Monday, April 11, 2016

पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर ही क्यों घूमती है?

धरती न केवल पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमती है साथ ही यदि हम उत्तरी ध्रुव के ऊपर से देखें तो वह सूर्य की परिक्रमा वामावर्त यानी एंटीक्लॉकवाइज़ करती है. उसे यह दिशा सौरमंडल की रचना के समय से ही मिल गई थी. शुरू में गैसीय बादलों की दशा और दिशा के कारण ऐसा हुआ होगा. हमारे सौर मंडल में शुक्र और यूरेनस पश्चगतिक हैं उन्हें छोड़कर सभी ग्रह इसी दिशा में घूम रहे हैं. यानी सूर्य के अपनी धुरी पर घूमने की दिशा में वे घूमने हैं. वस्तुतः जिसे आप पूर्व या पश्चिम कहते हैं वह हमारी परिभाषाएं हैं. हम उत्तरी ध्रुव के ऊपर से देखें तो पूर्व पश्चिम हैं, पर यदि हम दक्षिणी ध्रुव से देखें तो वह भी उलट जाएगा. महत्वपूर्ण है धरती की गति. इसमें भी बदलाव आ रहा है. लाखों साल पहले धरती का दिन आज के मुकाबले काफी छोटा था. धरती पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमती है इसलिए जब अंतरिक्ष में भेजने के लिए रॉकेट को पूर्व की ओर भेजते हैं तब उसके वेग में धरती के घूमने का वेग भी शामिल हो जाता है. इससे ऊर्जा की बचत होती है और वह आसानी से पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को पार कर लेता है.

घड़ी के विज्ञापन में समय हमेशा 10-10 ही क्यों रहता है? कुछ घड़ियों में 4 बजे को IV के स्थान पर IIII क्यों दिखाया जाता है?

इसके दो मुख्य कारण हैं. एक ज्यामितीय रचना के लिहाज से यह एक संतुलित या सिमिट्रिकल स्थिति होती है. स्माइली फेस या विक्ट्री का वी. दूसरे घड़ी बनाने वाली कम्पनी का लोगो ठीक से दिखाई पड़ता है. कुछ घड़ियों में आप टाइम 8-20 भी देख सकते हैं. इसी तरह दो बजने में दस मिनट भी दिखाए जाते हैं. उसके साथ भी वही बात है. कुछ लोग कहते हैं कि हिरोशिमा पर एटम बम इसी वक्त गिरा था और सारी घड़ियाँ इसी वक्त बंद हो गईं, पर विज्ञापनों में घड़ियाँ इस स्थिति में उसके पहले से दिखाई जाती हैं.


आपका दूसरा सवाल है कि कुछ घड़ियों में रोमन अंक IV के बजाय IIII क्यों लिखा जाता है. इसके जवाब में कई अवधारणाएं हैं. दरअसल रोमन अंकों में चार को IIII लिखने की परम्परा भी सैकड़ों साल पुरानी है. इस सिलसिले में एक छोटी सी कहानी है. कहा जाता है कि एक घड़ीसाज़ ने फ्रांस के राजा लुई चौदहवें के लिए एक घड़ी तैयार की. इसमें उसने रोमन अंकों का इस्तेमाल किया, जिसमें IV लिखा गया. राजा ने कहा, इसे IIII होना चाहिए था. जब उन्हें बताया गया कि IV सही है तो उन्होंने कहा, जब हमने कह दिया है तो कह दिया. पर शायद यह कहानी ही है. दरअसल ऊपर हमने एकरूपता का ज़िक्र किया है, जिसके कारण 10-10 का समय दिखाया जाता है. दरअसल आठ बजे के लिए रोमन अंक VIII बनता है, जो चार बजे के ठीक सामने पड़ता है. पूरी घड़ी में VIII सबसे बड़ा अंक बनता है. संतुलन या सिमिट्री के लिए किसी के दिमाग में यह बात आई कि इसे IIII कर देने से वजन लगभग बराबर हो जाएगा.

जीटी रोड (ग्रैंड ट्रक रोड) का यह नाम क्यों है? क्या यह नाम किसी व्यक्ति या घटना पर आधारित है?

एशिया के सबसे पुराने एवं सबसे लम्बे मार्गों में से एक है ग्रैंड ट्रंक रोड. कई शताब्दियों तक इस मार्ग ने भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी एवं पश्चिमी भागों को जोड़ा. हाल में शोध से पता लगा है कि यह सड़क तीसरी सदी ईपू में मौर्य सम्राटों के समय में भारत और मध्य एशिया के कई भागों के बीच थल व्यापार के लिए तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान) से होते हुए यूनान के उत्तर पश्चिमी नगरों तक चली गई थी. मैगस्थनीज़ के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य की सेना इस राजमार्ग की देखभाल करती थी. मैगस्थनीज़ लगभग 15 वर्ष तक मौर्य दरबार में रहा था. यह मार्ग सदियों तक प्रयोग होता रहा.

प्राचीन काल में इसे उत्तरापथ कहा जाता था. पर यह मार्ग पूरी तरह विकसित नहीं था. यह सड़क गंगा के किनारे बसे नगरों को, पंजाब से जोड़ते हुए, ख़ैबर दर्रा पार करती हुई अफ़ग़ानिस्तान के केंद्र तक जाती थी. मौर्यकाल में बौद्ध धर्म का प्रसार इसी उत्तरापथ के माध्यम से गंधार तक हुआ. सोलहवीं शताब्दी में दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी ने इसे पक्का करवाया, दूरी मापने के लिए जगह-जगह पत्थर लगवाए, छायादार पेड़ लगवाए, राहगीरों के लिए सरायें बनवाईं और चुंगी की व्यवस्था की. सोलहवीं सदी में दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी ने इसे पक्का करवाया. इस सड़क पर घुड़सवार डाक ले जाने का काम भी करते थे. उस समय इसे 'सड़क-ए-आज़म' और बादशाही सड़क भी कहते थे.

बंगाल से पेशावर तक की यह सड़क 500 कोस या 2500 किलोमीटर लम्बी थी. शेरशाह ने दूरी नापने के लिए इसपर जगह-जगह पत्थर लगवाए, छायादार वृक्ष लगवाए, राहगीरों के लिए सरायें बनवाईं और चुंगी की व्यवस्था की. सन 1833 से 1860 के बीच अंग्रेज सरकार ने इसका विस्तार किया और सुधारा. अंग्रेजों ने ही इसे नया नाम ग्रैंड ट्रंक रोड दिया.

चुनाव के दौरान लगाई जाने वाली स्याही की संरचना क्या है? इसका क्या अन्यत्र भी इस्तेमाल किया जा सकता है?
भारत में शुरूआती चुनावों में इस स्याही का इस्तेमाल नहीं होता था, पर बाद में फर्जी मतदान की शिकायतें आने पर सन 1962 से इस स्याही का इस्तेमाल होने लगा. चुनाव आयोग ने भारतीय कानून मंत्रालय, राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला, राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम के साथ मिलकर इस स्याही को तैयार किया था. इसका फॉर्मूला गोपनीय है और इसका पेटेंट राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला के पास है. मोटे तौर पर सिल्वर नाइट्रेट से तैयार होने वाली यह स्याही त्वचा पर एक बार लग जाए तो काफी दिन तक इसका निशान रहता है. इतना ही नहीं, यह त्वचा पर पराबैंगनी (अल्ट्रा वॉयलेट) रोशनी पडऩे पर चमकती भी है जिससे इसे छिपाना संभव नहीं. कर्नाटक सरकार के सरकारी प्रतिष्ठान मैसूर पेंट्स एवं वार्निश लिमिटेड द्वारा बनाई जाने वाली इस स्याही के ग्राहकों में दुनिया के 28 देश शामिल हैं. इस स्याही को खासतौर से चुनाव के लिए ही बनाया गया है. इसलिए इसे लोकतांत्रिक स्याही भी कहते हैं. इसका कोई दूसरा इस्तेमाल नहीं है.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

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