गिग वर्कर्स वे लोग हैं, जो अल्पकालिक, टास्क-आधारित या फ्रीलांस काम करते हैं। जो ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म्स जैसे ऊबर, ओला, रैपिडो, पोर्टर, स्विगी, ज़ोमैटो, ब्लिंकिट या फ्रीलांसिंग साइट्स (जैसे अपवर्क) के माध्यम से काम पाते हैं। जो लोग फिक्स्ड सैलरी या समय-सीमा के काम करते हैं। ‘गिग’ शब्द का इस्तेमाल 1920 के दशक में जैज़ संगीतकारों ने अपने ‘जॉब’ या काम के लिए किया, लेकिन गिग वर्कर्स के रूप में इसका व्यापक उपयोग हाल के वर्षों में, विशेषकर 2009 में अमेरिका में ऊबर के लॉन्च के बाद बढ़ा। भारत में गिग वर्कर्स तेजी से बढ़ रहे हैं। 2020-21 में इनकी संख्या लगभग 77 लाख थी, जो 2030 तक अनुमानतः 2.3 करोड़ से अधिक हो जाएगी। यह संख्या उस समय की वर्कफोर्स का 6-8 प्रतिशत होगी। गिग वर्क में फिक्स्ड वेतन, बीमा, पेंशन या छुट्टी नहीं होती, इसलिए सुरक्षा कम है। 2025 के अंत में बड़ी संख्या में डिलीवरी वर्कर्स ने बेहतर पेमेंट और सुरक्षा की माँग को लेकर हड़ताल की थी। भारत में सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत इनके हितों की रक्षा की जा रही है। इसके तहत स्वास्थ्य, बीमा और दुर्घटना लाभ सुनिश्चित करने की पहल है।
राजस्थान
पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 14 मार्च 2026 को प्रकाशित
