार पूर्ण चंद्र. चूंकि ऐसा बहुत कम होता है इसलिए इसे मुहावरा बना दिया गया, ‘वंस इन ए ब्लू मून.वैसे ही जैसे ईद का चाँद.सामान्यतः एक कैलेंडर महीने में एक रात ही पूर्ण चंद्रमा दिखाई देता है. चंद्रवर्ष और सौरवर्ष की काल गणना में संगति बैठाने के लिए प्राचीन यूनानी खगोल-विज्ञानी एथेंस के मेटोन ने गणना करके बताया कि 19 साल में 235 चंद्रमास (228 सौरमास) और 6940 दिन होते हैं. इस प्रकार 19 साल का एक मेटोनिक चक्र होता है. आपने देखा कि इन 19 साल में 234 चंद्रमास हैं जबकि कैलेंडर में 228 महीने हैं. इस प्रकार इन 19 साल में (234-228=7) सात अतिरिक्त पूर्णचंद्र होंगे. इस 19 वर्ष की अवधि में यदि किसी साल फरवरी में पूर्णमासी नहीं होती है (जैसाकि इस साल है) तब एक ब्लू मून और बढ़ जाता है.
पिछली 31 जनवरी 2018 से पहले 31 जुलाई 2015 को ब्लू मून था. अब इसके आगे की तारीखें हैं 31 मार्च, 2018, 31 अक्तूबर, 2020, 31 अगस्त, 2023, 31 मई, 2026, 31 दिसम्बर, 2028, 30 सितम्बर, 2031, 31 जुलाई, 2034. आपने गौर किया होगा कि 31 जुलाई 2015 के ठीक 19 साल बाद उसी तारीख यानी 31 जुलाई 2034 को ब्लू मून होगा.
टैक्टिकल न्यूक्लियर वैपन?
टैक्टिकल न्यूक्लियर वैपन का मतलब होता है, छोटे नाभिकीय अस्त्र. नाभिकीय अस्त्र बड़े स्तर पर भारी संहार करता है. उनका इस्तेमाल वास्तविक युद्धक्षेत्र से दूर शत्रु-देश की सीमा के काफी भीतर जाकर किया जाता है, जबकि इन छोटे हथियारों का इस्तेमाल छोटे युद्धक्षेत्र में किया जा सकता है. इनमें ग्रेविटी बम, कम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें, तोप के गोले, पलीते वगैरह होते हैं. इन हथियारों के इस्तेमाल से बड़े आणविक युद्ध का खतरा पैदा हो सकता है. हाल के वर्षों में पाकिस्तानी सेना ने भारत को धमकियाँ दी हैं कि यदि कभी सीमा पार की तो हम टैक्टिकल न्यूक्लियर वैपन का इस्तेमाल करेंगे.
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

दुनिया का पहला संचार उपग्रह

सन 1960 में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने गुब्बारे के आकार का एक उपग्रह इको-1 (Echo-1) छोड़ा था, जो दुनिया का पहला संचार उपग्रह था। यह उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में करीब 1600 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थापित हुआ था। स्थापना के बाद फुलाकर इसका आकार करीब 30 मीटर (100 फुट) कर दिया गया। यह बैलून मायलार (Mylar ) नाम की सामग्री से बना था। मायलार पर अल्युमिनियम की कोटिंग की गई थी, जिससे वह किरणों और तरंगों के परावर्तित करती थी।

धरती से भेजे गए रेडियो सिग्नल उपग्रह की सतह से परावर्तित होकर धरती पर वापस आते, पर वे ट्रांसमिशन केंद्र से काफी दूर तक पहुँच जाते। इससे संचार उपग्रहों की अवधारणा का विकास हुआ। इको-1 ने अमेरिका और यूरोप के बीच काफी अरसे तक ध्वनि, संगीत और चित्रों का प्रसारण किया। सन 1968 में यह उपग्रह आकाश से गायब हो गया।

कंक्रीट और सीमेंट क्या एक ही चीज है?
नहीं, ये दो अलग-अलग चीजें हैं। अक्सर जब लोग सीमेंट की दीवार या सीमेंट की सड़क कहते हैं, तब उनका आशय कंक्रीट से होता है। कंक्रीट और सीमेंट दोनों ही इमारती सामग्रियाँ हैं, पर दोनों एक ही चीज नहीं हैं। सीमेंट उस मिश्रण का एक हिस्सा है, जिसे कंक्रीट कहते हैं। सीमेंट को चूने और सिलिका से बनाया जाता है। सीमेंट में ये दोनों चीजें करीब 85 फीसदी होती हैं। इसके अलावा उसमें कैल्शियम, आयरन, अल्युमिनियम और कुछ दूसरी चीजें भी हो सकती हैं।

बड़ी भट्ठियों में इस मिश्रण को तेज तापमान (करीब 2,700 से 3,000 डिग्री फैरेनहाइट) पर मिलाया जाता है। इसके बाद जो चीज बनती है उसे क्लिंकर कहते हैं। क्लिंकर छोटी गोलियों की शक्ल में होता है। इन गोलियों को पीसकर पाउडर बनाया जाता है और इसमें जिप्सम मिलाया जाता है। यह होता है सीमेंट। सीमेंट में जब पानी मिलाया जाता है तो रासायनिक क्रिया होती है और सूखने के बाद यह पेस्ट कड़ा हो जाता है। वस्तुतः सीमेंट चीजों को जोड़ने का काम करता है।

सीमेंट भी दो प्रकार का होता है। एक, हाइड्रॉलिक और दूसरा, नॉन-हाइड्रॉलिक। हाइड्रॉलिक सीमेंट पानी की मदद से कड़ा होता है। यह कड़ा होता जाता है और अंत में इसपर पानी का असर बंद हो जाता है। ऐसा सीमेंट उन जगहों के लिए उपयोगी होता है, जहाँ पानी काफी हो। नॉन-हाइड्रॉलिक सीमेंट पानी मिलाने पर कड़ा नहीं होता। आमतौर पर प्रचलत सीमेंट को पोर्टलैंड या ऑर्डिनरी पोर्टलैंड सीमेंट कहते हैं। यह इमारतों के निर्माण के काम में आने वाला हाइड्रॉलिक सीमेंट है। इसे 18वीं सदी में ब्रिटेन के जोसफ एस्पडीन ने बनाया था।

इस श्रेणी के सीमेंट की भी कई किस्में होती हैं। कंक्रीट में सीमेंट, पानी और कुछ दूसरी चीजों जैसी रोड़ी-बजरी, रेत और पत्थरों का मिश्रण होता है। इनकी मात्रा जरूरत के हिसाब से कम या ज्यादा होती है। निरंतर कठोर बने रहने की क्षमता के कारण कंक्रीट दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाली निर्माण सामग्री है।

ई-मेल को डिलीट कर देने के बाद वह कहाँ चली जाती है?
ई-मेल आपके मेल बॉक्स से तो हट जाती है, पर वह पूरी तरह खत्म नहीं होती, बल्कि उसकी जगह बदल जाती है। कम्यूटर के नजरिए से वस्तुतः कोई भी चीज डिलीट नहीं होती। जब कोई चीज लिखी जाती है, तो उसे मिटाया नहीं जाता, बल्कि उसके ऊपर दूसरी चीज लिख दी जाती है। यानी ओवरराइट हो जाती है। जब आप अपना ई-मेल डिलीट करते हैं या कम्यूटर के रिसाइक्लिंग बिन की फाइलों को डिलीट करते हैं, तो आप उन्हें देखना बंद कर देते हैं और उसके ऊपर नया डेटा आ जाता है। कम्प्यूटर विशेषज्ञ ऐसे डेटा को भी रिकवर कर सकते हैं, जो डिलीट कर दिया गया है। हाँ यह संभव है कि उसमें कुछ खराबी आ जाए। 
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Monday, February 5, 2018

विश्व की पहली रोबो नागरिक

सोफिया पहली पूर्ण रोबोट है, जो मनुष्य की तरह व्यवहार कर सकती है, हालांकि उसका व्यवहार अभी काफी शुरुआती स्तर का है. उसे फिल्म अभिनेत्री ऑड्री हैपबर्न की शक्ल दी गई है. सोफिया को हांगकांग की कम्पनी हैंसन रोबोटिक्स (Hanson Robotics) ने तैयार किया है. उसे बनाने में कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence) के विशेषज्ञों और गूगल की पितृ कम्पनी अल्फाबेट इनकॉरपोरेशन की मदद ली गई है, जिसने उसे आवाज पहचानने की क्षमता दी है और सिंगुलैरिटीनेट (SingularityNET) ने उसके दिमाग को तैयार किया है. 25 अक्तूबर 2017 को सऊदी अरब सरकार ने उसे नागरिकता देने की घोषणा भी की है. इस प्रकार वह दुनिया की पहली रोबो नागरिक बन गई है. दिसम्बर 2017 में सोफिया को भारत में पहली बार आईआईटी, बॉम्बे के टेकफेस्ट समारोह में पेश किया गया.
सोफया बातचीत करती है और उसके चेहरे पर हाव-भाव भी आते हैं. वह पूर्व निर्धारित विषयों पर विचार-विमर्श कर सकती है. उसके जवाब पूर्व निर्धारित होते हैं. उसका सम्पर्क क्लाउड नेटवर्क से होता है, जहाँ से वह उत्तर प्राप्त करती है. उसकी आँखों की जगह पर लगे कैमरा अलग-अलग चेहरों को पहचान सकते हैं. इसे सन 2015 में बनाया गया था, पर उसके पैर जनवरी 2018 में ही सक्रिय किए गए हैं. कृत्रिम मेधा विशेषज्ञ अनुभव के आधार पर उसका निरंतर विकास कर रहे हैं. सोफिया के अलावा हैंसन रोबोटिक्स ने उसके कुछ साथी और बनाए हैं. इनके नाम हैं एलिस, अल्बर्ट आइंस्टाइन ह्यूबो, बीना48, हान, ज्यूल्स, प्रोफेसर आइंस्टाइन, फिलिप के डिक एंड्रॉयड, ज़ेनो और जो कैओटिक.  
राजकोषीय घाटा?
राजकोषीय घाटा तब होता है, जब सरकार का कुल खर्च उसके राजस्व से ज्यादा हो जाए. राजस्व घाटे का मतलब हमेशा वास्तविक राजस्व वसूली में कमी नहीं होती. सरकारी व्यय ज्यादा होने पर भी घाटा होता है. इस घाटे की भरपाई आमतौर पर केंद्रीय बैंक (रिजर्व बैंक) से उधार लेकर की जाती है या छोटी और लंबी अवधि के बॉन्ड के जरिए पूंजी बाजार से फंड जुटाया जाता है. घाटा पूरा करने के मकसद से ली गई उधारी पर सरकार को जो ब्याज देना पड़ता है, उसे राजकोषीय घाटे में से कम करने पर हासिल धनराशि को प्राथमिक घाटा कहेंगे. वास्तविक राजस्व वसूली उम्मीद से ज्यादा होने पर रेवेन्यू सरप्लस की स्थिति पैदा होती है.
राजकोषीय घाटे को लेकर अर्थशास्त्रियों की कई धारणाएं हैं. जॉन मेनार्ड कीन्स की धारणा थी कि राजस्व घाटा, देशों को मंदी से बचाता है. परम्परागत समझ है कि बजट में संतुलन होना चाहिए. अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में राजकोषीय घाटे की सकारात्मक भूमिका भी रही है. जब संयुक्त राज्य अमेरिका बन ही रहा था, तब वित्तमंत्री अलेक्जेंडर हैमिल्टन ने सुझाव दिया कि गृहयुद्ध के दौरान लिए गए कर्जों को चुकता करने के लिए बॉण्ड जारी किए जाएं. इन कर्जों पर ब्याज देने के कारण राजकोषीय घाटा पैदा हो रहा था. जब 1860 के दशक में सारे कर्ज निपट गए तो घाटा भी खत्म हो गया.
इसके बाद के सभी युद्धों के खर्च के लिए अमेरिका ने कर्जे लिए. पहले और दूसरे विश्वयुद्धों के दौरान जीडीपी के 17 और 24 फीसदी तक का घाटा था. चालू वित्त वर्ष में अमेरिकी सरकार का घाटा 440 अरब डॉलर का है, जो जीडीपी का 2.5 फीसदी है. सन 2017-18 के भारत के आम बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य था जीडीपी का 3.2 फीसदी.  
पूँजीगत खर्च क्या होता है?
आम बजट में और कम्पनियों की बैलेंस शीट में पूँजीगत व्यय (Capex) का उल्लेख होता है. यह खर्च कम्पनी या देश की अचल (फिक्स्ड) सम्पदा जैसे भवन, वाहन, उपकरण या भूमि वगैरह को खरीदने पर होता है. यह खर्च इस सम्पदा की खरीद के अलावा वर्तमान सम्पदा की जीवनावधि को बढ़ाने, मसलन रिपेयर वगैरह पर भी हो सकता है.
दावोस शिखर सम्मेलन?
दावोस स्विट्जरलैंड का एक शहर है, जो हर साल जनवरी के उत्तरार्ध में होने वाले आर्थिक शिखर-सम्मेलन के कारण प्रसिद्ध हुआ है. इस बैठक में दुनिया के ढाई हजार के आसपास बिजनेस लीडर जमा होते हैं. उनके अलावा विभिन्न देशों के राजनीतिक नेता, अर्थशास्त्री और सरकारी अधिकारी भी यहाँ जमा होते हैं. इस सालाना सम्मेलन के अलावा व‌र्ल्ड इकोनॉमिक फोरम साल में छह से आठ क्षेत्रीय बैठकें भी आयोजित करता है. ये बैठकें अफ्रीका, पूर्वी एशिया, लैटिन अमेरिका और दूसरे इलाकों में आयोजित होती हैं. इनके अलावा दो सालाना बैठकें चीन और संयुक्त अरब अमीरात में भी होती हैं.
व‌र्ल्ड इकोनॉमिक फोरम, जिनीवा स्थित एक गैर-सरकारी संस्था है, जो वैश्विक प्रश्नों पर विचार करती है. हर साल स्विट्ज़रलैंड के दावोस शहर में होने वाली बैठक के कारण यह प्रसिद्ध है. इस बैठक में दुनिया भर के उद्योगपति, राजनैतिक नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी हिस्सा लेते हैं. एक-प्रकार से यह संस्था सरकारों और निजी उद्योग जगत के बीच सेतु का काम भी करती है. इस संस्था की शुरुआत 1971 में क्लॉस मार्टिन शाबे नाम के बिजनेस प्रोफेसर ने जिनीवा में की थी. तब इसका नाम था युरोपियन मैनेजमेंट फोरम. तब यह एक तरह से बिजनेस से जुड़े लोगों की संस्था थी. धीरे-धीरे इसका रूप बदलता गया और 1987 में इसका नाम वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम हो गया.