Thursday, December 27, 2018

कैटोविस सम्मेलन क्या है?



पोलैंड के कैटोविस में 2 से 15 दिसम्बर, 2018 तक वैश्विक जलवायु सम्मेलन हुआ, जिसमें सन 2015 में हुई पेरिस संधि को 2020 तक लागू करने के तौर-तरीकों पर विचार हुआ. यह संधि सन 2020 में क्योटो संधि का स्थान लेगी. इस सम्मेलन को कॉप-24 यानी 24वीं कांफ्रेंस ऑफ द पार्टीज टु द यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के नाम से भी पहचाना जाता है. इस सम्मेलन में पेरिस समझौते को लागू करने के लिए 196 देशों ने मिलकर नियम-पुस्तिका तय की है. पेरिस समझौते के बाद अमेरिका ने इस संधि से हाथ खींच लिया था. जब संधि हो रही थी, जब अमेरिका में बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, पर डोनाल्ड ट्रम्प के आने के बाद स्थितियाँ बदल गईं. पेरिस संधि के समय वैश्विक बिरादरी काफी उत्साहित थी. पर पिछले तीन वर्षों में अमीर देश अपनी प्रतिबद्धता से हटते हुए नजर आए.



असहमति किन बातों पर है?

ग़रीब देशों और अमीर देशों के कार्बन उत्सर्जन की सीमा को लेकर शुरू से ही विवाद था. एक सबसे बड़ी असहमति इंटर-गवर्नमेंटल पैनल की जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक रिपोर्ट को लेकर है. कुछ देशों के समूह, जिनमें सऊदी अरब, अमरीका, कुवैत और रूस ने आईपीसीसी की रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया है. नवम्बर के महीने में जारी विश्व मौसम विज्ञान संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 में वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर 405 पीपीएम( पार्ट्स पर मिलियन) हो गया. पृथ्वी में ऐसी स्थिति पिछले तीस से पचास लाख साल में पहली बार आई है. अक्तूबर 2018 में इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने अपनी विशेष रिपोर्ट में कहा है कि धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. आईपीसीसी ने कार्बन उत्सर्जन को लेकर जो सीमा तय की है उस पर कई देशों के बीच मतभेद हैं. भारत ने 2030 तक 30-35 फ़ीसदी कम कार्बन उत्सर्जन करने की बात कही है.



क्या तय हुआ?

सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने 156 पेज का जो दस्तावेज तैयार किया है, उसमें यह बताया गया है कि देश किस प्रकार उत्सर्जन रोकने के प्रयासों को कैसे  मापेंगे, रिपोर्ट करेंगे और पुष्टि करेंगे. पेरिस संधि में देशों के लिए स्वैच्छिक अंशदान तय किया गया था, जिसे नेशनली डिटर्मिंड कंट्रीब्यूशन (एनडीसी) कहा गया. भारत के मामले में एनडीसी संशोधन 2030 में होना है. चूंकि सभी देशों के ग्रीनहाउस गैसों (जीएचसी) के बारे में अपने-अपने मानक और परिभाषाएं थीं, इसलिए परिणाम एक जैसे नहीं हो सकते थे. अब नियम-पुस्तिका के अनुसार हस्ताक्षर करने वाले देश मानकों पर दृढ़ रहेंगे. वित्तीय-व्यवस्था की कुछ विसंगतियों को दूर किया गया है. बावजूद इसके छोटे द्वीपों पर बसे देश परेशान हैं, क्योंकि अमीर देश ग्रीन क्लाइमेट फंड के लिए हर साल 100 अरब डॉलर की धनराशि केवल 2025 तक ही देने को तैयार हैं. पेरिस समझौते में जिस कार्बन मार्केट को बनाने की बात कही गई थी, उसके बारे में कोई रूपरेखा नहीं बनी है. इसपर फैसला कॉप-25 में होगा.  















Saturday, December 22, 2018

कश्मीर में शासन


हालांकि जम्मू-कश्मीर देश के दूसरे राज्यों की तरह एक राज्य है, पर हमारे संविधान ने इसे विशेष राज्य का दर्जा दिया है. इस वजह से यहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था शेष राज्यों से अलग है. देश का यह अकेला राज्य है, जिसका अपना अलग संविधान भी है. संविधान के अनुच्छेद 370 के अनुसार देश की संसद और संघ शासन का जम्मू-कश्मीर पर सीमित क्षेत्राधिकार है. जो मामले संघ सरकार के क्षेत्राधिकार में नहीं हैं, वे राज्य की विधायिका के अधीन हैं. देश के शेष राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर में एक बड़ा अंतर 30 मार्च, 1965 तक और था. जहाँ अन्य राज्यों में राज्यपाल का पद होता था, वहाँ जम्मू-कश्मीर में सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री के स्थान पर वजीर-ए-आज़म (प्रधानमंत्री) का पद होता था. जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 27 के अनुसार सदर-ए-रियासत का चुनाव राज्य की विधायिका के मार्फत जनता करती थी. सन 1965 में जम्मू-कश्मीर के संविधान में हुए छठे संशोधन के बाद सदर-ए-रियासत के पद को राज्यपाल का नाम दे दिया गया और उसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते हैं.



राज्यपाल या राष्ट्रपति शासन?

इस साल जून में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के इस्तीफे के बाद जम्मू-कश्मीर में जब राज्यपाल शासन लागू किया गया, तब यह सवाल उठा था कि क्या यह अन्य राज्यों में लागू होने वाले राष्ट्रपति शासन से अलग है? वास्तव में यह अलग है. जहाँ अन्य राज्यों में राष्ट्रपति शासन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत लागू किया जाता है, वहीं जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत राज्यपाल शासन लागू किया जाता है. यह राज्यपाल शासन छह महीने के लिए लागू होता है. इन छह महीनों के दौरान विधान सभा स्थगित रहती है या राज्यपाल चाहें तो भंग भी की जा सकती है. छह महीने के राज्यपाल शासन के बाद या तो नई विधानसभा चुनकर आ सकती है, अन्यथा वहाँ अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है.



दोनों में अंतर?

बुनियादी तौर पर कोई अंतर नहीं है. दोनों परिस्थितियों में राज्यपाल केन्द्र सरकार के निर्देश पर प्रशासन चलाते हैं. पर जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन फौरन नहीं लगता. पहले राज्यपाल शासन लगता है. यदि राज्यपाल इस दौरान विधानसभा भंग करते हैं, तो उसके छह महीने के भीतर चुनाव होने चाहिए. छह महीने के भीतर चुनाव नहीं होते हैं, तो कारण स्पष्ट करने होते हैं. राज्य में राज्यपाल शासन के छह महीने की अवधि 20 दिसम्बर को पूरी होने वाली है. तबतक वहाँ विधानसभा चुनाव नहीं हो पाएंगे, इसलिए राज्यपाल वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करेंगे. इस सिफारिश पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल विचार करेगा और इसके लिए संसद के दोनों सदनों की मंजूरी लेनी होगी. यह मंजूरी राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद दो महीने के भीतर मिल जानी चाहिए. संसद से मंजूरी के बाद राष्ट्रपति शासन छह महीने तक लागू रह सकता है. इसकी अवधि फिर बढ़ाई जा सकती है. सन 1990 में लागू हुआ राष्ट्रपति शासन छह साल तक चला था. इस दौरान राज्य सूची के 61 विषयों पर कानून देश की संसद बना सकेगी. 




Wednesday, December 19, 2018

‘यलो जैकेट’ आंदोलन क्या है?


फ्रांस में इन दिनों पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन चल रहा है, जो यलो जैकेट (ज़िले ज़ोन) या पीली कमीज आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ है. इसकी शुरूआत 17 नवम्बर को हुई थी, जिसमें तीन लाख से ज्यादा लोगों ने देश के अलग-अलग शहरों में जाम लगाए और रैलियाँ कीं. देखते ही देखते इस आंदोलन ने बगावत की शक्ल ले ली. आंदोलनकारियों ने यातायात रोका, पेट्रोल डिपो घेरे और पुलिस पर हमले किए. कुछ आंदोलनकारियों की मौत भी हुई. आंदोलन उग्र होता गया और 21 नवम्बर तक इस आंदोलन के कारण 585 नागरिकों के और 113 पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबरें आईं. आंदोलन फ्रांस तक ही सीमित नहीं था, बल्कि हिंद महासागर में फ्रांस प्रशासित द्वीप रियूनियन में दंगे हुए. वहाँ तीन दिन के लिए स्कूल बंद कर दिए गए. सेना तैनात करनी पड़ी. आंदोलन के कारण सरकार ने दबाव में आकर टैक्स में वृद्धि वापस ले ली है. मध्य वर्ग का यह गुस्सा फ्रांस में ही नहीं है, यूरोप के दूसरे देशों में भी है. ऐसे ही आंदोलन इटली, बेल्जियम और हॉलैंड में भी शुरु हुए हैं.



यलो जैकेट नाम क्यों?

अंग्रेजी में बर्र या ततैया के लिए यलो जैकेट शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. इस आंदोलन से जुड़े लोगों का व्यवहार बर्र जैसा है. पर केवल इसी वजह से इस आंदोलन को यलो जैकेट नाम नहीं मिला. वस्तुतः सन 2008 से देश में मोटर-चालकों के लिए अपनी गाड़ी में पीले रंग के चमकदार जैकेट रखना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि आपदा की स्थिति में दूर से पहचाना जा सके. आंदोलन में शामिल लोग पीली जैकेट पहनते हैं. अब यह जैकेट आंदोलन प्रतीक बन गया है. पचास के दशक से फ्रांस में मोटर वाहनों की खरीद को बढ़ावा दिया गया. डीजल इंजनों के निर्माण पर सब्सिडी दी गई. कम्पनियों को मोटर-वाहन खरीदने पर टैक्स में छूट दी गई. इस वजह से गाड़ियों की भरमार हो गई. इससे देश में मोटर-वाहन उद्योग को बढ़ावा मिला. समृद्धि भी बढ़ी.



आंदोलन क्यों?

आंदोलन के पीछे बुनियादी तौर पर अपनी व्यवस्था के प्रति रोष है. इनमें सबसे ज्यादा मध्यवर्ग के गोरे लोग हैं, जो मानते हैं कि व्यवस्था ने उन्हें भुला दिया है. उनका कहना है कि हम सबसे ज्यादा टैक्स भरते हैं, फिर भी हमसे ही सारी वसूली की जाती है. उन्हें पूँजीवादी व्यवस्था से भी शिकायत है. संयोग से पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोलियम की कीमतें बढ़ीं और फ्रांस सरकार ने अपने खर्चे पूरे करने के लिए टैक्स बढ़ाए. जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर सन 2014 से सरकार ने जीवाश्म-आधारित तेल की खपत कम करने के लिए भी पेट्रोलियम के उपभोग पर कार्बन टैक्स बढ़ा दिया. इतना ही नहीं सन 2019 में और नए टैक्स लगाने की योजना है. इन सब बातों का मिला-जुला प्रभाव यह हुआ कि नागरिकों के मन में नाराजगी बढ़ने लगी. यह महंगाई पिछले राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के समय में शुरू हो गई थी, पर नाराजगी पिछले महीने भड़की.





Thursday, December 6, 2018

ब्रेक्ज़िट क्या है?

ब्रेक्ज़िट शब्द अंग्रेजी वाक्यांश ब्रिटिश एक्ज़िट (यानी ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना) का संक्षिप्त रूप है. यूरोपीय संघ (ईयू) यूरोप के 28 देशों का राजनीतिक और आर्थिक संघ है. यूरोपीय संघ के विकास की पृष्ठभूमि को अलग से समझना होगा. मोटे तौर पर इतना समझ लें कि सन 1993 की मास्ट्रिख्ट संधि के बाद इस संघ ने व्यावहारिक शक्ल ली. उसके पहले यूरोपीय समुदाय के रूप में एक व्यवस्था थी, जिसमें यूके 1973 में शामिल हुआ था. सत्तर के दशक में देश के वामपंथी दल यूरोपीय समुदाय से अलग होने की माँग भी करते रहे थे. इसके बाद नब्बे के दशक में कुछ दक्षिणपंथी दलों ने भी ऐसी माँग शुरू कर दी. हाल के वर्षों में युनाइटेड किंगडम में माँग की जा रही थी कि इस संघ से हमें अलग हो जाना चाहिए. यह माँग उठती रही और सन 2015 के चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी ने वादा किया कि इस सवाल पर जनमत संग्रह कराएंगे. इसके बाद प्रधानमंत्री डेविड केमरन ने इस माँग पर फैसला करने के लिए देश में 23 जून 2016 को जनमत संग्रह कराया, जिसमें 52 फीसदी लोगों ने अलग होने की माँग का समर्थन किया.
कैसे होगा यह अलगाव?
केमरन व्यक्तिगत रूप से संघ में बने रहने के पक्षधर थे. जनमत संग्रह का परिणाम आने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उनकी जगह टेरेसा में ने ली, जिन्होंने कुछ समय बाद मध्यावधि चुनाव करा लिए. चुनाव में उनकी पार्टी अल्पसंख्या में आ गई. अब उनकी सरकार डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी के समर्थन से चल रही है. जनमत संग्रह के बाद 29 मार्च, 2017 से यूके सरकार ने ईयू संधि के अनुच्छेद 50 के तहत संघ से अलग होने की प्रक्रिया शुरू कर दी. इसके अंतर्गत युनाइटेड किंगडम 29 मार्च, 2019 को यूके के समय के अनुसार रात्रि में 11 बजे ईयू से अलग हो जाएगा. यदि दोनों पक्ष समय को और आगे बढ़ाने पर सहमत नहीं होते हैं, तो यह संघ से अलग होने के संदर्भ में विमर्श की अंतिम सीमा है.
अब विवाद क्या है?
सवाल है कि यह अलगाव बगैर किसी समझौते के होना चाहिए या अलगाव के संधिकाल के लिए कोई समझौता होना चाहिए. प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने जिस समझौते की रूपरेखा बनाई है, उसे लेकर उनके सहयोगियों के बीच भारी मतभेद हैं. यूरोपीय संघ के सदस्यों ने रविवार 25 नवम्बर को ब्रेक्जिट समझौते को मंजूरी दे दी. समझौते को ईयू के 27 नेताओं ने इस संक्षिप्त बैठक में स्वीकार कर लिया. युनाइटेड किंगडम की संसद में इस प्रस्ताव पर 4 दिसंबर से विचार-विमर्श शुरू होगा और 11 दिसंबर को मतदान होगा. लेबर, लिबरल-डेमोक्रेटिक, स्कॉटिश नेशनल पार्टी (एसएनपी), डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी (डीयूपी) और टेरेसा में की अपनी कंजर्वेटिव पार्टी के काफी सांसदों ने पहले से घोषणा कर दी है कि हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे. 


Friday, November 23, 2018

चाबहार बंदरगाह कहाँ है?

चाबहार बंदरगाह ओमान की खाड़ी में ईरान के दक्षिण पूर्व में स्थित है. यह ईरान का गहरे सागर का एकमात्र बंदरगाह है. इसमें दो बंदरगाह हैं. एक है शहीद कलंतारी और दूसरा शहीद बेहश्ती. दोनों में पाँच-पाँच बर्थ हैं. यह बंदरगाह भारत-ईरान और अफ़ग़ानिस्तान तीन देशों के समझौते के अधीन विकसित किया जा रहा है. यह एक दीर्घकालीन परियोजना है, जो बाद में इस इलाके को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर के मार्फत मध्य एशिया के रास्ते यूरोप तक से जोड़ने का कार्य कर सकती है. इस बंदरगाह के विकास की परिकल्पना सन 1973 में ईरान के अंतिम शाह ने की थी. सन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद इसका काम धीमा पड़ गया था. इसका पहला चरण सन 1983 में पूरा हुआ. इस बंदरगाह में ईरान की दिलचस्पी की एक वजह यह थी कि इराक़ के साथ युद्ध के कारण ईरान ने अपने समुद्री व्यापार को पूर्व की तरफ बढ़ाना शुरू कर दिया था. शहीद बेहश्ती बंदरगाह को विकसित करने के लिए भारत और ईरान के बीच समझौता 2003 में हुआ था.

अमेरिकी पाबंदियाँ

सन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते बिगड़ते गए जिनके कारण अमेरिका ने ईरान पर कई बार पाबंदियाँ लगाईं. हाल में अमेरिका ने 5 नवंबर से ईरान पर फिर से बड़ी पाबंदियाँ लगाने का फैसला किया है. पर उसने चाबहार बंदरगाह का विकास करने के भारतीय कार्यक्रम को उन पाबंदियों से छूट दी है. मई 2016 में भारत और ईरान के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत भारत शहीद बेहश्ती बंदरगाह की एक बर्थ के पुनरुद्धार और 600 मीटर लंबे एक कंटेनर क्षेत्र का पुनर्निर्माण करेगा. भारत इस बंदरगाह के कंटेनर रेलवे ट्रेक का निर्माण भी कर रहा है और चाबहार-ज़ाहेदान रेलवे लाइन भी तैयार कर रहा है. इसके बाद ज़ाहेदान से अफ़ग़ानिस्तान के ज़रंज तक रेलवे लाइन का विस्तार होगा. ईरान में भारत अंतरराष्ट्रीय उत्तरी-दक्षिणी कॉरिडोर को बनाने की योजना पर भी काम कर रहा है. यह परिवहन कॉरिडोर 7,200 किलोमीटर लंबा नेटवर्क होगा, जिसमें पोत, रेल और सड़क मार्ग से माल का परिवहन होगा. इस परियोजना पर 16 मई 2002 को भारत, रूस और ईरान के बीच समझौता हुआ था. यह नेटवर्क भारत, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया के रास्ते यूरोप को जोड़ेगा.

अफ़ग़ानिस्तान की भूमिका

अमेरिका मानता है कि युद्ध-प्रभावित अफ़ग़ानिस्तान के हितों की रक्षा के लिए चाबहार बंदरगाह का विकास करना जरूरी है. चूंकि अफ़ग़ानिस्तान के पास समुद्र तट नहीं है, इसलिए यह उसके व्यापार के लिए महत्वपूर्ण बंदरगाह साबित होगा. भारत के सीमा सड़क संगठन ने अफ़ग़ानिस्तान में जंरंज से डेलाराम तक 215 किलोमीटर लम्बे मार्ग का निर्माण पूरा कर लिया है, जो निमरोज़ प्रांत की पहली पक्की सड़क है. पिछले साल अक्तूबर में भारत ने चाबहार के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान को गेहूँ की पहली खेप भेजकर इस व्यापार मार्ग की शुरुआत कर भी दी है.


Friday, November 2, 2018

मानव विकास सूचकांक

मानव विकास सूचकांक या ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स मानव विकास के तीन बुनियादी आयामों (दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन, ज्ञान तक पहुँच तथा जीवन के एक सभ्य स्तर) द्वारा प्रगति का आकलन करने का एक वैश्विक मानक है, जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) हर साल जारी करता है। इसमें कई तरह की सूचनाओं के आधार पर हरेक देश को अंक दिए जाते हैं। मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य, स्त्रियों की स्थिति, आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर, संचार के साधन वगैरह। इसके आधार पर अलग-अलग देशों का तुलनात्मक अध्ययन सम्भव होता है। यह सूचकांक अलग-अलग शहरों या अलग-अलग प्रदेशों के तुलनात्मक अध्ययन के लिए भी तैयार किया जा सकता है। इस साल यह रिपोर्ट 14 सितम्बर, 2018 को जारी हुई। सन 1990 से यह रपट जारी हो रही है। इसे बनाने की पहल पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूबुल हक ने की थी। इसमें भारत के अमर्त्य सेन के अलावा पॉल स्ट्रीटेन, फ्रांसिस स्टीवर्ट, गुस्ताव रेनिस और कीथ ग्रिफिथ जैसे अर्थशास्त्री भी जुड़े रहे हैं।

‘घुटने टेको’ आंदोलन
अमेरिका में जातीय अन्याय के खिलाफ संघर्ष इन दिनों ‘टेक द नी’ या घुटने टेको आंदोलन की शक्ल में सामने आ रहा है। बराक ओबामा जब अमेरिका के राष्ट्रपति बने तब कहा जा रहा था कि अमेरिका में नए युग की शुरुआत हो गई है। ओबामा के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौर में अश्वेतों की शिकायतें बढ़ी हैं। उनके चुनाव में अश्वेतों ने उनके खिलाफ वोट दिया था। धीरे-धीरे यह चर्चा ठंडे बस्ते में दब भी गई थी लेकिन हाल में अमेरिकी फुटबॉलर कॉलिन कैपरनिक को प्रतीक बनाकर यह चर्चा फिर से शुरू हुई है। सोशल मीडिया के कारण यह आंदोलन बड़ी तेजी से फैल रहा है। अभी तक हाथ में मोमबत्तियाँ लेकर विरोध विरोध जताया जाता था। अब राष्ट्रीय गीत के दौरान एक घुटना जमीन पर टिकाकर विरोध जताने का नया तरीका सामने आया है। माना जाता है कि देश से बढ़कर कुछ नहीं, पर राष्ट्रगीत के दौरान ऐसा करने का मतलब है व्यक्ति हर उस चीज का विरोध कर रहा है जिसके कारण उसे अपने ही देश से नाराजगी है।

नाइके की पहल
हाल में खेल से जुड़ी चीजें, खासतौर से स्पोर्ट्स शूज़ बनाने वाली अमेरिकी कम्पनी नाइके ने कॉलिन कैपरनिक को एक लम्बे विज्ञापन अभियान के लिए अनुबंधित किया है। कॉलिन 2011 से इस कम्पनी के साथ जुड़े हैं, पर इस नए अनुबंध के राजनीतिक निहितार्थ हैं। कम्पनी के इस अभियान को समर्थन मिला है, इसे देश-विरोधी गतिविधि माना जा रहा है। नाइके के उत्पादों को जलाया जा रहा है। कॉलिन ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ (बीएलएम) नामक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के समर्थक भी हैं, जो अमेरिकी-अफ्रीकी समुदाय के सवालों को उठाता है। सन 2013 से सोशल मीडिया पर ‘हैशटैग ब्लैक लाइव्स मैटर’ नाम से अभियान भी चल रहा है। 
http://epaper.patrika.com/1862427/Me-Next/Me-Next#dual/2/1

ग्रीन पटाखों का मतलब?

अदालत ने जिन ग्रीन और सेफ पटाखों की बात कही है उसका मतलब है कि उन्हें बनाने में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा, जो कम खतरनाक होती है. ऐसे पटाखों की घोषणा इस साल जनवरी में विज्ञान और तकनीकी मंत्री हर्ष वर्धन ने की थी. ग्रीन पटाखों की इस अवधारणा को देश की वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं ने आगे बढ़ाया. इनमें कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर), सेंट्रल इलेक्ट्रो केमिकल इंस्टीट्यूट, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी, नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट और नेशनल केमिकल लैबोरेटरी शामिल हैं. सीएसआईआर के नेशनल एनवायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर डॉ राकेश कुमार इस परियोजना के कोऑर्डिनेटर हैं. उन्होंने बताया कि हमने तीन-चार रासायनिक सूत्र तैयार किए हैं, जिनमें 30 से 40 फीसदी ऐसी नुकसानदेह सामग्री कम की जा सकती है. इनसे पर्यावरण-मित्र अनार और बिजली क्रैकर बनाए जा सकते हैं.

ई-पटाखे कैसे काम करते हैं?

वैज्ञानिकों ने ऐसे बम बनाए हैं, जो आवाज करते हैं, पर माहौल में सल्फर डाईऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं करते. ये धुएं की जगह भाप या हवा छोड़ते हैं. पेट्रोलियम और विस्फोटकों की सुरक्षा से जुड़ा संगठन इनपर परीक्षण कर रहा है. एक अवधारणा ई-क्रैकर या इलेक्ट्रॉनिक पटाखों की भी है. इनमें हाई वोल्टेज माइक्रो जेनरेटर काम करते हैं, जो रह-रहकर तेज आवाज करते हैं. इनमें तार से जुड़े पटाखों की लड़ी होती है, जिसके साथ एलईडी लाइट भी होती है. धमाके के साथ चमक भी होती है. यह तकनीक महंगी है. भारतीय बाजारों में विदेशी ई-क्रैकर उपलब्ध हैं, पर उनकी कीमत काफी ज्यादा है. चीनी ई-पटाखे भी तीन हजार रुपये या उससे भी ज्यादा दाम के हैं. भारतीय प्रयोगशालाओं ने भी तकनीक विकसित की है, जिनका सीएसआईआर की पिलानी प्रयोगशाला में परीक्षण चल रहा है. वैज्ञानिकों को लगता है कि इन्हें लोग पसंद नहीं करेंगे, क्योंकि ये धमाकों की रिकॉर्डिंग जैसे लगेंगे.

क्या देश में पटाखों पर पूरी रोक है?

व्यावहारिक रूप से पूरी रोक है. पिछली 23 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की बिक्री और पटाखे चलाने से सम्बद्ध कुछ दिशा निर्देश जारी किए हैं. अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को जो निर्देश दिए हैं उनके अनुसार कम उत्सर्जन वाले पटाखों को दागा जा सकेगा. केवल ग्रीन और सेफ पटाखे ही बेचे जाएंगे. इसके साथ ही ऑनलाइन पटाखों की बिक्री पर भी रोक लगा दी गई है. पटाखों की बिक्री से जुड़े ये निर्देश सभी त्योहारों तथा शादियों पर भी लागू होंगे. दीवाली के अवसर पर पटाखे रात को 8 बजे से 10 बजे के बीच ही चलाए जा सकेंगे. नए साल पर रात में 11.55 से 12.30 तक ही पटाखे जलाए जा सकेंगे। यह समय सीमा पूरे देश पर लागू होगी. जिस याचिका पर अदालत ने यह फैसला सुनाया है, उसपर 28 अगस्त को जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण ने दलील पूरी होने के बाद फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.





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