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Sunday, June 16, 2024

ग्रैंड स्लैम के भी कई नाम हैं

ग्रैंड स्लैम का मतलब है दुनिया में टेनिस की चार सबसे बड़ी प्रतियोगिताओं में विजय हासिल करना। ये चार प्रतियोगिताएं हैं ऑस्ट्रेलिया ओपन, फ्रेंच ओपन, विंबलडन और यूएस ओपन। अब प्रोफेशनल टेनिस की प्रतियोगिताओं में एटीपी टुअर सीरीज़ भी होती है, जिसका वर्ष के अंत में एटीपी वर्ल्ड टुअर फाइनल होता है। यह प्रतियोगिता परंपरागत ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता नहीं है, पर प्रतिष्ठित प्रतियोगिता जरूर है। ग्रैंड स्लैम को कई नाम मिल गए हैं:-

मुख्य या कैलेंडर ग्रैंड स्लैम तब होता है जब कोई खिलाड़ी एक कैलेंडर वर्ष में सभी चार प्रमुख टूर्नामेंट जीतता है।

गैर-कैलेंडर वर्ष ग्रैंड स्लैम तब होता है जब खिलाड़ी लगातार सभी चार प्रमुख प्रतियोगिताओं में चैंपियन बनता है, पर ऐसा वह दो कैलंडर वर्ष में करता है। उदाहरण के लिए, वह 2005 में विंबलडन और यूएस ओपन में जीते और फिर 2006 में ऑस्ट्रेलिया और फ्रेंच ओपन। 1983-84 में मार्टिना नवरातिलोवा ने, 1993-94 में स्टेफी ग्राफ ने, 2002-03 में सेरेना विलियम्स ने और 2015-16 में नोवा जोकोविच ने ऐसे ही जीता। 

करियर ग्रैंड स्लैम यानी खिलाड़ी अपने करियर में कम से कम एक बार चारों प्रमुख प्रतियोगिताएं जीते।

गोल्डन स्लैम यानी खिलाड़ी उस साल के ग्रीष्मकालीन ओलिंपिक में स्वर्ण पदक के साथ-साथ सभी चार प्रमुख प्रतियोगिताएं जीते।

•सुपर स्लैम यानी कि खिलाड़ी सभी चार प्रमुख टूर्नामेंट जीते और साल के अंत

में एटीपी वर्ल्ड टुअर फाइनल भी जीते

• बॉक्स्ड सेट ग्रैंड स्लैम एक कैलेंडर वर्ष में खिलाड़ी सिंगल्स, डबल्स, और मिक्स्ड डबल्स ग्रैंड स्लैम जीते। ऐसा कभी हुआ नहीं है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 15 जून, 2024 को प्रकाशित

 

 

Saturday, April 20, 2024

अनिवार्य मतदान का मतलब क्य़ा है?


चुनाव में भागीदारी को स्वस्थ लोकतांत्रिक-व्यवस्था के लिए ज़रूरी और मतदाता का अधिकार माना जाता है। कुछ देशों में इसे कर्तव्य भी माना जाता है और उसमें भाग लेना कानूनन अनिवार्य होता है। मतदान में भाग नहीं लेने पर वोटर की भर्त्सना या जुर्माने की व्यवस्था भी होती है।
यदि कोई वैध मतदाता, मतदान केन्द्र पहुंचकर अपना मत नहीं देता है तो उसे पहले से घोषित कुछ दंड का भागी बनाया जा सकता है।

यह कोई नई अवधारणा नहीं है। बेल्जियम में सबसे पहले 1893 में पुरुषों के लिए और फिर 1948 में स्त्रियों के लिए भी अनिवार्य मतदान का प्रावधान किया गया था। अर्जेंटीना में 1914 में और ऑस्ट्रेलिया में 1924 में। इनमें ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और बेल्जियम के अलावा सायप्रस, सिंगापुर, बोलीविया, कोस्टारिका, इक्वेडोर, फिजी, थाईलैंड, मिस्र, उरुग्वाय, लक्ज़ेम्बर्ग, चिली और ब्राज़ील के नाम भी शामिल हैं।

कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं, जिनमें अनिवार्य मतदान की व्यवस्था कुछ समय लागू रही और फिर बाद में उसे खत्म कर दिया गया। ऐसे देशों में वेनेजुएला और द नीदरलैंड्स के नाम शामिल हैं। जनवरी 2023 तक की जानकारी के अनुसार दुनिया के 21 देशों में मतदान अनिवार्य है। कई देशों में मतदान ना करने पर दंड का प्रावधान है। हालांकि कुछ राजनीति शास्त्री मानते हैं कि मतदान एक महत्वपूर्ण अधिकार है, पर मतदान में भाग नहीं लेना भी उस अधिकार का हिस्सा है। भारत में नोटा (नन ऑफ द एबव) भी इसका एक रूप है।

वीवीपैट क्या है?

वोटर वैरीफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) या वैरीफाइड पेपर रिकार्ड (वीपीआर) इलेक्ट्रॉनिक वोटर मशीन का उपयोग करते हुए मतदाताओं को फीडबैक देने का एक तरीका है। यह एक स्वतंत्र सत्यापन प्रणाली है, जिससे मतदाताओं को जानकारी मिल जाती है कि उनका वोट सही ढंग से डाला गया है। इसमें वोट का बटन दबने के बाद एक पर्ची छपकर बाहर आती है। मतदाता सात सेकंड तक यह देख सकता है कि उसने जिस प्रत्याशी को वोट दिया है उसका नाम और चुनाव चिह्न क्या है। भारत में, 2014 के चुनाव में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में 543 में से 8 संसदीय क्षेत्रों में वीवीपैट प्रणाली की शुरुआत की गई थी। ये क्षेत्र थे लखनऊ, गांधीनगर, बेंगलुरु दक्षिण, चेन्नई सेंट्रल, जादवपुर, रायपुर, पटना साहिब और मिजोरम। इनका पहली बार इस्तेमाल सितंबर 2013 में नगालैंड के नोकसेन विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र हुआ था। सन 2017 में गोवा विधानसभा चुनाव में संपूर्ण राज्य में इनका इस्तेमाल किया गया था। चुनाव आयोग ने इस वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में हरेक संसदीय क्षेत्र के हरेक विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट के इस्तेमाल का निर्देश जारी किया है।

 इनकी जरूरत क्यों पड़ी?

 भारत में सन 1999 के लोकसभा चुनाव में आंशिक रूप से और 2004 के चुनाव में पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल किया गया था। उस चुनाव में 10 लाख से ज्यादा वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल किया गया। इन मशीनों के इस्तेमाल के पहले हमारे देश में कागज के बैलट पेपरों का इस्तेमाल होता था। उन चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की शिकायतें आती थीं। उनकी गिनती में काफी समय लगता था और मानवीय त्रुटि की सम्भावनाएं भी थीं। वोटिंग मशीनें बनाने की कोशिशें उन्नीसवीं सदी से चल रहीं थीं। अमेरिका में वोटिंग मशीन का पेटेंट भी कराया गया था। वह वोटिंग मशीन इलेक्ट्रॉनिक मशीन नहीं थी। पंचिंग मशीन थी। भारत में चुनाव आयोग ने वोटिंग मशीन का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद की मदद से किया था। सन 1980 में पहली वोटिंग मशीन बनाई गई थी। पहली बार इसका इस्तेमाल सन 1981 में केरल के उत्तरी पारावुर विधानसभा क्षेत्र के 50 पोलिंग स्टेशनों पर किया गया था।

यह खबरों में क्यों है? 

ईवीएम के इस्तेमाल के बाद उन्हें लेकर भी शिकायतें आईं हैं। इन शिकायतों के निवारण के लिए वीवीपैट बनाई गई है। इन मशीनों में भी गड़बड़ी की शिकायतें आती हैं। दूसरे इनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। संसदीय क्षेत्र के हरेक विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट के इस्तेमाल के विरोध में देश के 21 राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि ज्यादा पोलिंग स्टेशनों पर वीवीपैट के इस्तेमाल में क्या दिक्कत है? इसपर चुनाव आयोग ने जवाब दिया था कि यदि किसी संसदीय क्षेत्र के 50 फीसदी वोटों के लिए वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाए, तो मतगणना में छह दिन का विलम्ब होगा। बहरहाल अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि हरेक लोकसभा क्षेत्र में आने वाले पाँच विधानसभा क्षेत्रों के एक-एक पोलिंग स्टेशन पर वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाए। अब माँग की जा रही है कि सभी वीवीपैट मशीनों में पड़े वोटों की गिनती भी की जाए। 

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 20 अप्रेल, 2024 को प्रकाशित

Saturday, July 15, 2023

बनाना रिपब्लिक किसे कहते हैं?

राजनीति शास्त्र में बनाना रिपब्लिक शब्द लैटिन अमेरिका के उन देशों के लिए इस्तेमाल में लाया गया, जो राजनीतिक रूप से काफी अस्थिर थे। उन्हें बनाना रिपब्लिक इसलिए कहा गया, क्योंकि उनकी अर्थ-व्यवस्था मुख्यतः केले या प्राकृतिक संसाधनों के निर्यात पर निर्भर थी। इन देशों में गरीब-कमजोर मजदूर रहते हैं और सत्ता पर अल्पसंख्यक व्यापारियों, नौकरशाहों, राजनेताओं और फौजी अफसरों का नियंत्रण होता है। बनाना रिपब्लिक शब्दावली का प्रयोग प्रसिद्ध अमेरिकी कथाकार ओ’ हेनरी (O Henry) ने किया था। ओ’ हेनरी ने इसका इस्तेमाल उस विशेष स्थिति के लिए किया था जहाँ कुछ अमेरिकी कारोबारियों ने  कैरीबियन द्वीपों, मध्य अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका में अपनी चतुराई से भारी मात्रा में केला उत्पादक क्षेत्रों पर अपना एकाधिकार कर लिया। स्थानीय मजदूरों को कौड़ियों के भाव पर काम करवा कर केलों के उत्पादन को अमेरिका में भेजकर भारी लाभ उठाया।

पहला क्रिकेट टेस्ट मैच कब हुआ?

पहला आधिकारिक क्रिकेट टेस्ट मैच 15 मार्च 1877 को ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर हुआ। इसमें ऑस्ट्रेलिया की टीम 45 रन से जीती’ टेस्ट मैचों के सौ साल पूरे होने पर 12 से 17 मार्च 1977 को मेलबर्न में दोनों देशों के बीच हुए टेस्ट मैच में भी ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को 45 रन से हराया।

नीम कड़वा क्यों होता है?

नीम के तीन कड़वे तत्वों को वैज्ञानिकों ने अलग किया है, जिन्हें निम्बिन, निम्बिडिन और निम्बिनिन नाम दिए हैं। सबसे पहले 1942 में भारतीय वैज्ञानिक सलीमुज़्ज़मा सिद्दीकी ने यह काम किया। वे बाद में पाकिस्तान चले गए थे। यह कड़वा तत्व ही एंटी बैक्टीरियल, एंटी वायरल होता है और कई तरह के ज़हरों को ठीक करने का काम करता है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 15 जुलाई, 2023 को प्रकाशित


 

 

Sunday, April 26, 2015

दुनिया में सबसे पहले कपड़े कहाँ पहने गए?

एफ़एममोबाइल और वायरलेस तथा अन्य तरंगों का इंसानों और पशु पक्षियों पर क्या प्रभाव पड़ता है
आपने जो बातें पूछी हैं उनके अलावा कॉर्डलेस हैडफोन, वाइ-फाई, माइक्रोवेव अवन और ऑप्टिक फाइबर तक से स्वास्थ्य के लिए पैदा होने वाले खतरों को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है। मोबाइल टावरों से रेडिएशन हो सकता है, पर उनके लिए सीमा निर्धारित है। वस्तुतः ज्यादा धूप, गर्मी, सर्दी, पानी से भी स्वास्थ्य के लिए खतरा होता है, पर सीमा के भीतर रहें तो नहीं होता।

पानी में भँवर कैसे बनते हैं? और चक्रवात किसे कहते हैं? 
भँवर आमतौर पर एक-दूसरे से विपरीत दिशाओं से आ रही लहरों के टकराने से बनते हैं। इसके कई रूप हैं। जब आप किसी पानी के बर्तन में ऊपर से पानी गिराएं तो दबाव के कारण पानी नीचे जाता है और इसके चारों ओर गोल घेरा बन जाता है यह भी एक प्रकार का भँवर है। आप किसी पानी की भरी बोतल की तली में छेद कर दें और उसे देखें तो पता लगेगा कि पानी के बीचोबीच घूमते चक्रवात जैसा एक खड़ा स्तम्भ बन जाता है और सबसे ऊपर पानी की सतह पर भँवर जैसा बन जाता है। सागर के ऊपर या धरती की सतह पर जब हवाएं टकराकर गोल- गोल घूमने लगती हैं तब उसे हम चक्रवात कहते हैं।

ट्रैफिक सिग्नल की शुरुआत सबसे पहले कहां हुई?
ट्रैफिक सिग्नल की शुरूआत रेलवे से हुई है। रेलगाड़ियों को एक ही ट्रैक पर चलाने के लिए बहुत ज़रूरी था कि उनके लिए सिग्नलिंग की व्यवस्था की जाए। 10 दिसम्बर 1868 को लंदन में ब्रिटिश संसद भवन के सामने रेलवे इंजीनियर जेपी नाइट ने ट्रैफिक लाइट लगाई। पर यह व्यवस्था चली नहीं। सड़कों पर व्यवस्थित रूप से ट्रैफिक सिग्नल सन 1912 में अमेरिका के सॉल्ट लेक सिटी यूटा में शुरू किए गए। सड़कों पर बढ़ते यातायात के साथ यह व्यवस्था दूसरे शहरों में भी शुरू होती गई।

दुनिया में सबसे पहले कपड़े कहाँ पहने गए?
पुरातत्ववेत्ताओं और मानव-विज्ञानियों के अनुसार सबसे पहले परिधान के रूप में पत्तियोंघास-फूस,जानवरों की खाल और चमड़े का इस्तेमाल हुआ था। दिक्कत यह है कि इस प्रकार की पुरातत्व सामग्री मिलती नहीं है। पत्थरहड्डियाँ और धातुओं के अवशेष मिल जाते हैंजिनसे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैंपर परिधान बचे नहीं हैं। पुरातत्ववेत्ताओं को रूस की गुफाओं में हड्डियों और हाथी दांत से बनी सिलाई करने वाली सूइयाँ मिली हैंजो तकरीबन 30,000 साल ईपू की हैं। मानव विज्ञानियों ने कपड़ों में मिलने वाली जुओं का जेनेटिक विश्लेषण भी किया हैजिसके अनुसार इंसान ने करीब एक लाख सात हजार साल पहले बदन ढकना शुरू किया होगा। इसकी ज़रूरत इसलिए हुई होगी क्योंकि अफ्रीका के गर्म इलाकों से उत्तर की ओर गए इंसान को सर्द इलाकों में बदन ढकने की ज़रूरत हुई होगी। कुछ वैज्ञानिक परिधानों का इतिहास पाँच लाख साल पीछे तक ले जाते हैं। बहरहाल अभी इस विषय पर अनुसंधान चल ही रहा है।

राष्ट्रपति भवन और संसद भवन का निर्माण कब हुआ?
सन 1911 में घोषणा की गई कि भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाई जाएगी। मशहूर ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लैंडसीयर लुट्यन्स ने दिल्ली की ज्यादातर नई इमारतों की रूपरेखा तैयार की। इसके लिए उन्होंने सर हरबर्ट बेकर की मदद ली। जिसे आज हम राष्ट्रपति भवन कहते हैं उसे तब वाइसरॉयस हाउस कहा जाता था। इसके नक्शे 1912 में बन गए थेपर यह बिल्डिंग 1931में पूरी हो पाई। संसद भवन की इमारत 1927 में तैयार हुई।
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Monday, September 16, 2013

पेटेंट क्या है और यह किस प्रकार दिया जाता है?

पेटेंट क्या है और यह किस प्रकार दिया जाता है? बासमती चावल के पेटेंट का विवाद क्या था कृपया बताएं।
बौद्धिक सम्पदा अधिकार मस्तिष्क की उपज हैं और इनमे सबसे महत्वपूर्ण हैं - पेटेंट। पेटेंटी, पेटेंट का उल्लंघन करने वाले तरीके या उत्पाद के निर्माण को न्यायालय द्वारा रुकवा सकता है। ‘पेटेंट’ शब्द लैटिन से आया है। पुराने जमाने में शासको या सरकारों के द्वारा पदवी‚ हक‚ विशेष अधिकार पत्र के द्वारा दिया जाता है। आजकल पेटेंट शब्द का प्रयोग आविष्कारों के संबंध में होता है। इस तरह का प्रयोग पहली बार 15वीं शताब्दी के आस-पास आया। सर्वप्रथम, पेटेंट कानून जैसा इसे आज समझा जाता हैं, 14 मार्च, 1474 को वियना सिनेट के द्वारा को पारित किया गया। भारत में पहला पेटेंट सम्बन्धित कानून, 1856 में पारित अधिनियम था। तब से अब तक यह कई तरीके के बदलावों से गुजर चुका है। राइस टेक एक अमेरिकन कम्पनी है यह बासमती और टैक्समती के नाम से चावल बेच रही थी। 1994 में राइस टेक ने 20 तरह के बासमती चावल के लिए पेटेंट प्राप्त करने के लिए यूएस पेटेंट एण्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन (यूएसपीटीओ) में एक आवेदन पत्र दाखिल किया। यूएसपीटीओ ने 1997 में सभी पेटेंटों को मंजूर कर दिया। भारत ने अप्रैल 2000 में तीन पेटेंटों की पुन: परीक्षा के लिए एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया। राइसटेक ने इन तीन के साथ एक और पेटेंट को वापस ले लिया। बाद में राइसटेक से 11 अन्य पेटेंटों को भी वापस लेने के लिए भी कहा गया जो कि उसने वापस ले लिया। राइसटेक को पेटेंट का नाम भी बासमती राइस लाइन्स एंड ग्रेन्स से बदल कर बीएएस 867 आरटी 1121 और आरटी 117 करना पड़ा।

ब्लूचिप कंपनी क्या होती है ?
ब्लू चिप शब्द पोकर के खेल से आया है जिसमें कई रंग के बाज़ी लगाने वाले डिस्क होते है, जिन्हें चिप कहते हैं। पोकर के खेल में और कसीनो में नकदी की जगह इस्तेमाल होने वाले टोकनों में सबसे ज्यादा कीमत नीले डिस्क की होती है। मान लें सफेद चिप की कीमत 1 रुपया है, लाल का पाँच रुपया तो नीले की होगी 10 रुपया। यह शब्द शेयर बाजार में इस्तेमाल होता है तब माना जाता है श्रेष्ठ-मजबूत कंपनियों के शेयर। किसी कंपनी का ब्लू चिप होने का अभिप्राय यह है कि उसके शेयर निवेशकों के लिए पसंदीदा शेयर हैं। इस प्रकार की कंपनियों में सौदे भी काफी होते हैं, उतार-चढ़ाव भी काफी होता है और उनमें निवेशकों का आकर्षण भी खूब बना रहता है।ब्लू चिप का मतलब है राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त, सर्वसम्पन्न और स्थिर अर्थव्यवस्था वाली कंपनी। यह एक तरह से मापदंड होता है जिसमें किसी कंपनी को हम ब्लू चिप तभी कहते हैं जब वह ढलती अर्थव्यवस्था में भी सामान्य ढंग से व्यापार कर सके और मुनाफ़ा कमा सके।

शेयरों की कीमत कैसे घटती-बढती है? स्टॉक इंडेक्स या शेयर सूचकांक क्या है?
शेयर का सीधा सा अर्थ होता है हिस्सा। शेयर बाजार की भाषा में बात करें तो शेयर का अर्थ है कंपनियों में हिस्सा। उदाहरण के लिए एक कंपनी ने कुल 10 लाख शेयर जारी किए हैं। आप कंपनी के प्रस्ताव के अनुसार जितने अंश खरीद लेते हैं आपका उस कंपनी में उतने का मालिकाना हक हो गया जिसे आप किसी अन्य खरीददार को जब भी चाहें बेच सकते हैं। इस खरीद फरोख्त में शेयर के भाव बढ़ते और घटते हैं। 10 रु के शेयर की कीमत चार-पाँच सौ तक हो जाती है। इन कंपनियों के शेयरों का मूल्य शेयर बाजार में दर्ज होता है। सभी कंपनियों का मूल्य उनकी लाभदायक क्षमता के अनुसार कम-ज्यादा होता है। भारत में इस पूरे बाजार में नियंत्रण भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) का होता है। इसकी अनुमति के बाद ही कोई कंपनी अपना प्रारंभिक निर्गम इश्यू (आईपीओ) जारी कर सकती है। शेयर बाजार में लिस्टेड होने के लिए कंपनी को बाजार से लिखित समझौता करना पडता है, जिसके तहत कंपनी अपने हर काम की जानकारी बाजार को समय-समय पर देती रहती है, खासकर ऐसी जानकारियां, जिससे निवेशकों के हित प्रभावित होते हों। इन्हीं जानकारियों के आधार पर कंपनी का मूल्यांकन होता है और इस मूल्यांकन के आधार पर मांग घटने-बढ़ने से उसके शेयरों की कीमतों में उतार-चढाव आता है। अगर कोई कंपनी लिस्टिंग समझौते के नियमों का पालन नहीं करती, तो उसे डीलिस्ट करने की कार्रवाई सेबी करता है।

ऑटोग्राफ देने का रिवाज़ कैसे शुरू हुआ?
ऑटोग्राफ शब्द का अर्थ है हस्तलेख। ऑटोस यानी स्व और ग्राफो यानी लिखना। यानी जो आपने स्वयं लिखा है। पुराने वक्त में टाइपिंग या छपाई होती नहीं थी। केवल हाथ से लिखा जाता था, पर जो जो पत्र, दस्तावेज़ या लेख व्यक्ति स्वयं लिखता उसे ऑटोग्राफ कहते। ऐसा भी होता कि दस्तावेज़ कोई और लिखता और उसके नीचे उसे अधिकृत करने वाला अपने हाथ से अपना नाम लिख देता। यह नाम उसकी पहचान था। ऑटोग्राफ इस अर्थ में दस्तखत हो गया। किसी को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके हस्तलेख या ऑटोग्राफ हासिल करना भी हो गया। राजाओं, राष्ट्रपतियों, जनरलों, कलाकारों, गायकों वगैरह के दस्तखत अपने पास जमा करके रखने का चलन बीसवीं सदी में बढ़ा है। इस शौक को फिलोग्राफी कहते हैं।






Wednesday, September 11, 2013

उल्का पिंड के कारण बनी थी महाराष्ट्र की लोनार झील



लोनार झील कहाँ है और इसकी विशेषता क्या है?

महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के लोनार शहर में समुद्र तल से 1,200 मीटर ऊँची सतह पर लगभग 100 मीटर के वृत्त में फैली हुई है। इस झील का व्यास दस लाख वर्ग मीटर है। इस झील का मुहाना गोलाई लिए एकदम गहरा है, जो 100 मीटर की गहराई तक है। 50 मीटर की गहराई गर्द से भरी है। यह 5 से 8 मीटर तक खारे पानी से भरी हुई है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आकाशीय उल्का पिंड की टक्कर से के कारण यह झील बनी है। अनुमान है कि क़रीब दस लाख टन का उल्का पिंड यहाण गिरा था। क़रीब 1.8 किलोमीटर व्यास की इस झील की गहराई लगभग पांच सौ मीटर है। आज भी इस विषय पर शोध जारी है कि लोनार में जो टक्कर हुई, वो उल्का पिंड और पृथ्वी के बीच हुई या फिर कोई ग्रह पृथ्वी से टकराया था। बहरहाल वह शिलाखंड तीन हिस्सों में टूट चुका था और उसने लोनार के अलावा अन्य दो जगहों पर भी झील बना दी। पूरी तरह सूख चुकी अम्बर और गणेश नामक इन झीलों का अब विशेष महत्व नहीं है। स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ वाशिंगटन, भारत और अमेरिका के भूगर्भ सर्वक्षण विभागों को प्रमाण मिले थे कि लोनर का निर्माण पृथ्वी पर उल्का पिंड के टकराने से ही हुआ था।

ऑटोग्राफ देने का रिवाज़ कैसे शुरू हुआ?

ऑटोग्राफ शब्द का अर्थ है हस्तलेख। ऑटोस यानी स्व और ग्राफो यानी लिखना। यानी जो आपने स्वयं लिखा है। पुराने वक्त में टाइपिंग या छपाई होती नहीं थी। केवल हाथ से लिखा जाता था, पर जो जो पत्र, दस्तावेज़ या लेख व्यक्ति स्वयं लिखता उसे ऑटोग्राफ कहते। ऐसा भी होता कि दस्तावेज़ कोई और लिखता और उसके नीचे उसे अधिकृत करने वाला अपने हाथ से अपना नाम लिख देता। यह नाम उसकी पहचान था। ऑटोग्राफ इस अर्थ में दस्तखत हो गया। किसी को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके हस्तलेख या ऑटोग्राफ हासिल करना भी हो गया। राजाओं, राष्ट्रपतियों, जनरलों, कलाकारों, गायकों वगैरह के दस्तखत अपने पास जमा करके रखने का चलन बीसवीं सदी में बढ़ा है। इस शौक को फिलोग्राफी कहते हैं।

पेटेंट क्या है और यह किस प्रकार दिया जाता है? बासमती चावल के पेटेंट का विवाद क्या था कृपया बताएं।

बौद्धिक सम्पदा अधिकार मस्तिष्क की उपज हैं और इनमे सबसे महत्वपूर्ण हैं - पेटेंट। पेटेंटी, पेटेंट का उल्लंघन करने वाले तरीके या उत्पाद के निर्माण को न्यायालय द्वारा रुकवा सकता है। ‘पेटेंट’ शब्द लैटिन से आया है। पुराने जमाने में शासको या सरकारों के द्वारा पदवी‚ हक‚ विशेष अधिकार पत्र के द्वारा दिया जाता है। आजकल पेटेंट शब्द का प्रयोग आविष्कारों के संबंध में होता है। इस तरह का प्रयोग पहली बार 15वीं शताब्दी के आस-पास आया। सर्वप्रथम, पेटेंट कानून जैसा इसे आज समझा जाता हैं, 14 मार्च, 1474 को वियाना सिनेट के द्वारा को पारित किया गया। भारत में पहला पेटेंट सम्बन्धित कानून, 1856 में पारित अधिनियम था। तब से अब तक यह कई तरीके के बदलावों से गुजर चुका है। राइस टेक एक अमेरिकन कम्पनी है यह बासमती और टैक्समती के नाम से चावल बेच रही थी। 1994 में राइस टेक ने 20 तरह के बासमती चावल के लिए पेटेंट प्राप्त करने के लिए यूएस पेटेंट एण्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन (यूएसपीटीओ) में एक आवेदन पत्र दाखिल किया। यूएसपीटीओ ने 1997 में सभी पेटेंटों को मंजूर कर दिया। भारत ने अप्रैल 2000 में तीन पेटेंटों की पुन: परीक्षा के लिए एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया। राइसटेक ने इन तीन के साथ एक और पेटेंट को वापस ले लिया। बाद में राइसटेक से 11 अन्य पेटेंटों को भी वापस लेने के लिए भी कहा गया जो कि उसने वापस ले लिया। राइसटेक को पेटेंट का नाम भी बासमती राइस लाइन्स एंड ग्रेन्स से बदल कर बीएएस 867 आरटी 1121 और आरटी 117 करना पड़ा।

शेयरों की कीमत कैसे घटती-बढती है? स्टॉक इंडेक्स या शेयर सूचकांक क्या है?

शेयर का सीधा सा अर्थ होता है हिस्सा। शेयर बाजार की भाषा में बात करें तो शेयर का अर्थ है कंपनियों में हिस्सा। उदाहरण के लिए एक कंपनी ने कुल 10 लाख शेयर जारी किए हैं। आप कंपनी के प्रस्ताव के अनुसार जितने अंश खरीद लेते हैं आपका उस कंपनी में उतने का मालिकाना हक हो गया जिसे आप किसी अन्य खरीददार को जब भी चाहें बेच सकते हैं। इस खरीद फरोख्त में शेयर के भाव बढ़ते और घटते हैं। 10 रु के शेयर की कीमत चार-पाँच सौ तक हो जाती है। इन कंपनियों के शेयरों का मूल्य शेयर बाजार में दर्ज होता है। सभी कंपनियों का मूल्य उनकी लाभदायक क्षमता के अनुसार कम-ज्यादा होता है। भारत में इस पूरे बाजार में नियंत्रण भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) का होता है। इसकी अनुमति के बाद ही कोई कंपनी अपना प्रारंभिक निर्गम इश्यू (आईपीओ) जारी कर सकती है। शेयर बाजार में लिस्टेड होने के लिए कंपनी को बाजार से लिखित समझौता करना पडता है, जिसके तहत कंपनी अपने हर काम की जानकारी बाजार को समय-समय पर देती रहती है, खासकर ऐसी जानकारियां, जिससे निवेशकों के हित प्रभावित होते हों। इन्हीं जानकारियों के आधार पर कंपनी का मूल्यांकन होता है और इस मूल्यांकन के आधार पर मांग घटने-बढ़ने से उसके शेयरों की कीमतों में उतार-चढाव आता है। अगर कोई कंपनी लिस्टिंग समझौते के नियमों का पालन नहीं करती, तो उसे डीलिस्ट करने की कार्रवाई सेबी करता है।

ब्लूचिप कंपनी क्या होती है ?

ब्लू चिप शब्द पोकर के खेल से आया है जिसमें कई रंग के बाज़ी लगाने वाले डिस्क होते है, जिन्हें चिप कहते हैं। पोकर के खेल में और कसीनो में नकदी की जगह इस्तेमाल होने वाले टोकनों में सबसे ज्यादा कीमत नीले डिस्क की होती है। मान लें सफेद चिप की कीमत 1 रुपया है, लाल का पाँच रुपया तो नीले की होगी 10 रुपया। यह शब्द शेयर बाजार में इस्तेमाल होता है तब माना जाता है श्रेष्ठ-मजबूत कंपनियों के शेयर। किसी कंपनी का ब्लू चिप होने का अभिप्राय यह है कि उसके शेयर निवेशकों के लिए पसंदीदा शेयर हैं। इस प्रकार की कंपनियों में सौदे भी काफी होते हैं, उतार-चढ़ाव भी काफी होता है और उनमें निवेशकों का आकर्षण भी खूब बना रहता है।ब्लू चिप का मतलब है राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त, सर्वसम्पन्न और स्थिर अर्थव्यवस्था वाली कंपनी। यह एक तरह से मापदंड होता है जिसमें किसी कंपनी को हम ब्लू चिप तभी कहते हैं जब वह ढलती अर्थव्यवस्था में भी सामान्य ढंग से व्यापार कर सके और मुनाफ़ा कमा सके।

मोबाइल सिम कार्ड आगे से क्रॉसकट क्यों होता है?


मोबाइल सिम कार्ड आगे से क्रॉसकट क्यों होता है?
यह सिर्फ एलाइनमेंट को ठीक रखने के लिए है। बाएं और दाएं कट के अलावा एक कट कर्णवत या डायगोनल होने से सिम और मोबाइल फोन की पिनें एक दूसरे से ठीक तरह से मिल जाती हैं। फोन के सॉकेट में भी वैसा ही कट होता है।

लोकतंत्र व गणतंत्र में क्या अंतर है ?
रोहित शर्मा, जयपुर
लोकतंत्र एक व्यवस्था का नाम है, जिसकी एक संवैधानिक व्यवस्था भी हो। जब शासन पद्धति पर यह लागू हो तो शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक होती है। इसमें हिस्सा लेने वाले या तो आमराय से फैसले करते हैं और यदि ऐसा न हो तो मत-विभाजन से करते हैं। ये निर्णय सामान्य बहुमत से और कई बार ज़रूरी होने पर विशेष बहुमत से भी होते हैं। मसलन कुछ परिस्थितियों में दो तिहाई मत से भी निर्णय किए जाते हैं। गणतंत्र का अर्थ वह शासन पद्धति जहाँ राज्यप्रमुख का निर्वाचन सीधे जनता करे या जनता के प्रतिनिधि करें। यानी राष्ट्रप्रमुख वंशानुगत या तानाशाही तरीके से सत्ता पर कब्जा करके न आया हो। कुछ ऐसे देश भी हैं, जहाँ शासन पद्धति लोकतांत्रिक होती है, पर राष्ट्राध्यक्ष लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुना जाता। जैसे युनाइटेड किंगडम, जहाँ राष्ट्राध्यक्ष सम्राट होता है, जिसके परिवार के सदस्य ही राष्ट्राध्यक्ष बनते हैं। भारत में लोकतांत्रिक सरकार है और राष्ट्रपति का चुनाव होता है इसलिए यह गणतंत्रात्मक व्यवस्था है।

नक्सलवाद व आतंकवाद में क्या अंतर है ?
रोहित शर्मा, जयपुर 
rohit_dude58@yahoo.com
नक्सलवाद मोटे तौर पर भारत की मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी की विचारधारा के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द है। यह पार्टी नब्बे के दशक में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से टूटकर बनी थी। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 मे सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। मजूमदार चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ जे दुंग के समर्थक थे। इन्हें "नक्सलवादी" कहा गया। यह आंदोलन बाद में कई छोटे-छोटे संगठनों में बँट गया।

आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गए हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी सशस्त्र आंदोलन चला रहे हैं। इनमें माओवादी संगठन हैं जिनका पुराने नक्सलवाद से सीधा सम्बन्ध नहीं है, पर अपनी हिंसक गतिविधियों के कारण वे नक्सलवादी माने जाते हैं। आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड, और बिहार इनके प्रभाव में हैं। आतंकवाद भी एक राजनीतिक विचारधारा है, जिसमें हिंसा और भय का सहारा लेकर व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ते हैं। आतंकवाद के अनेक रूप हैं और दुनिया भर में कई तरह के संगठनों की रणनीति आतंक फैलाने की है। नक्सलवादी आंदोलन में हिंसा और भय का तत्व भी उसे आतंकवाद की ओर ले जाता है। पर कुछ पुराने नक्लवादी संगठन हिंसा की रणनीति त्याग कर संसदीय लोकतंत्र में शामिल हो गए हैं।

TRP क्या है और किस प्रकार काम करती है?
आशुतोष सोनी,ग्राम- कनवास, जिला- कोटा (राजस्थान)
ashutoshsoni7@gmail.com
टारगेट रेटिंग पॉइंट(टीआरपी) का उद्देश्य टेलीविज़न के दर्शकों की संख्या का अनुमान लगाना है। इसका सबसे प्रचलित तरीका है फ्रीक्वेंसी मॉनीटरिंग। कुछ सैम्पल घरों में पीपुल मीटर लगाए जाते हैं, जो टीवी पर देखे जा रहे कार्यक्रमों की फ्रीक्वेंसी दर्ज करते हैं। इसे डिकोड करके पता लगाया जाता है कि किस चैनल को कितना देखा गया। अब फ्रीक्वेंसी की जगह तस्वीर को रिकॉर्ड करने की तकनीक भी स्तेमाल में लाई जा रही है। भारत में इंडिया टेलीविज़न ऑडियंस मैज़रमेंट या इनटैम इस काम को करने वाली एजेंसी है। इसका उद्देश्य विज्ञापनदाताओं को यह बताना है कि किस चैनल की और किस कार्यक्रम की ज्यादा लोकप्रियता है।

मध्यमान सागर स्तर (मीन सी लेवल) क्या है?
त्रिलोक नायक, triloknayak07@gmail.com

आप जानते ही हैं कि सागर का स्तर समान नहीं रहता। ज्वार-भाटा के साथ बढ़ता या घटता है। मध्यमान सागर स्तर का मतलब है सागर की सतह का औसत स्तर। यानी ज्वार के उच्चतम स्तर और भाटा के निम्नतम स्तर के बीच की स्थिति।

एक क्यूसेक में कितने लीटर होते हैं?
हरीश, सीकर

क्यूसेक बहते पानी या तरल का पैमाना है और लिटर स्थिर तरल का। क्यूसेक माने होता है क्यूबिक फीट पर सेकंड। यानी एक फुट चौड़े, एक फुट लम्बे और एक फुट गहरे स्थान से क सेकंड में जितना पानी निकल सके। सामान्यतः एक क्यूसेक में 28.317 लिटर पानी होता है।

भारत में मेट्रो का इतिहास क्या है? इसके बारे में जानकारी दें।sukhram5694@gmail.com
भारत में सबसे पहले मेट्रो गाड़ी कोलकाता में शुरू हुई। कोलकाता मेट्रो भूमिगत रेल प्रणाली है, जिसे सोवियत संघ की मदद से शुरू किया गया था। यह भारतीय रेलवे के अंतर्गत आती है और इसे मंडलीय रेलवे का स्तर प्रदान किया गया है। 1984 में शुरू हुई यह भारत की प्रथम भूमिगत एवं मेट्रो प्रणाली थी। इसके बाद दिल्ली मेट्रो 2002 में आरंभ हुई थी। दिल्ली मेट्रो रेल दिल्ली मेट्रो रेल निगम कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) द्वारा संचालित है। 24 दिसंबर 2002 को शाहदरा- तीस हजारी लाइन से इसकी शुरूआत हुई। प्रारंभिक योजना यह छह मार्गों पर चलाई गई, जो दिल्ली के ज्यादातर हिस्से को जोड़ते थे। इस प्रारंभिक चरण को 2006 में पूरा किय़ा गया। बाद में इसका विस्तार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सटे शहरों गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गाँव और नोएडा तक किया गया। इस परिवहन व्यवस्था की सफलता से प्रभावित होकर भारत के दूसरे राज्यों में भी इस पर काम चल रहा है जैसे जयपुर, मुम्बई, बेंगलुरू, हैदराबाद, चेन्नई, कोच्चि वगैरह। बेंगलुरू मेट्रो शुरू भी हो गई है।

क्रिकेट खिलाड़ियों की ड्रेस पर शर्ट पीछे लिखे नम्बर का क्या मतलब है?
अंकित मौर्य, ललित बडेरा ru9lalit@gmail.com
फुटबॉल और हॉकी जैसे खेलों में परम्परा से खिलाड़ियों की जर्सी पर लिखे नम्बरों से उनकी पोज़ीशन का पता लगता था। जैसे कि गोली का नम्बर 1 होता था, फुलबैक का 2 और हाफ बैक का 3 वगैरह। पर धीरे-धीरे मैच के दौरान इतने बदलाव होने लगे और खिलाड़ियों की पोज़ीशन तेजी से बदलने लगीं कि वह व्यवस्था चल नहीं पाई। अलबत्ता नम्बर होने से खिलाड़ी को पहचानना आसान होता है, इसलिए प्रतियोगिताओं में जर्सी नम्बर दिए जाते हैं। क्रिकेट में जर्सी नम्बर नहीं होते थे। हाँ क्रिकेट में टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ियों को नम्बर देने की परम्परा है। जैसे कि 15 मार्च 1887 को इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले गए पहले टेस्ट मैच के खिलाड़ी टॉमस आर्मिटेज इंग्लैंड के नम्बर एक टेस्ट खिलाड़ी हैं। यह नम्बर उन्हें अकारादिक्रम में ए से नाम होने के कारण मिला। इसी तरह 20 अगस्त 2009 को इंग्लैंड की टीम में शामिल हुए जोनाथन ट्रॉट इंग्लैंड के 645 नम्बर के टेस्ट खिलाड़ी थे। प्रायः यह संख्या टेस्ट खिलाड़ी की टोपी या कमीज पर बने टीम के चिह्न के नीचे लिखी जाती थी। यह बहुत छोटे अक्षरों में होती थी और दूर से पढ़ी भी नहीं जाती थी। पीठ के पीछे लिखी संख्याएं 1995-96 में ऑस्ट्रेलिया में पहली बार शुरू हुई वर्ल्ड सीरीज़ एकदिनी क्रिकेट के दौरान इस्तेमाल में लाईं गईं। खेल को रोचक बनाने का क तरीका यह भी था। इसमें खिलाड़ियों को नम्बर दिए जाते थे और कई बार खिलाड़ी अपनी पसन्द का नम्बर खुद चुनते। खिलाड़ियों के नाम भी पीठ पर लिखे जाने लगे। विश्व कप क्रिकेट में खिलाड़ियों के नम्बरों का पहला इस्तेमाल 1999 के विश्व कप से शुरू हुआ। इसमें कप्तान 1 नम्बर की जर्सी पहनते और शेष खिलाड़ियों को 2 से 15 तक के नम्बर मिलते। पर इसमें भी कोई नियमितता नहीं थी। मसलन दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हैंसी क्रोन्ये 5 नम्बर की जर्सी पहनते और ओपनर गैरी कर्स्टन 1 नम्बर की। अब यह फैशन में भी है। कुछ जर्सी नम्बर मशहूर हैं जैसे सचिन तेन्दुलकर का 10, महेन्द्र सिंह धोनी का 7 या क्रिस गेल का 333।




































खान मजदूरों को लिए बना था जींस का पहनावा




जीन्स (jeans) जो फैशन के तौर पर पहने जाते हैं, इनकी शुरुआत कब, कहाँ,और किस उद्देश्य से हुई? 

हितेन्द्र कुमार शर्मा झाब, सांचोर
जीन्स का पहनावा मूल रूप से मेहनतकशों और कारखाने में काम करने वाले श्रमिकों और नाविकों से ताल्लुक रखता है। औद्योगीकरण के बाद यूरोप में कामगारों और नाविकों के लिए ऐसे परिधानों की ज़रूरत महसूस की गई जो मजबूत हों और देर से फटें। 16 वीं सदी में यूरोप ने भारतीय मोटा सूती कपडा़ मँगाना शुरू किया, जिसे डुंगारी कहा जाता था। बाद मे इसे नील के रंग में रंग कर मुंबई के डोंगारी किले के पास बेचा गया था। नाविकों ने इसे अपने अनुकूल पाया और इससे बनी पतलूनें वे पहनने लगे। कंधे से लेकर पाजामे तक का यह परिधान डंगरी कहलाता है। लगभग ऐसा ही परिधान कार्गो सूट होता है, जिसे नाविक और वायुसेवाओं के कर्मचारी पहनते हैं।

डंगरी के कपड़े और जीन्स में फर्क यह होता है कि जहाँ डंगरी में धागा रंगीन होता है वहीं जीन्स वस्त्र को तैयार करने के बाद रंगा जाता है। आमतौर पर जीन्स नीले, काले और ग्रे के शेड़्स में होते हैं। इन्हें जिस नील से रंगा जाता था वह भारत या अमेरिका से आता था। पर जीन्स का जन्म यूरोप में हुआ। सन 1600 की शुरुआत मे इटली के कस्बे ट्यूरिन के निकट चीयरी में जीन्स वस्त्र का उत्पादन किया गया। इसे जेनोवा के हार्बर के माध्यम से बेचा गया था, जेनोवा एक स्वतंत्र गणराज्य की राजधानी थी जिसकी नौसेना काफी शक्तिशाली थी। इस कपडे़ से सबसे पहले जेनोवा की नौसेना के नाविको की पैंट बनाई गईं। नाविको को ऐसी पैंट की ज़रूरत थी जिन्हें सूखा या गीला भी पहना जा सके तथा जिनके पौचों को पोत के डेक की सफाई के समय उपर को मोडा़ जा सके। इन जीन्सों को सागर के पानी से एक बडे़ जाल में बाँध कर धोया जाता था। समुद्र के पानी उनका रंग उडा़कर उन्हें सफेद कर देता था। इस तरह कई लोगों के अनुसार जीन्स नाम जेनोवा पर पडा़ है। जीन्स बनाने के लिए कच्चा माल फ्रांस के निम्स शहर से आता था जिसे फ्रांसीसी मे दे निम कहते थे इसीलिए इसके कपडे़ का नाम डेनिम पड़ गया।

उन्नीसवीं सदी में अमेरिका में सोने की खोज का काम चला। उस दौर को गोल्ड रश कहते हैं। सोने की खानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए भी मजबूत कपड़ों के परिधान की ज़रूरत थी। सन 1853 में लेओब स्ट्रॉस नाम के एक व्यक्ति ने थोक में वस्त्र सप्लाई का कारोबार शुरू किया। लेओब ने बाद में अपना नाम लेओब से बदल कर लेवाई स्ट्रॉस कर दिया। लेवाई स्ट्रॉस को जैकब डेविस नाम के व्यक्ति ने जीन्स नामक पतलून की पॉकेटों को जोड़ने के लिए मेटल के रिवेट इस्तेमाल करने की राय दी। डेविस इसे पेटेंट कराना चाहता था, पर इसके लिए उसके पास पैसा नहीं था। 1873 में लेवाई स्ट्रॉस ने कॉपर के रिवेट वाले ‘वेस्ट ओवरऑल’ बनाने शुरू किए। तब तक अमेरिका में जीन्स का यही नाम था। 1886 में लेवाई स्ट्रॉस ने इस पतलून पर चमड़े के लेबल लगाने शुरू कर दिए। इन लेबलों पर दो घोड़े विपरीत दिशाओं में जाते हुए एक पतलून को खींचते हुए दिखाई पड़ते थे। इसका मतलब था कि पतलून इतनी मजबूत है कि दो घोड़े भी उसे फाड़ नहीं सकते। बीसवीं सदी में हॉलीवुड की काउब्वॉय फिल्मों ने जीन्स को काफी लोकप्रिय बनाया। पर यह फैशन में बीसवीं सदी के आठवें दशक में ही आई।

यूरोज़ोन संकट क्या है?देवेन्दर सिंह, bhativikassingh@gmail.com, सूरतगढ़

यूरोपीय संघ अपने किस्म का सबसे बड़ा राजनीतिक-आर्थिक संगठन है। 27 देशों के इस संगठन की एक संसद है। और एक मुद्रा भी, जिसे 17 देशों ने स्वीकार किया है। इस मुद्रा का नाम है यूरो। यूरो को स्वीकार करने वाले देशों के नाम हैं ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, सायप्रस, एस्तोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, आयरलैंड, इटली, लक्ज़ेम्बर्ग, माल्टा, नीदरलैंड्स, पुर्तगाल, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन। दूसरे विवश्वयुद्ध के बाद इन देशों के राजनेताओं ने सपना देखा था कि उनकी मुद्रा यूरो होगी। सन 1992 में मास्ट्रिख्ट संधि के बाद यूरोपीय संघ के भीतर यूरो नाम की मुद्रा पर सहमति हो गई। इसे लागू होते-होते करीब दस साल और लगे। इसमें सारे देश शामिल भी नहीं हैं। यूनाइटेड किंगडम का पाउंड स्टर्लिंग स्वतंत्र मुद्रा बना रहा। मुद्रा की भूमिका केवल विनिमय तक सीमित नहीं है। यह अर्थव्यवस्था को जोड़ती है। अलग-अलग देशों के बजट घाटे, मुद्रास्फीति और ब्याज की दरें इसे प्रभावित करती हैं। समूचे यूरोप की अर्थव्यवस्था एक जैसी नहीं है। दुनिया की अर्थव्यवस्था इन दिनों दो प्रकार के आर्थिक संकटों से घिरी है। एक है आर्थिक मंदी और दूसरा यूरोज़ोन का संकट। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। यूरोज़ोन के ज्यादातर देश इन दिनों कर्ज में डूबे हुए हैं। मसलन ग्रीस सरकार पर आय के मुकाबले 113 फीसदी कर्ज हो गया। यूरोपीय बैंक और यूरोपीय संघ के दबाव के कारण प्रायः सभी देश किफायतशारी यानी ऑस्टैरिटी में लगे हैं। पिछले साल यूरोज़ोन के वित्त मंत्रियों ने मिलकर 500 अरब यूरो का एक स्थायी बेलआउट कोष बनाया है। ग्रीस, आयरलैंड, पुर्तगाल, स्पेन और इटली जैसे देश भुगतान के संकट से घिरे हैं। फ्रांस भी आर्थिक मंदी का शिकार है। जर्मनी की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, पर वह भी धीरे-धीरे शून्य विकास की ओर बढ़ रहा है। दिक्कत यह है कि यूरोप के अलग-अलग इलाके अलग-अलग किस्म की परेशानियों के शिकार हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 10 अक्तूबर को तोक्यो में वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट जारी की। इसमें कहा गया है कि वैश्विक वित्तीय बाज़ार में सबसे मुख्य जोखिम यूरो ज़ोन में रहा है। हाल के महीनों में यूरोप के नीति-निर्धारकों द्वारा कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने से कुछ हद तक बाजार में स्थिरता आई है। लेकिन वित्तीय बाज़ार की स्थिरता कायम रखने के लिए और अधिक कदम उठाने की ज़रूरत है। ब्रिक्स दल में शामिल पाँच देशों ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिणी अफ़्रीका ने घोषणा की है कि वे अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के खजाने को भरने के लिए 75 अरब डॉलर देने को तैयार हैं। इस वर्ष जून में मैक्सिको में हुए जी-20 के शिखर-सम्मेलन में यह घोषणा की गई। यूरोपीय संकट का समाधान करने के लिए चीन सबसे ज़्यादा मदद देने को तैयार है। उसने 43 अरब डॉलर देने की इच्छा दिखाई। रूस, भारत और ब्राज़ील ने इसके लिए दस-दस अरब डॉलर देने पर सहमति व्यक्त की। दक्षिणी अफ़्रीका भी 2 अरब डॉलर देने के लिए तैयार है।

भारतीय रुपए की तुलना हमेशा अमेरिकी डॉलर से क्यों की जाती है?
त्रिलोक नायक, triloknayak07@gmail.com


आप चाहें तो इसकी तुलना किसी दूसरी करेंसी से भी कर सकते है, पर चूंकि दुनिया में सबसे मजबूत करेंसी इस वक्त डॉलर है, इसलिए आमतौर पर तुलना डॉलर से की जाती है। दुनिया की मजबूत मुद्राओं को हार्ड करेंसी कहते हैं। डॉलर के अलावा विश्व में यूरो, पौंड स्टर्लिंग, जापानी येन और स्विस फ्रैंक को हार्ड करेंसी की श्रेणी में रख सकते हैं। इन करेंसियों के मार्फत दुनिया के तमाम देश एक-दूसरे से व्यापार करते हैं। इस वक्त दुनिया के ज्यादातर देशों के पास मुद्रा कोष के नाम पर सबसे बड़ा भंडार डॉलर का है। हमारे देश में भी जब विदेशी मुद्रा कोष की बात होती है तो डॉलर का नाम ही लिया जाता है।

मोबाइल जेमर कैसे काम करता है?

पहले यह समझ लें कि फोन जैमर की ज़रूरत क्यों होती है। इसकी ज़रूरत या तो सुरक्षा कारणों से होती है या अस्पताल जैसी जगह पर जहाँ शांति की ज़रूरत हो। आपने देखा होगा पिछले दिनों चुनाव के दिन भी मोबाइल सेवाएं ब्लॉक की गईं। कई बार पुलों और रक्षा संस्थानों के आसपास फोन जैम हो जाते हैं। उस इलाके से बाहर आने पर फोन फिर से काम करने लगते हैं। युद्ध के समय सीमा पर रेडियो जैमिंग की जाती है ताकि शत्रु के रेडियो संदेश न जा सकें। फोन जैमिंग एक प्रकार से रेडियो जैमिंग है। इसमें जैमिंग डिवाइस उसी फ्रीक्वेंसी पर रेडियो तरंगे प्रवाहित करते हैं, जिसपर आमतौर से फोन डिवाइस काम कर रही हैं। इससे फोन सेवाओं में व्यवधान पैदा हो जाता है और कुछ देर के लिए टावर से सम्पर्क टूट जाता है। इस इलाके से बाहर आने पर सेवा फिर से शुरू हो जाती है।

की-बोर्ड पर अक्षर क्रमवार क्यों नहीं?
मनोज शर्मा, सीकर


की-बोर्ड में अक्षरों को बेतरतीब लगाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वर्णमाला के सारे अक्षरों का समान इस्तेमाल नहीं होता। चूंकि टाइप करने के लिए दोनों हाथों की उंगलियों का इस्तेमाल होता है, इसलिए ऐसी कोशिश की जाती है कि उंगलियों को कम मेहनत करनी पड़े। अंग्रेजी में सबसे ज्यादा क्वर्टी (QWERTY) की-बोर्ड चलता है। यह क्वर्टी की-बोर्ड में अंकों की पंक्ति के नीचे बनी अक्षरों की पहली पंक्ति के पहली छह की हैं। इस की-बोर्ड को सबसे पहले 1874 में अमेरिकी सम्पादक क्रिस्टोफर शोल्स ने पेटेंट कराया जो टाइपराइटर के विकास के काम से भी जुड़े थे। टाइप रायटर कम्पनी रेमिंग्टन ने इस पेटेंट को उसी साल खरीद लिया। तब से अब तक इसमें एकाध बदलाव हुए हैं। यह की-बोर्ड अब दुनिया भर का मानक बन गया है। इसके अलावा भी की-बोर्ड हैं, पर वे विशेष काम के लिए ही इस्तेमाल में आते हैं। कम्प्यूटर के 101/102 की वाले बोर्ड को सन 1982 में मार्क टिडेंस ने तैया किया। इसमें भी बदलाव हो रहे हैं क्योंकि कम्प्यूटर का इस्तेमाल बदलता जा रहा है। हिन्दी में रेमिंग्टन, फोनेटिक, लिंग्विस्ट, लाइनोटाइप, देवनागरी, इनस्क्रिप्ट नाम से कई की-बोर्ड प्रचलित हैं। इनमें किसी एक के मानक न होने से हिन्दी टाइप करने वालों के सामने दिक्कतें आती हैं।

हावड़ा ब्रिज क्या है? इसके बारे में विस्तार से जानकारी दीजिए।
नवीन कुमार फलवारिया, सुजानगढ़, राजस्थान


सत्तर साल से भी पहले निर्मित हावड़ा ब्रिज इंजीनियरिंग का चमत्कार है। यह विश्व के व्यस्ततम कैंटीलीवर ब्रिजों में से एक है। कोलकाता और हावड़ा को जोड़ने वाले इस पुल जैसे अनोखे पुल संसार भर में केवल गिने-चुने ही हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कोलकाता और हावड़ा के बीच बहने वाली हुगली नदी पर एक तैरते हुए पुल के निर्माण की परिकल्पना की गई। तैरते हुआ पुल बनाने का कारण यह था कि नदी में रोजाना काफी जहाज आते-जाते थे। खम्भों वाला पुल बनाते तो जहाजों का आना-जाना रुक जाता। अंग्रेज सरकार ने सन् 1871 में हावड़ा ब्रिज एक्ट पास किया, पर योजना बनने में बहुत वक्त लगा। पुल का निर्माण सन् 1937 में ही शुरू हो पाया। सन् 1942 में यह बनकर पूरा हुआ। इसे बनाने में 26,500 टन स्टील की खपत हुई। इसके पहले हुगली नदी पर तैरता पुल था। पर नदी में पानी बढ़ जाने पर इस पुल पर जाम लग जाता था। इस ब्रिज को बनाने का काम जिस ब्रिटिश कंपनी को सौंपा गया उससे यह ज़रूर कहा गया था ‍कि वह भारत में बने स्टील का इस्तेमाल करेगा। टिस्क्रॉम नाम से प्रसिद्ध इस स्टील को टाटा स्टील ने तैयार किया। इसके इस्पात के ढाँचे का फैब्रिकेशन ब्रेथवेट, बर्न एंड जेसप कंस्ट्रक्शन कम्पनी ने कोलकाता स्थित चार कारखानों में किया। 1528 फुट लंबे और 62 फुट चौड़े इस पुल में लोगों के आने-जाने के लिए 7 फुट चौड़ा फ़ुटपाथ छोड़ा गया था। सन् 1943 में इसे आम जनता के उपयोग के लिए खोल दिया गया। हावड़ा और कोलकाता को जोड़ने वाला हावड़ा ब्रिज जब बनकर तैयार हुआ था तो इसका नाम था न्यू हावड़ा ब्रिज। 14 जून 1965 को गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर इसका नाम रवींद्र सेतु कर दिया गया पर प्रचलित नाम फिर भी हावड़ा ब्रिज ही रहा। इसपर पूरा खर्च उस वक्त की कीमत पर ढाई करोड़ रुपया (24 लाख 63,887 पौंड)आया। इस पुल से होकर पहली बार एक ट्रामगाड़ी चली थी।

नीम कड़वा क्यों होता है?

नीम के तीन कड़वे तत्वों को वैज्ञानिकों ने अलग निकाला है, जिन्हें निम्बिन, निम्बिडिन और निम्बिनिन नाम दिए हैं। सबसे पहले 1942 में भारतीय वैज्ञानिक सलीमुज़्ज़मा सिद्दीकी ने यह काम किया। वे बाद में पाकिस्तान चले गए थे। नाम का यह कड़वा तत्व एंटी बैक्टीरिया, एंटी वायरल होता है और कई तरह के ज़हरों को ठीक करने का काम करता है। नीम का सम्पूर्ण भाग कड़वा होता है, किन्तु कोई भी भाग अनुपयोगी नहीं होता। इसकी जड़, छाल, पत्ते, फूल, फल, गोंद, मद, सींक, टहनी एवं लकड़ी और इसकी छाया तथा इससे छनकर आने वाली हवा, सभी में कृषि, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए लाभकर हैं। उपयोगिता के मामले में यह एक प्रकार से भारतीय ग्रामीण औषधालय है। भारत के अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार तथा पश्चिमी अफ्रीकी देशों का यह घरेलू वृक्ष है। नीम की पत्तियों में 12.40 से 18.27 प्रतिशत तक क्रूड प्रोटीन, 11.40 से 23.08 प्रतिशत तक क्रूड फाइबर, 48 से 51 प्रतिशत तक कार्बोहाइड्रेट्स, 46.32 से 66.66 प्रतिशत तक नाइट्रोजन मुक्त अर्क, 2.27 से 6.24 प्रतिशत तक अन्य अर्क, 0.89 से 3.96 प्रतिशत तक कैल्शियम, 0.10 से 0.30 प्रतिशत तक फास्फोरस और 2.3 से 6.9 प्रतिशत तक वसा पाया जाता है। इसमें लोहा तथा विटामिन `ए' की मात्रा भी पर्याप्त होती है। नीम छाल में फास्फोरस, शर्करा, कांसी तथा गंधक काफी मात्रा में पाया जाता है। नीम फल का गूदा मीठा, हल्का खुमारी लिए होता है। इसके बीज के तेल में स्टिऑरिक एसिड, ओलेक एसिड तथा लारिक एसिड पाए जाते हैं। इस तेल का अंग्रेजी नाम मार्गोसा है।

टेलीविज़न की टीआरपी से टीवी एक्टरों और प्रोड्यूसरों को कैसे फायदा होता है?
प्रीति कुमावत, सीकर


टीआरपी का मतलब है कार्यक्रमों की लोकप्रियता। यदि कार्यक्रम लोकप्रिय होगा तभी तो उसे पेश किया जाएगा। एक लोकप्रिय कार्यक्रम के प्रोड्यूसर और कलाकारों को उस लोकप्रियता के सहारे दूसरे कार्यक्रम बनाने को मिलेंगे। यह तो एक प्रकार का कारोबार है।





Saturday, August 3, 2013

ब्लैक बॉक्स क्या होता है? यह किस काम आता है ?

ब्लैक बॉक्स क्या होता है? यह किस काम आता है ?
हवाई जहाज की उड़ान के दौरान उसके बारे में तमाम जानकारियाँ एक जगह दर्ज होती जाती हैं। विमान की गति, ऊँचाई, इंजन तथा अन्य यंत्रों की ध्वनि, यात्रियों और पायलटों की बातचित आदि, दर्ज होती रहती है। इन सूचनाओं के विश्लेषण द्वारा विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में दुर्घटना के कारणों की पहचान की जाती है।इसे फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर या फ़्लाइट रिकॉर्डर कहते हैं। इसके अलावा क़ॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर भी होता है। इसे कहते हैं ब्लैक बॉक्स। 1953-1954 में हवाई हादसों की श्रंखला के बाद हवाई जहाज में एक ऐसा उपकरण लगाने की जरूरत महसूस की गई थी जो कि दुर्घटना के समय या उससे तुरंत पहले वायुयान में होने वाले हलचलों और आँकड़ों को संग्रहीत कर रख सके तथा जो दुर्घटनाओं में सुरक्षित रहे। इसका रंग काला नहीं लाल या नारंगी होता है। इसीलिए शुरू में इसे रेड एगकहा जाता था। इसके शुरुआती प्रारूपों में उसकी भीतरी दीवार को काला रखा जाता था, क्योंकि उसमें फोटो फिल्म आधारित जानकारी भी दर्ज होती थी। वहीं से इसका नाम ब्लैक बॉक्स पड़ा। इसे इस तरह बनाया जाता है कि तेज आग, भीषण विस्फोट और कई टन मलबे के दबाव के बावजूद नष्ट नहीं होता

भारतीय रुपए की तुलना हमेशा अमेरिकी डॉलर से क्यों की जाती है?
त्रिलोक नायक, triloknayak07@gmail.com
 आप चाहें तो इसकी तुलना किसी दूसरी करेंसी से भी कर सकते है, पर चूंकि दुनिया में सबसे मजबूत करेंसी इस वक्त डॉलर है, इसलिए आमतौर पर तुलना डॉलर से की जाती है। दुनिया की मजबूत मुद्राओं को हार्ड करेंसी कहते हैं। डॉलर के अलावा विश्व में यूरो, पौंड स्टर्लिंग, जापानी येन और स्विस फ्रैंक को हार्ड करेंसी की श्रेणी में रख सकते हैं। इन करेंसियों के मार्फत दुनिया के तमाम देश एक-दूसरे से व्यापार करते हैं। इस वक्त दुनिया के ज्यादातर देशों के पास मुद्रा कोष के नाम पर सबसे बड़ा भंडार डॉलर का है। हमारे देश में भी जब विदेशी मुद्रा कोष की बात होती है तो डॉलर का नाम ही लिया जाता है।

मोबाइल जेमर कैसे काम करता है?
 पहले यह समझ लें कि फोन जैमर की ज़रूरत क्यों होती है। इसकी ज़रूरत या तो सुरक्षा कारणों से होती है या अस्पताल जैसी जगह पर जहाँ शांति की ज़रूरत हो। आपने देखा होगा पिछले दिनों चुनाव के दिन भी मोबाइल सेवाएं ब्लॉक की गईं। कई बार पुलों और रक्षा संस्थानों के आसपास फोन जैम हो जाते हैं। उस इलाके से बाहर आने पर फोन फिर से काम करने लगते हैं। युद्ध के समय सीमा पर रेडियो जैमिंग की जाती है ताकि शत्रु के रेडियो संदेश न जा सकें। फोन जैमिंग एक प्रकार से रेडियो जैमिंग है। इसमें जैमिंग डिवाइस उसी फ्रीक्वेंसी पर रेडियो तरंगे प्रवाहित करते हैं, जिसपर आमतौर से फोन डिवाइस काम कर रही हैं। इससे फोन सेवाओं में व्यवधान पैदा हो जाता है और कुछ देर के लिए टावर से सम्पर्क टूट जाता है। इस इलाके से बाहर आने पर सेवा फिर से शुरू हो जाती है। 

मुझे कुतुब मीनार के बारे में जानकारी चाहिए। यह किस काम आता था?

मुझे कुतुब मीनार के बारे में जानकारी चाहिए। यह किस काम आता था?
राकेश फलवारिया, सुजानगढ़, चुरू-331507
दिल्ली की कुतुब मीनार, ईंट से बनी दुनिया की सबसे ऊँची मीनार है। इसकी ऊँचाई 72.5 मीटर (237.86 फुट) और व्यास 14.3 मीटर है, जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फुट) हो जाता है। इसमें 379 सीढियाँ हैं। अफ़गानिस्तान की जाम मीनार से प्रेरित एवं उससे आगे निकलने की इच्छा से, दिल्ली के पहले मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, ने कुतुब मीनार का निर्माण सन 1193 में आरम्भ करवाया, परन्तु केवल इसका आधार ही बनवा पाया। बाद में उनके दामाद और उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसमें तीन मंजिलों को बढ़ाया, और सन 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने पाँचवीं और अन्तिम मंजिल बनवाई। इस मीनार में ऐबक से तुगलक तक के स्थापत्य एवं वास्तु शैली में बदलाव को देखा जा सकता है। मीनार को लाल पत्थर से बनाया गया है, जिस पर कुरान की आयतों की एवं फूल बेलों की महीन नक्काशी की गई है। यह मीनार पुराने दिल्ली शहर, ढिल्लिका के प्राचीन किले लालकोट के अवशेषों पर बनी है। ढिल्लिका आखिरी हिन्दू राजाओं तोमर और चौहान की राजधानी थी। इस क्यों बनाया गया? माना जाता कि कुतुब मीनार का इस्तेमाल पास ही में बनी कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की मीनार के रूप में होता था और यहां से अजान दी जाती थी। यह भी कहते हैं कि इस्लाम की दिल्ली पर विजय के प्रतीक रूप में बनी। कुछ पुरातत्व शास्त्री मानते हैं कि इसका नाम पहले तुर्क सुल्तान कुतुबुद्दीन एबक के नाम पर पडा, वहीं कुछ यह मानते हैं कि इसका नाम बग़दाद के प्रसिद्ध सन्त कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर है, जो भारत में रहने आए थे। यहाँ लगे शिलालेख में लिखा है कि इसकी मरम्मत फ़िरोज शाह तुगलक ने (1351-88) और सिकंदर लोधी (1489-1517) ने करवाई। मेजर आर.स्मिथ ने इसका जीर्णोद्धार 1829 में करवाया था।

मीनार के चारों ओर बने अहाते में भारतीय कला के कई उत्कृष्ट नमूने हैं, जिनमें से अनेक इसके निर्माण काल सन 1193 या और पहले के हैं। इनमें कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाई गई भारत की पहली मस्जिद कुव्वत-उल-इस्लाम, चौथी सदी का चंद्र लोह स्तम्भ (आयरन पिलर), अलाई दरवाजा, इल्तुतमिश का मकबरा (1235 इसवी) प्रमुख हैं। लोह स्तम्भ की खासियत यह है कि 1700 साल के लंबे अर्से से यह खुले आसमान में खड़ा है। इसके ऊपर सालों से धूप, बारिश और धूल गिरती रही है, लेकिन इसके बावजूद भी इस पर जंग नहीं लगा है।

कुतुब मीनार के पास ही एक और मीनार बनाने की शुरूआत की गई थी। इसे अलाई मीनार कहते हैं। अलाउद्दीन खिलजी ने इसका निर्णाण शुरू कराया था। वे कुतुब मीनार से दुगनी ऊँची मीनार बनाना चाहते थे। इस मीनार की बुनियाद के अलावा करीब 80 फुट की ऊँचाई तक काम हो गया था, पर सन 1316 में अलाउद्दीन की मौत के बाद यह काम अधूरा रह गया।

इंटरनेट पर पब्लिक साइट्स का स्टोरेज लिमिट क्या है? क्या यू ट्यूब और गूगल के पास अनलिमिटेड स्टोरेज है?
आयुष पोखरना, विजयनगर, अजमेर
इंटरनेट के इतिहास को देखें तो पता लगेगा कि शुरू में यह अनुसंधान प्रयोगशालाओं के बीच का नेटवर्क था। जैसे-जैसे इसकी सम्भावनाओं के दरवाजे खुले तब इंटरनेट सेवाओं के व्यावसायिक इस्तेमाल का रास्ता भी खुला और तब इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर के रूप में संस्थाएं बनीं। सन 1990 में द वर्ल्ड नाम से पहली इंरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) का जन्म हुआ। यूट्यूब, गूगल, पिकासा, याहू वगैरह तकनीक और कारोबार के नए मानक गढ़ रहे हैं। वैब स्टोरेज का एक समानांतर कारोबार चल रहा है। आप जिस स्टोरेज की बात पूछ रहे हैं, वह अब कोई समस्या नहीं है। वह अनलिमिटेड है।

क्या नेता लोग टैक्स भरते हैं?
त्रिलोक नायक, triloknayak07@gmail.com
नेता भी देश के नागरिक हैं। उन्हें भी हर तरह के टैक्स भरने होते हैं। वह हाउस टैक्स हो या इनकम टैक्स नेताओं को भी नियमानुसार उन्हें भरना होता है।


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