Sunday, June 17, 2018

रिम्पैक युद्धाभ्यास क्या है?


रिम ऑफ द पैसिफिक एक्सरसाइज़ (RIMPAC) को संक्षेप में रिम्पैक कहते हैं. दो साल में एकबार होने वाला यह युद्धाभ्यास अमेरिका के पश्चिमी तट पर प्रशांत महासागर में होनोलुलु, हवाई के पास जून-जुलाई में होता है. इसका संचालन अमेरिकी नौसेना का प्रशांत बेड़ा करता है, जिसका मुख्यालय पर्ल हार्बर में है. इसका साथ देते हैं मैरीन कोर, कोस्ट गार्ड और हवाई नेशनल गार्ड फोर्स. हवाई के गवर्नर इसके प्रभारी होते हैं.

हालांकि यह युद्धाभ्यास अमेरिकी नौसेना का है, पर वह दूसरे देशों की नौसेनाओं को भी इसमें शामिल होने का निमंत्रण देते हैं. इसमें प्रशांत महासागर से जुड़े इलाके के देशों के अलावा दूर के देशों को भी बुलाया जाता है. पहला रिम्पैक अभ्यास सन 1971 में हुआ था, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, युनाइटेड किंगडम, और अमेरिका की नौसेनाओं ने भाग लिया. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका ने तबसे अबतक हरेक अभ्यास में हिस्सा लिया है.

इसमें शामिल होने वाले अन्य नियमित भागीदार देश हैं, चिली, कोलम्बिया, फ्रांस, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, नीदरलैंड्स, पेरू, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड. न्यूजीलैंड की नौसेना 1985 तक नियमित रूप से इसमें शामिल होती रही. एक विवाद के कारण कुछ साल तक वह अलग रही, फिर 2012 के बाद से उसकी वापसी हो गई. पिछले कई वर्षों से भारतीय नौसेना भी इसमें शामिल होती है. इस साल 27 जून से यह अभ्यास होगा. इसमें भारत सहित 26 देश शामिल होंगे. इस बार इसमें चीन को नहीं बुलाया गया है.

अगले एशियाई खेल कहाँ होंगे?

अगले एशियाई खेल इंडोनेशिया के दो शहरों में होंगे. ये शहर हैं देश की राजधानी जकार्ता और दक्षिणी सुमात्रा प्रांत की राजधानी पलेमबैंग. इनका आयोजन इस साल 18 अगस्त से 2 सितम्बर तक होगा. इसके उद्घाटन और समापन समारोह जकार्ता में होंगे. यह पहला मौका है, जब एशियाई खेल दो शहरों में आयोजित किए जा रहे हैं. दूसरी खास बात यह है कि इन खेलों का आयोजन मूल रूप से वियतनाम के हनोई शहर में होना था, पर आर्थिक दिक्कतों के कारण वियतनाम ने इनके आयोजन में असमर्थता व्यक्त की, जिसके कारण इंडोनेशिया को ये खेल मिल गए.

17 अप्रैल 2014 को वियतनाम के प्रधानमंत्री एनगुएन तान दुंग ने इन खेलों के आयोजन में असमर्थता व्यक्त की. इंडोनेशिया को 18वें एशियाई खेल मिल जाने के बाद यह सोचा गया कि इनका आयोजन 2019 में किया जाए, पर चूंकि 2019 में इंडोनेशिया में चुनाव हैं, इसलिए इन्हें 2018 में ही कराने का फैसला किया गया. 2022 में 19वें एशियाई खेल चीन के हैंगजाऊ और 2026 के बीसवें खेल जापान के नगोया शहर में होंगे. 

हरी मिर्च से मुँह क्यों जलता है?

मुँह तो लाल मिर्च से भी जलता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके तीखेपन के पीछे कैपसाईपिनोइडपदार्थ है जो मिर्च को फफूंद से बचाता है. इंडियाना यूनिवर्सिटी के डेविड हाक के नेतृत्व में शोध करने वाले दल ने बोलीविया जाकर मिर्च के पौधे में कैपसाइसिन या ‘कैपसाईपिनोइड’ तत्व की जांच की. उन्होंने पाया कि उत्तरी क्षेत्र में मात्र 15 से 20 प्रतिशत मिर्च में ही यह तीखा पदार्थ मौजूद था. वहीं दूसरी ओर दक्षिणी हिस्से में स्थिति अलग थी. इस इलाके में करीब 100 प्रतिशत मिर्च के पौधों में इस तीखे पदार्थ के होने से मिर्च बहुत तीखी थी. यह तीखापन अलग-अलग मिर्चों में अलग-अलग होता है.  मिर्च में अमीनो एसिड, एस्कॉर्बिक एसिड, फॉलिक एसिड, साइट्रिक एसिड, ग्लीसरिक एसिड, मैलिक एसिड जैसे कई तत्व होते है जो हमारे स्वास्थ्य के साथ–साथ शरीर की त्वचा के लिए भी काफी फायदेमंद होते हैं.
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

दलित-प्रतिरोध का रंग नीला क्यों?

सामान्यतः दलित विचार से जुड़े संगठन नीले रंग को प्रतीक रूप से अपनाते हैं, हालांकि सत्तर के दशक में शुरू हुए दलित पैंथर के ध्वज में नीले रंग के साथ लाल रंग भी था, जो दुनिया के वामपंथियों का प्रिय रंग है। डॉ भीमराव आम्बेडकर की प्रतिमाओं में नीले रंग का इस्तेमाल होता है। हाल में उत्तर प्रदेश के बदायूं में बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की एक प्रतिमा को कुछ शरारती लोगों ने भगवा रंग दिया था, जिसे लेकर विवाद हुआ। उस घटना के बाद काफी लोगों ने जानना चाहा कि भीमराव आम्बेडकर के साथ नीला रंग क्यों जुड़ा है? इस सिलसिले में आम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी निर्मल ने कहा, ‘नीला रंग बाबा साहब को प्रिय था।’ रिटायर्ड आईपीएस ऑफिसर और दलित विचारक एसआर दारापुरी ने प्रेस ट्रस्ट को बताया कि सन 1942 में बाबा साहब ने शेड्यूल्‍ड कास्‍ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की स्‍थापना की थी। उसके झंडे का रंग नीला था और उसके बीच में अशोक चक्र था। इसके बाद 1956 में जब पुरानी पार्टी को खत्म कर रिपब्लिकन पार्टी का गठन किया गया तो इसमें भी इसी नीले रंग के झंडे का इस्तेमाल किया।
दारापुरी के अनुसार, नीला रंग आसमान का रंग है। ऐसा रंग जो भेदभाव से रहित दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है। बाबा साहब की भी यही दृष्टि थी। बसपा ने भी इसी रंग को अपनाया। यह दलित अस्मिता का प्रतीक बन गया। बाबा साहब की प्रतिमा हमेशा नीले रंग के कोट में दिखती है। उनके एक हाथ में संविधान की किताब और दूसरे हाथ की एक उंगली उठी रहती है, जो आगे बढ़ने की सूचक है। डॉ आम्बेडकर ने पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों और यहाँ तक कि सूट-बूट को दलितों की चेतना को जगाने का माध्यम बनाया। उन्हें नीले रंग का सूट बहुत पसंद था। वे अमूमन इसी रंग के थ्री पीस सूट पहनते थे। दलित चिंतक मानते हैं कि आम्बेडकर का नीला सूट दलितों के प्रतिरोध और अस्मिता का प्रतीक बन गया है। बौद्ध धर्म में भी नीला रंग महत्वपूर्ण है। अशोक चक्र का रंग नीला है। बौद्ध धम्म चक्र भी नीला है।

राजनीतिक-विचारधाराओं की पहचान रंगों से?

वैश्विक संदर्भों में नीला रंग सामान्यतः सेंटर राइट या कंजर्वेटिव पार्टियों का रंग माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र का ध्वज हल्का नीला या आसमानी है, जो शांति और सद्भाव का प्रतीक है। इसी तरह दुनियाभर में साम्यवाद और व्यापक अर्थ में समाजवाद का प्रतिनिधि रंग लाल है। लाल रंग अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी का प्रतिनिधि रंग भी है, जिसे अनुदारवादी दल माना जाता है। इसके विपरीत डेमोक्रेटिक पार्टी का रंग नीला है। आप गौर करेंगे कि अमेरिकी चुनाव परिणामों के ग्राफिक में अलग-अलग राज्यों में पार्टियों की जीत को लाल और नीले रंग से दिखाया जाता है। भारत में भगवा रंग हिन्दूवादी राजनीति का प्रतिनिधि है, पर पश्चिम में उससे मिलता-जुलता नारंगी रंग क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक दलों का प्रतिनिधित्व करता है। दुनियाभर में हरा रंग इस्लाम के साथ या इस्लामिक राजनीतिक संगठनों के साथ जोड़ा जाता है। इटली में फासी पार्टी का रंग काला था। हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया के इस्लामी स्टेट का झंडा भी काला है। अब्बासी खिलाफत का ध्वज भी काला था। भारत में पेरियार ई रामास्वामी के नेतृत्व में शुरुआती तमिल नास्तिक आंदोलन भी काले झंडे के साथ हुआ था और आज भी ज्यादातर द्रविड़ पार्टियों के झंडे में लाल और काले रंग का इस्तेमाल होता है। कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता के पहले से ही तिरंगे को अपनाया था, जो आज भी उसका रंग है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Sunday, June 3, 2018

बोआओ फोरम क्या है?

बोआओ फोरम एशिया (बीएफए) व्यापारिक सहयोग और विमर्श का फोरम है, जिसे दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तर्ज पर गठित किया गया है। इसका मुख्यालय चीन के हैनान प्रांत के बोआओ में है। सन 2001 से यहाँ एशिया की सरकारों और उद्योगों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हो रहा है। यह फोरम क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के इरादे से गठित किया गया है। इसमें एशिया के देशों को आर्थिक-विकास की राह पर चलते हुए अपनी अर्थ-व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का मौका मिलता है। इसे शुरू करने का विचार मूलतः फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वी रैमोस, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री बॉब हॉक और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री मोरीहीरो होसोकावा ने बनाया था।

इसका उद्घाटन 27 फरवरी 2001 को हुआ था। इसके लिए चीन ने खासतौर से पहल की। इसकी शुरूआत 26 देशों की भागीदारी के साथ हुई थी। इस वक्त इसके 29 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल हैं। इससे जुड़े संगठन की पहली बैठक 12-13 अप्रैल 2002 को हुई। हाल में 8 से 11 अप्रैल 2018 को फोरम का सालाना सम्मेलन हुआ। इसमें चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी भावी आर्थिक नीतियों की ओर इशारा किया। हालांकि भारत की ओर से इस सम्मेलन में कोई बड़ी राजनीतिक हस्ती उपस्थित नहीं थी। केवल उद्योग-व्यापार संगठन फिक्की के प्रतिनिधि इसमें उपस्थित थे।

बोआओ फोरम में आर्थिक एकीकरण के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय-प्रश्नों पर भी विचार किया जाता है। यह फोरम एक तरह से चीन और वैश्विक-व्यापार के बीच की कड़ी बना। सन 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य भी बना था।

जनहित याचिका क्या है?


जनहित याचिका भारतीय न्याय-व्यवस्था की अवधारणा है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक हित के लिए न्यायिक-सहायता लेना है। इसे संसदीय नियमों से नहीं बनाया गया है, बल्कि भारतीय अदालतों ने जनता को ताकतवर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया है। जस्टिस पीएन भगवती और जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर शुरूआती जज थे, जिन्होंने जनहित याचिकाओं को विचारार्थ स्वीकार किया। धीरे-धीरे इसकी व्यवस्था बनती गई। जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग के मामले भी सामने आए हैं और अदालतों ने इनपर कड़ाई से कार्रवाई भी की है।

सत्तर और अस्सी के दशक भारत में न्यायिक सक्रियता का दौर था। इस दौर में हमारी अदालतों ने सार्वजनिक हित में कई बड़े फैसले किए। दिसम्बर 1979 में कपिला हिंगोरानी ने बिहार की जेलों में कैद विचाराधीन कैदियों की दशा को लेकर एक याचिका दायर की। इस याचिका के कारण जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर की अदालत ने बिहार की जेलों से 40,000 ऐसे कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया, जिनके मामले विचाराधीन थे। सन 1981 में एसपी गुप्ता बनाम भारतीय संघ के केस में सात जजों की बेंच में जस्टिस भगवती भी एक जज थे। उन्होंने अपने फैसले में दूसरी बातों के अलावा यह भी लिखा कि अदालत सार्वजनिक हित में मामले को उठाने के लिए अदालत औपचारिक याचिका का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि कोई व्यक्ति एक चिट्ठी भी लिख देगा तो उसे सार्वजनिक हित में याचिका मान लेगी। इस व्यवस्था में भारी न्यायिक शुल्क को जमा किए बगैर सुनवाई हो सकती है।

http://epaper.patrika.com/1682653/Me-Next/Me-Next#dual/2/1

हींग क्या होती है?


हींग एशिया में पाए जाने वाले सौंफ की प्रजाति के फेरूला फोइटिस नामक पौधे का चिकना रस है. ये पौधे-ईरान, अफगानिस्तान, तुर्की, बलूचिस्तान, अफगानिस्तान के पहाड़ी इलाकों में अधिक होते हैं. भारत में हींग की खेती बहुत कम मात्रा में होती है. इस पौधे की टहनियाँ 6 से 10 फ़ुट तक ऊँची हो जाती हैं. इस पर हरापन लिए पीले रंग के फूल निकलते हैं. इसकी जड़ों को काटा जाता है जहाँ से एक दूधिया रस निकलता है. फिर इसे इकट्ठा कर लेते हैं. सूखने पर यह भूरे रंग के गोंद जैसा हो जाता है, यही हींग है. ईरान में लगभग हर तरह के भोजन में इसका प्रयोग किया जाता है. भारत में हींग का काफी इस्तेमाल होता है. इसे संस्कृत में 'हिंगु' कहा जाता है. इसमें ओषधीय गुण भी अनेक हैं. हाजमे के लिए हींग बहुत अच्छी है. यह खाँसी भी दूर करती है.

पीत-पत्रकारिता’ क्या होती है?

पीत पत्रकारिता (Yellow journalism) उस पत्रकारिता को कहते हैं जिसमें सही समाचारों की उपेक्षा करके सनसनी फैलाने वाले या ध्यान-खींचने वाले शीर्षकों का बहुतायत में प्रयोग किया जाता है. इसे समाचारपत्रों की बिक्री बढ़ाने का घटिया तरीका माना जाता है. मूलतः अब इससे आशय अनैतिक और भ्रष्ट पत्रकारिता है. जिन दिनों यह शब्द चला था तब इसका मतलब लोकप्रिय पत्रकारिता था. इसका इस्तेमाल अमेरिका में 1890 के आसपास शुरू हुआ था. उन दिनों जोज़फ पुलिट्जर के अख़बार ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ और विलियम रैंडॉल्फ हर्स्ट के ‘न्यूयॉर्क जर्नल’ के बीच जबर्दस्त प्रतियोगिता चली थी. इस पत्रकारिता को यलो कहने के बीच प्रमुख रूप से पीले रंग का इस्तेमाल है, जो दोनों अखबारों के कार्टूनों का प्रभाव बढ़ाता था. दोनों अखबारों का हीरो पीले रंग का कुत्ता था. यलो जर्नलिज्म शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल उन्हीं दिनों न्यूयॉर्क प्रेस के सम्पादक एरविन वार्डमैन ने किया.

रिमोट-आविष्कार किसने किया?

सन 1898 में निकोला टेस्ला ने अमेरिका में पहला रिमोट पेटेंट कराया जो पानी पर चल रही नाव को दूर से संचालित कर सकता था. रिमोट कंट्रोल से सामान्य तात्पर्य टीवी या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को इंफ्रारेड मैग्नेटिक स्पेक्ट्रम से संचालित करना है. सुदूर अंतरिक्ष में घूम रहे यानों को भी दूर से ही नियंत्रित किया जाता है. तमाम देशों में बगैर ड्राइवर की मेट्रो ट्रेन दूर से संचालित हो रहीं हैं. हम जिन रिमोट कंट्रोल गैजेट्स की बात कर रहे हैं वे कुछ दूरी यानी पाँच मीटर के आसपास तक काम करते हैं. ये रिमोट प्रायः इंफ्रारेड का उपयोग करते हैं. सत्तर के दशक से पहले के रिमोट अल्ट्रासोनिक तरंगों का इस्तेमाल करते थे. रेडियो तकनीक का आविष्कार होने के बाद रेडियो तरंगों के मार्फत संदेश भेजने की शुरुआत भी हो गई थी. शुरूआती रिमोट कंट्रोल रेडियो तरंगों के मार्फत चलते थे. अब इनमें ब्लू टूथ कनेक्टिविटी, मोशन सेंसर और वॉइस कंट्रोल भी शामिल होने लगे हैं. 




Friday, May 25, 2018

इंजेक्शन कब शुरू हुए?


शरीर में चोट लगने पर दवाई सीधे लगाने की परम्परा काफी पुरानी है. शरीर में अफीम रगड़कर या किसी कटे हुए हिस्से में अफीम लगाकर शरीर को राहत मिल सकती है ऐसा विचार भी पन्द्रहवीं सोलहवीं सदी में था. अफीम से कई रोगों का इलाज किया जाने लगा, पर डॉक्टरों को लगता था कि इसे खिलाने से लत पड़ सकती है. इसलिए शरीर में प्रवेश का कोई दूसरा तरीका खोजा जाए. स्थानीय एनिस्थासिया के रूप में भी मॉर्फीन वगैरह का इस्तेमाल होने लगा था. ऐसी भीतर से खोखली सूई सोलहवीं-सत्रहवीं सदी से इस्तेमाल होने लगी थी. पर सबसे पहले सन 1851 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक चार्ल्स गैब्रियल प्रावाज़ ने हाइपोडर्मिक नीडल और सीरिंज का आविष्कार किया. इसमें महीन सुई और सिरिंज होती थी. तबसे इसमें तमाम तरह के सुधार हो चुके हैं. 

आसमान ठोस है, तरल या गैस है?

आप जिस आसमान को देखते हैं वह बाहरी अंतरिक्ष का एक हिस्सा है. धरती से दिन में यह नीले रंग का नजर आता है. इसकी वजह है हमारा वातावरण जिससे टकराकर सूरज की किरणों का नीला रंग फैल जाता है. पर यह आसमान धरती से देखने पर ही नीला लगता है. किसी अन्य ग्रह से देखने पर ऐसा ही नहीं दिखेगा, बल्कि आमतौर पर काला नजर आएगा. यह ठोस नहीं है, पर इसमें ठोस, तरल और गैसीय पदार्थ प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं. यह अनंत है. दुनिया के बड़े से बड़े टेलिस्कोप से भी आप इसका बहुत छोटा हिस्सा देख पाएंगे.

हार्ड वॉटर को सॉफ्ट कैसे बनाते हैं?

सबसे आसान तरीका पानी को उबाल कर डिस्टिलेशन का है. पर वह रोजमर्रा के लिहाज से महंगा होगा. आमतौर पर हम रिवर्स ऑस्मॉसिस के जरिए पानी को पीने लायक बनाते हैं, जिसे छोटे नाम आरओ से ज्यादा पहचाना जाता है. इसमें एक मैम्ब्रेन या झिल्ली के मार्फत पानी के हार्ड तत्व को अलग किया जाता है. दुनिया की सबसे बड़ी डिसैलिनेशन प्रोजेक्ट संयुक्त अरब अमीरात में लगा रस अल-खैर संयंत्र है, जो खारे पानी से हर रोज 10,25,000 घन मीटर मीठा पानी तैयार करती है. अलबत्ता कुवैत ऐसा देश है, जो अपने नागरिकों को शत-प्रतिशत मीठा पानी सप्लाई करता है. 














Tuesday, May 22, 2018

मैराथन दौड़


मैराथन दुनिया में सबसे लम्बी दूरी की दौड़ है। आधिकारिक रूप से इसकी लम्बाई 42.195 किलोमीटर (26 मील 385 गज) होती है। यह सड़क पर होने वाली दौड़ है, जिसका छोटा सा हिस्सा ही स्टेडियम के भीतर होता है। सन 1896 में जब आधुनिक ओलिम्पिक खेल शुरू हुए तब मैराथन दौड़ भी उसका हिस्सा थी। पर उस वक्त इसकी लम्बाई का मानकीकरण नहीं हुआ था। इसकी लम्बाई का निर्धारण सन 1921 में हुआ।

दुनिया में आज 800 से ज्यादा ऐसी मैराथन प्रतियोगिताएं होती हैं, जो किसी न किसी रूप में खेल संघों से सम्बद्ध होती हैं। इन्हें स्वास्थ्य तथा अन्य सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों से भी जोड़ा जाता है। इनमें सैकड़ों और कई बार हजारों शौकिया धावक भी हिस्सा लेते हैं। तमाम लोग इस दौड़ के छोटे से हिस्से को ही पूरा करते हैं। कई जगह हाफ मैराथन भी होती हैं।

मैराथन दौड़ यूनान की एक दंतकथा से प्रेरित है। इसकी कहानी फ़ेडिप्पिडिस नामक यूनानी धावक से जुड़ी है। फ़ेडिप्पिडिस एक हरकारा था, जिसे मैराथन से एथेंस यह घोषित करने के लिए भेजा गया था कि मैराथन के युद्ध में (जिसमें वह खुद भी लड़ रहा था) फारसियों की पराजय हो गई है। यह ई.पू. 490 के अगस्त या सितंबर की घटना है। कहा जाता है कि फ़ेडिप्पिडिस पूरे रास्ते पर बिना रुके दौड़ा और फिर सभा में प्रवेश करके बोला नेनिकेकामेन (हम जीत गए)। और फिर वह गिर पड़ा और मर गया।

मैराथन से एथेंस की दौड़ का पहला वृत्तांत प्लूटार्क की एथेंस कीर्ति में मिलता है, जो पहली सदी में लिखी गई थी और हेराक्लाइडस पॉण्टिकस की लुप्त कृति को संदर्भित करते हुए धावक का नाम एर्चियस या यूक्लस का थेर्सिपस बताया गया था। एक और लेखक समोसाता के लूशियन (दूसरी सदी) ने भी इस कथा को लिखा है, पर धावक का नाम फ़ेलिप्पिडिस बताया है, फ़ेडिप्पिडिस नहीं। बहरहाल यह किंवदंती है। इसका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। यूनानी-फ़ारसी युद्धों के प्रमुख स्रोत, यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस ने फ़ेडिप्पिडिस को एक हरकारे के रूप में वर्णित किया है, जो मदद का संदेश लेकर एथेंस से स्पार्टा और वापस गया। एक तरफ से यह दूरी 240 किलोमीटर (150 मील) से भी ज़्यादा है।

डब्लूटीओ में कितने सदस्य हैं?
विश्व व्यापार संगठन में 164 सदस्य और 23 पर्यवेक्षक देश हैं। 14 जुलाई 2016 को लाइबेरिया इसका 163वाँ और 29 जुलाई 2016 को अफगानिस्तान इसका 164वाँ सदस्य बना।

कहाँ और कब बनी पहली कार?

हालांकि शुरू में भाप से चलने वाली गाड़ियाँ बनी थीं, पर इंटरनल कॉम्बुशन इंजन से चलने वाली पहली कार सन 1870 में ऑस्ट्रिया के वियना शहर में सिग्फ्राइड मार्कस ने तैयार की। वह गैसोलीन से चलती थी। इसे फर्स्ट मार्कस कार कहते हैं। मार्कस ने ही 1888 में सेकंड मार्कस कार तैयार की जिसमें कई तरह के सुधार किए गए थे। इस बीच जर्मनी के मैनहाइम में कार्ल बेंज ने सन 1885 में तैयार की।


Sunday, May 20, 2018

वोट शब्द कहाँ से आया?




वोट शब्द राय देने, चयन करने किसी व्यक्ति या प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के अर्थ में इस्तेमाल होता है. अंग्रेजी में यह संज्ञा और क्रिया दोनों रूपों में चलता है. अंग्रेजी में यह शब्द लैटिन के वोटम (votum) से बना है. इसका मतलब है इच्छा, कामना, प्रतिज्ञा, प्रार्थना, निष्ठा, वचन, समर्पण वगैरह. हिन्दी में इसका इस्तेमाल मत के अर्थ में लिया जाता है. अंग्रेजी की तरह हिन्दी ने भी मतदाता या निर्वाचक के लिए वोटर शब्द का इस्तेमाल स्वीकार कर लिया है. शब्दों का अध्ययन करने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार भाषा विज्ञानी इसे प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द मानते हैं. अंग्रेजी का वाऊ vow इसी श्रृंखला का शब्द है जिसका मतलब होता है प्रार्थना, समर्पण और निष्ठा के साथ अपनी बात कहना.

‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था क्या है?

लोकतंत्र में चुनाव सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. प्रतिनिधि के चयन से लेकर फैसले करने तक सारी बातें वोट से तय होती हैं. चुनाव की अनेक पद्धतियाँ दुनिया में प्रचलित हैं. ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ भी चुनाव की एक पद्धति है. जब एक से ज्यादा प्रत्याशी किसी पद के लिए खड़े हों, तब सबसे ज्यादा वोट पाने वाले व्यक्ति को चुना हुआ माना जाता है. भारत में चुनाव की यही पद्धति है.

चीनी सबसे पहले कहाँ बनी?

मीठे फल और गन्ने के रस का इस्तेमाल इंसान न जाने कब से करता रहा है. पर रस से क्रिस्टल के रूप में चीनी बनाने का काम सबसे पहले भारत में हुआ. इतिहासकारों का मत है कि ईसवी सन 350 के आसपास गुप्तवंश के दौर में चीनी बनती थी. संभव है इससे पहले भी बनती रही हो. संस्कृत के शर्करा से अरब में शक्कर और उससे अंग्रेजी का शुगर शब्द बना. लैटिन में सकारम (succharum) भी भारत से गया. ईसा से साढ़े तीन सदी पहले भारत आई सिकंदर की सेना भारत में बगैर मधुमक्खी के मधु को खाकर हैरान थी. शायद वह गुड़ का कोई रूप था.

http://epaper.prabhatkhabar.com/1659471/Awsar/Awsar#page/6/1

Saturday, May 12, 2018

संयुक्त राष्ट्र शांति-सेना क्या होती है?


संयुक्त राष्ट्र शांति-सेना संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की सेनाओं की मदद से एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में अलग-अलग परिस्थितियों में गठित की जाती है. इसका उद्देश्य टकराव को दूर करके शांति स्थापित करने में मदद करना होता है. संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक नीले रंग की टोपियाँ लगाते हैं या नीले रंग के हेल्मेट पहनते हैं, जो अब इस सेना की पहचान बन गई है.

संयुक्त राष्ट्र की अपनी कोई सेना नहीं होती. इस सेना के सदस्य अपने देश की सेना के सदस्य ही रहते हैं. शांति-सेना के रूप में कार्य करते समय यह सेना संयुक्त राष्ट्र के प्रभावी नियंत्रण में होती है. शांति-रक्षा का हर कार्य सुरक्षा परिषद द्वारा अनुमोदित होता है. संयुक्त राष्ट्र के गठन के समय इस सेना की परिकल्पना नहीं की गई थी, बल्कि बदलते हालात के साथ इसका विकास होता गया. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में सुरक्षा परिषद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए संयुक्त कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है. संयुक्त राष्ट्र के शांति-ऑपरेशंस का एक अलग विभाग बन गया है, जिसके प्रमुख इस समय ज्यां-पियरे लैक्रो हैं.

संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन सबसे पहले 1948 में अरब-इसरायल युद्ध के समय भेजा गया था. उसके बाद से संयुक्त राष्ट्र के 63 मिशन भेजे जा चुके हैं, जिनमें से 17 आज भी सक्रिय हैं. सन 1988 में संयुक्त राष्ट्र शांति-रक्षा बल को नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया. संयुक्त राष्ट्र के पूर्ववर्ती संगठन लीग ऑफ नेशंस के सामने शांति स्थापना के ज्यादा अवसर नहीं आए, पर सन 1934-35 में लीग ऑफ नेशंस के नेतृत्व में जर्मनी के सार क्षेत्र में सेना भेजी गई. इसे दुनिया की पहली शांति-स्थापना से जुड़ी संयुक्त सैनिक कार्रवाई माना जा सकता है. पहले विश्व युद्ध के काफी समय बाद सार क्षेत्र में जनमत संग्रह के संचालन के लिए इसकी जरूरत महसूस की गई. 

भारत में गाँवों की सही संख्या क्या है?

गूगल पर सर्च करें तो कई तरह की संख्याएं सामने आएंगी. ज्यादातर 6,40,000 को आसपास हैं. हाल में जब भारत सरकार ने घोषणा की कि देश के सभी गाँवों में बिजली पहुँचा दी गई है, तब यह संख्या 5,97, 464 बताई गई. दरअसल यह संख्या राजस्व गाँवों की संख्या है. जन 2011 की जनगणना में राजस्व गाँवों की संख्या 5,97, 464 बताई गईं थी. गाँव की बस्ती, पुरवा जैसी कई परिभाषाएं हैं. यदि कुछ लोग कहीं घर बनाकर रहने लगें, तो आधिकारिक रूप से उसे तबतक गाँव नहीं कहेंगे, जबतक राजस्व खाते में उसका नाम दर्ज न हो जाए. शहरों के विकास के साथ हमारे देश में बहुत से गाँवों और बस्तियों का अस्तित्व खत्म भी होता जा रहा है, इसलिए यह संख्या बदलता रहती है.

सोशल मीडिया में डीपी किसे कहते हैं?

डीपी माने डिस्प्ले पिक्चर. आपकी वह तस्वीर जो आपकी पहचान है. कुछ लोग अपनी तस्वीर लगाते हैं और कुछ लोग प्रतीक रूप में किसी दृश्य या वस्तु की तस्वीर भी लगाते हैं. समय पड़ने पर उसमें बदलाव भी करते हैं जैसे हाल में कुछ लोग ने जम्मू-कश्मीर में एक बालिका के साथ हुए बलात्कार के प्रति रोष जाहिर करने के लिए अपनी डीपी काली कर दी थी.

कम्प्यूटिंग या डिजिटल मीडिया के उदय के साथ जब कई तरह के फोरम जन्म लेने लगे तब यूजर की पहचान का सवाल भी उठा. इसके लिए शुरूआती शब्द बना अवतार. अवतार भारतीय पौराणिक शब्द है, जिसे इंटरनेट पर इस रूप में जगह मिली. कई जगह इसे पायकन (पर्सनल आयकन) भी कहा गया. अवतार शब्द का सबसे पहला इस्तेमाल सन 1979 में कम्प्यूटर गेम प्लेटो में देखने को मिला, पर ऑन-स्क्रीन परिचय के लिए 1985 में कम्प्यूटर गेम अल्टिमा-4

केसर क्या होता है?

केसर कृषि-उत्पाद है यानी कि उसकी खेती होती है. भारत की केसर दुनिया में सबसे अच्छी मानी जाती. भारत में जम्मू-कश्मीर में केसर की खेती होती है. कश्मीर के अवंतीपुर के पंपोर और जम्मू संभाग के किश्तवाड़ इलाके में केसर की खेती की जाती है. केसर बोने के लिए खास जमीन की आवश्यकता होती है. ऐसी जमीन जहां बर्फ पड़ती हो और जमीन में नमी मौजूद रहती हो. जिस जमीन पर केसर बोयी जाती है वहां कोई और खेती नहीं की जा सकती. कारण, केसर का बीज हमेशा जमीन के अंदर ही रहता है. इस बीज को निकाल कर उमसे दवाइयाँ और खाद मिलाकर फिर से बोया जाता है. यह बुआई जुलाई-अगस्त में की जाती है. केसर के फूल अक्टूबर-नवंबर में खिलने लगते हैं. जमीन में जितनी ज्यादा नमी होगी, केसर की पैदावार भी उतनी ही ज्यादा होगी. केसर का फूल नीले रंग का होता है. नीले फूल के भीतर पराग की पांच पंखुड़ियां होती हैं. इनमें तीन केसरिया रंग की और बीच की दो पंखुड़ियां पीले रंग की. केसरिया रंग की पंखुड़ियाँ ही असली केसर कही जाती हैं.




Sunday, May 6, 2018

दुनिया में कुल कितनी भाषाएं हैं?

अनुमान है कि पूरी दुनिया में भाषाओं की संख्या तीन से आठ हजार के बीच है। वस्तुतः यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप भाषा को किस तरह से परिभाषित करते हैं। अलबत्ता दुनिया की भाषाओं के एथनोलॉग कैटलॉग के अनुसार दुनिया में इस वक्त 6909 जीवित भाषाएं हैं। इनमें से केवल 6 फीसदी भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या दस लाख या ज्यादा है। एथनोलॉग कैटलॉग के बारे में जानकारी यहाँ मिल सकती है।

विश्व पत्रकारिता और हिन्दी पत्रकारिता दिवस

अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस (वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे) हर साल 3 मई को मनाया जाता है। वर्ष 1991 में युनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के 'जन सूचना विभाग' ने मिलकर इसे मनाने का निर्णय किया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी इसकी घोषणा की। युनेस्को महा-सम्मेलन के 26वें सत्र में 1993 में इससे संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था। इसे मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के जुड़े विभिन्न पक्षों को लेकर वैश्विक-जागरूकता बढ़ाना है।

हिन्दी पत्रकारिता दिवस भी मई में मनाया जाता है। इसकी तारीख है 30 मई। 30 मई, 1826 में पंडित युगल किशोर शुक्ल ने हिन्दी के पहले समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन व सम्पादन आरम्भ कोलकाता से किया था। इस प्रकार भारत में हिन्दी पत्रकारिता की आधारशिला उन्होंने रखी। उस समय अंग्रेज़ी, फारसी और बांग्ला में तो अनेक पत्र निकल रहे थे किन्तु हिन्दी में एक भी पत्र प्रकाशित नहीं होता था। प्रारंभिक रूप में इसकी केवल 500 प्रतियां ही मुद्रित हुई थीं। इसका प्रकाशन लम्बे समय तक न चल सका, क्योंकि इसके प्रकाशन का खर्च निकाल पाना मुश्किल हो गया था। अंतत: 4 दिसम्बर 1826 को इसका प्रकाशन स्थगित हो गया।

उंगलियों के निशान क्यों महत्वपूर्ण होते हैं?
प्रकृति ने सभी जीवधारियों को अलग-अलग सांचों से ढालकर निकाला है। दो व्यक्तियों के हाथों और पैरों की अंगुलियों के निशान या उभार समान नहीं होते। इन्हें एपिडर्मल रिज कहते हैं। हमारी त्वचा जब दूसरी वस्तुओं के साथ सम्पर्क में आती है तब ये उभार उसे महसूस करने में मददगार होते हैं। साथ ही ग्रिप बनाने में मददगार भी होते हैं। किसी भी वस्तु के साथ सम्पर्क होने पर ये निशान उसपर छूट जाते हैं। इसकी वजह है पसीना, जो हमारी त्वचा को नर्म बनाकर रखता है। तमाम दस्तावेजों में जहाँ व्यक्ति दस्तखत नहीं कर पाता उसकी उंगलियों के निशान लिए जाते हैं। आधार पहचान-पत्र में इसीलिए उंगलियों के निशान लिए जाते हैं। फोरेंसिक विज्ञान के विस्तृत होते दायरे में अब दूध का दूध और पानी का पानी अलग करना आसान हो गया है। इसके तहत संदेह की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं रहती। विज्ञान के अनुसार भले ही ये निशान फौरी तौर पर लगभग एक जैसे दिखाई पड़ें, पर उनमें समानता नहीं होती। इस अंतर का पता सूक्ष्म विश्लेषण से ही हो सकता है।

Thursday, May 3, 2018

मई दिवस क्यों मनाते हैं?


मई दिवस के दो अर्थ हैं. एक अर्थ है यूरोप में मनाया जाने वाला पारम्परिक मई दिवस और दूसरा है उन्नीसवीं सदी से शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस. दोनों 1 मई को मनाए जाते हैं. पारम्परिक अर्थ में यह यूरोप के पुराने मूर्ति-पूजक त्योहारों से जुड़ा है. उत्तरी गोलार्द्ध में यह भीषण सर्दियों की समाप्ति का संकेत भी करता है. जैसे-जैसे यूरोप ईसाई बनता गया, मूर्तिपूजक छुट्टियों की धार्मिक विशेषता खो गईं. शुरुआती मई दिवस समारोह, फूलों की रोमन देवी के त्योहार फ्लोरा और जर्मेनिक देशों के समारोह वालपुर्गिस नाइट के साथ तब मनाए जाते थे, जब यूरोप में ईसाई धर्म नहीं आया था. यूरोप में धर्मांतरण की प्रक्रिया के दौरान, कई मूर्तिपूजक समारोहों को त्याग दिया गया था, या उन्हें नया रूप दिया गया. मई दिवस का एक धर्मनिरपेक्ष संस्करण यूरोप और अमेरिका में मनाया जाता रहा है. इस रूप में, मई दिवस को मेपोल के नृत्य और मई की महारानी के राज्याभिषेक की परम्परा में मनाते हैं.

श्रमिक दिवस के रूप में 1 मई को आठ घंटे के कार्य-दिवस के लिए हुए संघर्ष की स्मृति में मनाया जाता है. इसे अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस कहते हैं. एक जमाने तक दुनिया में श्रमिकों के काम का समय निर्धारित नहीं था. इसके लिए संघर्ष चला और अमेरिका में इसकी खूनी परिणति हुई. इसे 4 मई 1886 के शिकागो के हेमार्केट प्रकरण के रूप में याद किया जाता है. हेमार्केट मामला शिकागो, इलिनॉय, संयुक्त राज्य अमेरिका में तीन दिन की आम हड़ताल के दौरान हुआ था, जिसमें आम मज़दूर, कारीगर, व्यापारी और दूसरे लोग शामिल थे. आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली से चार हड़ताली मारे गए. इसके अगले दिन हेमार्केट चौक में एक रैली हुई, जिसमें एक अज्ञात हमलावर ने बम फेंका, जिसमें सात पुलिसकर्मियों समेत करीब एक दर्जन लोगों की मौत हुई. इसके बाद एक मुकदमा चला, जिसके बाद चार लोगों को फाँसी दी गई. इस घटना से दुनियाभर में गुस्से की लहर फैल गई और अंततः दुनिया के मजदूरों के काम के घंटे आठ निर्धारित हो गए. उसकी याद में मई दिवस मनाया जाता है. यह भी रोचक है कि अमेरिका में काफी पहले से श्रम दिवस सितम्बर के पहले सोमवार को मनाया जाता है. बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उन्होंने 1 मई को लॉयल्टी डे के रूप में मनाना शुरू कर दिया है. समाजवाद और साम्यवाद के उभार के बाद सन 1904 में सेकंड इंटरनेशनल ने मई दिवस को अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस मनाने का फैसला किया. 

भारत में पहली ट्रेन कब चली?

16 अप्रैल 1853 को मुम्बई और ठाणे के बीच जब पहली रेल चली. ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के 14 डिब्बों वाली उस गाड़ी के आगे एक छोटा फॉकलैंड नाम का भाप इंजन लगा था. पहली ट्रेन ने 34 किलोमीटर का सफर किया. भारत में रेल की शुरुआत की कहानी अमेरिका के कपास की फसल की विफलता से जुड़ी हुई है, जहां वर्ष 1846 में कपास की फसल को काफी नुकसान पहुंचा था. इसके कारण ब्रिटेन के मैनचेस्टर और ग्लासगो के कपड़ा कारोबारियों को वैकल्पिक स्थान की तलाश करने पर विवश होना पड़ा था. अंग्रेज़ों को प्रशासनिक दृष्टि और सेना के परिचालन के लिए भी रेलवे का विकास करना तर्क संगत लग रहा था. ऐसे में 1843 में लॉर्ड डलहौजी ने भारत में रेल चलाने की संभावना तलाश करने का कार्य शुरु किया. डलहौजी ने बम्बई, कोलकाता, मद्रास को रेल सम्पर्क से जोड़ने का प्रस्ताव किया. इस पर अमल नहीं हो सका. साल 1849 में ग्रेट इंडियन पेंनिनसुलर कंपनी कानून पारित हुआ और भारत में रेलवे की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ.

उंगलियों के निशानों की क्या खासियत होती है?

प्रकृति ने सभी जीवधारियों को अलग-अलग सांचों से ढालकर निकाला है. दो व्यक्तियों के हाथों और पैरों की अंगुलियों के निशान या उभार समान नहीं होते. इन्हें एपिडर्मल रिज कहते हैं. हमारी त्वचा जब दूसरी वस्तुओं के साथ सम्पर्क में आती है तब ये उभार उसे महसूस करने में मददगार होते हैं. साथ ही ग्रिप बनाने में मददगार भी होते हैं. किसी भी वस्तु के साथ सम्पर्क होने पर ये निशान उसपर छूट जाते हैं. इसकी वजह है पसीना, जो हमारी त्वचा को नर्म बनाकर रखता है. तमाम दस्तावेजों में जहाँ व्यक्ति दस्तखत नहीं कर पाता उसकी उंगलियों के निशान लिए जाते हैं. आधार पहचान-पत्र में इसीलिए उंगलियों के निशान लिए जाते हैं. फोरेंसिक विज्ञान के विस्तृत होते दायरे में अब दूध का दूध और पानी का पानी अलग करना आसान हो गया है. इसके तहत संदेह की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं रहती. विज्ञान के अनुसार भले ही ये निशान फौरी तौर पर लगभग एक जैसे दिखाई पड़ें, पर उनमें समानता नहीं होती. इस अंतर का पता सूक्ष्म विश्लेषण से ही हो सकता है.


Sunday, April 22, 2018

एकसाथ चुनाव की अवधारणा क्या है?


गत 29 जनवरी को बजट सत्र के अभिभाषण में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्य विधानसभाओं के और लोकसभा के चुनाव एकसाथ कराने की वकालत करते हुए कहा कि इस विषय पर चर्चा और संवाद बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के किसी न किसी हिस्से में लगातार हो रहे चुनाव से अर्थव्यवस्था और विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे मानव संसाधन पर बोझ तो बढ़ता ही है, आचार संहिता लागू होने से देश की विकास प्रक्रिया भी बाधित होती है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में कहा कि विधानसभाओं और लोकसभा के चुनावों के साथ स्थानीय निकाय-चुनावों को भी शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही इस विषय पर देश में बहस चल पड़ी है। इस अवधारणा के विरोधियों का कहना है कि देश की भौगोलिक और राजनीतिक विविधता को देखते हुए ऐसा करना उचित नहीं होगा। पिछले कुछ समय में संसद की स्थायी समिति और नीति आयोग ने दो अलग-अलग रिपोर्टों में साथ-साथ चुनाव कराने का समर्थन किया है।

देश के पहले आम चुनाव 1951-52 में हुए थे। उस वक्त सभी विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव साथ-साथ ही हुए। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 तक साथ-साथ चुनाव हुए। सन 1967 में कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। कुछ राज्यों में समय से पहले ये सरकारें गिरीं और वहाँ चुनाव हुए, जिससे एकसाथ चुनावों का चक्र टूट गया। इसके बाद सन 1970 में पहली बार केन्द्र सरकार ने समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया और 1971 में केवल लोकसभा के चुनाव हुए।

पकौड़ा कहाँ से आया?

पकौड़ा, पकौड़ी, फक्कुरा, भजिया, भाजी और पोनाको दक्षिण एशिया में प्रचलित नमकीन व्यंजन है, जो खासतौर से भारत, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में गली-गली बनता मिलेगा। दुनिया में जबसे डीप फ्राई व्यंजनों का चलन शुरू हुआ है पकौड़ा किसी न किसी रूप में हमेशा हाजिर रहा है। यह शब्द सम्भवतः पक्व+वट से मिलकर बना है। वट, वटक और वड़ा इसके दूसरे रूप हैं। आंध्र प्रदेश में पकौडा है तो उत्तर भारत के कुछ इलाकों में पकौरा भी चलता है।

दक्षिण भारत का बोंडा और मुम्बई में पाव के साथ मिलने वाला वड़ा इस पकौड़े का ही एक रूप है। बांग्लादेश के कुछ इलाकों में फक्कुरा। र और ड़ के उच्चारण की भिन्नता के कारण भी ऐसा है। कर्नाटक में भाजी है, तो अफ्रीका के सोमालिया में बजिए। दक्षिण अफ्रीका के कुछ इलाकों में ढाल्टी नाम से पकौड़ों जैसा व्यंजन बनता है, जो मुस्लिम इलाकों में रोजों के दौरान इफ्तार में खाया जाता है। दक्षिण एशिया में यह आमतौर पर बेसन या चने की दाल को पीसकर तैयार पेस्ट में सब्जियाँ मिलाकर बनाया जाता है।

मूँग की दाल से बनता है, तो मुँगौड़ा और उरद की दाल से वड़ा। देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-लग ढंग से बनने वाली कढ़ी में भी इसे जगह मिली है। पुर्तगाली डिश टेम्पूरा, जापान में जाकर काफी लोकप्रिय हुआ है। इसी तरह दुनियाभर में मिलने वाले तरह-तरह के फ्रिटर्स भी पकौड़े ही हैं। इसमें अंडे और सीफूड को भी जगह मिल गई। भारत में सामान्यतः यह बेसन से बनता है, पर आटे, सूजी और मैदा की मिलावट के साथ इसके नाम भी बदलते जाते हैं। राजस्थान का मिर्ची वड़ा, दिल्ली का ब्रेड पकौड़ा, अंडा पकौड़ा, प्याज पकौड़ा, पनीर पकौड़ा से लेकर चिकन पकौड़ा और फिश पकौड़ा तक इसके तमाम रूप हैं।

Thursday, April 19, 2018

सीरिया में लड़ाई क्यों?

सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ पिछले सात साल से विद्रोह चल रहा है, जिसका इसरायल, सउदी अरब, तुर्की, अमेरिका और पश्चिमी देश अपने-अपने तरीके से समर्थन कर रहे हैं. दूसरी तरफ बशर-अल-असद की सरकार को ईरान और रूस का समर्थन प्राप्त है. यह बगावत गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है. इसमें अब तक 3 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल असद की जगह ली थी. सन 2011 में कई अरब देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था, जिसने गृहयुद्ध का रूप ले लिया है.

सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. यह संघर्ष साम्प्रदायिक रूप ले चुका है, जिसमें जेहादी ग्रुपों को पनपने का मौका मिला. इसी दौरान इराक में इस्लामिक स्टेट उभार शुरू हुआ, जिसने उत्तरी और पूर्वी सीरिया के काफी हिस्सों पर क़ब्ज़ा कर लिया. दूसरी तरफ ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरिया की सेना की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे हैं. सीरिया, इराक़ और तुर्की की सीमा पर बड़ी संख्या में कुर्दों की आबादी भी है. वे एक स्वतंत्र देश बनाने के लिए अलग लड़ रहे हैं.

इस प्रकार इस इलाके में कई तरह की ताकतें, कई तरह की ताकतों से लड़ रहीं हैं. पश्चिमी देशों का आरोप है कि सीरिया की सेना विद्रोहियों का दमन करने के लिए रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है. सीरिया पर पश्चिमी देशों के नवीनतम हमलों की वजह यह बताई जा रही है कि गत 7 अप्रैल को पूर्वी गोता इलाके के डूमा में सीरिया की सेना ने विद्रोहियों और राहत-कर्मियों पर रासायनिक हथियारों से हमला किया, जिसमें 40 लोग मारे गए.

बोआओ फोरम क्या है?

बोआओ फोरम एशिया (बीएफए) व्यापारिक सहयोग और विमर्श का फोरम है, जिसे दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तर्ज पर गठित किया गया है. इसका मुख्यालय चीन के हैनान प्रांत के बोआओ में है. सन 2001 से यहाँ एशिया की सरकारों और उद्योगों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हो रहा है. यह फोरम क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के इरादे से गठित किया गया है. इसमें एशिया के देशों को आर्थिक-विकास की राह पर चलते हुए अपनी अर्थ-व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का मौका मिलता है. इसे शुरू करने का विचार मूलतः फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वी रैमोस, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री बॉब हॉक और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री मोरीहीरो होसोकावा ने बनाया था.

इसका उद्घाटन 27 फरवरी 2001 को हुआ था. इसके लिए चीन ने खासतौर से पहल की. इसकी शुरूआत 26 देशों की भागीदारी के साथ हुई थी. इस वक्त इसके 29 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल हैं. इससे जुड़े संगठन की पहली बैठक 12-13 अप्रैल 2002 को हुई. हाल में 8 से 11 अप्रैल 2018 को फोरम का सालाना सम्मेलन हुआ. इसमें चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी भावी आर्थिक नीतियों की ओर इशारा किया. हालांकि भारत की ओर से इस सम्मेलन में कोई बड़ी राजनीतिक हस्ती उपस्थित नहीं थी. केवल उद्योग-व्यापार संगठन फिक्की के प्रतिनिधि इसमें उपस्थित थे.

बोआओ फोरम में आर्थिक एकीकरण के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय-प्रश्नों पर भी विचार किया जाता है. यह फोरम एक तरह से चीन और वैश्विक-व्यापार के बीच की कड़ी बना. सन 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य भी बना था.

डब्लूटीओ में कितने सदस्य हैं?

विश्व व्यापार संगठन में 164 सदस्य और 23 पर्यवेक्षक देश हैं. 14 जुलाई 2016 को लाइबेरिया इसका 163वाँ और 29 जुलाई 2016 को अफ़ग़ानिस्तान इसका 164वाँ सदस्य बना.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Saturday, April 14, 2018

मैराथन दौड़ की कहानी क्या है?


मैराथन दुनिया में सबसे लम्बी दूरी की दौड़ है. आधिकारिक रूप से इसकी लम्बाई 42.195 किलोमीटर (26 मील 385 गज) होती है. सामान्यतः यह सड़क पर होने वाली दौड़ है, जिसका छोटा सा हिस्सा ही स्टेडियम के भीतर होता है. सन 1896 में जब आधुनिक ओलिम्पिक खेल शुरू हुए तब मैराथन दौड़ भी उसका हिस्सा थी. पर उस वक्त इसकी लम्बाई का मानकीकरण नहीं हुआ था. इसकी लम्बाई का निर्धारण सन 1921 में हुआ.

दुनिया में आज 800 से ज्यादा ऐसी मैराथन प्रतियोगिताएं होती हैं, जो किसी न किसी रूप में खेल संघों से सम्बद्ध होती हैं. इन्हें स्वास्थ्य तथा अन्य सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों से भी जोड़ा जाता है. इनमें सैकड़ों और कई बार हजारों शौकिया धावक भी हिस्सा लेते हैं. तमाम लोग इस दौड़ के छोटे से हिस्से को ही पूरा करते हैं. कई जगह हाफ मैराथन भी होती हैं.

आधुनिक युग में मैराथन दौड़ यूनान की एक दंतकथा से प्रेरित है. इसकी कहानी फ़ेडिप्पिडिस नामक यूनानी धावक से जुड़ी है. दंतकथा के अनुसार फ़ेडिप्पिडिस एक हरकारा था, जिसे मैराथन से एथेंस यह घोषित करने के लिए भेजा गया था कि मैराथन के युद्ध में (जिसमें वह खुद भी लड़ रहा था) फारसियों की पराजय हो गई है. यह ई.पू. 490 के अगस्त या सितंबर की घटना है. कहा जाता है कि फ़ेडिप्पिडिस पूरे रास्ते पर बिना रुके दौड़ा और फिर सभा में प्रवेश करके बोला नेनिकेकामेन, ‘हम जीत गए. और फिर वह गिर पड़ा और मर गया.

मैराथन से एथेंस की दौड़ का पहला वृत्तांत प्लूटार्क की एथेंस कीर्ति में मिलता है, जो पहली सदी में लिखी गई थी और हेराक्लाइडस पॉण्टिकस की लुप्त कृति को संदर्भित करते हुए धावक का नाम एर्चियस या यूक्लस का थेर्सिपस बताया गया था. एक और लेखक समोसाता के लूशियन (दूसरी सदी) ने भी इस कथा को लिखा है, पर धावक का नाम फ़ेलिप्पिडिस बताया है, फ़ेडिप्पिडिस नहीं। बहरहाल यह किंवदंती है. इसका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. यूनानी-फ़ारसी युद्धों के प्रमुख स्रोत, यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस, फ़ेडिप्पिडिस को एक हरकारे के रूप में वर्णित करते हैं जो मदद का संदेश लेकर एथेंस से स्पार्टा और वापस गए, एक तरफ से यह दूरी 240 किलोमीटर (150 मील) से भी ज़्यादा है.

भारोत्तोलन की दो तकनीकें

भारोत्तोलन प्रतियोगिता में ताक़त और तकनीक की परीक्षा होती है. इसमें प्रतियोगियों के भार के हिसाब से कई वर्ग बनाए जाते हैं. मुक्केबाज़ी, कुश्ती और जूडो, कराते और भारोत्तोलन जैसी प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों के शरीर का वज़न भी महत्वपूर्ण होता है. इसलिए इनमें खिलाड़ियों को अलग-अलग वज़न के आधार पर वर्गीकृत करते हैं. ऊँचे दर्जे के भारोत्तोलक अपने वज़न से तीन गुना ज़्यादा तक भार उठा लेते हैं.

इन दिनों हो रहे कॉमनवैल्थ खेल में भारत की मीराबाई चानू ने 48 किलो वर्ग में भाग लेते हुए कुल 196 किलोग्राम भार उठाया. यह भार दो बार में अलग-अलग तकनीकों के तहत उठाया गया था. भारोत्तोलन में प्रतियोगी को दो तरह की तकनीकों से भार उठाने के लिए कहा जाता है. पहली तकनीक है स्नैच, जिसमें भार को सीधे एकबारगी सिर के ऊपर तक उठाना होता है. दूसरी तकनीक क्लीन एंड जर्क कहलाती है. इसमें भार को दो चरणों में सिर के ऊपर तक उठाना होता है. सफलतापूर्वक भार उठाने के लिए भारोत्तोलक के हाथ सिर के ऊपर तक जाने चाहिए और शरीर का सीधा रहना जरूरी होता है. हर भारोत्तोलक को भार उठाने के लिए तीन अवसर मिलते हैं.

कहाँ और कब बनी पहली कार?                                            

हालांकि शुरू में भाप से चलने वाली गाड़ियाँ बनी थीं, पर इंटरनल कॉम्बुशन इंजन से चलने वाली पहली कार सन 1870 में ऑस्ट्रिया के वियना शहर में सिग्फ्राइड मार्कस ने तैयार की. वह गैसोलीन से चलती थी. इसे फर्स्ट मार्कस कार कहते हैं. मार्कस ने ही 1888 में सेकंड मार्कस कार तैयार की जिसमें कई तरह के सुधार किए गए थे. इस बीच जर्मनी के मैनहाइम में कार्ल बेंज ने सन 1885 में तैयार की.

नॉटिकल मील क्या होता है?

नॉटिकल मील का इस्तेमाल आमतौर पर समुद्री और हवाई नेवीगेशन में होता है. लम्बाई के हिसाब से यह करीब 1852 मीटर या 6076 फुट होता है. सागर और आकाश के नेवीगेशन में आमतौर पर अक्षांश-देशांतर का इस्तेमाल होता है. भूमध्य रेखा और उससे उत्तर या दक्षिण में इसकी दूरी में मामूली फर्क भी आता रहता है.


Sunday, April 1, 2018

कॉमनवैल्थ खेल क्या हैं?


कॉमनवैल्थ गेम्स हर चार साल में होने वाला अंतरराष्ट्रीय खेल समारोह है जो ओलिम्पिक खेलों के तर्ज़ पर होता है. इसमें भाग लेने देश कॉमनवैल्थ के सदस्य हैं. कॉमनवैल्थ एक अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं जिसके 53 सदस्य हैं. ज्यादातर देश किसी न किसी रूप में ब्रिटिश साम्राज्य के अंग रहे थे. कॉमनवैल्थ का विकास सन 1887 से शुरू हुई कॉलोनियल कांफ्रेंसों से हुआ था, जिनका नाम 1911 से इम्पीरियल कांफ्रेंस हो गया. 1926 की बालफोर घोषणा के बाद इसे ब्रिटिश कॉमनवैल्थ ऑफ नेशंस कहा जाने लगा. 

सन 1891 में रेवरेंड एस्ले कूपर ने द टाइम्स, लंदन में लेख लिखकर सुझाव दिया कि ब्रिटिश साम्राज्य में सौहार्द कायम रखने के लिए हर चार साल में एक अखिल ब्रितानी-आंग्ल समारोह होना चाहिए. इस समारोह के बारे में चर्चा चलती रही और इस सुझाव के बीस साल बाद 1911 में जब जॉर्ज पंचम का राज्याभिषेक हो रहा था, अंतर-साम्राज्य चैम्पियनशिप हुई. इसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और यूके की टीमों ने हिस्सा लिया. इसके बाद इन खेलों को लेकर विचार चलता रहा और अंतत: 1928 में मेल्विल मार्क्स रॉबिनसन नाम के सज्जन को जिम्मेदारी दी गई कि वे इन खेलों का आयोजन करें. 1930 में कनाडा के हैमिल्टन शहर में पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स हुए.

1954 में इन खेलों का नाम ब्रिटिश एम्पायर एंड कॉमनवैल्थ गेम्स रखा गया. 1970 में इनका नाम ब्रिटिश कॉमनवैल्थ गेम्स और 1978 में कॉमनवैल्थ गेम्स हो गया. इन खेलों की खासियत है कि 53 सदस्य देशों की 71 के आसपास टीमें इनमें शामिल होतीं हैं. युनाइटेड किंगडम के चारों गृह देश इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड इनमें शामिल होते हैं. ऑस्ट्रेलिया की टीम के अलावा उसके नोरफॉक आयलैंड की अलग टीम इनमें शामिल होती है. न्यूजीलैंड के अलावा कुक आइलैंड्स और नियू फ्री एसोसिएशन की टीमें अलग से शामिल होती हैं. सन 2010 में दिल्ली में न्यूज़ीलैंड के अधीनस्थ तोकेलू की टीम ने भी हिस्सा लिया. इस तरह अनेक ऐसी टीमें भी इन खेलों में आती हैं, जो पूरी तरह स्वतंत्र देश नहीं हैं.

अब ये खेल कहाँ हो रहे हैं?

इस साल 21 वे कॉमनवैल्थ गेम्स ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड प्रांत के गोल्ड कोस्ट में 4 से 15 अप्रैल तक होंगे. यह पाँचवाँ मौका है, जब ऑस्ट्रेलिया में ये खेल हो रहे हैं. सन 2010 में दिल्ली में 19वें गेम्स हुए. उसके बाद 2014 में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 20वें खेल हुए. गोल्ड कोस्ट के बाद 2022 के खेल इंग्लैंड के बर्मिंघम में होंगे. एशिया के दो देशों में ये खेल हो चुके हैं. सन 2010 में दिल्ली के पहले 1998 में क्वालालम्पुर में ये खेल हुए थे.

गोल्ड कोस्ट शहर की क्या खासियत है?

गोल्ड कोस्ट ऑस्ट्रेलिया के अपेक्षाकृत नए शहरों में एक है. यह ब्रिसबेन से करीब 66 किलोमीटर दूर है. सन 2016 की जनगणना में इस शहर की आबादी 6,38,090 थी. यह ऑस्ट्रेलिया का छठा सबसे बड़ा शहर है. शुरू में इस इलाके में रहने के लिए युरोपियन लोग नहीं आए थे. सन 1823 में जॉन ओक्सले नामक एक अंग्रेज मरमेड बीच पर आए. यहाँ के लाल देवदार ने लोगों का ध्यान खींचा. सन 1875 में साउथ पोर्ट का सर्वे हुआ और यह छुट्टियाँ बिताने की जगह के रूप में विकसित होने लगा. आज यह पर्यटकों का शहर है. यहाँ के बीच पर सर्फिंग का आनंद लोग लेते हैं. देश के मनोरंजन उद्योग ने यहाँ अड्डा जमाया है. अब फिल्म और म्यूजिक उद्योग के लिए इस शहर को जाना जाता है.

चुनाव पांच साल बाद ही क्यों होते हैं?

हमारे संविधान के अनुच्छेद 63(2) के अनुसार लोकसभा का कार्यकाल पाँच वर्ष है। इसलिए चुनाव पाँच साल में होते हैं। विधानसभाओं के साथ भी ऐसा ही है। लोकसभा पाँच साल के पहले भी भंग की जा सकती है और आपत् काल में उसका कार्यकाल बढ़ाया भी जा सकता है। राज्यसभा में एक सदस्य का कार्यकाल छह साल होता है, पर चुनाव हर दो साल में होते हैं।






Saturday, March 31, 2018

वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से क्यों शुरू होता है?

ऐसा ब्रिटिश परम्परा के कारण है. ईस्ट इंडिया कम्पनी से ब्रिटिश सरकार को भारत की सत्ता हस्तांतरण होने के बाद 1860 में पहली बार बजट प्रणाली प्रारम्भ की गई. 1867 में 1 अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधि का पहला बजट प्रस्तुत किया गया. इंग्लैंड में इसे 1 जनवरी से 31 दिसंबर तक इसलिए नहीं रखा जाता, क्योंकि साल के अंत में क्रिसमस के त्योहार की वजह से लोग व्यस्त रहते हैं. उस वक्त आर्थिक हिसाब-किताब के लिए समय नहीं होता, क्योंकि सर्दी की छुट्टियाँ होती हैं.
दुनिया के सभी देशों में वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू नहीं होता. अमेरिका का वित्तीय वर्ष पहली अक्तूबर से 30 सितंबर तक होता है, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मिस्र, पाकिस्तान में यह पहली जुलाई को शुरू होकर 30 जून तक रहता है. चीन, ब्राजील, जर्मनी, नीदरलैंड, दक्षिण कोरिया, पुर्तगाल, रूस, स्पेन, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, ताइवान एवं अन्य 60 देशों में 1 जनवरी  से 31 दिसम्बर तक अर्थात् कैलेंडर वर्ष को वित्त वर्ष भी माना जाता है.
संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, आईएमएफ एवं विश्व के बड़े वित्तीय संस्थान कैलेंडर वर्ष को अपने वित्त वर्ष के रूप में अपनाते हैं. भारत में भी 1 जनवरी से 31 दिसम्बर तक के कैलेंडर वर्ष को वित्त वर्ष में अपनाने के लिए समय-समय पर सुझाव दिए जाते रहे हैं किन्तु अभी तक वित्त वर्ष की तारीखों में बदलाव नहीं आ पाया. हाल में भारत में नए वित्त वर्ष की जरूरत और बदलाव की संभावनाओं पर विचार के लिए भारत सरकार ने पूर्व आर्थिक सलाहकार डॉ. शंकर आचार्य की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय समिति ने भी वित्त वर्ष 1 जनवरी से रखने का सुझाव दिया है. दिसम्बर 2016 में इस समिति ने वित्त मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी.  
समिति ने नीति आयोग का समर्थन करते हुए कहा है कि मॉनसून और फसली मौसम के हिसाब से यह कदम अनुकूल रहेगा. समिति ने शेयर बाजार द्वारा अपनाए जाने वाले संवत कैलेंडर, जुलाई से शुरू होने वाले फसली चक्र के कैलेंडर पर भी गौर किया, लेकिन जनवरी से दिसंबर के कैलेंडर को उपयुक्त माना. हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था खेती से भी प्रभावित होती है. मॉनसून की अनियमितता का असर अर्थ-व्यवस्था पर पड़ता है. कुछ अर्थशास्त्रियों ने जुलाई से जून के वित्त वर्ष की सलाह भी दी. भारत सरकार ने 1984 में डॉ. एलके झा की अध्यक्षता में वित्त वर्ष में बदलाव के लिए समिति का गठन किया था. उस समिति ने जनवरी से दिसम्बर को वित्त वर्ष अपनाने का सुझाव दिया था. पर सरकार ने बदलाव करना ठीक नहीं समझा. 
साउंडप्रूफ प्रणाली क्या है?
साउंडप्रूफिंग से तात्पर्य है आवाज़ के दबाव को संतुलित करना. इसके कई अर्थ हो सकते हैं. एक अर्थ है कमरे से आवाज़ बाहर न जाने देना. दूसरा अर्थ है बाहर की आवाज़ अन्दर न आने देना. तीसरा अर्थ है कमरे में अनुगूँज या ईको को रोकना. चौथा अर्थ है कि आवाज़ की सभी आवृत्तियों की अनुमति देना और निरर्थक आवाज़ों को रद्द करना या जज़्ब करना. आमतौर पर दीवारों पर एकाउस्टिक बोर्ड और फोम लगाकर ध्वनि को बेहतर बनाया जाता है. ज़रूरत के अनुसार एकाउस्टिक ट्रांसमिशन, रिसेप्शन, माइक्रोफोन, स्पीकर आदि का इस्तेमाल होता है. अब ऐसे कम्प्यूटर बेस सिस्टम आते हैं, जो ध्वनि का तत्काल विश्लेषण करके निरर्थक ध्वनियों को रद्द कर देते हैं.
तितली की कितनी आँखें होती हैं?
तितली की भी दो आँखें होती हैं, पर उसकी आँखें कम्पाउंड यानी संयुक्त होती हैं. उसके अनेक फोटोरिसेप्टर होते हैं. इस तरह देखें तो उसके हजारों आँखें होती हैं. मोटे तौर पर करीब बारह से बीस हजार आँखें. तितलियाँ देख तो सकती हैं लेकिन उनकी यह क्षमता सीमित होती है. इनकी आँखें बड़ी और गोलाकार होती हैं. इनमें हज़ारों सैंसर होते हैं जो अलग- अलग कोण में लगे रहते हैं. तितलियां ऊपर, नीचे, आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ सभी दिशाओं में एक साथ देख सकती हैं. इसका यह नुक़सान भी होता है कि वे किसी चीज़ पर अपनी दृष्टि एकाग्र नहीं कर पातीं और उन्हें धुंधला सा दिखाई देता है. पर वे किसी भी प्रकार की गति को भाँप जाती हैं. इसीलिए जब कोई उन्हें पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाता है तो उन्हें फौरन पता चल जाता है और वे उड़ जाती हैं.
भारत में कुल कितने गाँव हैं?
सन 2011 की जनगणना के अनुसार देश में गाँवों की संख्या 6,40,867  है. 2001 की जनगणना में यह संख्या 6,38,588 थी.
http://epaper.prabhatkhabar.com/1605606/Awsar/Awsar#page/6/1

Monday, March 26, 2018

अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस क्या है?


हाल में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा के दौरान जब अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का पहला सम्मेलन हुआ, तब दुनिया का ध्यान इस नए उदीयमान संगठन की ओर गया, जो ऊर्जा की वैश्विक जरूरतों के लिए एक नया संदेश लेकर आया है. नवम्बर 2015 में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लंदन के वैम्ब्ले स्टेडियम में इस अवधारणा को प्रकट किया था और सौर-ऊर्जा के लिहाज से धनी देशों को सूर्यपुत्र कहा था. इसके बाद इस गठबंधन की शुरुआत 30 नवम्बर 2015 को पेरिस में हुई थी. यह गठबंधन कर्क और मकर रेखा पर स्थित देशों को नई ऊर्जा के विकल्प लेकर आया है. इस इलाके में सौर ऊर्जा इफरात से मिलती है.

इस संगठन का उद्देश्य है, इन देशों के बीच सहयोग बढ़ाना. इसका सचिवालय दिल्ली के करीब गुरुग्राम में बनाया गया है. इसके भवन की आधारशिला 25 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने रखी. सन 2016 के मराकेश जलवायु सम्मेलन में इस संधि का प्रारूप पेश किया गया था. पहले दिन इसपर 15 देशों ने दस्तखत किए. अब चीन और अमेरिका भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं. दोनों ने अभी इससे जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन दोनों ही जल्द इससे जुड़ सकते हैं. चीन और अमेरिका के साथ आने से फायदा होगा, क्योंकि दोनों के पास इससे जुड़ी पर्याप्त तकनीक है.

इस समझौते के तहत उष्णकटिबंधीय देशों में सोलर पावर के इस्तेमाल को बढ़ाया दिया जाएगा. फिलहाल 62 देशों ने इसके शुरुआती ढांचे पर रजामंदी जताते हुए दस्तखत किए हैं. भारत ने लक्ष्य रखा है कि वह 2022 तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा का उत्पादन करने लगेगा. इसमें 100 गीगावॉट सोलर और 75 गीगावॉट पवन ऊर्जा होगी. भारत दुनिया में सौर ऊर्जा का वरण करने वाले देशों में बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है. इस साल फरवरी में देश की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता 20 गीगावॉट की थी. सन 2014 में यह क्षमता 2.6 गीगावॉट थी. जो 20 गीगावॉट क्षमता हासिल की गई है, वह 2022 तक पाने का हमारा लक्ष्य था.

प्रशंसक के अर्थ में फैन शब्द कैसे बना?

दो साल पहले फिल्म 'फैन' के नायक थे शाहरुख खान. व्यक्तिगत बातचीत में कहीं शाहरुख ने कहा, फैन शब्द मुझे पसंद नहीं. उनका कहना था, फैन शब्द फैनेटिक (उन्मादी) से निकला है. यह कई बार नकारात्मक भी होता है. आप ने अक्सर लोगों को यह कहते सुना होगा कि मैं अमिताभ का फैन हूँ या सचिन तेंदुलकर, रेखा या विराट कोहली का फैन हूँ. कुछ लोग मज़ाक में कहते हैं कि मैं आपका पंखा हूँ, क्योंकि फैन का सर्वाधिक प्रचलित अर्थ पंखा ही है.

फैन का अर्थ उत्साही समर्थक या बहुत बड़ा प्रशंसक भी होता है, पर इसका यह अर्थ हमेशा से नहीं था. इसका जन्म अमेरिका में बेसबॉल के मैदान में हुआ. इसका पहली बार इस्तेमाल किया टेड सुलीवॉन ने, जो सेंट लुईस ब्राउन्ज़ बेसबॉल टीम के मैनेजर थे. सन 1887 में फिलाडेल्फ़िया की एक खेल पत्रिका ‘स्पोर्टिंग लाइफ़’ में इस शब्द के बारे में जानकारी दी गई. इसमें बताया गया कि फैन शब्द ‘फैनेटिक’ का संक्षिप्त रूप है.

टेड सुलीवॉन ने बताया,मैं टीम के मालिक क्रिस से बात कर रहा था. क्रिस के निदेशक मंडल में बेसबॉल के दीवाने भी थे जो मेरे कामों में हमेशा दखल देते रहते और क्रिस को यह बताते रहते कि टीम को कैसे चलना चाहिए. मैंने क्रिस से कहा कि मुझे इतने सारे फैनेटिक्स की सलाह की ज़रूरत नहीं है. इसी बातचीत में संक्षेप में फैन्ज़ शब्द बन गया. मैंने कहा कि क्रिस यहां बहुत सारे फैन्ज़ हैं. बाद में अखबारों में यह शब्द चल निकला. 

पहले यह शब्द अमेरिकी खेल प्रेमियों के लिए ही प्रयोग होता रहा, लेकिन बाद में यह दूसरे खेलों और फिर जीवन के सभी क्षेत्रों में छा गया. इस शब्द से फैनडम शब्द बना. फिर फैन मेल, फैन लेटर और फैन क्लब तक बन गए.

रोबोट शब्द कब बना?

रोबोट शब्द चेकोस्लोवाकिया के नाट्य लेखक कारेल चापेक ने 1921 में गढ़ा. उन्होंने एक नाटक लिखा आरयूआर यानी कि रोज़म्स युनीवर्सल रोबोट्स. इस वैज्ञानिक फैंटेसी में मशीनी सेवक हैं, जो मनुष्यों के लिए काम करते हैं. चेक भाषा में रोबोटा का मतलब होता है श्रमिक. इससे बना रोबोट शब्द. पर यहाँ से रोबोट की अवधारणा का जन्म नहीं हुआ. यदि हम मनुष्यों की तरह काम करने वाली मशीन की अवधारणा का इतिहास खोजें तो पाएंगे कि इससे पहले ऑटोमेटा की अवधारणा ने जन्म ले लिया था. ऑटोमेटा सन1700 के आसपास बनाए गए खिलौने थे, जो घड़ीसाज़ी में काम आने वाली मशीनरी के सहारे चलते थे. इतने चलते-फिरते पुतले कह सकते हैं. पिछले चार दशकों में कम्प्यूटर और कृत्रिम मेधा (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) के विकास के साथ रोबोट का मतलब काफी बदल गया है. 

पूरी दुनिया में कुल कितनी भाषाएं हैं?

पूरी दुनिया में अनुमान है कि भाषाओं की संख्या तीन से आठ हजार के बीच है. वस्तुतः यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप भाषा को किस तरह से परिभाषित करते हैं. अलबत्ता दुनिया की भाषाओं के एथनोलॉग कैटलॉग के अनुसार दुनिया में इस वक्त 6909 जीवित भाषाएं हैं. इनमें से केवल 6 फीसदी भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या दस लाख या ज्यादा है. एथनोलॉग कैटलॉग के बारे में जानकारी यहाँ मिल सकती है https://www.ethnologue.com/statistics/size.