Monday, January 26, 2015

स्वतंत्रता, लोकतंत्र और गणतंत्र में क्या अंतर है ?

स्वतंत्रता बहुत व्यापक अवधारणा है। इसका सीधा मतलब है व्यक्ति का अपने कार्य-व्यवहार में स्वतंत्र होना, पराधीन नहीं होना। व्यावहारिक अर्थ है ऐसी व्यवस्था में रहना जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार हो। हजारों साल के मनुष्य जाति के इतिहास में हमने व्यक्ति के कुछ प्राकृतिक अधिकारों को स्वीकार किया है जैसे जीवन, विचरण, भरण-पोषण, निवास वगैरह। इन प्राकृतिक अधिकारों को अतीत में राज-व्यवस्थाओं ने अपने लिखित-अलिखित कानूनों में स्थान देकर नागरिक अधिकार बनाया। 10 दिसम्बर 1948 को जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार घोषणापत्र में इन अधिकारों को जगह दी। इन अधिकारों पर नजर डालेंगे तो आप पाएंगे कि दुनिया के नागरिकों को अभी उनके पूरे अधिकार प्राप्त नहीं हैं। सम्भव है कभी मिलें।

लोकतंत्र एक व्यवस्था का नाम है, जिसकी एक संवैधानिक व्यवस्था भी हो। जब शासन पद्धति पर यह लागू हो तो शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक होती है। इसमें हिस्सा लेने वाले या तो आमराय से फैसले करते हैं और यदि ऐसा न हो तो मत-विभाजन से करते हैं। ये निर्णय सामान्य बहुमत से और कई बार ज़रूरी होने पर विशेष बहुमत से भी होते हैं। मसलन कुछ परिस्थितियों में दो तिहाई मत से भी निर्णय किए जाते हैं। 

गणतंत्र का अर्थ वह शासन पद्धति जहाँ राज्यप्रमुख का निर्वाचन सीधे जनता करे या जनता के प्रतिनिधि करें। यानी राष्ट्रप्रमुख वंशानुगत या तानाशाही तरीके से सत्ता पर कब्जा करके न आया हो। कुछ ऐसे देश भी हैं, जहाँ शासन पद्धति लोकतांत्रिक होती है, पर राष्ट्राध्यक्ष लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुना जाता। जैसे युनाइटेड किंगडम, जहाँ राष्ट्राध्यक्ष सम्राट होता है, जिसके परिवार के सदस्य ही राष्ट्राध्यक्ष बनते हैं। इस अर्थ में युनाइडेट किंगडम रिपब्लिक नहीं है। हमारे देश में लोकतांत्रिक सरकार है और राष्ट्रपति का चुनाव होता है इसलिए यह गणतंत्रात्मक व्यवस्था है।

स्वीकृत होने के दो महीने बाद लागू क्यों हुआ हमारा संविधान? यदि भारतीय संविधान 26 नवंबर 1949 को बनकर तैयार हो गया, तो इसे दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 को ही लागू क्यों किया गया?

हालांकि संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान के प्रारूप को अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया था, पर यह तय किया गया कि इसे 26 जनवरी से लागू किया जाए क्योंकि 26 जनवरी 1930 के लाहौर कांग्रेस-अधिवेशन में पार्टी ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास किया था और अध्यक्ष पं जवाहर लाल नेहरू ने अपने भाषण में इसकी माँग की थी। संविधान के नागरिकता, चुनाव और संसद जैसी व्यवस्थाएं तत्काल लागू हो गईं थीं। राष्ट्रीय संविधान सभा ने ध्वज 22 जुलाई 1947 को ही स्वीकार कर लिया था। और वह 15 अगस्त 1947 से औपचारिक रूप से राष्ट्रीय ध्वज बन चुका था। 

राष्ट्रपति भवन पर पहली बार तिरंगा कब फहराया गया?

भारतीय संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि के आसपास यह ध्वज संसद भवन के सेंट्रल हॉल में फहराया गया। इसी कार्यक्रम में श्रीमती हंसा मेहता ने राष्ट्रध्वज डॉ राजेन्द्र प्रसाद को भेंट किया। 15 अगस्त 1947 की भोर तब के वायसरीगल हाउस और वर्तमान राष्ट्रपति भवन पर तिरंगा फहराया गया। संसद भवन के शिखर पर भी उसी सुबह तिरंगा फहराया गया।  

Sunday, January 25, 2015

खतरे के संकेतों के लिए लाल रंग का ही प्रयोग क्यों होता है?

कादम्बिनी, ज्ञानकोश, नवंबर, 2012

खतरे के संकेतों के लिए लाल रंग का ही प्रयोग क्यों होता है, दूसरे रंगों का क्यों नहीं?
नीतू कनौजिया, 43-ए, गली नंबर-6, डिफेंस एंक्लेव, पार्ट-2, मोहन गार्डन, दिल्ली-110059

वैज्ञानिक अध्ययनों से पता लगा है कि लला रंग मनुष्य का ध्यान खींचता है। खतरे का निशान ध्यान खींचने के लिए होता है इसलिए इसके लिए लाल रंग उपयुक्त पाया गया। इसीलिए ट्रैफिक सिग्नल और रेलगाड़ियों के सिग्नल में लाल रंग रोकने के लिए इस्तेमाल होता है। अक्सर अखबारों की सुर्खियाँ लाल रंग में होती हैं। सुर्ख शब्द का अर्थ ही लाल है। कारों की टेल लाइट, लेबलों और होर्डिंगों में लाल रंग वहीँ इस्तेमाल होता है जहाँ ध्यान खींचना हो।

दुनिया में समुद्रों का निर्माण कैसे हुआ?
राजेश नेमा, लक्ष्मीकांत मंदिर, सिंहपुर बड़ा, जिला-नरसिंहपुर-487110 (म.प्र.)

धरती जब नई-नई थी तब वह बेहद गर्म थी। यानी अब से तकरीबन 4.5 अरब साल पहले धरती भीतर से तो गर्म थी ही उसकी सतह भी इतनी गर्म थी कि उस पर तरल जल बन नहीं पाता था। उस समय के वायुमंडल को हम आदि वायुमंडल (प्रोटो एटमॉस्फीयर) कहते हैं। उसमें भी भयानक गर्मी थी। पर पानी सृष्टि का हिस्सा है और सृष्टि के विकास के हर दौर में किसी न किसी रूप में मौज़ूद रहा है। धरती उस गर्म दौर में भी खनिजों के ऑक्साइड और वायुमंडल में धरती से निकली हाइड्रोजन के संयोग से गैस के रूप में पानी पैदा हो गया था। पर वह तरल बन नहीं सकता था। धरती के वायुमंडल के धीरे-धीरे ठंडा होने पर इस भाप ने बादलों की शक्ल ली। इसके बाद लम्बे समय तक धरती पर मूसलधार बारिश होती रही। यह पानी भाप बनकर उठता और संघनित (कंडेंस्ड) होकर फिर बरसता। इसी दौरान धरती की सतह भी अपना रूपाकार धारण कर रही थी। ज्वालामुखी फूट रहे थे और धरती की पर्पटी या क्रस्ट तैयार हो रही थी। धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से पानी ने अपनी जगह बनानी शुरू की। धरती पर जीवन की शुरूआत के साथ पानी का भी रिश्ता है। जहाँ तक महासागरों की बात है पृथ्वी की सतह का लगभग 72 फीसदी हिस्सा महासागरों के रूप में है। दो बड़े महासागर प्रशांत और अटलांटिक धरती को लम्बवत महाद्वीपों के रूप में बाँटते हैं। हिन्द महासागर दक्षिण एशिया को अंटार्कटिक से अलग करता है और ऑस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के बीच के क्षेत्र में फैला है। एक नज़र में देखें तो पृथ्वी विशाल महासागर है, जिसके बीच टापू जैसे महाद्वीप हैं। इन महाद्वीपों का जन्म भी धरती की संरचना में लगातार बदलाव के कारण हुआ।

बिना पायलेट के एयरक्राफ्ट को क्या कहते हैं?
कुमुद शर्मा, द्वारा के. के. शर्मा, 45/33, नागला अजीता, सेंट्रल जेल के पीछे, आगरा-282002 (उ.प्र.)

बिना पायलट के विमान से आपका आशय अनमैन्ड एरियल ह्वीकल (यूएवी) से है, जिन्हें रिमोटली पायलटेड ह्वीकल भी कहते हैं। आजकल नेटो की सेनाओं द्वारा अफगानिस्तान में इस्तेमाल हो रहे ड्रोन भी इसी श्रेणी के विमान हैं। ये पूरी तरह विमान है। इनमें केवल पायलट नहीं होते और न यात्री होते हैं। इनका इस्तेमाल आमतौर पर युद्ध में होता है। बमबारी या टोही उड़ान के लिए ये खासे उपयुक्त होते हैं। इनमें लगे कैमरे तस्वीरें और वीडियो शूट करके लाते हैं। हालांकि प्रक्षेपास्त्र भी दूर नियंत्रित होते हैं, पर प्रक्षेपास्त्रों का दुबारा इस्तेमाल नहीं होता, जबकि ये विमान अपना मिशन पूरा करने के बाद लौट आते हैं और दुबारा इस्तेमाल में लाए जा सकते हैं। यात्री विमानों में अब ऑटो पायलट तकनीक या फ्लाई बाई वायर तकनीक का इस्तेमाल होने लगा है, पर उन्हें चालक रहित विमान नहीं कहा जा सकता।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश क्या होता है?
पे्रम बड़गोत्या, फ्लैट-601, मालवीय टॉवर, ओ. एन. जी. सी. कॉलोनी, अंकलेश्वर-393010 (गुजरात)

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से आशय है किसी देश के कारोबार या उद्योग में किसी दूसरे की कम्पनियों द्वारा किया गया पूँजी निवेश। यह काम किसी कम्पनी को खरीद कर या नई कम्पनी खड़ी करके या किसी कम्पनी की हिस्सेदारी खरीद कर किया जाता है। विदेशी पूँजी निवेश के दो रूपों का जिक्र हम अक्सर सुनते हैं। एक है प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश(एफडीआई)और दूसरा है विदेशी संस्थागत पूँजी निवेश(एफआईआई)। एफआईआई प्राय: अस्थायी निवेश है, जो शेयर बाज़ार में होता है। इसमें निवेशक काफी कम अवधि में फायदा या नुकसान देखते हुए अपनी रकम निकाल कर ले जाता है। एफडीआई में निवेश लम्बी अवधि के लिए होता है।


गाय और भैंस के दूध में कौन-कौन से पोषक तत्व होते हैं? दोनों में से किसका दूध श्रेष्ठ होता है?
विभव सक्सेना, बल्लभ नगर कॉलोनी, पीलीभीत (उ.प्र.)

दूध में 85 प्रतिशत पानी और शेष भाग में वसा और खनिज होते हैं। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम और राइबोफ्लेविन (विटैमिन बी-2) होता है। इनके अलावा इसमें विटैमिन ए, डी, के और ई सहित फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, आयडीन, कई तरह के एंजाइम भी होते हैं। गाय और भैंस के दूध में किसका दूध श्रेष्ठ होता है इसे लेकर कोई आम राय नहींं है। आयुर्वेद में गाय के दूध को बेहतर माना गया है। यह भी कहा जाता है कि गाय के दूध में एटू बीटा प्रोटीन होता है, जो मधुमेह और मस्तिष्क के विकास में सहायक होता है। यह भी कहा जाता है कि यह प्रोटीन देसी गाय में ही मिलता है जर्सी और हॉलस्टीन नस्ल की गायों में नहीं। पर कुछ वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि गाय के दूध में प्रति ग्राम 3.14 मिलीग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है, जबकि भैंस के दूध में यह प्रति ग्राम 0.65 मिली ग्राम होता है। इस लिहाज से छोटे बच्चों को इसे पचाने में दिक्कत हो सकती है। और यह भी कि भैंस के दूध में कैल्शियम, लोह और फॉस्फोरस ज्यादा होता है। मोटे तौर पर दूध शरीर के लिए स्वास्थ्यर्वधक है। इस बहस में पड़ना उचित नहीं कि गाय या भैंस में किसका दूध बेहतर है।

मिट्टी के बर्तन में पानी ठंडा क्यों रहता है?
रीता जैन, 49-एच. आई. जी., ममफोर्ड गंज, इलाहाबाद-211002 (उ.प्र.)

जब किसी तरल पदार्थ का तापमान बढ़ता है तो भाप बनती है। भाप के साथ तरल पदार्थ की ऊष्मा भी बाहर जाती है। इससे तरल पदार्थ का तापमान कम रहता है। मिट्टी के बर्तन में रखा पानी उस बर्तन में बने असंख्य छिद्रों के सहारे बाहर निकल कर बाहरी गर्मी में भाप बनकर उड़ जाता है और अंदर के पानी को ठंडा रखता है। बरसात में वातावरण में आद्र्रता ज्यादा होने के कारण भाप बनने की यह क्रिया धीमी पड़ जाती है, इसलिए बरसात में यह असर दिखाई नहीं पड़ता।

बच्चों में बड़ों की अपेक्षा अधिक हड्डियां क्यों होती हैं?
नितिषा गोयल, 9-एम.आई.जी., ममफोर्डगंज, त्रिपाठी चौराहे के पास, इलाहाबाद-211002 (उ.प्र.)

बच्चों के शरीर की तमाम हड्डियाँ उम्र बढ़ने के साथ एक-दूसरे से जुड़कर एक बन जाती हैं। आपने देखा होगा कि एकदम नन्हे बच्चों के सिर में मुलायम हिस्सा होता है। उस वक्त सिर की हड्डी कई भागों में होती है। बाद में वह एक बन जाती है।

सिक्ससेंस से क्या तात्पर्य है?
अमित पटेरिया, एमएलबी कालेज के पास, अचलेश्वर टॉवर, फ्लैट न. 102, लश्कर, ग्वालियर, म.प्र.-474009

सामान्यत: मनुष्य की पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मानी जाती हैं। देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूँघना और स्वाद लेना। सिक्स्थ सेंस का मतलब है इनसे अलग का अनुभव। इसे अतीन्द्रिय ज्ञान या परामानसिक अनुभव कहते हैं। हमें भीतरी रूप से महसूस होना या अंतर्मन आदि। इसका वैज्ञानिक आधार नहीं है, पर इसके काफी उदाहरण मिलते हैं। मसलन किसी को सपने में कोई बात दिखाई पड़ती है जो सच हो जाती है।

हमारे राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह पर उत्कीर्ण ‘सत्यमेव जयते’ कहां से लिया गया है? पूरा मंत्र क्या है और उसका अर्थ क्या है?
कदम, जमशेदपुर-831005.

‘सत्यमेव जयते’ मूलत: मुण्डक उपनिषद का मंत्र 3.1.6 है। पूरा मंत्र इस प्रकार है:- सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पंथा विततो देवयान:। येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत् सत्यस्य परमम् निधानम्।। अर्थात आखिरकार सत्य की जीत होती है न कि असत्य की। यही वह राह है जहाँ से होकर आप्तकाम (जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों) मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। सत्यमेव जयते को स्थापित करने में पं मदनमोहन मालवीय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

जब केबिल टी.वी. चलता है तो कभी-कभी अंग्रेजी में कुछ संख्याएं एवं अंग्रेजी के अक्षर क्यों आ जाते हैं?इन संख्यांओं एवं अक्षरों के आने का तात्पर्य क्या है?
अनिल कुमार श्रीवास्तव, म.नं. बी-228, संचार विहार, आई.टी.आई. टाउनशिप, मनकापुर-271308.जिला-गोण्डा (उ.प्र.)।

आमतौर पर प्रसारण करने वाले कुछ देर के लिए विशेष कोड का प्रसारण भी करते हैं। उनका उद्देश्य यह देखना होता है कि कार्यक्रम का प्रसारण वैध स्रोत से हो रहा है अथवा नहीं।

 चन्द्रमा  पर ध्वनि क्यों नहीं सुनाई देती है?
नीतू कनौजिया, 43 ए, गली नं. 6 निकट काली माता मंदिर, डिफेंस इंक्लेव, मोहन गार्डन, दिल्ली-59.
ध्वनि की तरंगों को चलने के लिए किसी माध्यम की ज़रूरत होती है। चन्द्रमा पर न तो हवा है और न किसी प्रकार का कोई और माध्यम है। इसलिए आवाज़ सुनाई नहीं पड़ती।


Tuesday, January 20, 2015

भारत में पहली मोबाइल फोन कॉल

कादम्बिनी, ज्ञानकोश, अक्तूबर-2012
भारत में पहली मोबाइल कॉल कौन से सन में हुई तथा किस-किस शहर के बीच हुई?
खुशवीर मोठसरा, गांव व डाकखाना : रावलधी, तहसील : चरखी-दादरी, जिला : भिवानी (हरियाणा)-127306 

भारत में मोबाइल फोन सेवा का गैर-व्यावसायिक तौर पर पहला प्रदर्शन 15 अगस्त 1995 को दिल्ली में किया गया। पर पहली कॉल उसके पहले 31 जुलाई 1995 को कोलकाता में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने की जब मोदी टेलस्ट्रॉ मोबाइल नेट सेवा का प्रदर्शन और उद्घाटन किया गया।

सुनु जननी! सोई सुत बड़भागी।
जो पितु-मातु-वचन-अनुरागी।।
तनय मातु-पितु तोषन हारा।
दूरलभ जननी! सफल संसारा।।
-इन पंक्तियों  का क्या अर्थ है?
अमर परमार, द्वारा श्री सांवरमल योगी, फूलबाग, कॉलोनी, आमेर, जयपुर-302028, राज.

उपरोक्त पंक्तियाँ रामचरित मानस से ली गईं हैं। इनका भावार्थ है कि हे माता-पिता सुनो। वही पुत्र बड़भागी है जो माता-पिता के वचनों का अनुरागी अर्थात पालन करने वाला है। आज्ञा पालन करके माता-पिता को संतुष्ट करने वाला पुत्र हे जननी संसार में दुर्लभ है।

बच्चों में बड़ों की अपेक्षा अधिक हड्डियां क्यों होती हैं?
नितिषा गोयल, 9-एम.आई.जी., ममफोर्डगंज, त्रिपाठी चौराहे के पास, इलाहाबाद-211002 (उ.प्र.)

बच्चों के शरीर की तमाम हड्डियाँ उम्र बढ़ने के साथ एक-दूसरे से जुड़कर एक बन जाती हैं। आपने देखा होगा कि एकदम नन्हे बच्चों के सिर में मुलायम हिस्सा होता है। उस वक्त सिर की हड्डी कई भागों में होती है। बाद में वह एक बन जाती है।

सिक्ससेंस से क्या तात्पर्य है?
अमित पटेरिया, एमएलबी कालेज के पास, अचलेश्वर टॉवर, फ्लैट न. 102, लश्कर, ग्वालियर, म.प्र.-474009
सामान्यत: मनुष्य की पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मानी जाती हैं। देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूँघना और स्वाद लेना। सिक्स्थ सेंस का मतलब है इनसे अलग का अनुभव। इसे अतीन्द्रिय ज्ञान या परामानसिक अनुभव कहते हैं। हमें भीतरी रूप से महसूस होना या अंतर्मन आदि। इसका वैज्ञानिक आधार नहीं है, पर इसके काफी उदाहरण मिलते हैं। मसलन किसी को सपने में कोई बात दिखाई पड़ती है जो सच हो जाती है।

सेंधा नमक फलाहारी माना जाता है इसलिए व्रत में खाया जाता है, जबकि सादा नमक या काला नमक फलाहारी नहीं माना जाता। ऐसा क्यों?
अनुक्षा अग्रवाल, एम-142, जी.के.-2. नई दिल्ली-110048

पुराने ज़माने में समुद्री नमक बोरों में भरकर और उसके क्रिस्टल रूप में बिकता था। शायद इस वज़ह से उसे उतना शुद्ध नहीं माना गया जितना सेंधा या लाहौरी नमक को माना जाता है। सेंधा नमक वस्तुत: नमक की चट्टान है, जिसे पीसकर पाउडर की शक्ल में बनाते हैं। काला नमक मसाले (मूलत: हरड़) मिलाकर बनाया जाता है, इसलिए उसे भी पूरी तरह शुद्ध नमक माना जा सकता।

कमप्यूटर के की-बोर्ड तथा डिक्शनरी में अंग्रेजी के सभी अक्षर छोटे और बड़े होते हैं, परन्तु जेड सिर्फ बड़े अक्षर में ही क्यों होता है?
डॉ. विनोद कुमार, एल.डी.ए.वी. इंटर कॉलेज, अनूपशहर (उ. प्र.)-202390.
दरअसल यह की -बोर्ड का नहीं फॉण्ट का मसला है। फॉण्ट कई आकार प्रकार के होते हैं। जेड या ज़ी ही नहीं कुछ और अक्षर भी समान रूप में छोटे आकार में लोअर केस में आपको मिलंगे। मसलन Cc, Oo, Vv, Ww, Xx और Zz के लोअर केस में सिर्फ आकार का बदलाव होता है। यों ज़ेड या ज़ी का एक छोटा रूप आपको ऐसा भी मिलेगा 3। इसके कई रूप आपको देखने को मिलेंगे।

बादल क्यों और कैसे फटते हैं?
मुनेन्द्र वाष्र्णेय, न्यू कॉलोनी, सुभाष रोड, चन्दौसी-उ.प्र.-202412.

बादल फटने का अर्थ आसमान से अचानक बड़ी जलधार का गिरना है। जब वातावरण में बहुत ज्यादा नमी होती है और भारी पानी के साथ कपासी वर्षी (क्यूम्यूलोनिंबस) बादल ऊपर उठते हैं और उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिलता तब सारा पानी वहीं गिर जाता है। कपासी वर्षी मेघ लम्बवत काफी ऊँचे होते हैं। आमतौर पर ऊँचे पहाड़ों से टकराने के बाद वे फटते हैं। बादलों की यह ऊँचाई 15 किलोमीटर या उससे ज्यादा हो सकती है। यह एक तरीके से पानी भरे बैलून का फटना है। उनकी बूँदों का आकार सामान्य बूँदों से कहीं बड़ा होता है। यह बादल फटने की सरल व्याख्या है। इसकी दूसरी स्थितियाँ भी  हो सकती हैं। मसलन सर्द और गर्म हवाएं विपरीत दिशाओं से टकराने से भी बादल फटते हैं। 26 जुलाई 2005 को मुम्बई में इसी तरह बादल फटे थे। 18 जुलाई 2009 को पाकिस्तान के कराची शहर में भी ऐसा ही हुआ। वहाँ दो घंटे में 250 मिमी बारिश हो गई। इस घटना में गरज के साथ ओले भी गिरते हैं। पानी इतना ज्यादा होता है कि कि कुल देर के लिए प्रलय जैसी लगने लगती है। एक घंटे में 75 मिली मीटर तक बारिश हो जाती है।

मुक्केबाजी या कुश्ती में 51 किलोग्राम या 66 किलोग्राम का क्या अर्थ होता है?
विनोद कुमार सिन्हा, म.नं. 88, मान्टेसरी स्कूल लेन, बोरिंग रोड, पटना-800001

मुक्केबाज़ी, कुश्ती और जूडो, कराते और भारोत्तोलन जैसी प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों के शरीर का वज़न भी महत्वपूर्ण होता है। इसलिए इनमें खिलाड़ियों को अलग-अलग वज़न के आधार पर वर्गीकृत करते हैं। उदाहरण के लिए लंदन ओलिम्पिक की पुरुष वर्ग की बॉक्सिंग प्रतियोगिता में दस वर्ग इस प्रकार थे 1.लाइट फ्लाई वेट 49 किलोग्राम तक, 2.फ्लाईवेट 52 किलो तक, 3.बैंटमवेट 56 किलो, 4.लाइट वेट 60 किलो, 5.लाइट वेल्टर 64 किलो, 6.वेल्टर 69 किलो, 7.मिडिल 75 किलो, 8.लाइट हैवी 81 किलो, हैवी 91 और सुपर हैवी 91 किलो से ज्यादा। महिलाओं के वर्ग का वर्गीकरण दूसरा था। इसी तरह कुश्ती का वर्गीकरण महिला और पुरुष वर्ग में अलग-अलग था।

सवाल-क्या कुछ फफूंदियां लाभदायक भी होती हैं?
मुकेश जैन, सी-26, मिडल-सर्कल, कनाट प्लेस, नई दिल्ली-110001.

फफूंद या कवक एक प्रकार के पौधे हैं जो अपना भोजन सड़े-गले मृत कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं। ये सृष्टि की शुरूआत से ही हैं और इनका मुख्य काम प्रकृति को साफ रखने का है। इसे वनस्पतियों में शामिल किया जाता है, पर ये क्लोरोफिल रुहत होते पर इनमें जड़, तना और पत्तियाँ नहीं होतीं। एक प्रकार से ये वनस्पतियों, प्राणियों और बैक्टीरिया से अलग कोटि के होते हैं। फफूंदी का संक्रमण ज़रूर पीड़ादायक होता है, पर फफूंदी मूल रूप में लाभदायक ही है। खमीर और मशरूम के रूप में आप अपने भोजन में इन्हें पाते हैं। कई तरह की औषधियों में इनका इस्तेमाल होता है।

आकाश में ध्रुवतारा सदा एक ही स्थान पर दिखता है, जबकि अन्य तारे नहीं, क्यों?
राजेश कुमार कनौजिया,74 ए, गली नं. 6, जी-3 ब्लॉक, पार्ट-1, सांई इंक्लेव, मोहन गार्डन, नई दिल्ली-110059.

ध्रुवतारे की स्थिति हमेशा उत्तरी ध्रुव पर रहती है। इसलिए उसका या उनका स्थान नहीं बदलता। यह एक तारा नहीं है, बल्कि तारामंडल है। धरती के अपनी धुरी पर घूमते वक्त यह उत्तरी ध्रुव की सीध में होने के कारण हमेशा उत्तर में दिखाई पड़ता है।  इस वक्त जो ध्रुव तारा है उसका अंग्रेजी में नाम उर्सा माइनर तारामंडल है। जिस स्थान पर ध्रुव तारा है उसके आसपास के तारों की चमक कम है इसलिए यह अपेक्षाकृत ज्यादा चमकता प्रतीत होता है। धरती अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर परिक्रमा करती है, इसलिए ज्यादातर तारे र्पूव से पश्चिम की ओर जाते हुए नज़र आते हैं। चूंकि ध्रुव तारा सीध में केवल मामूली झुकाव के साथ उत्तरी ध्रुव के ऊपर है इसलिए उसकी स्थिति हमेशा एक जैसी लगती है। स्थिति बदलती भी है तो वह इतनी कम होती है कि फर्क दिखाई नहीं पड़ता। पर यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी। हजारों साल बाद यह स्थिति बदल जाएगी, क्योंकि मंदाकिनियों के विस्तार और गतिशीलता के कारण और पृथ्वी तथा सौरमंडल की अपनी गति के कारण स्थिति बदलती रहती है। यह बदलाव सौ-दो सौ साल में भी स्पष्ट नहीं होता। आज से तीन हजार साल पहले उत्तरी ध्रुव तारा वही नहीं था जो आज है। उत्तर की तरह दक्षिणी ध्रुव पर भी तारामंडल हैं, पर वे इतने फीके हैं कि सामान्य आँख से नज़र नहीं आते। उत्तरी ध्रुव तारा भूमध्य रेखा के तनिक दक्षिण तक नज़र आता है। उसके बाद नाविकों को दिशाज्ञान के लिए दूसरे तारों की मदद लेनी होती है।


हमारे राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह पर उत्कीर्ण ‘सत्यमेव जयते’ कहां से लिया गया है? पूरा मंत्र क्या है और उसका अर्थ क्या है?
कदम, जमशेदपुर-831005.

‘सत्यमेव जयते’ मूलत: मुण्डक उपनिषद का मंत्र 3.1.6 है। पूरा मंत्र इस प्रकार है:- सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पंथा विततो देवयान:। येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत् सत्यस्य परमम् निधानम्।। अर्थात आखिरकार सत्य की जीत होती है न कि असत्य की। यही वह राह है जहाँ से होकर आप्तकाम (जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों) मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। सत्यमेव जयते को स्थापित करने में पं मदनमोहन मालवीय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

जब केबिल टी.वी. चलता है तो कभी-कभी अंग्रेजी में कुछ संख्याएं एवं अंग्रेजी के अक्षर क्यों आ जाते हैं। इन संख्यांओं एवं अक्षरों के आने का तात्पर्य क्या है?
अनिल कुमार श्रीवास्तव, म.नं. बी-228, संचार विहार, आई.टी.आई. टाउनशिप, मनकापुर-271308.जिला-गोण्डा (उ.प्र.)।

आमतौर पर प्रसारण करने वाले कुछ देर के लिए विशेष कोड का प्रसारण भी करते हैं। उनका उद्देश्य यह देखना होता है कि कार्यक्रम का प्रसारण वैध स्रोत से हो रहा है अथवा नहीं।

 चन्द्रमा  पर ध्वनि क्यों नहीं सुनाई देती है?
नीतू कनौजिया, 43 ए, गली नं. 6 निकट काली माता मंदिर, डिफेंस इंक्लेव, मोहन गार्डन, दिल्ली-59.

ध्वनि की तरंगों को चलने के लिए किसी माध्यम की ज़रूरत होती है। चन्द्रमा पर न तो हवा है और न किसी प्रकार का कोई और माध्यम है। इसलिए आवाज़ सुनाई नहीं पड़ती।

बूझ-बुझौवल
इस बार के सवाल
क्या रावण की लंका वास्तव में ‘सोने’ की थी या सोने के लिए थी? यदि सोने की थी तो इतना सोना गया कहां? 
राम अवतार जैन, एन.एस.एस.ओ., बी.डी.ए. कम्पलेक्स, दूसरी मंजिल, प्रियदर्शिनी नगर, बरेली, (उ. प्र.)-243502.

आमंत्रण और निमंत्रण में क्या अंतर है?
दिलीप भाटिया, 372/201, न्यू मार्केट, रावतभाटा-323307 (राजस्थान)।

साहित्यकार अपने नाम के साथ-साथ एक उपनाम क्यों लगाते हैं? जैसे-सूर्यकान्त त्रिपाठी-निराला।
नौ दो ग्यारह’, चार सौ बीस और दस नम्बरी संख्याएं क्यों मुहावरों में चर्चित या बदनाम हैं?
शशिभूषण बडोनी, चीफ फार्मेसिस्ट, राजकीय संयुक्त चिकित्सालय, प्रेमनगर, देहरादून (उ. प्र.)-248007.

भारत में संस्कृत का समाचार पत्र कहां से निकलता है?
इंदर गांधी, 290/13, अरबन एस्टेट एक्सटेंशन, करनाल।


Sunday, January 18, 2015

सबसे पुराना शब्दकोश


विश्व का पहला शब्दकोश dictionary किस भाषा में कब और कहां तैयार किया गया?

दुनिया की सबसे पुरानी द्विभाषी शब्द सूचियों के उदाहरण प्राचीन मेसोपोटामिया के अक्कादी साम्राज्य में मिलते हैं। आधुनिक सीरिया के एब्ला क्षेत्र में मिट्टी की पट्टिकाएं मिली हैं, जिनमें सुमेरी और अक्कादी भाषाओं में शब्द लिखे गए हैं। ये पट्टियाँ 2300 वर्ष ईपू की बताई जाती हैं। यों शब्दकोशों के शुरुआती अस्तित्व से अनेक देशों और जातियों के नाम जुड़े हैं। शब्दकोश का मतलब शब्द संग्रह, द्विभाषी कोश और पर्यायवाची कोश होता है। इन सबके विकास का अपना अलग इतिहास है। भारत में सबसे पुराना शब्द संग्रह प्रजापति कश्यप का 'निघंटु' है। उसका रचना काल 700 या 800 साल ईपू है। उसके पूर्व भी 'निघंटु' की परंपरा थी। निघंटु पर महर्षि यास्क की व्याख्या निरुक्त दुनिया के प्राचीनतम शब्दार्थ कोशों (डिक्शनरी) एवं विश्वकोशों (एनसाइक्लोपीडिया) में शामिल है। इस शृंखला की सशक्त कड़ी है छठी या सातवीं सदी में लिखा अमर सिंह कृत नामलिंगानुशासन या त्रिकांड जिसे हम अमरकोश के नाम से जानते हैं। चीन में भी ईसवी सन के हजार साल के पहले से ही कोश बनने लगे थे। उस श्रुति-परंपरा का प्रमाण बहुत बाद में उस पहले चीनी कोश में मिलता है, जिसकी रचना 'शुओ वेन' ने पहली दूसरी सदी ई० के आसपास की थी। कहा जाता है कि हेलेनिस्टिक युग के यूनानियों ने यूरोप में सर्वप्रथम कोश रचना आरंभ की। यूनानियों का महत्व समाप्त कम होने और रोमन साम्राज्य के वैभव काल में तथा मध्यकाल में भी बहुत से लैटिन कोश बने।

दिल्ली में सबसे ज्यादा गहराई वाला मेट्रो स्टेशन कौन सा है?
दिल्ली में सबसे ज्यादा गहराई वाला मेट्रो स्टेशन चावड़ी बाज़ार है, जो 30 मीटर यानी तकरीबन 98 फुट की गहराई पर है। इसके आसपास जामा मस्जिद और लाल किला जैसी ऐतिहासिक इमारतें हैं, उन्हें मेट्रो चलने से किसी प्रकार का नुकसान न हो इसलिए इतनी गहराई रखी गई है।

एम्बुलेंस की आवाज़ का आविष्कार किसने किया? इसका रंग लाल और नीला क्यों होता है?

आमतौर पर आप एम्बुलेंस की जो आवाज सुनते हैं, वह इलेक्ट्रॉनिक सायरन हैं। एमबुलेंस में सायरन के अलावा फ्लैशिंग लाइट, स्पीकर, रेडियों फोन और अन्य उपकरण होते हैं ताकि सड़क पर उसके लिए लोग रास्ता छोड़ दें। शुरू के सायरन हवा के दबाव से चलते थे। एक दौर में सिर्फ घंटियाँ बजाकर भी काम किया जाता था। आज सबसे प्रसिद्ध ह्वेलेन इलेक्ट्रॉनिक सायरन हैं। एम्बुलेंस को अलग दिखाई पड़ने के लिए चमकदार रंगों से सजाया जाता है। ज़रूरी नहीं कि वह रंग नीला और लाल हो। पीले, हरे, नारंगी और दूसरे रंगों में भी एम्बुलेंस दुनियाभर में पाई जाती हैं। उद्देश्य होता है कि उन्हें लोग जल्द पहचानें और रास्ता छोड़ दें। एम्बुलेंस केवल मोटरगाड़ियों में ही नहीं होतीं। एम्बुलेंस हवाई जहाजों, हेलिकॉप्टरों से लेकर नावों, घोड़ागाड़ियो, मोटर साइकिलों और साइकिलों पर भी होती हैं। एम्बुलेंस में सामने की ओर आपने अक्सर अंग्रेजी के उल्टे अक्षरों में एम्बुलेंस लिखा देखा होगा। इसका उद्देश्य है कि आगे चल रही गाड़ियों के ड्राइवरों को पीछे आती गाड़ी के अक्षर साफ दिखाई पड़ सकें। चूंकि वह दर्पण में उल्टे अक्षर पढ़ पाता है इसलिए उल्टे अक्षर लिखे जाते हैं।
राजस्थान पत्रिका के मीनेक्स्ट में 18 जनवरी 2015 को प्रकाशित

Saturday, January 10, 2015

लोकतांत्रिक स्याही क्या होती है?

भारत मे सर्वप्रथम प्रतियोगिता परीक्षा किस विभाग की हुई?
-रोहिताश मीणा, खिँवास (जयपुर)

भारत में सन 1857 की लड़ाई के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी शासन के स्थान पर अंग्रेजी सरकार का शासन स्थापित हो गया था। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858 के तहत भारत में नागरिक सेवाओं के लिए अफसरों की नियुक्ति के नियम भी बनाए गए। इस सेवा को पहले इम्पीरियल सिविल सर्विस और बाद में इंडियन सिविल सर्विस का नाम दिया गया।  शुरुआत में उनकी भरती की परीक्षाएं केवल लंदन में होती थीं। बाद में इलाहाबाद में भी होने लगीं। नीचे के पदों को भारतीय कर्मचारियों से भरा जाता था। सन 1923 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में स्थानीय भागीदारी के लिए एक आयोग बनाया जिसके अध्यक्ष थे लॉर्ड ली ऑफ फेयरहैम। इसके पहले इंस्लिंगटन कमीशन और मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड आयोग ने भी भारतीयों की भागीदारी के लिए सिफारिशें की थीं। बहरहाल ली आयोग ने सिफारिश की कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में 40 फीसदी ब्रिटिश, 40 फीसदी भारतीय सीधे और 20 फीसदी स्थान प्रादेशिक सेवाओं से प्रोन्नति देकर लाए गए अफसरों को दिए जाएं। ली आयोग ने भरती के लिए एक लोक सेवा आयोग बनाने की सिफारिश भी की। इसके बाद सन 1926 में संघ लोकसेवा आयोग की स्थापना हुई। स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा ने अनुच्छेद 315 के तहत इसे एक स्वायत्त संस्था के रूप में संविधान में स्थान भी दिया।

आईसीयू क्या होता है? रोगियों को इसकी जरूरत क्यों होती है?
आईसीयू का मोटा मतलब है इंटेंसिव केयर यूनिट। यानी अस्पताल का वह कक्ष जहाँ मरीज पर गहराई से नजर रखी जाती है। इसे इंटेंसिव ट्रीटमेंट यूनिट (आईटीयू) इंटेंसिव कोरोनरी केयर यूनिट (आईसीसीयू) या क्रिटिकल केयर यूनिट (सीसीयू) जैसे नाम भी दिए जाते हैं। मूल बात यह है कि इस कक्ष में ऐसे उपकरण और सुविधाएं होती हैं जो रोगी की सहायता कर सकें। ये सुविधाएं लग-अलग आवश्यकताओं के अनुसार होती हैं। मसलन हृदय का दौरा पड़ने के बाद अस्पताल में आए रोगी के लिए जो सुविधाएं चाहिए, उससे अलग किस्म की सुविधाएं हृदय का ऑपरेशन कराने वाले रोगियों को चाहिए। अस्पतालों में अब ये कक्ष विशेषज्ञता के आधार पर बनाए जाते हैं।

चुनाव के दौरान लगाई जाने वाली स्याही की संरचना क्या है? इसका क्या अन्यत्र भी इस्तेमाल किया जा सकता है?

भारत में शुरूआती चुनावों में इस स्याही का इस्तेमाल नहीं होता था, पर बाद में फर्जी मतदान की शिकायतें आने पर सन 1962 से इस स्याही का इस्तेमाल होने लगा। चुनाव आयोग ने भारतीय कानून मंत्रालय, राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला, राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम के साथ मिलकर इस स्याही को तैयार किया था। इसका फॉर्मूला गोपनीय है और इसका पेटेंट राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला के पास है। मोटे तौर पर सिल्वर नाइट्रेट से तैयार होने वाली यह स्याही त्वचा पर एक बार लग जाए तो काफी दिन तक इसका निशान रहता है। इतना ही नहीं, यह त्वचा पर पराबैंगनी (अल्ट्रा वॉयलेट) रोशनी पड़ने पर चमकती भी है जिससे  इसे  छिपाना  संभव नहीं। कर्नाटक सरकार के सरकारी प्रतिष्ठान मैसूर पेंट्स एवं वार्निश लिमिटेड द्वारा बनाई जाने वाली इस स्याही के ग्राहकों में दुनिया के 28 देश शामिल हैं। इस स्याही को खासतौर से चुनाव के लिए ही बनाया गया है। इसलिए इसे लोकतांत्रिक स्याही भी कहते हैं। इसका कोई दूसरा इस्तेमाल नहीं है।

एक क्यूसेक कितने लिटर के बराबर होता है? 
क्यूसेक बहते पानी या तरल का पैमाना है और लिटर स्थिर तरल का। क्यूसेक माने होता है क्यूबिक फीट पर सेकंड। यानी एक फुट चौड़े, एक फुट लम्बे और एक फुट गहरे स्थान से एक सेकंड में जितना पानी निकल सके। सामान्यतः एक क्यूसेक में 28.317 लिटर पानी होता है। 



राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट में 31 अगस्त 2014 को प्रकाशित

Thursday, January 8, 2015

शार्क मछलियाँ काट रहीं हैं समुद्र में बिछे केबल


हाल में कहीं पढ़ा था कि शार्क मछलियाँ समुद्र के भीतर पड़े केबल तारों को काट रही हैं। समुद्र के भीतर कैसे केबल तार हैं और मछलियाँ उन्हें क्यों काट रहीं हैं? कृपया जानकारी दें।
तमाम किस्म के संचार सम्पर्क का सबसे सफल और व्यावहारिक तरीका केबल वायर है। यह केबल वायर अब फाइबर ऑप्टिक तकनीक पर आधारित हैं। इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के साथ केबल वायर तकनीक में भी क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है। टेलीग्राफी के आविष्कार के बाद से दुनिया में संचार केबल बिछाने का काम शुरू हुआ। इसके बाद टेलीफोन और डेटा लाइनों के केबल डाले गए। हाल में इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के बाद से डिजिटल सामग्री के आदान-प्रदान में इनकी भूमिका बढ़ गई है। आप इतना समझ लें कि गीत, संगीत, वीडियो से लेकर तमाम तरह के सैनिक सम्पर्क इन केबलों की मदद से होता है। यह सम्पर्क सैटेलाइटों के साथ-साथ समुद्र के अंदर बिछे केबल के सहारे होता है। दुनिया में अंटार्कटिका को छोड़कर सारे महाद्वीप केबल वायर से जुड़े हैं। हाल में गूगल और पाँच अन्य टेली-कम्पनियों ने मिलकर अमेरिका को जापान से जोड़ने वाले ट्रांस-पैसिफिक केबल नेटवर्क स्थापित करने का फैसला किया है। इसमें 3000 किमी लम्बा केबल नेटवर्क होगा।
ये केबल ज़मीन के नीचे भी बिछाए जाते हैं, पर समुद्र पार इलाकों तक ले जाने के लिए समुद्र के पानी में गहराई पर इन्हें बिछाने की शुरूआत भी काफी पहले हो गई थी। यूरोप को अमेरिकी महाद्वीप से जोड़ने वाले पहला ट्रांस-अटलांटिक केबल 1858 में बिछाया गया था। इसके सहारे 16 अगस्त 1858 को पहली बार इंग्लैंड की रानी विक्टोरिया ने अमेरिका के राष्ट्रपति जेम्स बुकैनन को बधाई संदेश भेजा था। भारत सन 1863 में केबल से जुड़ा जब मुम्बई (तब बॉम्बे) को सऊदी अरब से जोड़ने वाला केबल चालू हुआ। सन 1870 में मुम्बई बाकायदा लंदन से जुड़ गया था।
आधुनिक केबल सामान्यतः 69 मिमी (2,7 इंच) व्यास का होता है। इसके केंद्र में ऑप्टिकल फाइबर होता है और उसकी रक्षा के लिए ताँबे, पॉली कार्बोनेट, नायलन, स्टील की जाली और पॉलीयूरेथेन कवर होते हैं। एक मीटर केबल का वज़न सामान्यतः 10 किलोग्राम के बराबर होता है। नए केबल अत्यधिक तेज गति के हैं। जो नए केबल बिछाए जा रहे हैं वे 3 टेराबिट प्रति सेकंड या उससे ज्यादा स्पीड से डेटा भेजने में समर्थ हैं।

1980 के दशक से खबरें मिल रहीं है कि शार्क मछलियाँ इन केबल नेटवर्क को अपने तेज दाँतों से काट देती हैं। हाल में गूगल ने जिस फास्टर नाम के ट्रांस-पैसिफिक नेटवर्क की योजना बनाई है उसमें शार्क मछलियों से बचाव की व्यवस्था भी की गई है। इन केबलों के चारों और ऐसा पदार्थ लपेटा जाएगा कि मछलियाँ काट न पाएं। 
राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट में 14 सितम्बर 2014 को प्रकाशित

Tuesday, January 6, 2015

ई-कचरा क्या है? इसका निपटारा कैसे होता है?

आपने ध्यान दिया होगा कि घरों से निकलने वाले कबाड़ में अब पुराने अखबारों, बोतल, डिब्बों, लोहा-लक्कड़ के अलावा पुराने कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, सीडी, टीवी, अवन, रेफ्रिजरेटर, एसी जैसे तमाम इलेक्ट्रॉनिक आइटम जगह बनाते जा रहे हैं। पहले बड़े आकार के कम्प्यूटर, मॉनिटर आते थे, जिनकी जगह स्लिम और फ्लैट स्क्रीन वाले छोटे मॉनिटरों ने ले ली है। माउस, की-बोर्ड या अन्य उपकरण जो चलन से बाहर हो गए हैं, वे ई-वेस्ट की श्रेणी में आते हैं। फैक्स, मोबाइल, फोटो कॉपियर, कम्प्यूटर, लैप-टॉप, कंडेंसर, माइक्रो चिप्स, पुरानी शैली के कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, टेलीविजन और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों तथा अन्य उपकरणों के बेकार हो जाने के कारण इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। अमेरिका में हरेक घर में साल भर में औसतन छोटे-मोटे 24 इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खरीदे जाते हैं। इन पुराने उपकरणों का फिर कोई उपयोग नहीं होता। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका में कितना इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकलता होगा। बदलती जीवन शैली और बढ़ते शहरीकरण के कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का ज्यादा प्रयोग होने लगा है। इससे पैदा होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे के दुष्परिणाम से हम बेखबर हैं। ई-कचरे से निकलने वाले रासायनिक तत्त्व लीवर, किडनी को प्रभावित करने के अलावा कैंसर, लकवा जैसी बीमारियों का कारण बन रहे हैं। उन इलाकों में रोग बढ़ने का अंदेशा ज्यादा है जहाँ अवैज्ञानिक तरीके से ई-कचरे की रीसाइक्लिंग की जा रही है। ई-वेस्ट से निकलने वाले जहरीले तत्व और गैसें मिट्टी व पानी में मिलकर उन्हें बंजर और जहरीला बना देते हैं। फसलों और पानी के जरिए ये तत्व हमारे शरीर में पहुंचकर बीमारियों को जन्म देते हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने कुछ साल पहले जब सर्किट बोर्ड जलाने वाले इलाके के आसपास शोध कराया तो पूरे इलाके में बड़ी तादाद में जहरीले तत्व मिले थे, जिनसे वहां काम करने वाले लोगों को कैंसर होने की आशंका जताई गई, जबकि आसपास के लोग भी फसलों के जरिए इससे प्रभावित हो रहे थे।

भारत सहित कई अन्य देशों में हजारों की संख्या में महिला पुरुष व बच्चे इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निपटान में लगे हैं। इस कचरे को आग में जलाकर इसमें से आवश्यक धातु आदि भी निकाली जाती हैं। इसे जलाने के दौरान जहरीला धुआँ निकलता है, जो घातक होता है। सरकार के अनुसार 2004 में देश में ई-कचरे की मात्रा एक लाख 46 हजार 800 टन थी जो बढ़कर वर्ष 2012 तक आठ लाख टन से ज्यादा हो गई है। विकसित देश अपने यहाँ के इलेक्ट्रॉनिक कचरे की गरीब देशों को बेच रहे हैं। गरीब देशों में ई-कचरे के निपटान के लिए नियम-कानून नहीं बने हैं।  इस कचरे से होने वाले नुकसान का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें 38 अलग प्रकार के रासायनिक तत्व शामिल होते हैं जिनसे काफी नुकसान भी हो सकता है। इस कचरे को आग में जलाकर या तेजाब में डुबोकर इसमें से आवश्यक धातु आदि निकाली जाती है।
यों ई-वेस्ट के सही निपटान के लिए जब तक व्यवस्थित ट्रीटमेंट नहीं किया जाता, वह पानी और हवा में जहर फैलता रहेगा। कुछ समय पहले दिल्ली के एक कबाड़ी बाजार में एक उपकरण से हुए रेडिएशन के बाद इस खतरे की और ध्यान गया है।


Monday, January 5, 2015

दाढ़ी के बाल पुरुषों के ही क्यों होते हैं?

खर्राटे क्यों आते हैं? क्या यह कोई बीमारी है या उसका कोई लक्षण है? तथा इनसे किस प्रकार बचा जा सकता है?

सोते समय गले का पिछला हिस्सा थोड़ा सँकरा हो जाता है। साँस जब सँकरी जगह से जाती है तो आसपास के टिशुओं में स्पंदन होता है, जिससे आवाज आती है। यही हैं खर्राटे। यह सँकरापन नाक एवं मुँह में सूजन के कारण भी हो सकता है। यह सूजन एलर्जी, संक्रमण, धूम्रपान, शराब पीने या किसी दूसरे कारण से हो सकती है। इससे फेफड़ों को कम आक्सीजन मिलती है, जिससे मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर ज्यादा ऑक्सीजन माँगने लगते हैं। ऐसे में नाक एवं मुँह ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, जिससे खर्राटे की आवाज आने लगती है। बच्चों में एडीनॉयड ग्रंथि में सूजन एवं टांसिल से भी खर्राटे आते हैं। मोटापे के कारण भी गले की नली में सूजन से रास्ता संकरा हो जाता है, और सांस लेने में आवाज आने लगती है। जीभ का बढ़ा आकार भी खर्राटे का बड़ा कारण है। ब्राज़ील में हुए एक शोध के अनुसार भोजन में नमक की अध‌िकता शरीर में ऐसे फ्लूइड का निर्माण करती है जिससे नाक के छिद्र में व्यवधान होता है।

बहरहाल खर्राटे या तो खुद बीमारी हैं या बीमारी का लक्षण हैं। खर्राटे से अचानक हृदय गति रुकने का खतरा रहता है। मधुमेह एवं मोटापे की बीमारी के कारण खर्राटे के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। खर्राटे के दौरान शरीर में रक्त संचार अनियमित हो जाता है, जो दिल के दौरे का बड़ा कारण है। दिमाग में रक्त की कम आपूर्ति से पक्षाघात तक हो सकता है। इससे फेफड़ों पर भी दबाव पड़ता है। खर्राटे के रोगियों को पॉलीसोमनोग्राफी टेस्ट करवाना चाहिए। यह टेस्ट व्यक्ति के सोते समय की शारीरिक स्थितियों की जानकारी देता है।

दाढ़ी के बाल सिर्फ पुरुषों के ही क्यों होते हैं, महिलाओं के क्यों नहीं?

जन्म के समय बच्चे के शरीर में लेता है तो उसके शरीर पर केवल रोएं जैसे बाल होते हैं। ग्यारह से तेरह की उम्र से लड़के और लड़कियों के शरीर में केश वृद्धि शुरू होती है. यही वह उम्र होती है जब सेक्स ग्रन्थियों का तेजी से विकास होता है। स्त्रियों और पुरुषों के शरीर में ग्रंथियाँ विशेष प्रकार के हारमोंस पैदा करती हैं जिन्हें एंड्रोजेंस कहते हैं। पुरुषों में एंड्रोजेंस की मौजूदगी के कारण ही दाढ़ी-मूँछें विकसित होती हैं। स्त्री में दूसरी सेक्स ग्रंथियां होती हैं जो दूसरे प्रकार के हारमोंस के पैदा करती हैं जिन्हें एस्ट्रोजेंस कहते हैं। पुरुष में बनने वाले हारमोंस आवाज़ में भारीपन और केश वृद्धि आदि को नियमित करते हैं। स्त्री में बनने वाले एस्ट्रोजेंस उसके सेक्स लक्षणों को पैदा करते हैं। इन्हीं हारमोंस के कारण स्त्री व पुरुष में शारीरिक भिन्नताएं होती हैं। औरतों का जिस्म कोमल, नरम व नाज़ुक रहता है वहीं पुरुषों का जिस्म सख्त व मजबूत होता है।

साधारण पेय पदार्थों  की बोतलों पर लिखा एफ पी ओ क्या होता है ?
केवल पेय ही नहीं वल्कि किसी भी प्रसंस्करित खाद्य या पेय सामग्री को पैक करके बेचने के लिए भारत में इसे लगाना जरुरी होता है । FPO का मतलब यह होता है कि इन पदार्थों को तैयार करते वक्त खाद्य सुरक्षा व मानक नियम 2006 के अंतर्गत निर्धारित मानकों का पालन किया गया है । भारत में प्रसंस्करित खाद्य तैयार करने के लिए FPO लाइसेंस लेना जरुरी है । एफपीओ का फुलफॉर्म है फूड प्रोसेस ऑर्डर। 


Sunday, January 4, 2015

नाम रखने का चलन क्यों शुरू हुआ?

नाम रखने की परम्परा कब से शुरू हुई?

यह बताना मुश्किल है कि नाम रखने का चलन कब और कहाँ से शुरू हुआ। इतना समझ में आता है कि नाम का रिश्ता पहचान से है। नाम व्यक्ति का ही नहीं वस्तु, वर्ग, समूह, समुदाय, स्थान, जाति, विषय वगैरह-वगैरह के होते हैं। यानी पहली बात पहचान की है। इस पहचान को कोई ध्वनि दी गई। वही नाम है। शुरू में नाम किसी जानवर को दिया गया होगा या किसी फल को या किसी तालाब, नदी या पेड़ को। पेड़ और फल को अलग-अलग पहचानने के लिए ऐसा करना पड़ा होगा। बस्ती और बस्ती का फर्क करने के लिए नाम रखा गया होगा। नदी और नदी, झील और झील। जबतक थोड़े से लोग होंगे नाम की जरूरत नहीं रही होगी, पर जब लोगों की संख्या बढ़ी होगी तब नाम भी बने होंगे। भाषा और लेखन का विकास होने पर इसमें सुधार हुए होंगे। बहरहाल दुनिया की सभी सभ्यताओं में व्यक्तियों के नाम मिलते हैं। यानी मनुष्य का नामकरण प्रागैतिहासिक काल में हो गया था।

एनालॉग सिग्नल्स और डिजिटल सिग्नल्स में क्या अंतर होता है?

हिन्दी में एनालॉग को अनुरूप और डिजिटल को अंकीय सिग्नल कहते हैं। दोनों सिग्नलों का इस्तेमाल विद्युतीय सिग्नलों के मार्फत सूचना को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए किया जाता है। दोनों में फर्क यह है कि एनालॉग तकनीक में सूचना विद्युत स्पंदनों के मार्फत जाती है। डिजिटल तकनीक में सूचना बाइनरी फॉर्मेट (शून्य और एक) में बदली जाती है। कम्प्यूटर द्वयाधारी संकेत (बाइनरी) ही समझता है। इसमें एक बिट दो भिन्न दिशाओं को व्यक्त करती है। इसे आसान भाषा में कहें तो कम्प्यूटर डिजिटल है और पुराने मैग्नेटिक टेप एनाल़ॉग। एनालॉग ऑडियो या वीडियो में वास्तविक आवाज या चित्र अंकित होता है जबकि डिजिटल में उसका बाइनरी संकेत दर्ज होता है, जिसे प्ले करने वाली तकनीक आवाज या चित्र में बदलती है। टेप लीनियर होता है, यानी यदि आपको कोई गीत सुनना है जो टेप में 10वें मिनट में आता है तो आपको बाकायदा टेप चलाकर 9 मिनट, 59 सेकंड पार करने होंगे। इसके विपरीत डिजिटल सीडी या कोई दूसरा फॉर्मेट सीधे उन संकेतों पर जाता है। पुराने रिकॉर्ड प्लेयर में सुई जब किसी ऐसी जगह आती थी जहाँ आवाज में झटका लगता हो तो वास्तव में वह आवाज ही बिगड़ती थी। डिजिटल सिग्नल में आवाज सुनाने वाला उपकरण डिजिटल सिग्नल पर चलता है। मैग्नेटिक टेप में जेनरेशन लॉस होता है। यानी एक टेप से दूसरे टेप में जाने पर गुणवत्ता गिरती है। डिजिटल प्रणाली में ऐसा नहीं होता।

प्रॉक्सी युद्ध क्या होता है?

प्रॉक्सी माने किसी के बदले काम करना। मुख्तारी, किसी का प्रतिनिधित्व। वह चाहे वोट देना हो या युद्ध लड़ना। दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर लड़ना या लड़ाना। यह युद्ध दो गुटों के बीच हो सकता है। या एक किसी का प्रॉक्सी युद्ध दूसरे से लड़ा जाए।

गारंटी और वॉरंटी में क्या अंतर है?

सामान्य अर्थ में गारंटी है किसी वस्तु की पूरी जिम्मेदारी। वह खराब हो तो या तो दुरुस्त करने या पूरी तरह बदलने का आश्वासन। वॉरंटी का मतलब है एक कीमत लेकर उस वस्तुगत को कारगर बनाए रखने का वादा।

पोक्सो कानून क्या है?

पोक्सो कानून से आशय है लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस)। 19 जून 2012 से लागू इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का सेक्सुअल बर्ताव इसके दायरे में आता है। इसके तहत लड़के और लड़की, दोनों को ही संरक्षण दिया गया है। इस तरह के मामलों की सुनवाई स्पेशल कोर्ट में होती है और बच्चों के साथ होने वाले अपराध के लिए उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट में प्रकाशित 26 अक्टूबर 2014

1 जनवरी को नया साल मनाना किसने शुरू किया?

एक जनवरी को नव-वर्ष दिवस किस ने और कब मनाना शुरू किया?

नया साल ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 1 जनवरी को होता है। अलग-अलग संस्कृतियों के अपने कैलेंडर और अपने नव वर्ष होते हैं। दुनिया के देश अलग-अलग समय पर नया साल मनाते हैं। विभिन्न सम्प्रदायों के नव वर्ष समारोह भिन्न-भिन्न होते हैं और इसका महत्व भी विभिन्न संस्कृतियों में भिन्न होता है। माना जाता है कि नए साल का उत्सव 4000 साल से भी पहले बेबीलोन में मनाया जाता था। पर तब यह पर्व 21 मार्च को मनाया जाता था जो कि वसंत के आगमन की तिथि भी मानी जाती थी। प्राचीन रोम में भी नव वर्षोत्सव तभी मनाया जाता था। रोम के बादशाह जूलियस सीजर ने ईसा पूर्व 45 वें वर्ष में जब जूलियन कैलेंडर की स्थापना कीतब विश्व में पहली बार 1 जनवरी को नए साल का उत्सव मनाया गया। ऐसा करने के लिए जूलियस सीजर को उससे पिछला साल यानी ईसा पूर्व ईसवी 46 को 445 दिन का करना पड़ा था। हिब्रू मान्यताओं के अनुसार ईश्वर ने दुनिया को सात दिन में इन सात दिनों के बाद नया वर्ष मनाया जाता है। यह दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक 5 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच आता है। हिन्दुओं का नया साल चैत्र नव रात्रि के पहले दिन आता है। इसे देश में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। चीनी कैलेंडर के अनुसार पहले महीने का पहला चन्द्र दिवस नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। यह आमतौर पर 21 जनवरी से २१ फरवरी के बीच पड़ता है। मारवाड़ी कारोबारी नया साल दीपावली के दिन मनाते हैं और गुजराती दीपावली के दूसरे दिन।

फेसबुक’ क्या है और इसे हैक कर लेने का क्या अर्थ है?
फेसबुक इंटरनेट पर एक निःशुल्क सामाजिक नेटवर्किंग सेवा है, जिसके माध्यम से 13 वर्ष से ऊपर की उम्र के इसके सदस्य अपने मित्रों, परिवार और परिचितों से संपर्क रखते हैं। इसे फेसबुक इनकॉरपोरेटेड नामक कंपनी संचालित करती है। इसके प्रयोक्ता कई तरह के नेटवर्कों में शामिल हो सकते हैं और आपस में विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इसकी शुरुआत फरवरी 2004 में हारवर्ड के एक छात्र मार्क ज़ुकरबर्ग ने की थी। इसके पहले 28 अक्तूबर 2003 से ज़ुकरबर्ग फेसमैश नाम से वैबसाइट चला रहे थे जिसमें छात्र दो दोस्तों के चित्रों को बराबर रखकर उनमें तुलना करते थे। फरवरी 2004 में जब इसे शुरू किया गया तब इसका नाम द फेसबुक था। कॉलेज नेटवर्किंग के रूप में शुरू होने के बाद जल्द ही यह कॉलेज परिसर में लोकप्रिय होती चली गई। कुछ ही महीनों में यह नेटवर्क पूरे यूरोप में पहचाना जाने लगा। अगस्त 2005 में इसका नाम फेसबुक कर दिया गया। जून 2014 में इसके सदस्यों की संख्या 1.3 करोड़ थी। फेसबुक में अन्य भाषाओं के साथ हिन्दी में भी काम करने की सुविधा है। फेसबुक ने भारत सहित अनेक देशों की मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों से समझौता किया है। इस करार के तहत फेसबुक का उपयोग मोबाइल फोन पर भी निःशुल्क किया जा रहा है।
फेसबुक अकाउंट हैक करने का मतलब है किसी तरीके से आपके पासवर्ड को हासिल करके अकाउंट का दुरुपयोग करना। मसलन आपके नाम से गलत संदेश दिए जा सकते हैं। इससे भी ज्यादा आपके बैंकिंग पासवर्ड वगैरह का पता लगाया जा सकता है। साथ ही आपके अकाउंट की मदद से आपके मित्रों के अकाउंट भी हैक किए जा सकते हैं।

सबसे बड़ा डायनोसॉर कितना बड़ा था?
डायनोसॉरों का अध्ययन करने वाले पैलेंटोलॉजिस्ट अभी तक जिस सबसे बड़े डायनोसॉर का पता लगा पाए हैं वह 40 मीटर लम्बा, 20 मीटर ऊँचा और लगभग 77 टन वज़नी रहा होगा। इसकी खोज सन 2014 में अर्जेंटीना के पेंटागोनिया के ला फ्लेचा इलाके में की गई है। इस इलाके के रेगिस्तान में स्थानीय लोगों को एक विशाल हड्डी के जीवाश्म मिले। इसके बाद वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस इलाके की खुदाई करके सात जानवरों की 150 हड्डियाँ निकालीं। इनके आधार पर इस डायनोसॉर के आकार का अनुमान लगाया गया है। मोटे तौर पर यह 14 अफ्रीकी हाथियों के बराबर वज़नी और चार जिराफों के बराबर ऊँचा रहा होगा। इसके जीवाश्म जिस पत्थर पर बने हैं उनके उम्र को देखते हुए यह जीव साढ़े नौ से 10 करोड़ साल पहले धरती पर विचरण करता रहा होगा।


राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट में प्रकाशित 04 जनवरी 2015

Thursday, January 1, 2015

ट्रेन की आखिरी बोगी में X का निशान क्यों लगा होता है?

सेना में फील्ड मार्शल किसे कहा जाता है? आजकल इस पद पर कौन है?
फील्ड मार्शल पद भारतीय सेना में एक प्रकार से थल सेना का सम्मान का पद है। हमारी सेना का सर्वोच्च पद जनरल और चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का होता है। सन 1971 में बांग्लादेश-युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले जनरल सैम मानेकशॉ (3 अप्रेल 1914-27 जून 2008) को 1 जनवरी सन 1973 में देश का पहला फील्ड मार्शल पद दिया गया। वे भारतीय थलसेना के आठवें चीफ ऑफ स्टाफ थे, पर फील्ड मार्शल बनने वाले पहले सेनाधिकारी थे। सैम मानेकशॉ को यह पद देने के बाद सन 1986 में जनरल केएम करियप्पा (29 दिसम्बर 1899-15 मई 1993) को फील्ड मार्शल का ओहदा दिया गया। चूंकि सन 1973 में सैम मानेकशॉ को यह पद दिया जा चुका था। इसलिए देर से ही सही यह ओहदा उन्हें उनके सेवानिवृत्त होने के तकरीबन तीस साल बाद दिया गया। जन करियप्पा 1947 में स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ थे। उन्हें सम्मान देते हुए फील्ड मार्शल की पदवी दी गई। इस वक्त देश में कोई फील्ड मार्शल नहीं है।

फील्ड मार्शल की तरह वायुसेना में मार्शल ऑफ एयरफोर्स का एक पद बनाया गया। यह पद सन 2002 में वायु सेना प्रमुख अर्जन सिंह को दिया गया। भारतीय वायुसेना में यह पद अब तक केवल उन्हें ही दिया गया है। वे वायुसेना में एयर चीफ मार्शल बनने वाले भी पहले भारतीय थे। उसके पहले तक भारतीय वायुसेनाध्यक्ष का पद था एयर मार्शल। एयर चीफ मार्शल के कंधे पर चार स्टार लगाए जाते हैं, जबकि मार्शल ऑफ एयरफोर्स के कंधे पर पाँच स्टार लगते हैं। नौसेना में भी इसके समकक्ष एक पद होता है एडमिरल ऑफ द फ्लीट। पर भारतीय नौसेना में किसी अधिकारी को यह पद नहीं दिया गया है।

फील्ड मार्शल का पद हमारे देश में ही नहीं कुछ और देशों में भी है। जैसे स्पेन, मैक्सिको, पुर्तगाल और ब्राजील में भी है। फ्रांस में इस तरह का रैंक है, जिसे ब्रिगेड कमांड रैंक कहा जाता है। पुराने जमाने में राजा के घुड़सवार दस्ते और सेना के प्रमुख को यह रैंक देने का चलन था। फिर ऐसे लोगों को यह रैंक दिया जाने लगा, जिन्होंने युद्ध भूमि में विलक्षण बहादुरी दिखाई या सेना का नेतृत्व करने में सूझ-बूझ का परिचय दिया हो। कई देशों में फील्ड मार्शल जनरल भी कहते हैं। इसी तरह मार्शल ऑफ एयरफोर्स का रैंक भी है।

रेल की आखिरी बोगी के आखिर में X क्यों अंकित होता है?

रेलगाड़ी के आखिरी डिब्बे पर कोई निशान जरूरी है ताकि उनपर नज़र रखने वाले कर्मचारियों को पता रहे कि पूरी गाड़ी गुज़र गई है। सफेद या लाल रंग से बना यह बड़ा सा क्रॉस आखिरी डिब्बे की निशानी है। इसके अलावा अब ज्यादातर गाड़ियों में अंतिम बोगी पर बिजली का एक लैम्प भी लगाया जाता है, जो रह-रहकर चमकता है। पहले यह लैम्प तेल का होता था, पर अब यह बिजली का होता है। इस लैम्प को लगाना नियमानुसार आवश्यक है। इसके अलावा इस आखिरी डिब्बे पर अंग्रेजी में काले या सफेद रंग का एलवी लिखा एक बोर्ड भी लटकाया जाता है। एलवी का मतलब है लास्ट वेहिकल। यदि किसी स्टेशन या सिग्नल केबिन से कोई गाड़ी ऐसी गुजरे जिसपर लास्ट वेहिकल न हो तो माना जाता है कि पूरी गाड़ी नहीं आ पाई है। ऐसे में तुरत आपात कालीन कार्रवाई शुरू की जाती है।


बंदूक चलाने पर पीछे की तरफ झटका क्यों लगता है?


न्यूटन का गति का तीसरा नियम है कि प्रत्येक क्रिया की सदैव बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। जब बंदूक की गोली आगे बढ़ती है तब वह पीछे की ओर भी धक्का देती है। गोली तभी आगे बढ़ती है जब बंदूक का बोल्ट उसके पीछे से प्रहार करता है। इससे जो शक्ति जन्म लेती है वह आगे की और ही नहीं जाती पीछे भी जाती है। तोप से गोला दगने पर भी यही होता है। आप किसी हथौड़े से किसी चीज पर वार करें तो हथौड़े में भी पीछे की और झटका लगता है। 
राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट में प्रकाशित 09 नवम्बर 2014