Thursday, January 16, 2020

दफा 144 क्या होती है?


अपराध प्रक्रिया संहिता-1973 या सीआरपीसी की धारा 144 इन दिनों देशव्यापी आंदोलनों के कारण खबरों में है. गत वर्ष अगस्त के महीने से जम्मू कश्मीर में लगाई गई पाबंदियों के सिलसिले में फैसला सुनाते हुए 10 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 144 का इस्तेमाल किसी के विचारों को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि इस धारा का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है, और लंबे समय तक के लिए नहीं लगा सकते हैं, इसके लिए जरूरी तर्क होना चाहिए. सामान्यतः जब किसी इलाके में कानून-व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा हो, तो इस धारा को लागू किया जाता है. इसे लागू करने के लिए मजिस्ट्रेट या प्राधिकृत अधिकारी एक अधिसूचना जारी करता है. जिस जगह भी यह धारा लगाई जाती है, वहां तीन या उससे ज्यादा लोग जमा नहीं हो सकते हैं. मोटे तौर पर इसका इस्तेमाल सभाएं करने या लोगों को जमा करने से रोकना है. उस स्थान पर हथियारों के लाने ले जाने पर भी रोक लगा दी जाती है. इसका उल्लंघन करने वाले को गिरफ्तार किया जा सकता है, जिसमें एक साल तक की कैद की सजा भी हो सकती है. यह एक ज़मानती अपराध है, जिसमें जमानत हो जाती है.
कितने समय के लिए लगती है?
धारा-144 को दो महीने से ज्यादा समय तक नहीं लगाया जा सकता है, पर यदि राज्य सरकार को लगता है कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए इसकी जरूरत है तो इसकी अवधि को बढ़ाया जा सकता है. इस स्थिति में भी इसे छह महीने से ज्यादा समय तक इसे नहीं लगाया जा सकता है. इस कानून को अतीत में कई बार अदालतों में चुनौती दी गई है. यह धारा अंग्रेजी राज की देन है और सबसे पहले सन 1861 में इसका इस्तेमाल किया गया था. इस धारा की आलोचना में यह बात कही जाती है कि इसका उद्देश्य जो भी हो, पर प्रशासन इसका दुरुपयोग करता है.
अदालतों में चुनौती दी गई?
सन 1939 में अर्देशिर फिरोज शॉ बनाम अनाम मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट की आलोचना की थी. सन 1961 के बाबूलाल पराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के पाँच सदस्यों की बेंच ने इस कानून को रद्द करने से इनकार कर दिया था. सन 1967 में समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने इसे चुनौती दी, पर अदालत ने कहा, यदि सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने की खुली छूट दे दी जाएगा, तो कोई भी लोकतंत्र बचा नहीं रहेगा. सन 1970 में मधु लिमये बनाम सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट मामले में भी अदालत ने इसे रद्द करने से इनकार कर दिया. सन 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन सरकार की इस बात के लिए आलोचना की थी कि पुलिस ने रामलीला मैदान में सोते हुए लोगों की पिटाई की थी.


Sunday, January 12, 2020

एशिया में कितने देश हैं?


एशिया में पूरी तरह स्वतंत्र और संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या 49 है। इनके अलावा 6 ऐसे देश हैं, जो आंशिक रूप से मान्यता प्राप्त हैं जैसे अबखाजिया, नागोर्नो कारबाख, उत्तरी सायप्रस, फलस्तीन, दक्षिण ओसेतिया और ताइवान। इनमें से दो देश ऐसे हैं, जो जिन्हें अंतरमहाद्वीपीय कहा जा सकता है। तुर्की का एक हिस्सा यूरोप में है और उसी प्रकार मिस्र का एक हिस्सा अफ्रीका में पड़ता है। रूस का ज्यादातर क्षेत्र हालांकि एशिया महाद्वीप में है, पर उसे यूरोपीय देश माना जाता है। सायप्रस ऐसा अकेला देश है, जो एशिया में है, पर जो यूरोपियन यूनियन का सदस्य है। छह देश या इलाके ऐसे हैं जो किसी देश के अधीन हैं। ये हैं अक्रोती, ब्रिटिश इंडियन ओसन टेरिटरीज़, क्रिसमस द्वीप, कोको द्वीप, हांगकांग और मकाऊ। एशिया के पाँच सबसे छोटे देश हैं फलस्तीन, ब्रूनेई, बहरीन, सिंगापुर और मालदीव। मालदीव इनमें सबसे छोटा है।
ओलिंपिक में क्रिकेट शामिल होगा?
इन दिनों खबरें हैं कि लॉस एंजेलस में सन 2028 में होने वाले ओलिंपिक खेलों में क्रिकेट को भी शामिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं। संभावना है कि क्रिकेट की टी-20 शैली को इन खेलों में शामिल कर लिया जाए। ओलिंपिक के इतिहास में केवल एक बार क्रिकेट को शामिल किया गया है। 1896 में एथेंस में हुए पहले ओलिम्पिक खेलों में क्रिकेट को शामिल किया गया था, पर पर्याप्त संख्या में टीमें न आ पाने के कारण, क्रिकेट प्रतियोगिता रद्द हो गई। सन 1900 में पेरिस में हुए दूसरे ओलिम्पिक में चार टीमें उतरीं, पर बेल्जियम और नीदरलैंड्स ने अपना नाम वापस ले लिया, जिसके बाद सिर्फ फ्रांस और इंग्लैंड की टीमें बचीं। उनके बीच मुकाबला हुआ, जिसमें इंग्लैंड की टीम चैम्पियन हुई। क्रिकेट के पाँच दिनी टेस्ट मैच स्वरूप के कारण इसका आयोजन काफी मुश्किल समझा जाता था। साथ ही इसे खेलने वाले देशों की संख्या एक समय तक ज्यादा नहीं थी। पहले एक दिनी और फिर टी-20 क्रिकेट के आगमन के बाद इसे खेलने वाले देशों की संख्या बढ़ी है और इसमें लगने वाला समय भी कम हुआ है।
हम मोटे क्यों होते हैं?
एक वैज्ञानिक अध्ययन से पता लगा है कि चूहों के शरीर में पैनेक्सिन 1 नाम का एक प्रोटीन होता है, जो उनके शरीर में वसा या फैट का नियमन करता है। शारीरिक विकास के शुरुआती समय में पैंक्स 1 जीन के कमजोर हो जाने से फैट बढ़ने लगता है। इसके पहले ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने ‘एफटीओ’ नामक विशेष कोशिका खोज निकाली थी, जिसकी वजह से मोटापा, हृदयघात और मधुमेह जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं। जिनके शरीर में यह खास किस्म का जीन पाया जाता है, उन्हें अगर एक प्रकार का आहार दिया जाए, तो वह उन लोगों के मुकाबले अपना वजन बढ़ा हुआ महसूस करते है, जिनके शरीर में यह जीन नहीं होता है। वैज्ञानिकों का यह भी दावा है कि इस जीन को खोज लिया गया है, जो कोशिकाओं में चर्बी जमा होने के लिए जिम्मेदार हैं।  इन्हें फिट-1 व फिट-2 (फैट इंड्यूसिंग ट्रांसक्रिप्ट 1-2) जीन कहा जाता है।
पोलर लाइट्स क्या हैं?
ध्रुवीय ज्योति या मेरुज्योति, वह चमक है जो ध्रुव क्षेत्रों के वायुमंडल के ऊपरी भाग में दिखाई पड़ती है। उत्तरी अक्षांशों की ध्रुवीय ज्योति को सुमेरु ज्योति और दक्षिणी अक्षांशों की ध्रुवीय ज्योति को कुमेरु ज्योति कहते हैं। यह रोशनी वायुमंडल के ऊपरी हिस्से थर्मोस्फीयर ऊर्जा से चार्ज कणों के टकराव के कारण पैदा होती है। धरती का चुम्बकीय घेरा इन्हें वायुमंडल में भेजता है।
पृथ्वी गोलाकार क्यों है?
इसकी वजह गुरुत्व शक्ति है। धरती की संहिता इतनी ज्यादा है कि वह अपने आसपास की सारी चीजों को अपने केन्द्र की ओर खींचती है। यह केन्द्र चौकोर नहीं गोलाकार ही हो सकता है। इसलिए उसकी बाहरी सतह से जुड़ी चीजें गोलाकार हैं। इतना होने के बावजूद पृथ्वी पूरी तरह गोलाकार नहीं है। उसमें पहाड़ ऊँचे हैं और सागर गहरे। दोनों ध्रुवों पर पृथ्वी कुछ दबी हुई और भूमध्य रेखा के आसपास कुछ उभरी हुई है।
बवंडर या टॉर्नेडो क्या होते हैं?
टॉर्नेडो मूलतः वात्याचक्र हैं। यानी घूमती हवा। यह हवा न सिर्फ तेजी से घूमती है बल्कि ऊपर उठती जाती है। इसकी चपेट में जो भी चीजें आती हैं वे भी हवा में ऊपर उठ जाती हैं। इस प्रकार धूल और हवा से बनी काफी ऊँची दीवार या मीनार चलती जाती है और रास्ते में जो चीज़ भी मिलती है उसे तबाह कर देती है। इनके कई रूप हैं। इनके साथ गड़गड़ाहट, आँधी, तूफान और बिजली भी कड़कती है। जब से समुद्र में आते हैं तो पानी की मीनार जैसी बन जाती है। हमारे देश में तो अक्सर आते हैं।
बारह राशियां क्या होती हैं?
यह एक काल्पनिक व्यवस्था है और इसका सम्बन्ध फलित ज्योतिष से है, खगोल विज्ञान से नहीं। अलबत्ता अंतरिक्ष का नक्शा बनाने में इससे आसानी होती है। अंतरिक्ष का अध्ययन करने के लिए प्रायः हम एक काल्पनिक गोला मानकर चलते हैं, जो पृथ्वी केंद्रित है। इसे खगोल कहते हैं। पृथ्वी की भूमध्य रेखा और दोनों ध्रुवों के समांतर इस खगोल की भी मध्य रेखा और ध्रुव मान लेते हैं। इस खगोल में सूर्य का एक विचरण पथ है, जिसे सूरज का क्रांतिवृत्त या एक्लिप्टिक कहते हैं। पूरे साल में सूर्य इससे होकर गुजरता है। अंतरिक्ष में हर वस्तु गतिमान है, पर यह गति इस प्रकार है कि हमें तमाम नक्षत्र स्थिर लगते हैं। इन्हें अलग-अलग तारा-मंडलों के नाम दिए गए हैं।
सूर्य के यात्रा-पथ को एक काल्पनिक लकीर बनाकर देखें तो पृथ्वी और सभी ग्रहों के चारों ओर नक्षत्रों की एक बेल्ट जैसी बन जाती है। इस बेल्ट को बारह बराबर भागों में बाँटने पर बारह राशियाँ बनतीं हैं, जो बारह तारा समूहों को भी व्यक्त करतीं हैं। इनके नाम हैं मेष, बृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन। सूर्य की परिक्रमा करते हुए धरती और सारे ग्रह इन तारा समूहों से गुजरते हैं। साल भर में सूर्य इन बारह राशियों का दौरा करके फिर अपनी यात्रा शुरू करता है। अंतरिक्ष विज्ञानी इसके आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालते। फलित ज्योतिषी निकालते हैं।










Friday, January 10, 2020

जनगणना कब होती है?


भारत में हर दस साल बाद जनगणना होती है. दुनिया में अपने किस्म की यह सबसे बड़ी प्रशासनिक गतिविधि है. पिछली जनगणना सन 2011 में हुई थी और अगली जनगणना अब 2021 में होगी. जनगणना में आबादी के साथ ही साक्षरता, शिक्षा, बोली-भाषा, लिंगानुपात, शहरी तथा ग्रामीण निवास तथा अन्य जनसांख्यिकीय जानकारियाँ मिलती हैं. सन 2011 की जनगणना के अनुसार विश्व की कुल आबादी की तुलना में 17.5 फीसदी लोग भारत में रहते हैं. उससे पिछली जनगणना यानी 2001 में यह आंकड़ा 16.8 प्रतिशत का था. 2001 से 2011 में भारत की जनसंख्या 17.6 प्रतिशत की दर से 18 करोड़ बढ़ी है. यह वृद्धि वर्ष 1991-2001 की वृद्धि दर  21.5 प्रतिशत, से करीब 4 प्रतिशत कम थी. 2011 की जनगणना से यह भी पता लगा था कि भारत और चीन की आबादी का अंतर दस साल में घटकर 23 करोड़ 80 लाख से 13 करोड़ 10 लाख रह गया. इसी तरह देश में साक्षरता की दर 10 प्रतिशत बढ़कर करीब 74 प्रतिशत हो गई. जनगणना 2021 भारत की 16वीं और आजादी के बाद आज़ादी के बाद यह आठवीं जनगणना होगी. पहली जनगणना सन 1872 में हुई थी.
क्या यह एनपीआर से अलग है?
जनगणना बुनियादी तौर पर सभी निवासियों की गिनती है. जबकि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर या एनपीआर में व्यक्तियों के नाम और उनके जन्म, निवास तथा अन्य जानकारियों का विवरण दर्ज होगा. यह काम जनगणना की तरह घर-घर जाकर होगा. यह भारतीयों के साथ भारत में रहने वाले विदेशी नागरिकों के लिए भी अनिवार्य होगा. इसका उद्देश्य देश में रहने वाले लोगों की पहचान से जुड़ा डेटाबेस तैयार करना है. पहला एनपीआर 2010 में तैयार किया गया था और उसे 2015 में अपडेट किया गया था. इसे नागरिकता क़ानून 1955 और सिटीजनशिप (रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटीजन्स एंड इश्यू ऑफ नेशनल आइडेंटिटी कार्ड्स) रूल्स, 2003 के प्रावधानों के तहत गाँव, पंचायत, ज़िला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर किया जाएगा.
जातीय जनगणना क्या है?
देश में जो जनगणना होती है, उसमें धर्म के साथ ही अनुसूचित जातियों और जनजातियों का विवरण भी होता, पर सभी जातियों का विवरण नहीं होता. देश में केवल 1931 में जातीय जनगणना हुई थी. इस बात की माँग होती रही है कि जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए. इसकी जरूरत शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को आरक्षण देने के लिए भी हुई थी. मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना को आधार बनाते हुए यह पाया था कि 52 प्रतिशत लोग ओबीसी वर्ग में आते हैं. सन 2011 की जनगणना के साथ जातीय आधार पर जनगणना कराने की बात भी हुई थी. इस सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारियाँ सन 2015 में जारी की गईं, पर इसे जाति आधारित जनगणना नहीं कहा जा सकता. इसे लेकर कई प्रकार की पेचीदगियाँ बनी हुई हैं.



Thursday, December 26, 2019

सीडीएस क्या है?


इस साल स्वतंत्रता दिवस के अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि देश की सेनाओं के नेतृत्व को प्रभावशाली बनाने और उनके बीच बेहतर समन्वय के लिए शीघ्र ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की नियुक्ति की जाएगी. सेना के सभी अंगों के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. माना जाता है कि जिन देशों में यह पद होता है, वहाँ की सेनाओं के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता नहीं होती है. खासतौर से युद्ध के समय उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. अमेरिका में चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीजेसीएससी) ऐसा ही पद है. इस पद पर नियुक्त अधिकारी को वरिष्ठतम सेनाधिकारी माना जाता है और वह राष्ट्रपति का सलाहकार होता है. अमेरिका में सेना की सर्वोच्च संस्था जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (जेसीएससी) होती है, जिसमें थलसेना, वायुसेना, नौसेना, मैरीन कोर और नेशनल गार्ड के अध्यक्ष इस कमेटी के सदस्य होते हैं. सीजेसीएससी इसके प्रमुख होने के नाते मुख्य सैनिक सलाहकार होते हैं, पर वे विभिन्न थिएटरों के ऑपरेशनल प्राधिकारी नहीं होते. सेनाओं को निर्देश देने का अधिकार राष्ट्रपति के पास ही होता है. भारत में उसके समतुल्य चेयरमैन चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीओएससी) का पद है, पर वह पर्याप्त अधिकार संपन्न नहीं है.
इसकी जरूरत क्यों?
सन 1999 में करगिल युद्ध के बाद रक्षा विशेषज्ञ के सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति बनाई गई थी, जिसने 2000 में दाखिल अपनी रिपोर्ट में पाँच सितारा अधिकारी के रूप में सीडीएस की नियुक्ति का सुझाव दिया गया था. हालांकि तब उसकी नियुक्ति तो नहीं हुई थी, पर 23 नवंबर, 2001 को इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) की स्थापना हो गई थी, पर सीडीएस की नियुक्ति का मामला टलता रहा. प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री तक सीधे संपर्क में रहने वाले सैनिक अधिकारी की नियुक्ति को लेकर देश के नागरिक प्रशासन के मन में झिझक थी. इसके अलावा भी कई और संदेह थे. सन 2011 में तत्कालीन सरकार ने सुरक्षा मामलों को लेकर नरेश चंद्रा कमेटी का गठन किया. इस कमेटी ने भी 2012 की अपनी रिपोर्ट में सीडीएस की नियुक्ति का सुझाव दिया. फिर लेफ्टिनेंट जनरल डीबी शेकतकर कमेटी (2016) ने भी इसी आशय की सलाह दी.
कब होगी नियुक्ति?
भारतीय सेना के सह-प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मनोज मुकुंद नरवाने इस महीने के अंत में जनरल बिपिन रावत से सेनाध्यक्ष का कार्यभार संभालेंगे, जो 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं. इस नियुक्ति के बाद संभावना है कि सीडीएस की नियुक्ति होगी। इस पद के लिए निवृत्तमान सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत का नाम लिया जा रहा है। उपयुक्त पात्र का चयन करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की अध्यक्षता में एक कार्यान्वयन समिति का गठन किया था, जिसे सीडीएस पद की भूमिका, उसकी नियुक्ति और उससे जुड़ी अन्य बातों को परिभाषित करने का काम दिया गया था. इस समिति ने अपनी सिफारिशें रक्षा मामलों से संबद्ध कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) को सौंप दी हैं.



Saturday, December 21, 2019

चंद्रमा पर कितने व्यक्ति पैर रख चुके हैं?


काफी लोगों को यह पता है कि चंद्रमा पर पैर रखने वाले पहले व्यक्ति थे अमेरिका के नील आर्मस्ट्रांग, पर यह बात कम लोग जानते हैं कि अब तक कुल 12 लोग चंद्रमा की सतह पर पैर रख चुके हैं। ये सभी लोग अमेरिकी हैं और उनकी ये यात्राएं अपोलो कार्यक्रम के अंतर्गत जुलाई 1969 से दिसंबर 1972 तक हुईं थीं। चंद्रमा पर उतरते वक्त इन अंतरिक्ष-यात्रियों में एलन शेपर्ड सबसे ज्यादा उम्रदार थे, जो 47 साल की उम्र में चंद्रमा पर उतरे थे। चार्ल्स ड्यूक 36 साल 221 दिन के थे, जब वे चंद्रमा पर उतरे। चंद्रमा की यात्रा करने वाले 12 यात्रियों में से चार्ल्स ड्यूक, बज एल्ड्रिन, डेविड स्कॉट और हैरिसन श्मिट अभी जीवित हैं। इन 12 यात्रियों की पूरी सूची इस प्रकार हैः-
1.नील आर्मस्ट्रांग, 2.बज एल्ड्रिन. 3.चार्ल्स पीट, 4.एलन बीन, 5.एलन शेपर्ड, 6.एडगर मिशेल, 7.डेविड स्कॉट, 8.जेम्स इरविन, 9.जॉन यंग, 10.चार्ल्स ड्यूक, 11.जीन सर्नन, 12.हैरिसन श्मिट।

संरा सदस्य देशों की संख्या कितनी है?
संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या इस समय 193 है। इन सभी देशों को संरा महासभा में बराबरी का दर्जा मला हुआ है। किसी भी नए उस देश को सदस्यता दी जा सकती है, जो सम्प्रभुता सम्पन्न हो। इस सदस्यता के लिए संरा महासभा के अलावा सुरक्षा परिषद की अनुमति की जरूरत भी होती है। सदस्य देशों के अलावा संरा महासभा में पर्यवेक्षक के रूप में देशों को आमंत्रित किया जा सकता है। इस समय होली सी (वैटिकन) और फलस्तीन दो संरा पर्यवेक्षक हैं। पर्यवेक्षक महासभा की बैठकों में भाग लेने के अलावा अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं, पर मतदान में भाग नहीं ले सकते।
ऑक्सीजन की खोज किसने की?
ऑक्सीजन का किसी ने आविष्कार नहीं किया है, बल्कि यह वातावरण में उपस्थित महत्वपूर्ण गैस है। अलबत्ता इसे रासायनिक तरीके से प्राप्त करने का काम सबसे पहले 1772 में स्वीडन के वैज्ञानिक कार्ल विल्हेम शीले ने किया था। इसे हिंदी में प्राणवायु भी कहते हैं। वायु में क़रीब 21% मात्रा ऑक्सीजन की होती है। हवा के अलावा ऑक्सीजन पृथ्वी के अनेक दूसरे पदार्थों में भी रहती है। जैसे पानी में। कई प्रकार के ऑक्साइडों जैसे पारा, चाँदी आदि अथवा डाई ऑक्साइडों लैड, मैंगनीज में। फ्रांसीसी वैज्ञानिक अंतों लैवोइजियर ने सन 1777 में इसे ऑक्सीजन नाम दिया।
रेफ्रिजरेटर में कौन सी गैस डाली जाती है?
रेफ्रिजरेशन यानी फ्रिज और एयरकंडीशनरों में आमतौर पर फ्लुओरोकार्बंस, खासतौर से क्लोरोफ्लुओरोकार्बंस का इस्तेमाल होता था इन्हें सीएफसी गैस कहा जाता है। इनका इस्तेमाल बंद हो गया है ये गैसें ओज़ोन परत को नुकसान पहुँचाती हैं अब हाइड्रोफ्लुओरोकार्बंस या एचएफसी का इस्तेमाल होने लगा है, जो शायद कम नुकसान पहुँचाती हैं पर ज्यादातर ग्रीनहाउस गैसें जलवायु में परिवर्तन और धरती को गरम बनाती हैं इन गैसों का उत्सर्जन एयरकंडीशनर, फ्रिज, कंप्यूटर, स्कूटर, कार आदि से है
सौरमंडल के ग्रहों और सूर्य के द्रव्यमान का अनुपात क्या है?
पूरे सौरमंडल का 99.86 प्रतिशत द्रव्यमान सूर्य में है यानी शेष सभी ग्रह और उनके चन्द्रमा और उल्का पिंड मिलाकर 0.14 प्रतिशत हैं उसके इसी द्रव्यमान के कारण उसकी गुरुत्व शक्ति है कि सारे ग्रह उसके चारों ओर घूमते हैं












Thursday, December 19, 2019

फास्टैग क्या है?


फास्टैग भारत का इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन सिस्टम है. दुनिया के अलग-अलग देशों में टोल कलेक्शन की इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियाँ हैं. फास्टैग का संचालन राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) करता है. यह सिस्टम इस साल 15 दिसंबर से पूरे देश में लागू हो गया है. इस प्रकार एनएचएआई के अधीन काम करने वाले सभी 560 टोल प्लाजा इसके अंतर्गत आ गए हैं. इसकी शुरुआत 4 नवम्बर 2014 में अहमदाबाद और मुम्बई के बीच स्वर्ण चतुर्भुज राजमार्ग पर हुई थी. जुलाई 2015 में चेन्नई-बेंगलुरु राजमार्ग के टोल प्लाजा इसके सहारे भुगतान को स्वीकार करने लगे. इसके कारण अब राजमार्गों पर बने टोल प्लाजा काउंटरों के सामने लाइनें लगना बंद हो जाएगा. सरकार ने सभी वाहन स्वामियों के लिए फास्टैग अनिवार्य कर दिया है. फास्टैग को अमेज़न डॉट इन के अलावा बैंकों से खरीदा जा सकता है. पिछले कुछ समय से देश में बिकने वाले नए वाहनों में फास्टैग पहले से लगा होता है. शुरुआत में टोल प्लाजा पर एक लेन ऐसी भी होगी, जिसमें नकद भुगतान स्वीकार किया जा सकेगा. फास्टैग वाहन पर नहीं लगाएंगे, तो ऐसे वाहनों को टोल प्लाजा पर सिर्फ एक लेन से गुजरने की अनुमति मिलेगी और उन्हें जाम से जूझना पड़ सकता है.  
यह कैसे काम करता है?
यह रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडैंटिफ़िकेशन (आरएफआईडी) तकनीक पर काम करने वाली प्रणाली है. यह वैसी ही प्रणाली है, जो मेट्रो ट्रेन के स्मार्ट यात्रा-कार्ड में होती है. यह ऐसी व्यवस्था है, जिसमें वाहन स्वामी टोल प्लाजा पर या तो अपने किसी प्रीपेड या सेविंग्स बैंक खाते से भुगतान करता है. यह वाहन के विंड स्क्रीन पर लगा होता है, जिसके कारण टोल प्लाजा पर उसे रुककर भुगतान नहीं करना होता है और इलेक्ट्रॉनिक भुगतान हो जाता है. जनवरी 2019 में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों ने पेट्रोल पम्पों पर फास्टैग के मार्फत पेट्रोल खरीदने की व्यवस्था भी कर दी थी.
पैसा कहाँ से आएगा?
फास्टैग पेटीएम या ऐसे ही किसी वॉलेट से या डैबिट/क्रेडिट कार्ड से जुड़ा होता है. वाहन के स्वामी को रिचार्ज या टॉप अप करना पड़ता है. यदि यह एकाउंट किसी बचत खाते से जुड़ा है, तो उसके खाते से पैसा खुद ब खुद कट जाएगा, पर खाते में इतना पैसा होना चाहिए कि वह कम न पड़े. जैसे ही वाहन टोल प्लाजा पर करेगा वाहन स्वामी के पास पैसा कटने का एसएमएस आएगा. बैंकों के अलावा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की ओर से जारी फास्टैग भी उपलब्ध हैं. शुरुआती दिनों में फास्टैग कई तरह के कैशबैक और छूट भी दे रहे हैं. फास्टैग खरीदने के लिए वाहन के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट की एक कॉपी और वाहन स्वामी के पासपोर्ट साइज के फोटो की जरूरत होती है. इसके अलावा केवाईसी दस्तावेज के रूप में आईडी और एड्रेस प्रूफ की जरूरत होगी. इसके लिए पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, वोटर आईडी, आधार काम करेंगे.

Saturday, December 14, 2019

डेटा संरक्षण बिल क्या है?


केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार 4 दिसम्बर को व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक-2019 को अपनी मंजूरी दे दी. यह विधेयक संसद में पेश किया जाएगा. संभव है कि इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक पेश कर दिया गया हो. विधेयक के पास हो जाने के बाद भारतीय विदेशी कंपनियों को व्यक्तियों के बारे में प्राप्त व्यक्तिगत जानकारियों के इस्तेमाल को लेकर कुछ मर्यादाओं का पालन करना होगा. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में प्राइवेसी को मौलिक अधिकार घोषित किया था, पर अभी तक देश में व्यक्तिगत सूचनाओं के बारे में कोई नियम नहीं है. यह विधेयक एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया था. इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण ने की थी. विधेयक के महत्व को समझने के पहले सूचनाओं के महत्व को समझना भी जरूरी होगा. जैसे-जैसे इंटरनेट का विस्तार हो रहा है और जीवन में उसकी भूमिका बढ़ रही है, वैसे-वैसे जीवन में सुविधाओं और सहूलियतों के साथ-साथ कई तरह की पेचीदगियाँ भी बढ़ रही हैं. हालांकि देशों ने इंटरनेट के इस्तेमाल को अपने-अपने तरीके से नियंत्रित किया है, पर इसपर हम विश्व-नागरिक के रूप में भ्रमण करते हैं, इसलिए इसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिधियों पर भी विचार करना होगा. साथ ही हमें गूगल जैसे सर्च इंजनों की दुविधाओं को भी समझना होगा, जिनका कार्यक्षेत्र पूरा विश्व है.
कानून में क्या है?
यह कानून पास हो जाने के बाद कम्पनियों को कुछ समय इसके लिए दिया जाएगा, ताकि वे अपनी व्यवस्थाएं कर सकें. इस विधेयक में संवेदनशील डेटा, वित्तीय डेटा, स्वास्थ्य डेटा, आधिकारिक पहचान, लैंगिक रुझान, धार्मिक या जातीय डेटा, बायोमीट्रिक डेटा तथा अनुवांशिकी डेटा जैसी जानकारियों को परिभाषित किया गया है. कंपनियों के लिए ये जरूरी नहीं होगा कि वे तमाम तरह के निजी डेटा को भारत में ही स्टोर और प्रोसेस करें. संवेदनशील और क्रिटिकल निजी डेटा को लेकर भौगोलिक बंदिशों का प्रावधान बिल में है. यानी किस प्रकार की सूचनाओं को देश के बाहर भी प्रोसेस किया जा सकता है और किस प्रकार के बेहद महत्वपूर्ण डेटा को केवल देश में ही प्रोसेस किया जा सकता है.
सोशल मीडिया पर असर?
देश के टेक्नोलॉजी उद्योग ने इस विधेयक पर खुशी भी जाहिर की है और अपने अंदेशे भी जाहिर किए हैं. विधेयक में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर यूजर्स के स्वैच्छिक वैरीफिकेशन का प्रस्ताव किया है. साथ ही कंपनियों से कहा है कि वे अपने गोपनीय डेटा की जानकारी सरकार को दें. वैरीफिकेशन की जरूरत सोशल मीडिया को और ज्यादा जिम्मेदार बनाने के लिए है. उससे जुड़ी कंपनियों से कहा जाएगा कि वे ऐसी व्यवस्थाएं बनाएं, जिसमें यूजर्स खुद ही वैरीफाई करें और जो खुद को वैरीफाई नहीं करें, उनकी पहचान अलग कर दी जाए. इससे फेक एकाउंटों का पहचान हो सकेगी.


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