Friday, June 21, 2019

एससीओ शिखर सम्मेलन?

पिछली 13 और 14 जून को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में शामिल हुए थे. इस वजह से यह संगठन हाल में खबरों में रहा. इसकी शिखर वार्ता में 19 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और तीन बड़ी बहुराष्ट्रीय संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं. इसके आठ सदस्य चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान हैं. इसके अलावा चार पर्यवेक्षक देश अफ़ग़ानिस्तान, बेलारूस, ईरान और मंगोलिया हैं. तुर्कमेनिस्तान को विशेष अतिथि के रूप में बुलाया जाता है. छह डायलॉग पार्टनर आर्मेनिया, अजरबैजान, कंबोडिया, नेपाल, श्रीलंका और तुर्की हैं. शिखर सम्मेलन में इनके अलावा आसियान, संयुक्त राष्ट्र और सीआईएस के प्रतिनिधियों को भी बुलाया जाता है. मूलतः यह राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग का संगठन है, जिसकी शुरुआत चीन और रूस के नेतृत्व में यूरेशियाई देशों ने की थी. अप्रैल 1996 में शंघाई में हुई एक बैठक में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान जातीय और धार्मिक तनावों को दूर करने के इरादे से आपसी सहयोग पर राज़ी हुए थे. इसे शंघाई फाइव कहा गया था. इसमें उज्बेकिस्तान के शामिल हो जाने के बाद जून 2001 में शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना हुई. 2005 में कजाकिस्तान के अस्ताना में हुए सम्मेलन में भारत, ईरान, मंगोलिया और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने पहली बार इसमें हिस्सा लिया. अब भारत और पाकिस्तान भी इसके सदस्य हैं.

संगठन का विस्तार?

इस संगठन का मुख्य उद्देश्य मध्य एशिया में सुरक्षा सहयोग बढ़ाना है. पश्चिमी मीडिया मानता है कि एससीओ का मुख्य उद्देश्य नेटो के बराबर खड़े होना है. सन 1996 में जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब उद्देश्य था सोवियत संघ के विघटन के बाद नए आज़ाद देशों से लगी रूस और चीन की सीमाओं पर तनाव रोकना और इन सीमाओं का पुनर्निर्धारण. यह काम तीन साल में पूरा हो गया. उज्बेकिस्तान को संगठन में जोड़ने के बाद 2001 में यह एक नए संगठन के रूप में सामने आया. अब इसका उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना और आतंकवाद से लड़ना भी है. जून, 2010 में एससीओ ने नए सदस्य बनाने की प्रक्रिया को तय किया. अभी ईरान पर्यवेक्षक देश है, पर उसे पूर्ण सदस्य बनाने पर भी विचार किया जा रहा है. मिस्र और सीरिया ने पर्यवेक्षक देश बनने की अर्जी दी है. इसरायल, मालदीव और यूक्रेन ने डायलॉग पार्टनर बनने के लिए आवेदन किया है. इराक ने भी डायलॉग पार्टनर बनने का संकेत किया है. बहरीन और कतर भी इससे जुड़ना चाहते हैं.

भारत की भूमिका?

चीन और रूस के बाद इस संगठन में भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है. भारत का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहा है. एससीओ धीरे-धीरे दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन बनता जा रहा है. भारत की दिलचस्पी अपनी ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने और प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा करने के अलावा आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में है. आतंकवाद के विरोध में अपनी नीतियों के कारण ही इसबार के शिखर सम्मेलन में नरेन्द्र मोदी ने सम्मेलन के हाशिए पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से मुलाकात नहीं की.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Tuesday, June 18, 2019

यूरोपीय संघ क्या है?


यूरोपीय संघ (ईयू) यूरोप के 28 देशों का राजनीतिक और आर्थिक संघ है. यूरोपीय संघ के विकास की पृष्ठभूमि को अलग से समझना होगा. इन सभी देशों का कुल क्षेत्र 44,75,757 वर्ग किलोमीटर है. इन देशों की कुल आबादी करीब 51.3 करोड़ है. यूरोपीय संघ ने नियमों और कानूनों की ऐसी व्यवस्था बना ली है, जिसके तहत काफी मामलों में आंतरिक रूप से पूरा संघ-क्षेत्र एक बाजार बन चुका है. इसके तहत लोगों का आना-जाना, सेवाओं, उत्पादों और पूँजी का आवागमन वैसे ही होता है, जैसे किसी एक देश के भीतर होता है. यूरोपीय संघ के भीतर एकल मुद्रा क्षेत्र यानी यूरो ज़ोन और शेंजेन क्षेत्र के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए. यूरो ज़ोन उन 19 देशों के क्षेत्र को कहते हैं, जिन्होंने अपने यहाँ मुद्रा के रूप में यूरो को अपना लिया है. इसी तरह शेंजेन क्षेत्र, यूरोपीय संघ के उन 26 देशों का ऐसा समूह है, जो अपने नागरिकों को सदस्य देशों में बिना किसी सीमा नियंत्रण के आवागमन की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं. यूरोपीय संघ के देशों के बीच यह संधि लक्ज़ेम्बर्ग के शेंजेन शहर में होने के कारण इसका नाम ‘शेंजेन क्षेत्र संधि’ पड़ा.
संघ कब और कैसे बना?
यूरोपीय संघ एक झटके में नहीं बन गया था. वस्तुतः सन 476 में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भी यूरोप को एक करने का सैद्धांतिक विचार किसी न किसी रूप में बना रहा. बावजूद इसके यूरोप में राष्ट्रवादी लहरें भी आती रहीं और बीसवीं सदी में दो विश्व युद्धों का केन्द्र किसी न किसी रूप में यूरोप ही रहा. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद चरमपंथी राष्ट्रवाद के स्थान पर सामूहिकता के विचार ने अपनी जगह बनानी शुरू की. इस सिलसिले में 19 सितम्बर, 1946 को ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने ज्यूरिच विश्वविद्यालय में एक भाषण में यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ यूरोप की अवधारणा पेश की. सन 1948 में यूरोपीय देशों के हेग सम्मेलन में यूरोपियन मूवमेंट इंटरनेशनल और कॉलेज ऑफ यूरोप की स्थापना के विचार से यूरोप के एकीकरण की अवधारणा बनी. इसके बाद सन 1949 में कौंसिल ऑफ यूरोप की स्थापना हुई. हालांकि यह कौंसिल राजनीतिक-आर्थिक एकीकरण के लिए नहीं थी, पर इससे एकीकरण का रास्ता प्रशस्त हुआ. यूरोपीय एकीकरण का वास्तव में पहला कदम था सन 1951 में पेरिस की संधि के मार्फत छह देशों की यूरोपियन कोल एंड स्टील कम्युनिटी की स्थापना. फिर इसके बाद 1957 में रोम की संधि के मार्फत यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना हुई. इसके बाद 1 नवम्बर, 1993 की मास्ट्रिख्ट संधि से यूरोपीय संघ की बुनियाद पड़ी.
आज की स्थिति क्या है?
यूरोपीय देशों के बीच कई तरह की संधियाँ होती रही हैं. इसमें शामिल देशों की संख्या भी बढ़ी है. इस संघ में नीति-निर्णय करने के लिए सात प्रमुख संस्थाएं हैं. ये हैं यूरोपीय संसद, यूरोपियन कौंसिल, कौंसिल ऑफ द यूरोपियन यूनियन, यूरोपियन कमीशन, कोर्ट ऑफ जस्टिस ऑफ द यूरोपियन यूनियन, यूरोपियन सेंट्रल बैंक और यूरोपियन कोर्ट ऑफ ऑडिटर्स. सन 2012 में ईयू को नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया था. हाल ब्रिटेन ने इस संघ से अलग होने का फैसला किया है, जिसे हम ब्रेक्जिट के नाम से जानते हैं. यूके सरकार के अनुरोध के अनुसार 29 मार्च, 2019 को रात्रि में 11 बजे ब्रिटेन को ईयू से अलग हो जाना चाहिए था, पर अभी वह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है.

Monday, June 17, 2019

मंत्रियों की संख्या कैसे तय होती है?



सरकार के सभी मंत्रियों के समूह को मंत्रिपरिषद कहते हैं. हमारे संविधान के अनुच्छेद 74 में केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के गठन के बारे में उल्लेख किया गया है जबकि अनुच्छेद 75 में मंत्रियों की नियुक्ति, उनके कार्यकाल, जिम्मेदारी, शपथ, योग्यता और वेतन-भत्तों से सम्बद्ध जानकारियाँ हैं. सन 2003 में हुए 91वें  संविधान संशोधन के बाद केन्द्र और राज्यों की मंत्रिपरिषदों के सदस्यों की अधिकतम संख्या का निर्धारण हुआ. अनुच्छेद 75 (1क) के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्‍या लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्‍या के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी. लोकसभा में 543 सांसद होते हैं और इस लिहाज से 15 फीसदी होता है 81. इसी अनुच्छेद के उपखंड (5) के अनुसार कोई मंत्री, जो निरंतर छह मास की किसी अवधि तक संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा. यानी उसे छह महीने के भीतर किसी न किसी का सदस्य बन जाना चाहिए. राज्यों के संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 164 (1क) में कहा गया है कि किसी राज्य की मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या राज्य विधानसभा की कुल सदस्य-संख्या के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, परंतु यह संख्या बारह से कम भी नहीं होगी.
मंत्री कितने प्रकार के होते हैं?
सामान्यतः मंत्रिपरिषद के तीन स्तर होते हैं.1.कैबिनेट मंत्री- कैबिनेट मंत्री के पास एक या एक से ज्यादा विभागों की जिम्मेदारी होती है. सरकार के सभी फैसलों में कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं. आमतौर पर हर सप्ताह कैबिनेट की बैठक होती है. सरकार अपने निर्णय, अध्यादेश, नए कानून, कानूनों में संशोधन वगैरह कैबिनेट की बैठक से ही पास कराती है. 2.राज्य मंत्री- स्वतंत्र प्रभार- मंत्रिपरिषद में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य-मंत्रियों के पास आवंटित मंत्रालय और विभाग की पूरी जवाबदेही होती है लेकिन वे आमतौर पर कैबिनेट की बैठक में शामिल नहीं हो सकते. कैबिनेट इनको उनके मंत्रालय या विभाग से संबंधित मसलों पर चर्चा और फैसलों के लिए खास मौकों पर बुला सकती है. 3.राज्य मंत्री-ये कैबिनेट मंत्री के अधीन काम करने वाले मंत्री हैं. एक कैबिनेट मंत्री के अधीन एक या उससे ज्यादा राज्य मंत्री हो सकते हैं.
कैबिनेट कमेटियाँ?
मंत्रीfपरिषद में शामिल कैबिनेट मंत्रियों की कुछ कमेटियाँ भी होती है. इन्हें बोलचाल में सुपर कैबिनेट भी कह सकते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है सीसीएस यानी कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी यानी सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी. इसमें सामान्यतः प्रधानमंत्री के अलावा गृहमंत्री, रक्षामंत्री, विदेशमंत्री और वित्तमंत्री शामिल होते हैं. यह कमेटी अहम नीतिगत और राजनयिक प्रश्नों पर विचार करती है. सीसीएस दूसरे देशों से संधियों, समझौतों, हथियारों की खरीद-बिक्री, देश के अंदर सुरक्षा हालात पर फैसले करती है. सीसी यानी अपॉइंटमेंट्स कमेटी ऑफ द कैबिनेट भी महत्वपूर्ण होती है. इसमें प्रधानमंत्री के अलावा गृहमंत्री होते हैं. यह कमेटी कैबिनेट सचिव और सचिवों जैसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति करती है. इनके अलावा कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स,  कैबिनेट कमेटी ऑन पार्लियामेंट्री अफेयर्स, कैबिनेट कमेटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स भी होती हैं.

Friday, June 14, 2019

एग्जिट पोल का मतलब?


एग्जिट पोल का इस्तेमाल चुनाव के सिलसिले में होता है. इसके मतलब है चुनाव देकर बाहर आ रहे व्यक्ति की राय लेना. सामान्यतः चुनाव पूर्व सर्वे में मतदाताओं से यह जानने का प्रयास किया जाता है कि वे किसे वोट देने का मन बना रहे हैं, जबकि एग्जिट पोल में यह जानने की कोशिश की जाती है कि वे किसे वोट देकर आए हैं. सामान्यतः अखबारों और मीडिया-हाउसों के लिए रिसर्च से जुड़ी कम्पनियाँ यह काम करती हैं. ये कम्पनियाँ उपभोक्ता सामग्री तथा अन्य कारोबारी वस्तुओं के बारे में सर्वेक्षण वगैरह करती हैं. इसके अलावा वोटरों तथा उपभोक्ताओं के बारे में दूसरी जानकारियाँ भी ये एजेंसियाँ एकत्र करती हैं. मसलन किस उम्र के व्यक्ति क्या सोचते हैं, महिलाओं की धारणा क्या है, किस आय वर्ग के लोगों की पसंद क्या हैं, किस विचार को सबसे ज्यादा समर्थन हासिल है या किस बात को लोग सबसे ज्यादा नापसंद करते हैं. मतदाता का वोटिंग व्यवहार और जनमत के प्रभाव का अध्ययन राजनीति शास्त्र का विषय है. इसमें कुल मतदाताओं के अनुपात से एक छोटे नमूने से राय ली जाती है. मसलन दस लाख मतदाता हैं, तो दो-तीन सौ ऐसे मतदाताओं के विचार दर्ज किए जाते हैं, जिनमें हर वर्ग, हर आयु समूह और स्त्री-पुरुष सभी तरह के व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व हो.
इनकी शुरुआत कैसे हुई?
कई मत हैं कि इनकी शुरुआत कैसे हुई. शुरुआती वर्षों में पत्रकार जनता की राय लेने के लिए ऐसे पोल का सहारा लेते थे. इन्हें शुरू करने का श्रेय सर्वे-सैम्पलिंग के अमेरिकी विशेषज्ञ जॉर्ज गैलप और क्लॉड रॉबिनसन को जाता है. काफी लोग मानते हैं कि डच समाज-शास्त्री और पूर्व राजनीतिक नेता मार्सेल वैन डैम (Marcel van Dam) ने 15 फरवरी, 1967 को पहली बार एग्जिट पोल के रूप में इनका इस्तेमाल किया. कुछ दूसरे स्रोत कहते हैं कि अमेरिकी चुनाव-विशेषज्ञ वॉरेन मितोफस्की (Warren Mitofsky) ने इनका इस्तेमाल पहली बार किया. सन 1967 में ही नवम्बर के महीने में अमेरिका के केंटकी राज्य के गवर्नर के चुनाव के दौरान सीबीएस न्यूज के लिए उन्होंने पहला एग्जिट पोल आयोजित किया. पर इतना जरूर है कि जनमत संग्रह करने का काम पिछली सदी के तीसरे-चौथे दशक में शुरू हो चुका था.
भारत में ये कब शुरू हुए?
देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों का चलन नब्बे के दशक से बढ़ा. यों जनमत सर्वेक्षणों की योजना साठ के दशक में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज़ (सीएसडीएस) ने बनाई थी. अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में अर्थशास्त्री से पत्रकार बने प्रणय रॉय ने इंडिया टुडे पत्रिका में इनकी शुरुआत की. फिर 1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान दूरदर्शन ने देश भर में एग्जिट पोल की अनुमति दी.  देखा-देखी कई पोल शुरू हो गए. इनके दुरुपयोग की शिकायतें मिलने पर 1999 में चुनाव आयोग ने इनपर रोक लगा दी. अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. सन 2009 में सरकार ने जन-प्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन करके व्यवस्था की कि जबतक मतदान की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती इनका प्रसारण नहीं किया जा सकता.



Thursday, June 13, 2019

राजनीतिक दलों की संख्या?


सन 1951 के चुनाव में हमारे यहाँ 14 राष्ट्रीय और 39 अन्य मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं. सन 2009 के लोकसभा चुनाव में 363 पार्टियाँ उतरीं थीं. इनमें 7 राष्ट्रीय, 34 प्रादेशिक और 242 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं. सन 2014 के लोकसभा चुनाव में जिन दलों ने हिस्सा लिया उनकी संख्या इस प्रकार थी-राष्ट्रीय दल 6 भाजपा, बसपा, भाकपा, माकपा, कांग्रेस और राकांपा. राज्य स्तर के दल 46 और पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त पार्टियाँ 464. चुनाव आयोग की 15 मार्च, 2019 की विज्ञप्ति के अनुसार इस समय देश में सात राष्ट्रीय, राज्य स्तर के 55 मान्यता प्राप्त दल और पंजीकृत पर गैर-मान्यता प्राप्त दलों की संख्या 2044 है. चुनाव आयोग की 25 मार्च, 2019 की विज्ञप्ति के अनुसार 15 मार्च के बाद 48 और दलों का पंजीकरण किया गया. इस प्रकार पंजीकृत दलों की संख्या 2092 हो गई है. राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दलों में आम आदमी पार्टी का नाम दिल्ली और पंजाब दो राज्यों में है. इसी तरह अन्ना द्रमुक, द्रमुक और पीएमके तमिलनाडु के अलावा पुदुच्चेरी में भी मान्यता प्राप्त दल हैं. जनता दल सेक्यूलर कर्नाटक के अलावा केरल में भी मान्यता प्राप्त दल है. राष्ट्रीय जनता दल बिहार के अलावा झारखंड में भी मान्यता प्राप्त दल है. तेलंगाना राष्ट्र समिति और तेलुगु देशम पार्टी आंध्र और तेलंगाना दोनों राज्यों में मान्यता प्राप्त दल हैं.
राष्ट्रीय दल कौन से हैं?
इस समय जो मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल हैं उनके नाम हैं 1.भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (हाथ), 2.भारतीय जनता पार्टी (कमल), 3.भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (गेहूँ की बाली और हँसिया), 4.भारत की कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (हँसिया-हथौड़ा), 5.राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (घड़ी), 6.बहुजन समाज पार्टी (हाथी), 7.अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (पुष्प और तृण). मान्यता प्राप्त दलों का विशेष चुनाव चिह्न आरक्षित होता है. इसके अलावा उनके प्रत्याशियों को नामांकन भरते समय केवल एक प्रस्तावक की जरूरत होती है, साथ ही उन्हें मतदाताओं की सूची की एक प्रति निःशुल्क दी जाती है. मान्यता प्राप्त दलों को 40 स्टार प्रचारकों के इस्तेमाल की अनुमति मिलती है. इन स्टार प्रचारकों का यात्रा व्यय प्रत्याशी के खर्च में शामिल नहीं किया जाता.
मान्यता का आधार
किसी राज्य में राजनीतिक दल को मान्यता लेने के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी करनी होती हैं: 1.पार्टी ने विधानसभा की तीन फीसदी सीटों पर जीत हासिल की हो. यह संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए. 2.लोकसभा चुनाव में पार्टी राज्य को आबंटित प्रत्येक 25 लोकसभा सीटों में से एक सीट पर जीत हासिल करे. 3.लोकसभा या विधानसभा के चुनाव में पार्टी लोकसभा की एक और विधानसभा की दो सीटें जीतने के साथ पूरे राज्य में कम से कम छह फीसदी वोट हासिल करे. 4.आम चुनाव या विधानसभा चुनाव में पार्टी राज्य में आठ फीसदी वोट हासिल करे. राष्ट्रीय स्तर की मान्यता के लिए 1.पार्टी कम से कम तीन राज्यों से चुनाव लड़कर लोकसभा की कम से कम दो फीसदी सीटों (11 सीटें) पर जीत हासिल करे. आम चुनाव में पार्टी चार राज्यों में लोकसभा की चार सीटें जीते और साथ ही कम से कम छह फीसदी वोट प्राप्त करे. पार्टी को कम से कम चार राज्यों में मान्यता प्राप्त हो. 


Friday, June 7, 2019

लोया जिरगा क्या होता है?


अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के पश्तून इलाकों में पश्तूनवाली नाम से एक अलिखित विधान चलता है, जिसका सभी कबीले आदर करते हैं. हाल में सोमवार 29 अप्रैल से शुक्रवार 3 मई तक लोया जिरगा का अधिवेशन हुआ, जिसमें अफगानिस्तान में तालिबान के साथ मिलकर सरकार चलाने से जुड़े मसलों पर विचार किया गया. यह नियमों की एक व्यवस्था है. इसके अंतर्गत कबायली परिषद को लोया जिरगा नाम से जाना जाता है. तालिबान के शासन के दौरान पश्तूनवाली के साथ-साथ शरिया कानून भी लागू किए गए थे. करीब एक सदी पुरानी इस संस्था का उपयोग अंतर्विरोधी कबायली गुटों और जातीय समूहों के बीच सहमति बनाने के लिए किया जाता है. 2001 में तालिबान शासन के पतन के बाद भी इस परिषद का उपयोग किया गया था. लोया जिरगा की बैठक अंतिम बार 2013 में हुई थी. सन 2013 के लोया जिरगा में अमेरिका के साथ किए गए द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते को स्वीकृति दी गई थी. अब अफ़ग़ानिस्तान के संविधान में लोया जिरगा की व्यवस्था शामिल है. सन 2004 में बने वर्तमान अफ़ग़ान संविधान में लोया जिरगा का उल्लेख है. यह एक प्रकार से जनमत संग्रह का प्रतीक है और इसे असाधारण स्थितियों में ही बुलाया जाता है.
इसकी शुरूआत कैसे हुई?
यों तो यह सैकड़ों साल पुरानी व्यवस्था है, जो परम्परा से चलती थी, पर सौ साल पहले बादशाह अमानुल्ला (1919-29) ने आधुनिक युग में इसकी शुरूआत की. उन्होंने अपने शासन के संचालन के लिए लोया जिरगा का सहारा लिया. इसका मतलब है कि वे तमाम महत्वपूर्ण सवालों पर जनता की राय लेते रहते थे. वर्तमान संविधान के अनुसार इसमें संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के अलावा सभी प्रांतों और जिलों के प्रतिनिधि सदनों के सभापतियों की भागीदारी होती है. लोया जिरगा मूलतः सलाह और राय देने वाली प्रक्रिया है. इसमें आमराय बनती है. हालांकि इसका महत्व देश की संसद से भी ज्यादा है, पर निर्भर करता है कि इसमें प्रतिनिधित्व किस प्रकार का है.
कितनी बार हुआ?
सन 2001 के बाद की व्यवस्था में अबतक छह बार लोया जिरगा के अधिवेशन हो चुके हैं. पिछले हफ्ते छठा अधिवेशन हुआ. पहला अधिवेशन 2002 में हुआ था, जिसमें 1600 प्रतिनिधि शामिल हुए थे. तबतक देश का वर्तमान संविधान बना नहीं था. दिसम्बर 2003 के अंत और जनवरी 2004 के शुरुआती दिनों में बुलाए गए लोया जिरगा में देश के वर्तमान संविधान को स्वीकृति दी गई थी. इसके बाद जून 2010 में इसका एक अधिवेशन हुआ था. नवम्बर 2011 में एक परम्परागत लोया जिरगा भी हुआ. इसके बाद नवम्बर 2013 में इसका एक अधिवेशन हुआ. इस बार लोया जिरगा में आमंत्रित तीन हजार से ज्यादा लोगों को संबोधित करते हुए अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने कहा, 'हम तालिबान के साथ वार्ताओं के लिए मुख्य बातों को स्पष्ट करना चाहते हैं. इसके लिए हम आप सभी से स्पष्ट सलाह चाहते हैं.' इस बैठक के लिए तालिबान को भी आमंत्रित किया था, लेकिन तालिबान ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया.

Thursday, May 16, 2019

सूर्य सबसे पहले किस देश में उगता है?


इस सवाल का जवाब समझना आसान नहीं है, क्योंकि धरती घूमती रहती है। इसलिए सबसे पहले कौन सा इलाका सूर्य के सामने सबसे पहले आता है कहना मुश्किल है। मनुष्य ने धरती को अक्षांश, देशांतर के मार्फत विभाजित किया है। धरती के गोले पर उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक जो काल्पनिक देशांतर रेखाएं हैं, उनमें जो देश सुदूर पूर्व में 180 देशांतर पर पड़ेंगे, वहाँ सबसे पहले सूर्योदय मानना चाहिए। साथ ही दुनिया को अलग-अलग टाइम ज़ोन में विभाजित किया है। इस टाइम ज़ोन से तय होता है कि सबसे पहले सूर्योदय किस देश में होता है। सामान्यतः हम मानते हैं कि दुनिया में जापान का मिनामी तोरीशीमा धुर पूर्व में है। इसलिए वहाँ सबसे पहले सूर्योदय मान सकते हैं। इसका दूसरा तरीका यह है कि डेटलाइन को आधार मानें। ग्रीनविच मीन टाइम को यदि हम आधार मानते हैं तो जापान के समय में नौ घंटे जोड़ने होंगे। यानी जब ग्रीनविच मान टाइम शून्य होगा, यानी रात के बारह बजे होंगे तब जापान में सुबह के नौ बजे होंगे। वास्तव में जीएमटी से ठीक बारह घंटे का फर्क फिजी, तुवालू, न्यूजीलैंड और किरिबाती के मानक समयों में है, जबकि इन सबकी स्थिति में फर्क है। इस लिहाज से दुनिया का सबसे पूर्व में स्थित क्षेत्र किरिबाती का कैरलिन द्वीप है, जहाँ के सूर्योदय को धरती का पहला सूर्योदय मान सकते हैं।
ओलिम्पिक गोल्ड मेडल में कितना सोना होता है?
पहले यह बताना बेहतर होगा कि 1896 और 1900 के ओलिम्पिक खेलों में गोल्ड मेडल नहीं दिए गए। उनमें चाँदी और ताँबे के मेडल क्रमशः विजेता और उप विजेता को दिए गए। 1904 में अमेरिका के मिज़ूरी में तीन मेडल का चलन शुरू हुआ। ओलिम्पिक के गोल्ड मेडल का आकार, डिजाइन और वज़न बदलता रहता है। लंदन ओलिम्पिक में काफी बड़े आकार के मेडल दिए गए जो 85 मिमी व्यास के थे। इनकी मोटाई 7 मिमी थी। सोने का मेडल भी चाँदी में ढाला जाता है और उसके ऊपर लगभग 6 ग्राम सोने की प्लेटिंग होती है। चाँदी का मेडल .925 शुद्धता की चाँदी का होता है और कांस्य पदक में ताँबे, टिन और ज़स्ते की मिलावट होती है।
गैस का गुब्बारा कितना ऊपर जाता है?
गैस के गुब्बारे में हीलियम गैस भरी जाती है। यह गुब्बारा इसलिए ऊपर उठता है क्योंकि हीलियम गैस हवा से हल्की होती है। चूंकि हमारे वायुमंडल में आप जैसे-जैसे ऊपर जाएंगे हवा हल्की होती जाएगी। आमतौर पर एक छोटा गुब्बारा चार पाँच सौ मीटर से ज्यादा ऊँचाई तक जाता है। साथ ही वह हवा के प्रवाह के साथ बहने लगता है। धीरे-धीरे गुब्बारे में भरी हीलियम निकलती जाती है और वह नीचे आने लगता है।

जुगनू क्यों चमकता है?
जुगनू एक प्रकार का उड़ने वाला कीड़ा है, जिसके पेट में रासायनिक क्रिया से रोशनी पैदा होती है। इसे बायोल्युमिनेसेंस कहते हैं। यह कोल्ड लाइट कही जाती है इसमें इंफ्रा रेड और अल्ट्रा वॉयलेट देनों फ्रीक्वेंसी नहीं होतीं।



Thursday, May 9, 2019

आतंक-विरोधी अंतरराष्ट्रीय संधि?

आतंकवाद के खिलाफ दुनिया में कई तरह के समझौते और संधियाँ हैं, पर संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पिछले कई साल से ‘कांप्रिहैंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म (सीसीआईटी)’ को लेकर चल रहा विमर्श पूरा नहीं हो पा रहा है. संयुक्त राष्ट्र महासभा की सालाना बैठकों में करीब-करीब हर साल भारत की और से इस संधि को अंतिम रूप देने की अपील की जाती है. इस संधि का प्रस्ताव भारत ने सन 1996 में किया था, पर अमेरिका और इस्लामिक देशों के संगठन की पारस्परिक आपत्तियों के कारण इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका. प्रस्ताव 51/210 के अंतर्गत 17 दिसम्बर, 1996 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक तदर्थ समिति बनाई गई थी. हालांकि इस संधि की अंतिम रूपरेखा नहीं बन पाई है, पर इस सिलसिले में हुए विचार-विमर्श की रोशनी में आतंकवाद के खिलाफ तीन प्रोटोकॉल जरूर पास हो गए हैं. 1.आतंकवादी बमबारी रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (संधि) जो 15 दिसम्बर,1997 को स्वीकार हुआ, 2. आतंकवाद की वित्तीय सहायता रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि, जो 9 दिसम्बर, 1999 को स्वीकार की गई और 3.एटमी आतंकवादी गतिविधियाँ रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि, जो 13 अप्रैल, 2005 को स्वीकार की गई.

संधि का उद्देश्य?

संधि का मूल उद्देश्य यह है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के सभी 193 सदस्य आतंकवाद की स्वीकृत परिभाषा को अपने देश के आपराधिक कानूनों का हिस्सा बनाएं. इसके तहत सभी आतंकवादी ग्रुपों को बैन करें और उनके कैम्पों को बंद करें। सभी आतंकवादियों के खिलाफ विशेष कानूनों के तहत मुकदमे चलाएं. सीमा पार आतंकवाद को प्रत्यर्पणीय (एक्स्ट्राडिटेबल) अपराध घोषित करें. भारत ने 26 नवम्बर, 2008 के मुम्बई हमले के बाद से इस संधि के लिए तेजी से प्रयास किए हैं और इसके उद्देश्यों के अनुरूप पाकिस्तान से कार्रवाई करने का आग्रह भी किया है.

संधि क्यों नहीं हो पाई?

मुख्य संधि पर विमर्श गतिरोधों का शिकार होता रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है आतंकवाद की परिभाषा पर आमराय का नहीं बन पाना. मसलन ‘आतंकी संगठन’ और ‘मुक्ति संगठन’ के बीच फर्क क्या होगा? साथ ही क्या देशों की सेनाओं की गतिविधियों को भी राज्य आतंकवाद की संज्ञा दी जा सकेगी? अमेरिका का कहना है कि राज्य की सेना के ऑपरेशंस को इसको दायरे से बाहर रखा जाए, जबकि इस्लामिक देशों का संगठन (ओआईसी) राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों को इसके दायरे से बाहर रखना चाहता है. राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों से उसका तात्पर्य खासकर इसराइल-फलस्तीन संघर्ष से है. पाकिस्तान इसमें कश्मीर को भी शामिल करता है. कानूनी विशेषज्ञ चाहते हैं कि इसकी परिभाषा ऐसी हो, जिसे कानूनी शब्दावली में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जा सके, पर यह मसला राजनीतिक शब्दावली के कारण अटका पड़ा है.





Saturday, April 27, 2019

ब्लैक बॉक्स क्या होता है?

हवाई जहाज की उड़ान के दौरान उसके बारे में तमाम जानकारियाँ एक जगह दर्ज होती जाती हैं। विमान की गति, ऊँचाई, इंजन तथा अन्य यंत्रों की ध्वनि, यात्रियों और पायलटों की बातचीत आदि, दर्ज होती रहती है। इन सूचनाओं के विश्लेषण द्वारा विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में दुर्घटना के कारणों की पहचान की जाती है। इसे फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर या फ़्लाइट रिकॉर्डर कहते हैं। इसके अलावा कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर भी होता है। दोनों उपकरणों से बनता है ब्लैक बॉक्स। सन 1953-54 में हवाई हादसों की श्रृंखला के बाद हवाई जहाज में एक ऐसा उपकरण लगाने की जरूरत महसूस की गई थी जो कि दुर्घटना के समय या उससे तुरंत पहले वायुयान में होने वाले हलचलों और आँकड़ों को संग्रहीत कर रख सके तथा जो दुर्घटनाओं में सुरक्षित रहे। इसका रंग काला नहीं लाल या नारंगी होता है। इसीलिए शुरू में इसे ‘रेड एग’ कहा जाता था. इसके शुरुआती प्रारूपों में उसकी भीतरी दीवार को काला रखा जाता था, क्योंकि उसमें फोटो फिल्म आधारित जानकारी भी दर्ज होती थी। वहीं से इसका नाम ब्लैक बॉक्स पड़ा। इसमें क्रैश-प्रूफ मेमरी यूनिट्स होते हैं। इसे इस तरह बनाया जाता है कि तेज आग, भीषण विस्फोट और कई टन मलबे के दबाव के बावजूद नष्ट नहीं होता।

ह्वाइट कॉलर जॉब क्या है?

ह्वाइट कॉलर शब्द एक अमेरिकी लेखक अपटॉन सिंक्लेयर ने 1930 के दशक में गढ़ा। औद्योगीकरण के साथ शारीरिक श्रम करने वाले फैक्ट्री मजदूरों की यूनीफॉर्म डेनिम के मोटे कपड़े की ड्रेस हो गई। शारीरिक श्रम न करने वाले कर्मचारी सफेद कमीज़ पहनते। इसी तरह खदानों में काम करने वाले ब्लैक कॉलर कहलाते। सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े कर्मियों के लिए अब ग्रे कॉलर शब्द चलने लगा है।

टाटा-बाय-बाय माने?

अंग्रेजी में विदाई के वक्त टाटा कहने का चलन है। यह शब्द बोली का है। इसका प्रचलन उन्नीसवीं सदी से हुआ है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार यह गुडबाय का नर्सरी संस्करण है। इसका इस्तेमाल पहली बार 1837 में दर्ज है। सन 1941 में बीबीसी के एक रेडियो प्रोग्राम में इस्तेमाल किया गया संक्षिप्त प्रयोग टीटीएफएन काफी लोकप्रिय हुआ था जिसका मतलब था टाटा फॉर नाउ।

‘इंडो-चायना’ किसे कहते हैं?

इंडो-चायना या हिन्द-चीन प्रायद्वीप दक्षिण पूर्व एशिया का एक इलाका है। यह इलाक़ा चीन के दक्षिण-पश्चिम और भारत के पूर्व में पड़ता है। इन दोनों देशों की संस्कृतियों का इस इलाके पर असर है। आमतौर पर अंतर्गत कम्बोडिया, लाओस और वियतनाम को इन देशों की श्रेणी में रखा जाता है। ये तीनों फ्रांसीसी उपनिवेश थे। इस इलाके में बड़ी संख्या में चीन से आए लोग रहते हैं, पर सांस्कृतिक रूप से भारत का यहाँ जबर्दस्त प्रभाव है। इंडो-चायना नाम का श्रेय डेनिश-फ्रेंच भूगोलवेत्ता कोनराड माल्ट-ब्रन को दिया जाता है, जिन्होंने सन 1804 में इस इलाके को इंडो-चिनॉय कहा। उनके बाद 1808 में स्कॉटिश भाषा विज्ञानी जॉन लेडेन ने इस इलाके को इंडो-चायनीस कहा।




Thursday, April 25, 2019

चुनावी बॉण्ड क्या हैं?


चुनावी बॉण्ड एक प्रकार की हुंडी हैं, जिन्हें वित्त विधेयक, 2017 के मार्फत देशी कम्पनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया है. यह योजना 2 जनवरी, 2018 से लागू है. केवल वही राजनीतिक दल चुनावी बॉण्ड प्राप्त कर सकते हैं, जो जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 के अनुच्छेद 29ए के तहत पंजीकृत हों और जिन्होंने लोकसभा चुनाव या राज्य विधानसभा चुनाव में डाले गए वोटों के कम से कम एक प्रतिशत या ज्यादा वोट हासिल किए हों. इन्हें किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा किसी अधिकृत बैंक खाते के माध्यम से ही भुनाया जा सकेगा. इन्हें हरेक वित्त वर्ष की हरेक तिमाही में दस दिन के एक खास निर्धारित समय में ही खरीदा जा सकता है. ये बॉण्ड 1,000, 10,000, एक लाख, दस लाख, एक करोड़ रुपये या इनकी गुणक राशि के रूप में खरीदे जा सकते हैं. राजनीतिक दलों को इन्हें प्राप्ति के 15 दिन के भीतर भुनाना होता है. इन बॉण्डों को खरीदारों को अपना पूरा परिचय देना होता है, पर राजनीतिक दलों को इस बात की जानकारी देने की जरूरत नहीं कि उन्हें किसने ये बॉण्ड दिए हैं.

इन्हें किसने चुनौती दी है?

सुप्रीम कोर्ट में सितम्बर, 2017 में पहली चुनौती एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) ने चुनौती दी थी, फिर इसके बाद जनवरी, 2018 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इन्हें चुनौती दी. इनका कहना है कि इन बॉण्डों के साथ राजनीतिक दलों को कॉरपोरेट हाउसों से असीमित मात्रा में पैसा प्राप्त करने का रास्ता खुल गया है. इससे हमारे लोकतंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. इन्होंने चार मुख्य आधारों पर चुनौती दी है. 1.सामान्य नागरिक को इस बात की जानकारी नहीं होगी कि किसने किस पार्टी को कितना धन दिया. 2.कम्पनियों के लाभ-हानि खाते में उन राजनीतिक दलों का नाम नहीं होगा, जिन्हें चंदा दिया गया है. 3.पहले कम्पनियों पर पिछले तीन वर्षों के शुद्ध लाभ के 7.5 फीसदी तक के चंदे की सीमा थी. अब कोई सीमा नहीं है. 4.ये बॉण्ड आयकर कानून की धारा 13ए के तहत आयकर से मुक्त हैं. देश के चुनाव आयोग ने भी इन बॉण्डों पर आपत्ति व्यक्त की है.

अदालत का फैसला क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने इन बॉण्डों पर स्थगनादेश नहीं दिया है. अलबत्ता गत 12 अप्रैल को इस मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद अपने अंतरिम आदेश में सभी दलों से कहा है कि वे सीलबंद लिफाफे में इन बॉण्डों की पूरी जानकारी चुनाव आयोग को दें. कोर्ट ने कहा है कि सभी दलों को 15 मई तक मिले चुनावी चंदे की जानकारी देनी होगी. जानकारी सौंपने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई तक का समय निर्धारित किया है. अदालत के अनुसार इस महत्वपूर्ण विषय पर गहराई से जाकर विचार करना होगा.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित





Monday, April 15, 2019

वीवीपैट क्या है?


https://epaper.prabhatkhabar.com/2110431/Awsar/Awsar#page/6/2
वोटर वैरीफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) या वैरीफाइड पेपर रिकार्ड (वीपीआर) इलेक्ट्रॉनिक वोटर मशीन का उपयोग करते हुए मतदाताओं को फीडबैक देने का एक तरीका है. यह एक स्वतंत्र सत्यापन प्रणाली है, जिससे मतदाताओं को जानकारी मिल जाती है कि उनका वोट सही ढंग से डाला गया है. इसमें वोट का बटन दबने के बाद एक पर्ची छपकर बाहर आती है. मतदाता सात सेकंड तक यह देख सकता है कि उसने जिस प्रत्याशी को वोट दिया है उसका नाम और चुनाव चिह्न क्या है. भारत में, 2014 के चुनाव में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में 543 में से 8 संसदीय क्षेत्रों में वीवीपैट प्रणाली की शुरुआत की गई थी. ये क्षेत्र थे लखनऊ, गांधीनगर, बेंगलुरु दक्षिण, चेन्नई सेंट्रल, जादवपुर, रायपुर, पटना साहिब और मिजोरम. इनका पहली बार इस्तेमाल सितंबर 2013 में नगालैंड के नोकसेन विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र हुआ था. सन 2017 में गोवा विधानसभा चुनाव में संपूर्ण राज्य में इनका इस्तेमाल किया गया था. चुनाव आयोग ने इस वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में हरेक संसदीय क्षेत्र के हरेक विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट के इस्तेमाल का निर्देश जारी किया है. 

इनकी जरूरत क्यों पड़ी?

भारत में सन 1999 के लोकसभा चुनाव में आंशिक रूप से और 2004 के चुनाव में पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल किया गया था. उस चुनाव में 10 लाख से ज्यादा वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल किया गया. इन मशीनों के इस्तेमाल के पहले हमारे देश में कागज के बैलट पेपरों का इस्तेमाल होता था. उन चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की शिकायतें आती थीं. उनकी गिनती में काफी समय लगता था और मानवीय त्रुटि की सम्भावनाएं भी थीं. वोटिंग मशीनें बनाने की कोशिशें उन्नीसवीं सदी से चल रहीं थीं. अमेरिका में वोटिंग मशीन का पेटेंट भी कराया गया था. वह वोटिंग मशीन इलेक्ट्रॉनिक मशीन नहीं थी. पंचिंग मशीन थी. भारत में चुनाव आयोग ने वोटिंग मशीन का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद की मदद से किया था. सन 1980 में पहली वोटिंग मशीन बनाई गई थी. पहली बार इसका इस्तेमाल सन 1981 में केरल के उत्तरी पारावुर विधानसभा क्षेत्र के 50 पोलिंग स्टेशनों पर किया गया था.

यह खबरों में क्यों है?

ईवीएम के इस्तेमाल के बाद उन्हें लेकर भी शिकायतें आईं हैं. इन शिकायतों के निवारण के लिए वीवीपैट बनाई गई है. इन मशीनों में भी गड़बड़ी की शिकायतें आती हैं. दूसरे इनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है. संसदीय क्षेत्र के हरेक विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट के इस्तेमाल के विरोध में देश के 21 राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. इसपर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि ज्यादा पोलिंग स्टेशनों पर वीवीपैट के इस्तेमाल में क्या दिक्कत है? इसपर चुनाव आयोग ने जवाब दिया है कि यदि किसी संसदीय क्षेत्र के 50 फीसदी वोटों के लिए वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाए, तो मतगणना में छह दिन का विलम्ब होगा. बहरहाल अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि हरेक लोकसभा क्षेत्र में आने वाले पाँच विधानसभा क्षेत्रों के एक-एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाए. 



Saturday, April 6, 2019

चुनाव कब शुरू हुए?


http://epaper.patrika.com/2100072/Me-Next/Me-Next#page/2/1
व्यापक स्तर पर यह व्यवस्था 18वीं सदी में बड़े स्तर पर सामने आई, जब यूरोप और उत्तरी अमेरिका में सांविधानिक व्यवस्थाओं के तहत प्रतिनिधियों के चुनाव की जरूरत महसूस की गई। यों चुनाव-पद्धति का विकास हो ही रहा है और तकनीकी-विकास के साथ इसका रूप बदल रहा है। चुनाव प्राचीन यूनान, रोम और भारत में भी होते थे, पर वे आधुनिक चुनाव जैसे नहीं थे। बादशाह और धर्मगुरु यानी पोप के चुनाव होते थे। वैदिक युग में भारत में गण (यानी जनजाति) के प्रमुख के रूप में राजा के चुनाव का वर्णन मिलता है। पाल राजा गोपाल (750-770 के बीच शासन) का चुनाव सामंतों ने किया था। शब्द-व्युत्पत्ति पर लिखने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार हिंदी में निर्वाचन की जगह चुनाव शब्द का इस्तेमाल ज्यादा होता है। चुनाव शब्द बना है चि धातु से जिससे चिनोति, चयति, चय जैसे शब्द बनते हैं, जिनमें उठाना, चुनना, बीनना, ढेर लगाना जैसे भाव हैं।
निश्चय, निश्चित जैसे शब्द भी इसी कड़ी के हैं जो निस् उपसर्ग के प्रयोग से बने हैं जिनमें तय करना, संकल्प करना, निर्धारण करना शामिल है। संस्कृत में निर्वचन शब्द का मतलब है व्याख्या, व्युत्पत्ति या अभिप्राय लगाना। गूढ़ वचनों में छिपे संदेश को चुनना। स्पष्ट है कि निर्वचन में चुनने का भाव ही प्रमुख है।
जनमत-संग्रह और चुनाव में अंतर?
दोनों प्रक्रियाएं जनता की राय से जुड़ी हैं, पर दोनों के उद्देश्यों में बुनियादी अंतर है। सामान्यतः चुनाव एक समयबद्ध सांविधानिक-प्रक्रिया है, जबकि जनमत-संग्रह प्रश्न-विशेष या विषय पर केन्द्रित है। जैसे कि सन 2015 में ब्रिटेन की जनता ने यूरोपियन यूनियन से हटने का फैसला जनमत-संग्रह के माध्यम से किया। शुरू में सांविधानिक-व्यवस्थाओं को स्वीकार करने के लिए व्यापक स्तर पर जनमत-संग्रह की व्यवस्था ने भी जन्म लिया। ऑस्ट्रेलिया और स्विट्ज़रलैंड में अब तक दर्जनों जनमत-संग्रह हो चुके हैं।
जनमत-संग्रह के लिए अंग्रेजी में रेफरेंडम (Referendum) शब्द का इस्तेमाल होता है। कई बार इसके लिए प्लेबिसाइट (Plebiscite) शब्द का इस्तेमाल भी होता है। कई जगह इन दोनों में अंतर किया जाता है। मसलन ऑस्ट्रेलिया में संविधान में बदलाव के लिए होने वाले जनमत-संग्रह को रेफरेंडम कहते हैं, और जो जनमत-संग्रह संविधान को प्रभावित नहीं करता, उसे प्लेबिसाइट। आयरलैंड में संविधान को अंगीकार करने के लिए जो पहला जनमत-संग्रह हुआ, उसे रेफरेंडम कहा गया। फिर संविधान में बदलाव के लिए जो हुआ, उसे प्लेबिसाइट।

मताधिकार क्या है?
वोट देने का अधिकार भी सबको एक साथ नहीं मिला। नागरिकों के बीच श्वेत-अश्वेत, स्त्री-पुरुष, आयु और सम्पत्ति के आधार पर भेद को खत्म होने में भी लम्बा समय लगा। आधुनिक चुनाव-पद्धतियों में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को मान्यता दी जाती है, पर इस अधिकार को बीसवीं सदी में ही मान्यता मिल पाई। ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों को सन 1962 में मताधिकार मिला। महिलाओं को मताधिकार देने वाला पहला देश न्यूजीलैंड था, जहाँ 1893 में महिलाओं को वोट का अधिकार मिला। यूरोप में स्विट्ज़रलैंड आखिरी देश था, जहाँ 1971 में स्त्रियों को वोट देने का अधिकार मिला। 
दूरबीन क्या है?
दूरबीन यानी दूर तक दिखाने वाला यंत्र। इसके आविष्कार का श्रेय हॉलैंड के चश्मा बनाने वालों को जाता है। इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीली ने इसमें बुनियादी सुधार किए। आधुनिक इटली के पीसा नामक शहर में 15 फरवरी 1564 को गैलीलियो गैलीली का जन्म हुआ। ज्यादातर लोग गैलीलियो को एक खगोल विज्ञानी के रूप में याद करते हैं जिसने दूरबीन में सुधार कर उसे अधिक शक्तिशाली तथा खगोलीय प्रेक्षणों के लिए उपयुक्त बनाया और साथ ही अपने प्रेक्षणों से ऐसे चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए जिसने खगोल विज्ञान को नई दिशा दी और आधुनिक खगोल विज्ञान की नींव रखी।





Friday, April 5, 2019

फ्रिज के आइस क्यूब का आविष्कार कैसे हुआ?


http://epaper.patrika.com/1997463/Me-Next/Me-Next#page/2/1
आइस क्यूब के पहले आइस या बर्फ का आविष्कार हुआ था। यों तो बर्फ प्राकृतिक रूप से हमें मिलती है। उसके आविष्कार की बात सोची नहीं जा सकती। पर खाने-पीने की चीज़ों को सुरक्षित रखने के लिए और गर्म इलाकों में कमरे को ठंडा रखने के लिए बर्फ की ज़रूरत हुई। शुरू के दिनों में सर्दियों की बर्फ को जमीन के नीचे दबाकर या मोटे कपड़े में लपेट कर उसे देर तक सुरक्षित रखने का काम हुआ। फिर आइस हाउस बनाने का चलन शुरू हुआ। ज़मीन के नीचे तहखाने जैसे बनाकर उनमें बर्फ की सिल्लियाँ रखी जाती थीं, जो या तो सर्दियों में सुरक्षित कर ली जाती थीं या दूर से लाई जाती थीं। उधर चीन में आइसक्रीम बनाने की कला का जन्म भी हो गया था। सन 1295 में जब मार्को पोलो चीन से वापस इटली आया तो उसने आइस क्रीम का जिक्र किया। आइस हाउस के बाद आइस बॉक्स बने। फिर कृत्रिम बर्फ बनाने की बात सोची गई। इसके बाद रेफ्रिजरेटर की अवधारणा ने जन्म लिया। सन 1841 में अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन गोरी ने बर्फ बनाने वाली मशीन बना ली। आइस क्यूब ट्रे बीसवीं सदी की देन है। इस ट्रे ने आइस क्यूब को जन्म दिया। 
एस्ट्रोनॉट्स स्पेस में क्या या कैसा खाना खाते हैं?

अब अंतरिक्ष यात्राएं काफी लम्बी होने लगी हैं। कई-कई महीने तक यात्रियों को अंतरिक्ष स्टेशन पर रहना पड़ता है। उनके लिए खाने की व्यवस्था करने के पहले देखना पड़ता है कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मुक्त स्पेस में उनके शरीर को किस प्रकार के भोजन की जरूरत है। साथ ही उसे स्टोर किस तरह से किया जाए। सबसे पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गागारिन को भोजन के रूप में टूथपेस्ट जैसी ट्यूब में कुछ पौष्टिक वस्तुएं दी गईं थीं। उन्हें गोश्त का पेस्ट और चॉकलेट सॉस भी दिया गया। 1962 में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री जॉन ग्लेन ने भारहीनता की स्थिति में भोजन करने का प्रयोग किया था। शुरू में लगता था कि भारहीनता में इंसान भोजन को निगल पाएगा या नहीं। इसके बाद अंतरिक्ष यात्रियों के लिए टेबलेट और तरल रूप में भोजन बनाया गया। धीरे-धीरे उनके भोजन पर रिसर्च होती रही। उन्हें सैंडविच और टोस्ट दिए जाने लगे। अब उन्हें कई तरह के पेय पदार्थ और खाने की चीजें भेजी जाती हैं। अलबत्ता वहाँ स्वाद की समस्या होती है। भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स हाल में जब कुछ साल पहले भारत आईं थी तो उन्होंने बताया था कि वे अंतरिक्ष में समोसे लेकर गई थीं। साथ ही वे पढ़ने के लिए उपनिषद और गीता भी लेकर गईं थी।


महात्मा गांधी के बेटे थे या नहीं?

गांधी जी के चार बेटे थे। हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास गांधी। एक शिशु का बचपन में निधन हो गया था।


दुनिया का सबसे छोटा हवाई अड्डा?

कैरीबियन सागर के द्वीप सबा का हवाई अड्डा दुनिया का सबसे छोटा हवाई अड्डा माना जाता है। इसका रनवे 400 मीटर लम्बा है। इस हवाई अड्डे पर जेट विमान नहीं उतरते क्योंकि उनके लिए कुछ लम्बा रनवे चाहिए। 


Thursday, April 4, 2019

लोकपाल की भूमिका?


https://epaper.prabhatkhabar.com/2096305/Awsar/Awsar#page/6/1
देश में लम्बे समय से एक ऐसे प्राधिकार की माँग की जा रही थी, जो भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जाँच करे. गत 17 मार्च को राष्ट्रपति ने देश के पहले लोकपाल के रूप में पिनाकी चन्द्र घोष की नियुक्ति की है. सन 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले आंदोलन के बाद संसद ने सन 2013 में लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम पास किया था. लोकपाल राष्ट्रीय स्तर के और लोकायुक्त की नियुक्ति राज्य स्तर के मामलों के लिए की जानी है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पीसी घोष की नियुक्ति का निर्णय एक समिति ने किया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन सदस्य थे. लोकपाल अधिनियम के अनुसार लोकपाल के अंतर्गत एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्यों की एक व्यवस्था होगी. इनमें आधे यानी चार न्यायिक सदस्य होंगे. इनके अलावा एक सचिव, एक जाँच निदेशक और एक अभियोजन निदेशक होंगे.

अब इसके बाद क्या होगा?

अब सबसे पहले लोकपाल संगठन की स्थापना होगी. इसकी दो मुख्य शाखाएं हैं. एक, जाँच शाखा और दूसरी अभियोजन शाखा. इनका कार्यक्षेत्र भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत लोक-सेवकों पर लगे आरोपों की जाँच करना और उनपर मुकदमा चलाना है. इन लोक-सेवकों में प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद तथा केन्द्र सरकार के ए, बी, सी और डी वर्ग के कर्मचारी आते हैं. लोकपाल अधिनियम ने कुछ मामलों में सीमाएं भी तय की हैं. मसलन प्रधानमंत्री के खिलाफ उन मामलों की जाँच नहीं की जा सकेगी, जो अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों, आंतरिक और बाहरी सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, नाभिकीय ऊर्जा और अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े हैं. प्रधानमंत्री के खिलाफ जाँच तबतक नहीं हो सकेगी, जबतक लोकपाल की पूरी बेंच उसकी सुनवाई न करे और उसके कम से कम दो तिहाई सदस्यों की स्वीकृति न हो. प्रधानमंत्री के खिलाफ जाँच (यदि हो तो) बंद कमरे में होगी और यदि लोकपाल शिकायत को खारिज करें, तो जाँच से जुड़े रिकॉर्डों का न तो प्रकाशन होगा और न वे किसी को उपलब्ध होंगे. अधिनियम के अनुसार लोकपाल के अपने सदस्य भी लोक-सेवक की परिभाषा में आएंगे.

राज्यों की व्यवस्था?

भारत में संघीय व्यवस्था है. लोकायुक्तों की नियुक्ति राज्यों के अधीन होगी. अधिनियम के अनुसार राज्य विधानसभाएं इसके लिए कानून बनाएंगी. कई राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्तियाँ हुईं हैं, पर बड़ी संख्या में राज्यों ने अपने अधिनियम नहीं बनाए हैं. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, पुदुच्चेरी, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश ने लोकायुक्तों की नियुक्ति नहीं की है. अदालत ने इन राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा था कि वे अदालत के सामने स्थिति की जानकारी रखें. अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम विधानसभाओं ने 2014 में लोकायुक्त विधेयक पास कर दिए थे. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुदुच्चेरी विधानसभाओं ने भी अपने अधिनियम पास कर दिए. धीरे-धीरे नियुक्तियाँ की जा रहीं हैं.



Monday, April 1, 2019

संसद के कितने सत्र होते हैं?

http://epaper.patrika.com/2017701/Me-Next/Me-Next#dual/2/2
सामान्यतः हर साल संसद के तीन सत्र होते हैं। बजट (फरवरी-मई), मॉनसून (जुलाई-अगस्त) और शीतकालीन (नवंबर-दिसंबर)। बजट अधिवेशन को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया जाता है। इन दोनों के बीच तीन से चार सप्ताह का अवकाश होता है। इस दौरान स्थायी समितियाँ विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान माँगों पर विचार करती हैं। इस साल से बजट सत्र जनवरी के अंतिम सप्ताह से शुरू करने का फैसला किया गया है।

राष्ट्रपति दोनों सदनों को बैठक के लिए आमंत्रित करते हैं। हरेक अधिवेशन की अंतिम तिथि के बाद छह मास के भीतर आगामी अधिवेशन के लिए सदनों को बैठक के लिए आमंत्रित करना होता है। सदनों को बैठक के लिए आमंत्रित करने की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, पर व्यवहार में इस आशय के प्रस्‍ताव की पहल सरकार द्वारा की जाती है। इन तीन के अलावा संसद के विशेष सत्र भी बुलाए जा सकते हैं।

भारत का पहला बजट कब और किसने पेश किया?

देश का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को आरके शण्मुगम चेट्टी ने पेश किया था। वे देश के पहले वित्तमंत्री थे और इस पद पर सन 1949 तक रहे।

वर्च्युअल करेंसी किसे कहते हैं?

वर्च्युअल करेंसी का मतलब है आभासी। यानी जो वास्तविक होने का आभास दे। कागजी नोट भी आभासी मुद्रा है। चूंकि सरकार ने जिम्मेदारी ली है, इसलिए कागज पर जिस राशि का भुगतान करने का आश्वासन होता है वह वास्तविक धन होता है। क्रेडिट कार्डों, शॉपिग सेंटरों और एयरलाइंस के लॉयल्टी पॉइंट्स का आप इस्तेमाल करते हैं। यह भी एक प्रकार से मुद्रा है। इसमें बिटकॉइंस का नाम और जुड़ गया है। यह भविष्य की आभासी मुद्रा है। बिटकॉइन एक ऑनलाइन करेंसी और भुगतान-प्रणाली है, जो धन का अंतरराष्ट्रीय संचरण संभव बनाती है। दुनिया भर में हजारों व्यापारी इस क्रिप्टो करेंसी को स्वीकार करते हैं। सुरक्षा की गारंटी देने के लिए क्रिप्टोग्राफी या कूटभाषा का प्रयोग करने के कारण ऐसा कहा जाता है। बिटकॉइन को एक नए प्रकार की करेंसी के रूप में देखा जा रहा है।
Rx (आरएक्स) का निशान डॉक्टर क्यों बनाते हैं?

दरअसल यह निशान Rx (आरएक्स) नहीं होता बल्कि R की अंतिम रेखा को आगे बढ़ाते हुए उसपर क्रॉस लगाकर बनता है। माना जाता है कि यह लैटिन शब्द रेसिपी का निशान है। नुस्खा यानी डॉक्टरी हिदायत। इलाज के लिए इस तरह लें। कुछ लोग इसे यूनानी जुपिटर का चिह्न जियस मानते हैं।

दुनिया की सबसे लंबी रेल सुरंग

विश्व की सबसे लंबी रेल सुरंग 1 जून, 2016 को स्विट्ज़रलैंड के ईस्टफील्ड से बोडियो तक शुरू हुई गोटहार्ड रेल सुरंग है। इस लाइन पर पूरी सेवाएं 11 दिसंबर 2016 से शुरू हुईं। स्विट्ज़रलैंड के आल्प्स पहाड़ों के नीचे बनी सुरंग से उत्तरी तथा दक्षिणी यूरोप को रेलवे लाइन से जोड़ा जा सकेगा। इस सुरंग से जर्मनी और इटली के बीच की दूरी कम हो गई है। यह सफर 3.40 घंटे था, जो अब 2.40 घंटे का हो गया है। 
राष्ट्रीय गणित दिवस
भारत में  राष्ट्रीय गणित दिवस महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की याद में मनाया जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ। मनमोहन सिंह ने रामानुजन की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर 26 दिसंबर 2011 आयोजित एक कार्यक्रम में वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया। साथ ही उनके जन्मदिन 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस भी घोषित किया। उनका जन्म 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से 400 किलोमीटर दूर इरोड नगर में हुआ था।





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