Monday, July 21, 2014

खर्राटे क्यों आते हैं?

खर्राटे क्यों आते हैंक्या यह कोई बीमारी है या उसका कोई लक्षण है?
सोते समय गले का पिछला हिस्सा थोड़ा सँकरा हो जाता है। साँस जब सँकरी जगह से जाती है तो आसपास के टिशुओं में स्पंदन होता है, जिससे आवाज आती है। यही हैं खर्राटे। यह सँकरापन नाक एवं मुँह में सूजन के कारण भी हो सकता है। यह सूजन एलर्जी, संक्रमण, धूम्रपान, शराब पीने या किसी दूसरे कारण से हो सकती है। इससे फेफड़ों को कम आक्सीजन मिलती हैजिससे मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर ज्यादा ऑक्सीजन माँगने लगते हैं। ऐसे में नाक एवं मुँह ज्यादा सक्रिय हो जाते हैंजिससे खर्राटे की आवाज आने लगती है। बच्चों में एडीनॉयड ग्रंथि में सूजन एवं टांसिल से भी खर्राटे आते हैं। मोटापे के कारण भी गले की नली में सूजन से रास्ता संकरा हो जाता हैऔर सांस लेने में आवाज आने लगती है। जीभ का बढ़ा आकार भी खर्राटे का बड़ा कारण है। ब्राज़ील में हुए एक शोध के अनुसार भोजन में नमक की अध‌िकता शरीर में ऐसे फ्लूइड का निर्माण करती है जिससे नाक के छिद्र में व्यवधान होता है।

बहरहाल खर्राटे या तो खुद बीमारी हैं या बीमारी का लक्षण हैं। खर्राटे से अचानक हृदय गति रुकने का खतरा रहता है। मधुमेह एवं मोटापे की बीमारी के कारण खर्राटे के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। खर्राटे के दौरान शरीर में रक्त संचार अनियमित हो जाता हैजो दिल के दौरे का बड़ा कारण है। दिमाग में रक्त की कम आपूर्ति से पक्षाघात तक हो सकता है। इससे फेफड़ों पर भी दबाव पड़ता है। खर्राटे के रोगियों को पॉलीसोमनोग्राफी टेस्ट करवाना चाहिए। यह टेस्ट व्यक्ति के सोते समय की शारीरिक स्थितियों की जानकारी देता है।
भारत का नाम भारत कैसे पड़ा?
भारतवर्ष का नामकरण कैसे हुआ इस संबंध में मतभेद हैं। भारतवर्ष में तीन भरत हुए एक भगवान ऋषभदेव के पुत्र, दूसरे राजा दशरथ के और तीसरे दुश्यंत- शकुंतला के पुत्र भरत। भारत नाम की उत्पति का संबंध प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट राजा मनु के वंशज भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत से है। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के पश्चात ब्रह्मा के मानस पुत्र मनु ने व्यवस्था सम्हाली। ऋषभदेव मनु से पांचवीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वयंभू मनु, प्रियव्रत, आग्नीध्र, नाभि और फिर ऋषभ। वृद्धावस्था में आग्नीध्र ने अपने नौ पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न नौ स्थानों का शासन दायित्व सौंपा। इन नौ पुत्रों में सबसे बड़े थे नाभि जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला। इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम अजनाभ से जोड़कर अजनाभवर्ष प्रचारित किया। राजा नाभि के पुत्र थे ऋषभ। पहले भारतवर्ष का नाम ॠषभदेव के पिता नाभिराज के नाम पर अजनाभवर्ष प्रसिद्ध था। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे। विष्णु पुराण में उल्लेख आता है "ततश्च भारतवर्ष तल्लो केषु गीयते" अर्थात् "तभी से इस देश को भारत वर्ष कहा जाने लगा"। वायु पुराण भी कहता है कि इससे पहले भारतवर्ष का नाम हिमवर्ष था। पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना 'महाभारत' में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। कालिदास कृत महान संस्कृत ग्रंथ 'अभिज्ञान शाकुंतलम' के एक वृत्तांत अनुसार राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष का नामकरण हुआ।

थ्री-डी फिल्म की शुरूआत कैसे हुई? कम्प्यूटर से या कैमरा से थ्री-डी इफेक्ट कैसे दिया जाता है?
थ्री-डी फिल्म मूवी की एक तकनीक है, जिसमें छवियां वास्तविक लगती हैं। इसमें चित्रों को रिकॉर्ड करने के लिए विशेष मोशन पिक्चर कैमरे का प्रयोग किया जाता है। यह तकनीक नई नहीं है। सन 1890 के दौरान भी इनका प्रदर्शन होता था, पर उस समय के इन फिल्मों को थिएटर पर दिखाया जाना काफी महंगा काम होता था। मुख्यत: 1950 से 1980 के बीच अमेरिकी सिनेमा में ये फिल्में प्रमुखता से दिखने लगी।
मोशन पिक्चर का स्टीरियोस्कोपिक युग 1890 के दशक के अंतिम दौर में आरंभ हुआ जब ब्रिटिश फिल्मों के पुरोधा विलियम ग्रीन ने थ्री-डी प्रक्रिया का पेटेंट फाइल किया। फ्रेडरिक युजीन आइव्स ने स्टीरियो कैमरा रिग का पेटेंट 1900 में कराया। इस कैमरे में दो लैंस लगाए जाते थे जो एक दूसरे से तीन-चौथाई इंच की दूरी पर होते थे। 27 सितंबर, 1922 को पहली बार दर्शकों को लॉस एंजेलस के एंबेसडर थिएटर होटल में द पावर ऑफ लव का प्रदर्शन आयोजित किया गया था। सन 1952 में पहली कलर स्टीरियोस्कोपिक फीचर, वान डेविल बनाई गई। इसके लेखक, निर्माता और निर्देशक एमएल गुंजबर्ग थे। स्टीरियोस्कोपिक साउंड में बनी पहली थ्री-डी फीचर फिल्म हाउस ऑफ वैक्स थी।
सिनेमा में तीसरा आयाम जोड़ने के लिए उसमें अतिरिक्त गहराई जोड़ने की जरूरत होती है। वैसे असल में यह केवल छद्म प्रदर्शन मात्र होता है। फिल्मांकन के लिए प्रायः 90 डिग्री पर स्थित दो कैमरों का एक-साथ प्रयोग कर चित्र उतारे जाते हैं और साथ में दर्पण का भी प्रयोग किया जाता है। दर्शक थ्री-डी चश्मे के साथ दो चित्रों को एक ही महसूस करते हैं और वह उसे त्रि-आयामी या थ्री-डायमेंशनल लगती है। ऐसी फिल्में देखने के लिए कुछ समय पहले तक एक खास तरीके के चश्मे को पहनने की आवश्यकता होती है। हाल ही निर्माता-निर्देशक स्टीवन स्पीलर्ब ने एक ऐसी तकनीक का पेटेंट कराया है, जिसमें थ्री-डी फिल्म देखने के लिए चश्मे की कोई जरूरत नहीं रहेगी। भारत में भी कई थ्री-डी फिल्में बन चुकी हैं। सन 1985 में छोटा चेतन और शिवा का इन्साफ रिलीज़ हुई थी। रंगीन चश्मे के साथ फिल्म देखने का अनुभव एकदम नया था। भारत में अब 20-25 पुरानी फिल्मों को थ्री-डी में बदला जा रहा है। 
  
पहला टेस्ट ट्यूब बेबी कितने साल का है? आजकल क्या कर रहा है?
कर रहा है नहीं कर रही है। पुरुष पहले आया या स्त्री इसका पता नहीं, पर टेस्ट ट्यूब बेबी के रूप में सबसे पहले लड़की का जन्म हुआ था। 25 जुलाई 1978 को ग्रेट ब्रिटेन में लेज़्ली ब्राउन ने दुनिया के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी को जन्म दिया था। इस बेबी का नाम है लुइज़ जॉय ब्राउन। इनके पिता का नाम है जॉन ब्राउन। इनके माता-पिता के विवाह के नौ साल बाद तक संतान नहीं होने पर उन्होंने डॉक्टरों से सम्पर्क किया। डॉक्टर रॉबर्ट जी एडवर्ड्स कई साल से ऐसी तकनीक विकसित करने के प्रयास में थे, जिसे इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन कहा जाता है। डॉक्टर एडवर्ड्स को बाद में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार भी दिया गया। टेस्ट ट्यूब बेबी लुइज़ आज 34 वर्ष की हैं और वे एक बच्चे की माँ हैं। उनके बेटे का नाम केमरन है, जिसकी उम्र पाँच साल है। लुइज़ का विवाह सन 2004 में वेस्ली मलिंडर से हुआ था। और 20 दिसम्बर 2006 को केमरन का जन्म सामान्य तरीके से हुआ।

हमारे राष्ट्रीय ध्वज को किसने डिजाइन किया?
तिरंगे झंडे का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए। इसका विकास हुआ है और इसमें कई लोगों का योगदान है। माना जाता है कि सबसे पहले आंध्र प्रदेश के देशभक्त कृषि विज्ञानी पिंगली वैंकैया ने इसकी परिकल्पना की थी। उन्होंने गांधी जी को एक राष्ट्रीय ध्वज का सुझाव दिया था। गांधी जी ने सबसे पहले 1921 में कांग्रेस के अपने झंडे की बात की थी। इस झंडे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। इसमें दो रंग थे लाल रंग हिन्दुओं के लिए और हरा रंग मुस्लिमों के लिए। बीच में एक चक्र था। बाद में इसमें अन्य धर्मों के लिए सफेद रंग जोड़ा गया। कांग्रेस के ध्वज में बीच में चरखा था। ध्वज को उसके वर्तमान रूप में 15 अगस्त 1947 के कुछ ही दिन पूर्व 22 जुलाई, 1947 को आयोजित भारतीय संविधान-सभा की बैठक में अपनाया गया था। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र ने ली। इस नए झंडे की देश के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने फिर से व्याख्या की।
इससे भी पहले 1904  में स्वामी विवेकानन्द की शिष्या भगिनी निवेदिता ने एक ध्वज बनाया था। 7 अगस्त, 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम् लिखा गया था। द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों ने फहराया था। कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार यह 1905 की बात है। यह भी पहले ध्वज के समान था; सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, किंतु सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था। 1917 में डॉ. एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान एक और ध्वज फहराया। इस ध्वज में ५ लाल और ४ हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के प्रतीक रूप में सात सितारे बने थे। ऊपरी किनारे पर बाईं ओर यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
ऐ मेरे वतन के लोगो, गीत किसने लिखा? इस गाने के कितने वर्ष हो गए?
सबसे पहले लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप के लिखे इस गाने को गाया था 27 जनवरी 1963 को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने। 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की बुरी हार हुई थी। पूरे देश का मनोबल गिरा हुआ था. ऐसे में सबकी निगाहें फ़िल्म जगत और कवियों की तरफ़ जम गईं कि वे कैसे सबके उत्साह को बढ़ाने का काम कर सकते हैं। कवि प्रदीप ने एक जगह बताया है कि उस दौर में तीन महान आवाज़ें हुआ करती थीं. मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और लता मंगेशकर. उसी दौरान नौशाद भाई ने तो मोहम्मद रफ़ी से 'अपनी आज़ादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं', गीत गवा लिया, जो बाद में फ़िल्म 'लीडर' में इस्तेमाल हुआ। राज साहब ने मुकेश से 'जिस देश में गंगा बहती है' गीत गवा लिया. तो इस तरह से रफ़ी और मुकेश तो पहले ही रिज़र्व हो गए. अब बचीं लता जी. उनकी मखमली आवाज़ में कोई जोशीला गाना फिट नहीं बैठता। यह बात मैं जानता था। तो मैंने एक भावनात्मक गाना लिखने की सोची। इस तरह से 'ऐ मेरे वतन के लोगों' का जन्म हुआ, जिसे लता ने पंडित नेहरू के सामने गाया और उनकी आंखों से भी आंसू छलक आए।

वॉट्सएप की शुरूआत किसने की और कब की?

वॉट्सएप की शुरूआत किसने की और कब की? इस एप का कोई फुल फॉर्म है?
वॉट्सएप स्मार्टफोन पर इंटरनेट के मार्फत संदेश भेजने की सेवा है। इसमें टेक्स्ट के अलावा फोटो, ऑडियो और वीडियो फाइलें भी भेजी जा सकती हैं। यह गूगल एंड्रॉयड, ब्लैकबेरी, एपल, नोकिया सीरीज़ 40 और माइक्रोसॉफ्ट विंडो प्लेटफॉर्म पर काम करता है। वॉट्सएप इनकॉरपोरेट की स्थापना सन 2009 में अमेरिकी ब्रायन एक्टन और यूक्रेन के जैन काऊम ने की थी। ये दोनों याहू के पूर्व कर्मचारी थे। यह कम्पनी माउंटेन व्यू, सेंटा क्लारा काउंटी, कैलिफोर्निया में है। वॉट्सएप के मुकाबले कुछ और सेवाएं इस बीच आ गईं हैं। इनमें लाइन, काकाओ टॉक, वीचैट और ज़ालो भी शामिल हैं। जो काम एसएमएस ने मोबाइल फोन पर और स्काइप ने कम्प्यूटर पर किया, तकरीबन वैसा ही काम वॉट्सएप ने किया है। यह नाम रखने के पीछे मंशा वॉट्सअप और एप्लीकेशंस के एप को जोड़ने की रही होगी। वॉट्सएप आमतौर पर अंग्रेजी में क्या चल रहा है के लिए कहा जाता है।

Sunday, July 20, 2014

कौन सा देश स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाता?

विश्व में कहाँ पर स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया जाता?
स्वतंत्रता दिवस वही देश मनाएगा, जो कभी परतंत्र रहा हो। यूके, रूस, फ्रांस, नेपाल, थाईलैंड, जापान, चीन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे अनेक देश नहीं मनाते। फिर भी फ्रांसीसी क्रांति की याद में बास्तील दिवस मनाता है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका पर बाहर से आए लोगों का शासन है। पर वे अब भी इन देशों के निवासी हैं, इसलिए स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाते। चीन 1 अक्तूबर को कम्युनिस्ट शासन की शुरूआत को मनाता है। नेपाल 29 मई 2008 को संप्रभुता सम्पन्न गणतंत्र बना। इस दिन यहाँ से राजशाही का खात्मा हुआ। नेपाल में लोकतंत्र दिवस हर साल फाल्गुन सप्तमी को मनाया जाता है। इस रोज सन 1951 में राजा त्रिभुवन ने देश को राणाशाही के हाथों से निकाल कर लोकतंत्र की स्थापना की थी। पर देश में लोकतंत्र 1960 में आया जब राजा महेन्द्र ने पंचायत प्रणाली की स्थापना की।

ग्रेट विक्टोरिया रेगिस्तान कहाँ है?
ग्रेट विक्टोरिया रेगिस्तान ऑस्ट्रेलियन रेगिस्तानों में से एक है। इस रेगिस्तान का क्षेत्रफल 338,000 वर्ग किमी है। इस विशाल रेगिस्तान में रेतीले टीलों की भरमार है। इस रेगिस्तान की यह विशेषता है कि यहाँ वनस्पति बहुतायत से होती है। ब्रिटेन ने 1952 में जब एटम बम बनाया तो उसका परीक्षण यहाँ आकर किया।

ट्यूबलाइट में चोक का क्या इस्तेमाल होता है?
ट्यूबलाइट मूलतः मर्करी वैपर लैम्प है। इसमें मर्करी वैपर को चार्ज करने के लिए बिजली के हाई वोल्टेज प्रवाह की जरूरत होती है। चोक और स्टार्टर प्रेरक या inductor या reactor का काम करते हैं। प्रेरक को साधारण भाषा में 'चोक' (choke) और 'कुण्डली' (coil) भी कहते हैं। ट्यूबलाइट आदि को जलाने के लिए हाई वोल्ट पैदा करने एवं जलने के बाद उससे बहने वाली धारा को सीमित रखने के लिए इसका इस्तेमाल होता है। पुरानी कारों एवं स्कूटरों आदि में स्पार्क पैदा करने के लिए इग्नीशन क्वायल की भी यही भूमिका होती है।

प्रकृति में सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करने वाला पेड़ या पौधा कौन सा है?
पेड़ या पौधे ऑक्सीजन तैयार नहीं करते बल्कि वे फोटो सिंथेसिस या प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करते हैं और उसके दो बुनियादी तत्वों को अलग करके ऑक्सीजन को वातावरण में फैलाते हैं। एक माने में वातावरण को इंसान के रहने लायक बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। कौन सा पेड़ सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करते है? इसे लेकर अधिकार के साथ कहना मुश्किल है, पर तुलसी, पीपल, नीम और बरगद के पेड़ काफी ऑक्सीजन तैयार करते हैं और हमारे परम्परागत समाज में इनकी पूजा होती है। यों पेड़ों के मुकाबले काई ज्यादा ऑक्सीजन तैयार करती है।
प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है जिसमें पौधे अपने हरे रंग वाले अंगों जैसे पत्तीद्वारा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बन डाइऑक्साइड तथा भूमि से जल लेकर जटिल कार्बनिक खाद्य पदार्थों जैसे कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं। इस प्रक्रिया में आक्सीजन एवं ऊर्जा से भरपूर कार्बोहाइड्रेट (सूक्रोजग्लूकोजस्टार्च आदि) का निर्माण होता है तथा आक्सीजन गैस बाहर निकलती है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रियाओं में से एक है। सीधे या परोक्ष रूप से दुनिया के सभी सजीव इस पर आश्रित हैं। 

शीशे का आविष्कार कब और कैसे हुआ और इसका पहली बार किस रूप में उपयोग किया गया?
शीशे से आपका आशय दर्पण से है तो वह प्रकृति ने हमें ठहरे हुए पानी के रूप में दिया था। पत्थर युग में चिकने पत्थर में भी इंसान को अपना प्रतिबिंब नज़र आने लगा था। इसके बाद यूनान, मिस्र, रोम, चीन और भारत की सभ्यताओं में धातु को चमकदार बनाकर उसका इस्तेमाल दर्पण की तरह करने की परंपरा शुरू हुई। पर प्रकृति ने उससे पहले उन्हें एक दर्पण बनाकर दे दिया था। यह था ऑब्सीडियन। ज्वालामुखी के लावा के जमने के बाद बने कुछ काले चमकदार पत्थर एकदम दर्पण का काम करते थे। बहरहाल धातु युग में इंसान ने ताँबे की प्लेटों को चमकाकर दर्पण बना लिए। प्राचीन सभ्यताओं को शीशा बनाने की कला भी आती थी। ईसा की पाँचवीं सदी में चीन के लोगों ने चाँदी और मरकरी से शीशे के एक और कोटिंग करके दर्पण बना लिए थे। हमारे यहाँ स्त्रियों के गहनों में आरसी भी एक गहना है, जो वस्तुतः चेहरा देखने वाला दर्पण है।

एंटी ऑक्सीडेंट क्या होते हैं और ये शरीर पर क्या प्रभाव डालते हैं?
हमारे शरीर की खरबों कोशिकाओं को पोषण की कमी और संक्रमण का ही खतरा नहीं होता हैबल्कि फ्री रेडिकल्स भी कोशिकाओं को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। यह फ्री रेडिकल्स भोजन को ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया में उप-उत्पाद के रूप में निकलते हैं। इसके अलावा कुछ उस भोजन में होते हैं जो हम खाते हैंकुछ उस हवा में तैरते रहते हैं जो हमारे आसपास मौजूद होती है। फ्री रेडिकल्स अलग-अलग आकारमाप और रासायनिक संगठन के होते हैं। फ्री रेडिकल्स कोशिकाओं को नष्ट करके हृदय रोगोंकैंसर और दूसरी बीमारियों की आशंका बढ़ा सकते हैं। एंटी ऑक्सीडेंट फ्री रेडिकल्स के प्रभाव से कोशिकाओं को बचाते हैं। भोजन को पचाने में कई क्रियाएं होती हैं। शरीर भोजन से अपने लिए जरूरी तत्वों को ले लेता है लेकिन उन तत्वों को अलग कर देता है जो नुकसानदेह हैं। ये विषैले तत्व कई बार शरीर से आसानी से नहीं निकलते। ऐसे में एंटी ऑक्सीडेंट उन्हें शरीर से बाहर करता है और शरीर की सफाई करता है।
एंटी ऑक्सीडेंट वह अणु होते हैं जो दूसरे अणुओं के ऑक्सीडेशन को रोकते हैं। सैकड़ों नहीं हजारों पदार्थ एंटी ऑक्सीडेंट की तरह कार्य करते हैं। यह विटामिनमिनरल्स और दूसरे कई पोषक तत्व होते हैं। बीटा कैरोटिनल्युटिन लाइकोपीनफ्लैवोनाइडलिगनान जैसे एंटी ऑक्सीडेंट हमारे लिए बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण हैं। इनके अलावा मिनरल सेलेनियम भी एक एंटी ऑक्सीडेंट की तरह कार्य करता है। विटामिन एविटामिन सी और विटामिन ई की एक एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में हमारे शरीर में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

एंटी ऑक्सीडेंट ताजे फल और सब्जियों में सबसे अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इन्हें स्कैवेंजर भी कहते हैंक्योंकि यह फ्री रेडिकल्स को खाकर शरीर की सफाई करते हैं। गाजर शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट बीटा-कैरोटिन से भरपूर होती है। यह शकरकंदशलजम और पीली एवं नारंगी रंग की सब्जियों में होता है। टमाटर में लाइकोपीन होता है। यह फेफड़ेबड़ी आंत और स्तन कैंसर से बचाता है और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखता है। चाय हमें कैंसरहृदय रोगोंस्ट्रोक और दूसरी बीमारियों से बचाती है। हरी और काली दोनों चाय काफी लाभदायक होती हैं। लहसुन एंटी ऑक्सीडेंट से भरपूर होता है जो कैंसर और हृदय रोगों से लड़ने में मददगार होता है और बढ़ती उम्र के प्रभावों को कम करता है।

नक्षत्र क्या होते हैं? क्या हम नक्षत्रों तक जा सकते हैं, जैसे कि चाँद पर?
नक्षत्र यानी स्टार या सितारे जो ऊर्जा पैदा करते हैं। जैसे हमारा सूर्य। संपूर्ण सूर्य के गोले में 13 लाख पृथ्वियां समा सकती है। सूर्य की सतह का तापमान 6000 डिग्री सैल्शियस है और केंद्र में 1.5 डिग्री सैल्शियस है। किसी भी प्राणी या यंत्र का वहाँ तक पहुँचना सम्भव नहीं। उनका अध्ययन दूर से करते हैं।


दुनिया का सबसे ऊँचा पेड़

विश्व का सबसे ऊँचा पेड़ कौन सा है?

दुनिया का सबसे ऊँचा जीवित पेड़ है रेडवुड नेशनल पार्क, कैलिफोर्निया में खड़ा कोस्ट रेडवुड जिसकी ऊँचाई है 115.66 मीटर यानी 379 फुट। कुतुब मीनार से भी ऊँचे इस पेड़ की तुलना कुछ और चीजों से करें तो पाएंगे कि यह अमेरिकी संसद भवन और स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ज्यादा ऊँचा है। और सबसे बड़ा यानी सबसे ज्यादा जगह घेरने वाला सिंगल स्टैम पेड़ है जनरल शर्मन। आसानी से समझने के लिए सबसे ज्यादा लकड़ी देने वाला


पेड़। जनरल शर्मन पेड़ अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के सेक्योवा नेशनल पार्क में मौजूद है। यह इतिहास में ज्ञात जीवित पेड़ों में सबसे ऊँचा नहीं है। दरअसल यह मनुष्यों को ज्ञात सबसे विशाल वृक्ष भी नहीं है। ट्रिनिडाड, कैलिफोर्निया के पास क्रैनेल क्रीक जाइंट पेड़ जनरल शर्मन के मुकाबले 15 से 25 प्रतिशत ज्यादा बड़ा था। पर उस पेड़ को 1940 के दशक में काट डाला गया।





Wednesday, July 2, 2014

दुनिया की सबसे बड़ी इमारत

बुर्ज खलीफा 
विश्व की सबसे बड़ी इमारत कहाँ पर है?
सऊदी अरब के मक्का शहर में अब्राज अल बेयत टावर्स दुनिया की सबसे बड़ी इमारत है जिसमें तकरीबन 15 लाख वर्ग मीटर एरिया है। यह इमारत ऊँचाई के लिहाज से दुनिया की दूसरी सबसे ऊँची इमारत है। इसकी ऊँचाई 601 मीटर या 1972 फुट है। दुनिया की सबसे ऊँची इमारत है दुबई की बुर्ज खलीफा जो 828 मीटर ऊँची है। चीन के सिचुआन प्रांत के चेंगदू शहर में न्यू सेंचुरी ग्लोबल सेंटर बनाया गया है। चीन का दावा है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी इमारत है। इसके अंदर कई शॉपिंग मॉल और होटल हैं। इस बिल्डिंग में सिडनी के 20 ऑपेरा हाउस या तीन पैंटागन आ सकते हैं। यह 400 मीटर चौड़ी और 1500 मीटर लंबी और 100 मीटर ऊंची है। इस साल 28 जून को पब्लिक के लिए खोली गई इस इमारत को बनाने में 3 साल लगे। इमारत में एक आर्टीफिशल सूर्य बनाया गया है जो 24 घंटे रोशनी और गर्मी देगा।







भारत में चंदन के पेड़ कहाँ पाए जाते हैं?
भारतीय चंदन का संसार में सर्वोच्च स्थान है। इसका आर्थिक महत्व भी है। यह पेड़ मुख्यत: कर्नाटक के जंगलों में मिलता है तथा देश के अन्य भागों में भी कहीं-कहीं पाया जाता है। भारत के 600 से लेकर 900 मीटर तक कुछ ऊँचे स्थल और मलयद्वीप इसके मूल स्थान हैं। वृक्ष की आयुवृद्धि के साथ ही साथ उसके तनों और जड़ों की लकड़ी में सुगंधित तेल का अंश भी बढ़ने लगता है। इसकी पूर्ण परिपक्वता में 60 से लेकर 80 वर्ष तक का समय लगता है। इसके लिए ढलवाँ जमीन, जल सोखने वाली उपजाऊ चिकनी मिट्टी तथा 500 से लेकर 625 मिमी. तक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है।
किसी की उंगलियों के निशान से कोई अपराधी कैसे ठहराया जा सकता है?

फोरेंसिक विज्ञान के तहत अंगुलियों के निशानों से कई प्रकार के सबूत तैयार होते हैं। प्रकृति ने सभी जीवधारियों को अलग-अलग सांचों से ढालकर निकाला है। दो व्यक्तियों के हाथों और पैरों की अंगुलियों के निशान या उभार समान नहीं होते। इन्हें एपिडर्मल रिज कहते हैं। हमारी त्वचा जब दूसरी वस्तुओं के साथ सम्पर्क में आती है तब ये उभार उसे महसूस करने में मददगार होते हैं। साथ ही ये ग्रिप को बनाने में मददगार भी होते हैं। किसी भी वस्तु के साथ सम्पर्क होने पर ये निशान उसपर छूट जाते हैं। इसकी वजह वह पसीना है जो हमारी त्वचा को नर्म बनाकर रखता है। अकसर इन निशानों को हम अपनी आँख से देख नहीं पाते। ये निशान किसी खास स्थान पर व्यक्ति की उपस्थिति को साबित करते हैं। इससे अपराधी के विरुद्ध साक्ष्य बनता है। तमाम दस्तावेजों में जहाँ व्यक्ति दस्तखत नहीं कर पाता उसकी उंगलियों के निशान लिए जाते हैं। विज्ञान के विस्तृत होते दायरे में अब दूध का दूध और पानी का पानी अलग करना कहीं ज्यादा आसान हो गया है। इसके लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है उसे क्रिमिनोलॉजी कहते हैं। इसके तहत फोरेंसिक जांच की जाती है जिसके फलस्वरूप इसमें संदेह की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं रहती। फोरेंसिक साइंस विज्ञान की ही एक शाखा है जिसमें जीव विज्ञान के अतिरिक्त भौतिक, रसायन आदि के सिद्धांतों का भी उपयोग चीजों को विश्लेषित करने में किया जाता है। विज्ञान के अनुसार भले ही ये निशान फौरी तौर पर लगभग एक जैसे दिखाई पड़े, पर उनमें समानता नहीं होती बल्कि जमीन आसमान का अंतर होता है। इस अंतर का पता सूक्ष्म विश्लेषण द्वारा ही लगाया जा सकता है।

फरीदकोट हाउस कहाँ पर है?

दिल्ली के कोपरनिकस मार्ग पर फरीदकोट हाउस है। फरीदकोट पंजाब की एक पुरानी देशी रियासत थी। अंग्रेजी राज में दिल्ली में देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के रहने की व्यवस्था थी। दिल्ली में हैदराबाद हाउस, बड़ौदा हाउस, धौलपुर हाउस, बीकानेर हाउस, कपूरथला हाउस जैसे अन्य भवन भी हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब की रिहाइश पर रोशनी डालें।

मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” (27 दिसंबर 1796–15फरवरी 1869) उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। इनको उर्दू का सार्वकालिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का भी श्रेय दिया जाता है। ग़ालिब (और असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। उन्होंने अपना ज्यादातर वक्त आगरा, दिल्ली और कलकत्ता में गुज़ारा। उनका जन्म आगरा मे एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था। अपने पिता और चाचा को उन्होंने बचपन मे ही खो दिया था। उनका जीवनयापन मूलत: अपने चाचा की पेंशन से होता था। उनके चाचा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी मे सैन्य अधिकारी थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा के बारे मे कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन ग़ालिब के अनुसार उन्होंने 11 साल की उम्र से ही उर्दू एवं फ़ारसी मे गद्य तथा पद्य लिखने आरम्भ कर दिया था। 13 साल की आयु मे उनका विवाह नवाब इलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था। विवाह के बाद वह दिल्ली आ गए थे जहाँ उनकी तमाम उम्र बीती। अपनी पेंशन के सिलसिले मे उन्हें कोलकाता की लम्बी यात्रा भी करनी पड़ी थी। इसका ज़िक्र उनकी ग़ज़लों में जगह–जगह पर मिलता है। सन 1850 में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र उन्हें "दबीर-उल-मुल्क" और "नज़्म-उद-दौला" के खिताब से नवाज़ा।

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,

डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता!

हुआ जब गम से यूँ बेहिश तो गम क्या सर के कटने का,

ना होता गर जुदा तन से तो जहानु पर धरा होता!

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,

वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता!

बरमूडा ट्राएंगिल क्या है? लोग कहते हैं कि यहाँ जाकर लोग गुम हो जाते हैं। क्या यह सच है?
बरमूडा त्रिकोण को शैतान के त्रिकोण का नाम भी दिया गया है। यह उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर का एक क्षेत्र है जिसमें कुछ विमान और गायब हो गए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है 5 दिसम्बर 1945 को अमेरिकी नौसेना के पाँच टीबीएम एवेंजर बमवर्षक विमानों की गुमशुदगी। ये विमान फ्लोरिडा के एक नौसैनिक बेस से उड़े थे। इनका पता नहीं लगा। इनपर सवार 14 नौसैनिकों का पता भी नहीं लगा। इन्हें खोजने गया विमान भी दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें 13 नौसैनिक थे। इसके बाद इस इलाके से कई विमान और पोत लापता हो गए। त्रिकोण के बारे में उल्लेख करने वाला पहला व्यक्ति क्रिस्टोफर कोलंबस था, जिसने सन 1492 के अपने दस्तावेजों में लिखा कि उसने और उसके चालक दल ने, " क्षितिज पर नृत्य करती अद्भुत रोशनी देखी।" अपनी लॉग बुक में एक अन्य स्थान पर उसने लिखा, आकाश में आग की लपटें थी। बरमूडा ट्रायंगल के बारे में तमाम अवधारणाएं हैं, पर वैज्ञानिक मानते हैं कि ये सामान्य दुर्घटनाएं भी हो सकतीं हैं। सागर में तूफान वगैरह के कारण या दूसरे कारणों से उनका पता नहीं लग पाया। सन 1854 से इस क्षेत्र में कुछ ऐसी घटनाएं होती रही हैं कि इसे 'मौत के त्रिकोण' के नाम से जाना जाता है।


यह सब किन कारणों से हो रहा है, यह कोई भी निर्णयात्मक रूप से कोई बता नहीं पाया है। चार्ल्‍स बर्लिट्ज ने 1974 में अपनी एक पुस्‍तक के द्वारा इस रहस्‍य की पर्तों को खोजने का दावा किया था। उसने अपनी पुस्‍तक 'दा बरमूडा ट्राइएंगिल मिस्‍ट्री सॉल्‍व्‍ड' में लिखा था कि यह घटना जैसी बताई जाती है, वैसी है नहीं। पायलट अनुभवी नहीं थे। सम्‍भवतः उनके दिशा सूचक यंत्र में खराबी होने के कारण खराब मौसम में एक दूसरे से टकरा कर नष्‍ट हो गए। कुछ रसायन शास्त्रियों का मत है कि इस क्षेत्र में 'मीथेन हाइड्रेट' नामक रसायन इन दुर्घटनाओं का कारण है। समुद्र में बनने वाला यह हाइड्राइट जब अचानक ही फटता है, तो अपने आसपास के सभी जहाजों को चपेट में ले सकता है। हाइड्राइट के विस्‍फोट के कारण डूबा हुआ जहाज जब समुद्र की अतल गहराई में समा जाता है, तो वहॉं पर बनने वाले हाइड्राइट की तलछट के नीचे दबकर गायब हो जाता है। अमेरिकी भौ‍गोलिक सर्वेक्षण के अनुसार बरमूडा की समुद्र तलहटी में मीथेन का अकूत भण्‍डार हुआ है।

हिन्दुस्तान में हीरे की खानें कहाँ है?

भारत में आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा और तमिलनाडु के कोल्लूर तथा मध्य प्रदेश के पन्ना और बुंदर में हीरा खानें हैं। भारत के हीरे क ज़माने में विश्व प्रसिद्ध थे। गोलकुंडा से 185 कैरेट का दरिया-ए नूर हीरा ईरान गया था। भारत के सबसे बड़े हीरे की बात करें तो नाम आता है ग्रेट मुगल का । गोलकुंडा की खान से 1650 में जब यह हीरा निकला तो इसका वजन 787 कैरेट था। यानी कोहिनूर से करीब छह गुना भारी। कहा जाता है कि कोहिनूर भी ग्रेट मुगल का ही एक अंश है। 1665 में फ्रांस के जवाहरात के व्यापारी ने इसे अपने समय का सबसे बड़ा रोजकट हीरा बताया था। यह हीरा आज कहां है किसी को पता नहीं। लंबे समय से गुमनाम भारतीय हीरों की सूची में आगरा डायमंड और अहमदाबाद डायमंड भी शामिल हैं। अहमदाबाद डायमंड को बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई के बाद ग्वालियर के राजा विक्रमजीत को हराकर हासिल किया था। तब 71 कैरेट के इस हीरे को दुनिया के 14 बेशकीमती हीरों में शुमार किया जाता था। हल्की गुलाबी रंग की आभा वाले 32.2 कैरेट के आगरा डायमंड को हीरों की ग्रेडिंग करने वाले दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका ने वीएस-2 ग्रेड दिया है। द रीजेंट की कहानी भी कुछ ऐसी ही हैं। 1702 के आसपास यह हीरा गोलकुंडा की खान से निकला। तब इसका वजन 410 कैरेट था। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर विलियम पिट के हाथों से होता हुआ द रीजेंट फ्रांसीसी क्रांति के बाद नेपोलियन के पास पहुंचा। नेपोलियन को यह हीरा इतना पसंद आया कि उसने इसे अपनी तलवार की मूठ में जड़वा दिया। अब 140 कैरेट का हो चुका यह हीरा पेरिस के लूव्र म्यूजियम में रखा गया है। गुमनाम भारतीय हीरों की लिस्ट में अगला नाम है ब्रोलिटी ऑफ इंडिया का। 90.8 कैरेट के ब्रोलिटी को कोहिनूर से भी पुराना बताया जाता है। 12वीं शताब्दी में फ्रांस की महारानी में इसे खरीदा। कई सालों तक गुमनाम रहने के बाद यह हीरा 1950 में सामने आया। जब न्यूयॉर्क के जूलर हेनरी विन्सटन ने इसे भारत के किसी राजा से खरीदा। आज यह हीरा यूरोप में कहीं है।


शादियों या पार्टियों के कार्ड में नीचे लिखा रहता है RSVP. इसका मतलब क्या है?

रेस्पांदे सी वु प्ले (Respondez Sil Vous Plait)। इस फ्रेंच वाक्यांश में विनम्रता से पूछा गया है कृपया बताएं आ रहे हैं या नहीं।

मिस्र यानी इजिप्ट में अभी जो क्रांति आई थी, उसे सोशल मीडिया की क्रांति कहा गया ऐसा क्यों?

सन 2011 के जनवरी महीने में ट्यूनीशिया से उठी क्रांति की आग की चिनगारियाँ मिस्र पहुँची थीं। बाद में आग की लपटें यमन, जॉर्डन होते हुए दूसरे अरब देशों में पहुँचीं। इसे बढ़ाने में सोशल मीडिया की जबरदस्त भूमिका थी। दशकों से तानाशाही झेल रही अफ्रीकी और मध्य पूर्वी देशों की जनता ने इंटरनेट और मोबाइल फोन को बेड़ियां काटने का औजार बना डाला है। फेसबुक पर कैंपेन छिड़ गया। मिस्र में जब मोबाइल सेवाएं रोकी गईं तो ट्वीट और फेसबुक के जरिए प्रदर्शन की तैयारियां की गईं। सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों ने मिलकर आंदोलन की हर पल की खबर दुनिया तक पहुंचाई। इसके पहले 2005 में लेबनॉन में ब्लॉगिंग की ताकत दिखी थी।

विश्व की सबसे लम्बी कविता कौन सी है?

माना जाता है कि महाभारत दुनिया की सबसे लम्बी कविता है। इसमें एक लाख से ज्यादा श्लोक हैं और लगभग बीस लाख शब्द हैं। प्रसिद्ध ग्रीक महाकाव्य इलियाड और ओडिसी को एक साथ मिला लें तब भी महाभारत उनका दस गुना ग्रंथ साबित होगा।

फैट जीन क्या है?

ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने ‘एफटीओ’ नामक विशेष कोशिका खोज निकाली है, जिसकी वजह से खासकर भारतीय मूल के लोगों में मोटापा, हृदयघात और मधुमेह जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं। इस खास जीन से यह भी जानकारी मिलेगी कि एक प्रकार की जीवनशैली के बावजूद कुछ लोगों का शरीर दुरुस्त रहता है, लेकिन कुछ मोटे हो जाते हैं। “जिनके शरीर में यह खास किस्म का जीन पाया जाता है, उन्हें अगर एक प्रकार का आहार दिया जाए, तो वह उन लोगों के मुकाबले अपना वजन बढ़ा हुआ महसूस करते है, जिनके शरीर में यह जीन नहीं होता है।” मोटापे का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर में चर्बी बढ़ने के लिए जीन जिम्मेदार है। वैज्ञानिकों का यह भी दावा है कि इस जीन को खोज लिया गया है, जो कोशिकाओं में चर्बी जमा होने के लिए जिम्मेदार हैं। खोज से अनेक बीमारियों के उपचार और छुटकारा पाने की संभावना जताई गई है। फिट-1 व फिट-2 (फैट इंड्यूसिंग ट्रांसक्रिप्ट 1-2) नामक जीन की पहचान की है। इन दोनों जीनों में 50 प्रतिशत तक समानता है।

भारत में सबसे पहली ट्रेन यात्रा कहाँ से शुरू हुई थी?

16 अप्रैल 1853 को मुम्बई और ठाणे के बीच जब पहली रेल चली, उस दिन सार्वजनिक अवकाश था। ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के 14 डिब्बों वाली उस गाड़ी के आगे एक छोटा फॉकलैंड नाम का भाप इंजन लगा था। पहली ट्रेन ने 34 किलोमीटर का सफर किया। भारत में रेल की शुरुआत की कहानी अमेरिका के कपास की फसल की विफलता से जुड़ी हुई है, जहां वर्ष 1846 में कपास की फसल को काफी नुकसान पहुंचा था| इसके कारण ब्रिटेन के मैनचेस्टर और ग्लासगो के कपड़ा कारोबारियों को वैकल्पिक स्थान की तलाश करने पर विवश होना पड़ा था| ऐसे में भारत इनके लिए मुफीद स्थान था| अंग्रेज़ों को प्रशासनिक दृष्टि और सेना के परिचालन के लिए भी रेलवे का विकास करना तर्क संगत लग रहा था| ऐसे में 1843 में लॉर्ड डलहौजी ने भारत में रेल चलाने की संभावना तलाश करने का कार्य शुरु किया| डलहौजी ने बम्बई, कोलकाता, मद्रास को रेल सम्पर्क से जोड़ने का प्रस्ताव किया। इस पर अमल नहीं हो सका| इस उद्देश्य के लिए साल 1849 में ग्रेट इंडियन पेंनिनसुलर कंपनी कानून पारित हुआ और भारत में रेलवे की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बारिश सवालों की कार्यक्रम में शामिल

Saturday, October 26, 2013

बुरा ना देखो, ना कहो और ना सुनो वाले तीन बंदरों का प्रचलन कैसे शुरू हुआ? क्या इनके नाम भी हैं?


वर्ष 1617 में जापान के निक्को स्थि‍त तोगोशु की समाधि पर ये तीनों बंदर बने हैं। ऐसा माना जाता है कि यह बंदर जिन सिद्धांतों की ओर इशारा करते हैंवे बुरा न देखोबुरा न सुनोबुरा न बोलो को दर्शाते हैं। मूलतः यह शिक्षा ईसा पूर्व के चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस की थी। वहाँ से यह विचार जापान गया। उस समय जापान में शिंटो संप्रदाय का बोलबाला था। शिंटो संप्रदाय में बंदरों को काफी सम्मान दिया जाता है। शायद इसीलिए इस विचारधारा को बंदरों का प्रतीक दे दिया गया। यह यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल है। ऐसे ही विचार जापान के कोशिन मतावलम्बियों के हैं जो चीनी ताओ विचार से प्रभावित हैं। जापानी में इन बंदरों के नाम हैं मिज़ारूकिकाज़ारू और इवाज़ारू। महात्मा गांधी ने इन तीन बंदरों के मार्फत नैतिकता की शिक्षा दीइसलिए कुछ लोग इन्हें गांधी जी के बंदर भी कहते हैं।


सीनियर सिटिज़न की परिभाषा क्या है
अमेरिका में रिटायरमेंट की उम्र 65 साल है। भारत में सामान्यतः 60 साल के व्यक्ति को सीनियर सिटिज़न मानते हैं। भारतीय बैंक 60 साल से ऊपर के व्यक्ति को ज्यादा ब्याज़ देते हैं। भारतीय रेलवे में महिला वरिष्ठ नागरिकों के लिए रियायत लेने हेतु न्यूनतम आयु 58 वर्ष है और रियायत का तत्व केवल मूल किराए में 50 प्रतिशत है। पुरुष वरिष्ठ नागरिकों के मामले में रियायत लेने हेतु न्यूनतम आयु 60 वर्ष है और रियायत का तत्व केवल मूल किराए में 40 प्रतिशत है।

भारत में कुल कितने गाँव हैं? विश्व में सबसे अधिक गाँव किस देश में हैं?
सन 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 6,38,000 गाँव हैं। चीन में प्रशासनिक दृष्टि से घोषित गाँवों की संख्या 6,80,000 है।

पैराशूट बनाने के पीछे क्या कहानी है?
इंटरनेट पर सर्च इंजन गूगल का इस्तेमाल करने वालों ने परसों यानी 22 अक्तूबर 2013 को पैराशूट जम्प के एनीमेशन का गूगल डूडल देखा होगा। यह डूडल दुनिया के पहले पैराशूट जम्प की 216 वीं जयंती के मौके पर बनाया गया था। 22 अक्तूबर सन 1797 को फ्रांस के आंद्रे याक गार्नेरिन ने दुनिया में पहली बार 3000 फुट की ऊँचाई पर उड़ते बैलून से पैराशूट के सहारे छलांग लगाई थी। आसमान में उड़ान भरने की इच्छा इंसान के मन में हजारों साल से है। यूनानी पौराणिक कथाओं में इकेरस नामक पात्र की कथा है। उसके पिता डेडेलस वास्तुविद तथा एक महान आविष्कारक थे। पिता-पुत्र दोनों को सम्राट मिनॉस कैद कर दिया था। उनके बच निकलने का एक ही रास्ता था और वह था हवाई मार्ग से समुद्र को पार कर जाना। डेडेलस तो थे ही आविष्कारक, उन्होंने पक्षियों के परों को मोम से जोड़कर पंख बनाए। उन्होंने इकेरस से कहा कि न तो नीची उड़ान भरना और न बहुत ऊँची। नीचे उड़े तो समुद्र की नमी से पंख गीले हो जाएंगे और बहुत ऊँचे चले गए तो सूर्य की गर्मी मोम पिघल जाएगा। आसमान में उड़ते-उड़ते इकेरस पिता की चेतावनी को भूल गया ऊँचा चला गया। इकेरस के पंखों का मोम पिघलने लगा और वह समुद्र में जा गिरा। बहरहाल इंसान ने पहले गर्म हवा भर कर बैलून बनाए फिर पैराशूट। दुनिया में पहला व्यावहारिक रूप से सफल पैराशूट बनाने का श्रेय फ्रांसीसी नागरिक लुइ सेबास्तियन लेनोर्मां को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1783 में इसका पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। हालांकि पंद्रहवीं सदी के दौरान लिओनार्दो दा विंची ने सबसे पहले पैराशूट की कल्पना करते हुए इसका रेखाचित्र भी तैयार किया था। दा विंची की इस डिजाइन से प्रेरणा लेकर फॉस्ट ब्रांसिस ने वर्ष 1617 में एक सख्त फ्रेम वाला पैराशूट पहनकर वेनिस टॉवर से छलांग लगाई थी। उन्होंने अपने इस पैराशूट को होमो वोलंस नाम दिया था। हालांकि आपात काल में पैराशूट के इस्तेमाल का पहला प्रयोग 1785 में फ्रांसीसी नागरिक ज्यां पियरे ब्लांचार्ड ने किया था, जिन्होंने ऊंचाई पर तैर रहे एक हॉट एयर बैलून से एक कुत्ते को पैराशूट बंधी टोकरी के जरिए नीचे गिराया था। ब्लांचार्ड ने ही पहली बार सिल्क के कपड़े से तह करने लायक पैराशूट तैयार किया था। इसे इस्तेमाल करना भी आसान था। १७९७ में फ्रांस के आंद्रे गार्नेरिन ने पहली बार इसी तरह के पैराशूट के जरिए सफल जंप को अंजाम दिया था। गार्नेरिन ने कंपन कम करने के इरादे से इसमें कुछ और सुधार किया और इस तरह पहला छिद्रित पैराशूट अस्तित्व में आया।

तूफान कितने प्रकार के होते हैं? क्या दिल्ली में कभी तूफान आया?
हिन्दी में तूफान शब्द चक्रवात और बवंडर यानी साइक्लोन और टॉर्नेडो दोनों के लिए इस्तेमाल होता है। अक्सर आंधी के लिए भी। मौसम विज्ञान में, चक्रवात उसे कहा जाता है जिसमें पानी ऊपर उठ जाता है और एक ही दिशा में चक्कर लगाता रहता है। इसमें आमतौर पर हवा सर्पिल आकार में, पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिणावर्त और दक्षिणी गोलार्द्ध में वामावर्त रूप से घूमती है। तूफान धरती के घूमने और मौसम के बदलाव का परिणाम है। तूफान या बवंडर हवा के भारी दबाव और बादलों के कई सतहों के संपर्क से बनते है। सूरज की गर्मी से जब गर्म हवा ऊपर उठती है और ठंडे बादलों में जाती है तो तेजी से ऊपर उठने के साथ-साथ घूमने लग जाती है। और फिर पानी, धूल और मिट्टी की धार जैसी लकीर आसमान से बनती है। यही नहीं तूफान के दरम्यान बवंडर के अंदर बिजली भी बनती है, जिसकी वजह से ये अपने आसपास इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड बना देती है। जिसकी वजह से धरातल पर मौजूद चीजें मसलन पानी का तालाब, झील या नदी का पानी भी ऊपर खिंचने लगता है और आस पास भयंकर बारिश भी होने लगती है। 
दिल्ली में 17-18 मार्च 1978 को चक्रवात आया था जिसमें 28 लोगों की मृत्यु हुई और 700 के आसपास लोग घायल हुए थे।

क्या कोई ग्रह ऐसा भी है जिस पर जीवन की सम्भावना है?
नासा की नए उपग्रहों की खोज करने वाले टेलिस्कोप केप्लर ने पृथ्वी के समान सात नए उपग्रहों को खोज निकाला है. सातों उपग्रह एक ही तारे का चक्कर लगाने वाले उपग्रह हैं. इनमें से दो उपग्रहों की कक्षा अत्यधिक गर्म और अत्यधिक शीत क्षेत्र के मध्य में है. विशेषज्ञों का कहना है कि इन दो उपग्रहों पर जीवन की सम्भावना हो सकती है। नासा के कैलिफोर्निया स्थित एमेस अनुसंधान केंद्र के केप्लर अभियान के मुख्य खोजकर्ता विलियम बोरुकी ने कहा कि हमने किसी अन्य सौरमंडल के जीवन की सम्भावना वाले क्षेत्र में दो उपग्रहों को खोज की है. अब तक खोजे गए उपग्रहों में इन दोनों उपग्रहों पर जीवन की सर्वाधिक सम्भावना है. दोनों उपग्रहों को केप्लर-62ई और केप्लर-62 एफ नाम दिया गया है, जबकि इसके तारे का नाम केप्लर-62 रखा गया है. उन्होंने कहा कि दोनों ग्रहों का आकार लगभग पृथ्वी के बराबर है.

विश्व की सबसे बड़ी दूरबीन कौन सी है? इससे क्या देखा जाता है?
फिलहाल स्पेन के कैनरी द्वीप में स्थापित ग्रैन टेलेस्कोपियो कैनेरियास को दुनिया का सबसे बड़ा टेलिस्कोप इस आधार पर कह सकते हैं कि उसके एपर्चर यानी लेंस का व्यास 10.4 मीटर यानी 410 इंच है।  पर दुनिया की सबसे बड़ी दूरबीन अमेरिका के हवाई द्वीप में तैयार की जा रही है। इसे कहते हैं प्रोजेक्ट  थर्टी मीटर टेलीस्कोप (टीएमटी)। इस परियोजना के तहत पाँच देश कनाडा, चीन, भारत, जापान और अमेरिका इसे बनाएंगे। इस परियोजना की लागत करीब 1.4 अरब डॉलर है और इसमें भारत लगभग 14 करोड़ डॉलर यानी 10 प्रतिशत योगदान करेगा। इस दूरबीन के काम शुरू करने के बाद वैज्ञानिक ब्रह्मांड की उत्पत्ति सहित अन्य रहस्यों से पर्दा हटा सकेगा। इसके इस्तेमाल से वैज्ञानिक कॉस्मिक डार्क एज के अंत से लेकर पहले तारे की उत्पत्ति, पुन:-आयनीकरण और आकाशगंगा की उत्पत्ति के युग के बारे में जानकारी हासिल कर सकेंगे। जैसा कि इस दूरबीन के नाम से ही पता चलता है, इसमें 30 मीटर व्यास के लेंस का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसकी क्षमता इस समय मौजूद सबसे बड़ी दूरबीन के मुकाबले नौ गुना होगी। इस दूरबीन का निर्माण अगले साल शुरू होगा और उम्मीद है कि 2022 तक यह काम करने लगेगी।

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार दशानन नाम से कौन जाना जाता है?
लंकाधिपति रावण को दशानन कहते हैं। वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण महाकाव्य में रावण का सबसे 'प्रामाणिक' इतिहास मिलता है। रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्म ज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी के पास नहीं था। इस सभी के कारण सभी उससे भयभीत रहते थे। कुछ विद्वान मानते हैं कि रावण के दस सिर नहीं थे किंतु वह दस सिर होने का भ्रम पैदा कर देता था इसी कारण लोग उसे दशानन कहते थे। कुछ विद्वानों अनुसार रावण छह दर्शन और चारों वेद का ज्ञाता था इसीलिए उसे दसकंठी भी कहा जाता था। दसकंठी कहे जाने के कारण प्रचलन में उसके दस सिर मान लिए गए। जैन शास्त्रों में उल्लेख है कि रावण के गले में बड़ी-बड़ी गोलाकार नौ मणियां होती थीं। उक्त नौ मणियों में उसका सिर दिखाई देता था जिसके कारण उसके दस सिर होने का भ्रम होता था।

सबसे ज्यादा गाने किस हिन्दी फिल्म में थे?
सन 1932 में बनी फिल्म मदन थिएटर द्वारा निर्मित फिल्म इंदरसभा में 71 गाने थे। यह फिल्म आगा हसन अमानत के उर्दू नाटक इंदर सभा पर आधारित थी। इस नाटक को पहली बार सन 1853 में खेला गया था। यह पूरा नाटक काव्य में है।

फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन सिनेमा कौन थीं?
देविका रानी चौधरी को फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन सिनेमा कहा जाता है। वे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रिश्ते में पौत्री थीं। इनके पिता सेना के सर्जन जनरल कर्नल एमएन चौधरी थे। फिल्म अभिनेता और निर्माता हिमांशु राय उनपर इतने मुग्घ हुए कि अपनी जर्मन पत्नी को छोड़कर इनसे विवाह किया। हिमांशु राय ने इन्हें फिल्मों में लाने के लिए 1933 में फिल्म कर्मा बनाई। बाद में इन दोनों ने मिलकर बॉम्बे टॉकीज़ नाम से मशहूर फिल्म कम्पनी बनाई। देविका रानी को सन 1958 में पद्मश्री प्रदान किया गया और सन 1970 में पहला दादा साहब फाल्के पुरस्कार उन्हें दिया गया।

कुइज़ीन Cuisine का क्या मतलब होता है?
कुइज़ीन फ्रांसीसी शब्द है, जिसका अर्थ है खाना बनाने की कला। इसके लिए लैटिन शब्द है कोकरे। पर कुइज़ीन शब्द का इस्तेमाल किसी स्थान विशेष या किसी और तरह से विशेष भोजन के लिए किया जाता है। जैसे जापानी व्यंजन, बंगाली, दक्षिण भारतीय, गुजराती वगैरह। स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल भी इसमें महत्वपूर्ण है।

दुनिया की सबसे महंगी करेंसी कौन सी है? रुपए का कौन सा स्थान है?
सबसे महंगी करेंसी कुवैत की दीनार है जिसका वर्तमान रेट 3.5 डॉलर के आसपास है। सबसे कम मूल्य की करेंसी ईरान की रियाल है। वर्तमान रेट के अनुसार 24, 815 रियाल का एक डॉलर है। भारत का रुपया बीच में कहीं आता है।



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