Monday, July 21, 2014

खर्राटे क्यों आते हैं?

खर्राटे क्यों आते हैंक्या यह कोई बीमारी है या उसका कोई लक्षण है?
सोते समय गले का पिछला हिस्सा थोड़ा सँकरा हो जाता है। साँस जब सँकरी जगह से जाती है तो आसपास के टिशुओं में स्पंदन होता है, जिससे आवाज आती है। यही हैं खर्राटे। यह सँकरापन नाक एवं मुँह में सूजन के कारण भी हो सकता है। यह सूजन एलर्जी, संक्रमण, धूम्रपान, शराब पीने या किसी दूसरे कारण से हो सकती है। इससे फेफड़ों को कम आक्सीजन मिलती हैजिससे मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर ज्यादा ऑक्सीजन माँगने लगते हैं। ऐसे में नाक एवं मुँह ज्यादा सक्रिय हो जाते हैंजिससे खर्राटे की आवाज आने लगती है। बच्चों में एडीनॉयड ग्रंथि में सूजन एवं टांसिल से भी खर्राटे आते हैं। मोटापे के कारण भी गले की नली में सूजन से रास्ता संकरा हो जाता हैऔर सांस लेने में आवाज आने लगती है। जीभ का बढ़ा आकार भी खर्राटे का बड़ा कारण है। ब्राज़ील में हुए एक शोध के अनुसार भोजन में नमक की अध‌िकता शरीर में ऐसे फ्लूइड का निर्माण करती है जिससे नाक के छिद्र में व्यवधान होता है।

बहरहाल खर्राटे या तो खुद बीमारी हैं या बीमारी का लक्षण हैं। खर्राटे से अचानक हृदय गति रुकने का खतरा रहता है। मधुमेह एवं मोटापे की बीमारी के कारण खर्राटे के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। खर्राटे के दौरान शरीर में रक्त संचार अनियमित हो जाता हैजो दिल के दौरे का बड़ा कारण है। दिमाग में रक्त की कम आपूर्ति से पक्षाघात तक हो सकता है। इससे फेफड़ों पर भी दबाव पड़ता है। खर्राटे के रोगियों को पॉलीसोमनोग्राफी टेस्ट करवाना चाहिए। यह टेस्ट व्यक्ति के सोते समय की शारीरिक स्थितियों की जानकारी देता है।
भारत का नाम भारत कैसे पड़ा?
भारतवर्ष का नामकरण कैसे हुआ इस संबंध में मतभेद हैं। भारतवर्ष में तीन भरत हुए एक भगवान ऋषभदेव के पुत्र, दूसरे राजा दशरथ के और तीसरे दुश्यंत- शकुंतला के पुत्र भरत। भारत नाम की उत्पति का संबंध प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट राजा मनु के वंशज भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत से है। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के पश्चात ब्रह्मा के मानस पुत्र मनु ने व्यवस्था सम्हाली। ऋषभदेव मनु से पांचवीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वयंभू मनु, प्रियव्रत, आग्नीध्र, नाभि और फिर ऋषभ। वृद्धावस्था में आग्नीध्र ने अपने नौ पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न नौ स्थानों का शासन दायित्व सौंपा। इन नौ पुत्रों में सबसे बड़े थे नाभि जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला। इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम अजनाभ से जोड़कर अजनाभवर्ष प्रचारित किया। राजा नाभि के पुत्र थे ऋषभ। पहले भारतवर्ष का नाम ॠषभदेव के पिता नाभिराज के नाम पर अजनाभवर्ष प्रसिद्ध था। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे। विष्णु पुराण में उल्लेख आता है "ततश्च भारतवर्ष तल्लो केषु गीयते" अर्थात् "तभी से इस देश को भारत वर्ष कहा जाने लगा"। वायु पुराण भी कहता है कि इससे पहले भारतवर्ष का नाम हिमवर्ष था। पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना 'महाभारत' में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। कालिदास कृत महान संस्कृत ग्रंथ 'अभिज्ञान शाकुंतलम' के एक वृत्तांत अनुसार राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष का नामकरण हुआ।

थ्री-डी फिल्म की शुरूआत कैसे हुई? कम्प्यूटर से या कैमरा से थ्री-डी इफेक्ट कैसे दिया जाता है?
थ्री-डी फिल्म मूवी की एक तकनीक है, जिसमें छवियां वास्तविक लगती हैं। इसमें चित्रों को रिकॉर्ड करने के लिए विशेष मोशन पिक्चर कैमरे का प्रयोग किया जाता है। यह तकनीक नई नहीं है। सन 1890 के दौरान भी इनका प्रदर्शन होता था, पर उस समय के इन फिल्मों को थिएटर पर दिखाया जाना काफी महंगा काम होता था। मुख्यत: 1950 से 1980 के बीच अमेरिकी सिनेमा में ये फिल्में प्रमुखता से दिखने लगी।
मोशन पिक्चर का स्टीरियोस्कोपिक युग 1890 के दशक के अंतिम दौर में आरंभ हुआ जब ब्रिटिश फिल्मों के पुरोधा विलियम ग्रीन ने थ्री-डी प्रक्रिया का पेटेंट फाइल किया। फ्रेडरिक युजीन आइव्स ने स्टीरियो कैमरा रिग का पेटेंट 1900 में कराया। इस कैमरे में दो लैंस लगाए जाते थे जो एक दूसरे से तीन-चौथाई इंच की दूरी पर होते थे। 27 सितंबर, 1922 को पहली बार दर्शकों को लॉस एंजेलस के एंबेसडर थिएटर होटल में द पावर ऑफ लव का प्रदर्शन आयोजित किया गया था। सन 1952 में पहली कलर स्टीरियोस्कोपिक फीचर, वान डेविल बनाई गई। इसके लेखक, निर्माता और निर्देशक एमएल गुंजबर्ग थे। स्टीरियोस्कोपिक साउंड में बनी पहली थ्री-डी फीचर फिल्म हाउस ऑफ वैक्स थी।
सिनेमा में तीसरा आयाम जोड़ने के लिए उसमें अतिरिक्त गहराई जोड़ने की जरूरत होती है। वैसे असल में यह केवल छद्म प्रदर्शन मात्र होता है। फिल्मांकन के लिए प्रायः 90 डिग्री पर स्थित दो कैमरों का एक-साथ प्रयोग कर चित्र उतारे जाते हैं और साथ में दर्पण का भी प्रयोग किया जाता है। दर्शक थ्री-डी चश्मे के साथ दो चित्रों को एक ही महसूस करते हैं और वह उसे त्रि-आयामी या थ्री-डायमेंशनल लगती है। ऐसी फिल्में देखने के लिए कुछ समय पहले तक एक खास तरीके के चश्मे को पहनने की आवश्यकता होती है। हाल ही निर्माता-निर्देशक स्टीवन स्पीलर्ब ने एक ऐसी तकनीक का पेटेंट कराया है, जिसमें थ्री-डी फिल्म देखने के लिए चश्मे की कोई जरूरत नहीं रहेगी। भारत में भी कई थ्री-डी फिल्में बन चुकी हैं। सन 1985 में छोटा चेतन और शिवा का इन्साफ रिलीज़ हुई थी। रंगीन चश्मे के साथ फिल्म देखने का अनुभव एकदम नया था। भारत में अब 20-25 पुरानी फिल्मों को थ्री-डी में बदला जा रहा है। 
  
पहला टेस्ट ट्यूब बेबी कितने साल का है? आजकल क्या कर रहा है?
कर रहा है नहीं कर रही है। पुरुष पहले आया या स्त्री इसका पता नहीं, पर टेस्ट ट्यूब बेबी के रूप में सबसे पहले लड़की का जन्म हुआ था। 25 जुलाई 1978 को ग्रेट ब्रिटेन में लेज़्ली ब्राउन ने दुनिया के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी को जन्म दिया था। इस बेबी का नाम है लुइज़ जॉय ब्राउन। इनके पिता का नाम है जॉन ब्राउन। इनके माता-पिता के विवाह के नौ साल बाद तक संतान नहीं होने पर उन्होंने डॉक्टरों से सम्पर्क किया। डॉक्टर रॉबर्ट जी एडवर्ड्स कई साल से ऐसी तकनीक विकसित करने के प्रयास में थे, जिसे इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन कहा जाता है। डॉक्टर एडवर्ड्स को बाद में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार भी दिया गया। टेस्ट ट्यूब बेबी लुइज़ आज 34 वर्ष की हैं और वे एक बच्चे की माँ हैं। उनके बेटे का नाम केमरन है, जिसकी उम्र पाँच साल है। लुइज़ का विवाह सन 2004 में वेस्ली मलिंडर से हुआ था। और 20 दिसम्बर 2006 को केमरन का जन्म सामान्य तरीके से हुआ।

हमारे राष्ट्रीय ध्वज को किसने डिजाइन किया?
तिरंगे झंडे का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए। इसका विकास हुआ है और इसमें कई लोगों का योगदान है। माना जाता है कि सबसे पहले आंध्र प्रदेश के देशभक्त कृषि विज्ञानी पिंगली वैंकैया ने इसकी परिकल्पना की थी। उन्होंने गांधी जी को एक राष्ट्रीय ध्वज का सुझाव दिया था। गांधी जी ने सबसे पहले 1921 में कांग्रेस के अपने झंडे की बात की थी। इस झंडे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। इसमें दो रंग थे लाल रंग हिन्दुओं के लिए और हरा रंग मुस्लिमों के लिए। बीच में एक चक्र था। बाद में इसमें अन्य धर्मों के लिए सफेद रंग जोड़ा गया। कांग्रेस के ध्वज में बीच में चरखा था। ध्वज को उसके वर्तमान रूप में 15 अगस्त 1947 के कुछ ही दिन पूर्व 22 जुलाई, 1947 को आयोजित भारतीय संविधान-सभा की बैठक में अपनाया गया था। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र ने ली। इस नए झंडे की देश के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने फिर से व्याख्या की।
इससे भी पहले 1904  में स्वामी विवेकानन्द की शिष्या भगिनी निवेदिता ने एक ध्वज बनाया था। 7 अगस्त, 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम् लिखा गया था। द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों ने फहराया था। कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार यह 1905 की बात है। यह भी पहले ध्वज के समान था; सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, किंतु सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था। 1917 में डॉ. एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान एक और ध्वज फहराया। इस ध्वज में ५ लाल और ४ हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के प्रतीक रूप में सात सितारे बने थे। ऊपरी किनारे पर बाईं ओर यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
ऐ मेरे वतन के लोगो, गीत किसने लिखा? इस गाने के कितने वर्ष हो गए?
सबसे पहले लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप के लिखे इस गाने को गाया था 27 जनवरी 1963 को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने। 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की बुरी हार हुई थी। पूरे देश का मनोबल गिरा हुआ था. ऐसे में सबकी निगाहें फ़िल्म जगत और कवियों की तरफ़ जम गईं कि वे कैसे सबके उत्साह को बढ़ाने का काम कर सकते हैं। कवि प्रदीप ने एक जगह बताया है कि उस दौर में तीन महान आवाज़ें हुआ करती थीं. मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और लता मंगेशकर. उसी दौरान नौशाद भाई ने तो मोहम्मद रफ़ी से 'अपनी आज़ादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं', गीत गवा लिया, जो बाद में फ़िल्म 'लीडर' में इस्तेमाल हुआ। राज साहब ने मुकेश से 'जिस देश में गंगा बहती है' गीत गवा लिया. तो इस तरह से रफ़ी और मुकेश तो पहले ही रिज़र्व हो गए. अब बचीं लता जी. उनकी मखमली आवाज़ में कोई जोशीला गाना फिट नहीं बैठता। यह बात मैं जानता था। तो मैंने एक भावनात्मक गाना लिखने की सोची। इस तरह से 'ऐ मेरे वतन के लोगों' का जन्म हुआ, जिसे लता ने पंडित नेहरू के सामने गाया और उनकी आंखों से भी आंसू छलक आए।

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, विज्ञापनों का निचोड़ - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete