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Saturday, January 14, 2023

गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को क्यों मनाते हैं?

हमारे यहाँ गणतंत्र दिवस का मतलब है संविधान लागू होने का दिन। संविधान सभा ने 29 नवम्बर 1949 को संविधान को अंतिम रूप दे दिया था। इसे उसी रोज, 1 दिसम्बर या 1 जनवरी को भी लागू किया जा सकता था। पर इसके लिए पहले से 26 जनवरी की तारीख मुकर्रर की गई। वह इसलिए कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिसम्बर 1929 में हुए लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास किया गया और 26 जनवरी, 1930 को कांग्रेस ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी ‘पूर्ण स्वराज्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता रहा। पर स्वतंत्रता मिली 15 अगस्त को। अब ‘पूर्ण स्वराज्य दिवस’ यानी 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए संविधान को 26 जनवरी 1950 से लागू करने का फैसला किया गया। गणतंत्र माने जिस देश का राष्ट्राध्यक्ष चुना जाता है। युनाइटेड किंगडम लोकतंत्र हैगणतंत्र नहीं। वहाँ राजा राष्ट्राध्यक्ष हैं, हमारे यहाँ राष्ट्रपति, जो चुनकर आते हैं।

समुद्र कैसे बने?

धरती जब नई-नई थी तब वह बेहद गर्म थी। अब से तकरीबन साढ़े चार अरब साल पहले धरती भीतर से तो गर्म थी ही उसकी सतह भी इतनी गर्म थी कि उस पर तरल जल बन नहीं पाता था। उस समय के वायुमंडल को हम आदि वायुमंडल (प्रोटो एटमॉस्फीयर) कहते हैं। उसमें भी भयानक गर्मी थी। पर पानी सृष्टि का हिस्सा है और सृष्टि के विकास के हर दौर में किसी न किसी रूप में मौज़ूद रहा है। उस गर्म दौर में भी खनिजों के ऑक्साइड और वायुमंडल में धरती से निकली हाइड्रोजन के संयोग से गैस के रूप में पानी पैदा हो गया था। पर वह तरल बन नहीं सकता था, और भाप के रूप में था। वायुमंडल के धीरे-धीरे ठंडा होने पर इस भाप ने बादलों की शक्ल ली। इसके बाद लम्बे समय तक धरती पर मूसलधार बारिश होती रही। यह पानी भाप बनकर उठता और संघनित (कंडेंस्ड) होकर फिर बरसता। इसी दौरान धरती की सतह भी अपना रूपाकार धारण कर रही थी। ज्वालामुखी फूट रहे थे और धरती की पर्पटी या क्रस्ट तैयार हो रही थी। धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से पानी ने अपनी जगह बनानी शुरू की। धरती पर जीवन की शुरूआत के साथ पानी का भी रिश्ता है। जहाँ तक महासागरों की बात है पृथ्वी की सतह का लगभग 72 फीसदी हिस्सा महासागरों के रूप में है। दो बड़े महासागर प्रशांत और अटलांटिक धरती को लम्बवत महाद्वीपों के रूप में बाँटते हैं। हिन्द महासागर दक्षिण एशिया को अंटार्कटिक से अलग करता है और ऑस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के बीच के क्षेत्र में फैला है। एक नज़र में देखें तो पृथ्वी विशाल महासागर हैजिसके बीच टापू जैसे महाद्वीप हैं। इन महाद्वीपों का जन्म भी धरती की संरचना में लगातार बदलाव के कारण हुआ है, जिसकी अलग कहानी है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 14 जनवरी, 2023 को प्रकाशित


Thursday, May 21, 2015

पहला ईमेल किसने भेजा और कब?

ईमेल इलेक्ट्रॉनिक मेल का संक्षिप्त रुप है। दुनिया का पहला ई-मेल सन 1971 में अमेरिका के कैम्ब्रिज नामक स्थान पर रे टॉमलिंसन  नामक इंजीनियर ने उसी एक ही कमरे में रखे दो कम्पयूटरों के बीच भेजा। वे कम्प्यूटर नेटवर्क अर्पानेट से जुड़े थे। अर्पानेट एक माने में इंटरनेट का पूर्वज है। यह संदेश को एक जगह से दूसरी जगह भेजने का प्रयोग था। ईमेल को औपचारिक रूप लेने में कई साल लगे। अलबत्ता भारतीय मूल के अमेरिकी वीए शिवा अय्यदुरई ने 1978 में एक कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किया जिसे 'ईमेल' कहा गया। इसमें इनबॉक्स, आउटबॉक्स, फोल्डर्स, मेमो, अटैचमेंट्स ऑप्शन थे। सन 1982 में अमेरिका के कॉपीराइट कार्यालय ने उन्हें इस आशय का प्रमाणपत्र भी दिया। इस कॉपीराइट के बावजूद उन्हें ईमेल का आविष्कारक नहीं कहा जा सकता।

@ की क्या महत्ता है? इसके बिना ई-मेल अधूरा क्यों है?
अंग्रेज़ी के ऍट या स्थान यानी लोकेशन का यह प्रतीक चिह्न है। शुरू में इसका इस्तेमाल गणित में ‘ऍट द रेट ऑफ’ यानी दर के लिए होता था। ई-मेल में इसके इस्तेमाल ने इसके अर्थ का विस्तार कर दिया। ई-मेल में पते के दो हिस्से होते हैं। एक होता है लोकल पार्ट जो @ के पहले होता है। इसमें अमेरिकन स्टैंडर्ड कोड फॉर इनफॉरमेशन इंटरचेंज (एएससीआईआई) के तहत परिभाषित अक्षर, संख्या या चिह्न शामिल हैं। चिह्न @ के बाद डोमेन का नाम लिखा जाता है। यानी इस चिह्न के पहले व्यक्ति या संस्था का नाम बताने वाले संकेत और उसके बाद डोमेन नाम। कुछ लोगों को लगता है कि इस पते को केवल लोअर केस में लिखा जा सकता है। इसे अपर और लोअर दोनों केस में लिख सकते हैं।

दुनिया में ऐसे कितने देश हैं जहां लोकतंत्र या डेमोक्रेसी नहीं है ?
घना, म्यांमार और वैटिकन सिटी किसी न किसी रूप में लोकतंत्र की परिधि से बाहर के देश हैं। इसके अलावा सउदी अरब, जॉर्डन, मोरक्को, भूटान, ब्रूनेई, कुवैत, यूएई, बहरीन, ओमान, कतर,स्वाज़ीलैंड वगैरह में राजतंत्र है। इन देशों में लोकतांत्रिक संस्थाएं भी काम करती हैं। नेपाल में कुछ साल पहले तक राजतंत्र था, पर अब वहाँ लोकतंत्र है। दुनिया के 200 के आसपास देश हैं, जिनमें से तीस से चालीस के बीच ऐसे देश हैं, जो लोकतंत्र के दायरे से बाहर हैं या उनमें आंशिक लोकतंत्र है। जिन देशों में लोकतंत्र है भी उनमें भी पूरी तरह लोकतंत्र है या नहीं यह बहस का विषय है।

लोकतंत्र  व  गणतंत्र में  क्या  अंतर है ?
लोकतंत्र एक व्यवस्था का नाम है। यानी हम जब भी फैसले करें तब यथेष्ट लोगों की सहमति हो। हालांकि यह अनिवार्य नहीं, पर व्यवहारिक बात है कि उसकी संवैधानिक व्यवस्था भी होनी चाहिए। जब शासन पद्धति पर यह लागू हो तो शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक होती है। इसमें हिस्सा लेने वाले या तो आमराय से फैसले करते हैं और यदि ऐसा न हो तो मत-विभाजन से करते हैं। ये निर्णय सामान्य बहुमत से और कई बार ज़रूरी होने पर विशेष बहुमत से भी होते हैं। मसलन कुछ परिस्थितियों में दो तिहाई मत से भी निर्णय किए जाते हैं।

गणतंत्र का अर्थ वह शासन पद्धति जहाँ राज्य प्रमुख का निर्वाचन सीधे जनता करे या जनता के प्रतिनिधि करें। यानी राष्ट्रप्रमुख वंशानुगत या तानाशाही तरीके से सत्ता पर कब्जा करके न आया हो। कुछ ऐसे देश भी हैं, जहाँ शासन पद्धति लोकतांत्रिक है, पर राष्ट्राध्यक्ष लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुना जाता। जैसे युनाइटेड किंगडम, जहाँ राष्ट्राध्यक्ष सम्राट होता है, जिसके परिवार के सदस्य ही राष्ट्राध्यक्ष बनते हैं। वह लोकतंत्र है, गणतंत्र नहीं। भारत में लोकतांत्रिक सरकार है और राष्ट्रपति का चुनाव होता है इसलिए यह गणतंत्रात्मक व्यवस्था भी है।


दुनिया का सबसे बड़ा हाइवे कहाँ है? उसकी लम्बाई कितनी है?
ऑस्ट्रेलिया का हाइवे नम्बर वन दुनिया का सबसे लम्बा हाइवे माना जाता है। इसकी लम्बाई 14,500 किलोमीटर है। और यह इस महाद्वीप सागर तट से लगकर चलता है। यानी पूरे महाद्वीप का चक्कर लगाता है। भारत सरकार ने इसी प्रकार के एक राजमार्ग के निर्माण की योजना बनाई है जो देश की सीमाओं से होता हुआ पूरे देश का चक्कर लगाएगा। इसकी लम्बाई तकरीबन 5000 किलोमीटर होगी। इसे भारत माला नाम दिया गया है।

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Monday, January 26, 2015

स्वतंत्रता, लोकतंत्र और गणतंत्र में क्या अंतर है ?

स्वतंत्रता बहुत व्यापक अवधारणा है। इसका सीधा मतलब है व्यक्ति का अपने कार्य-व्यवहार में स्वतंत्र होना, पराधीन नहीं होना। व्यावहारिक अर्थ है ऐसी व्यवस्था में रहना जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार हो। हजारों साल के मनुष्य जाति के इतिहास में हमने व्यक्ति के कुछ प्राकृतिक अधिकारों को स्वीकार किया है जैसे जीवन, विचरण, भरण-पोषण, निवास वगैरह। इन प्राकृतिक अधिकारों को अतीत में राज-व्यवस्थाओं ने अपने लिखित-अलिखित कानूनों में स्थान देकर नागरिक अधिकार बनाया। 10 दिसम्बर 1948 को जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार घोषणापत्र में इन अधिकारों को जगह दी। इन अधिकारों पर नजर डालेंगे तो आप पाएंगे कि दुनिया के नागरिकों को अभी उनके पूरे अधिकार प्राप्त नहीं हैं। सम्भव है कभी मिलें।

लोकतंत्र एक व्यवस्था का नाम है, जिसकी एक संवैधानिक व्यवस्था भी हो। जब शासन पद्धति पर यह लागू हो तो शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक होती है। इसमें हिस्सा लेने वाले या तो आमराय से फैसले करते हैं और यदि ऐसा न हो तो मत-विभाजन से करते हैं। ये निर्णय सामान्य बहुमत से और कई बार ज़रूरी होने पर विशेष बहुमत से भी होते हैं। मसलन कुछ परिस्थितियों में दो तिहाई मत से भी निर्णय किए जाते हैं। 

गणतंत्र का अर्थ वह शासन पद्धति जहाँ राज्यप्रमुख का निर्वाचन सीधे जनता करे या जनता के प्रतिनिधि करें। यानी राष्ट्रप्रमुख वंशानुगत या तानाशाही तरीके से सत्ता पर कब्जा करके न आया हो। कुछ ऐसे देश भी हैं, जहाँ शासन पद्धति लोकतांत्रिक होती है, पर राष्ट्राध्यक्ष लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुना जाता। जैसे युनाइटेड किंगडम, जहाँ राष्ट्राध्यक्ष सम्राट होता है, जिसके परिवार के सदस्य ही राष्ट्राध्यक्ष बनते हैं। इस अर्थ में युनाइडेट किंगडम रिपब्लिक नहीं है। हमारे देश में लोकतांत्रिक सरकार है और राष्ट्रपति का चुनाव होता है इसलिए यह गणतंत्रात्मक व्यवस्था है।

स्वीकृत होने के दो महीने बाद लागू क्यों हुआ हमारा संविधान? यदि भारतीय संविधान 26 नवंबर 1949 को बनकर तैयार हो गया, तो इसे दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 को ही लागू क्यों किया गया?

हालांकि संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान के प्रारूप को अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया था, पर यह तय किया गया कि इसे 26 जनवरी से लागू किया जाए क्योंकि 26 जनवरी 1930 के लाहौर कांग्रेस-अधिवेशन में पार्टी ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास किया था और अध्यक्ष पं जवाहर लाल नेहरू ने अपने भाषण में इसकी माँग की थी। संविधान के नागरिकता, चुनाव और संसद जैसी व्यवस्थाएं तत्काल लागू हो गईं थीं। राष्ट्रीय संविधान सभा ने ध्वज 22 जुलाई 1947 को ही स्वीकार कर लिया था। और वह 15 अगस्त 1947 से औपचारिक रूप से राष्ट्रीय ध्वज बन चुका था। 

राष्ट्रपति भवन पर पहली बार तिरंगा कब फहराया गया?

भारतीय संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि के आसपास यह ध्वज संसद भवन के सेंट्रल हॉल में फहराया गया। इसी कार्यक्रम में श्रीमती हंसा मेहता ने राष्ट्रध्वज डॉ राजेन्द्र प्रसाद को भेंट किया। 15 अगस्त 1947 की भोर तब के वायसरीगल हाउस और वर्तमान राष्ट्रपति भवन पर तिरंगा फहराया गया। संसद भवन के शिखर पर भी उसी सुबह तिरंगा फहराया गया।  

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