Sunday, March 13, 2016

@ की क्या महत्ता है? इसके बिना ई-मेल अधूरा क्यों है?

अंग्रेज़ी के ऍट या स्थान यानी लोकेशन का यह प्रतीक चिह्न है। शुरू में इसका इस्तेमाल गणित में ऍट द रेट ऑफ’ यानी दर के लिए होता था। ई-मेल में इसके इस्तेमाल ने इसके अर्थ का विस्तार कर दिया। ई-मेल में पते के दो हिस्से होते हैं। एक होता है लोकल पार्ट जो @ के पहले होता है। इसमें अमेरिकन स्टैंडर्ड कोड फॉर इनफॉरमेशन इंटरचेंज (एएससीआईआई) के तहत परिभाषित अक्षर, संख्या या चिह्न शामिल हैं। चिह्न @ के बाद डोमेन का नाम लिखा जाता है। यानी इस चिह्न के पहले व्यक्ति या संस्था का नाम बताने वाले संकेत और उसके बाद डोमेन नाम।

(बीबीसी हिन्दी वैबसाइट ने इस सिलसिले में रोचक सामग्री प्रकाशित की है.
इंटरनेट, ई-मेल और सोशल नेटवर्क के इस ज़माने में हम @ इस प्रतीक का ख़ूब इस्तेमाल करते हैं. मगर, कभी आपने सोचा है कि इस @ यानी 'ऐट द रेट ऑफ़' चिह्न का इस्तेमाल पहली बार कब हुआ? अंग्रेज़ी में ये प्रतीक अक्षर कहां से आया? अगर, आप अंग्रेज़ी नहीं बोलते हैं तो इसके बारे में बात करना और भी दिलचस्प होगा. तो चलिए इस @ से जुड़े दिलचस्प क़िस्से आपको सुनाते हैं. इसे पढ़ें यहाँ)
(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

क्या होती है कौड़ी? इस शब्द का प्रयोग मुद्रा के रूप में कैसे और कब से है? बीस की संख्या के लिए कौड़ी शब्द का आधार क्या है?

कौड़ी शंख की तरह एक प्रकार का छोटा समुद्री घोंघा है। कौड़ी को इतालवी भाषा में पोर्सेलाना कहा जाता है। अपनी चमक के कारण पोर्सलीन शब्द इसी पोर्सेलाना यानी कौड़ी से बना है। हमारे यहाँ शंख को लक्ष्मी का भाई माना जाता है। शंख की ही तरह कौड़ी भी समुद्र से उत्पन्न हुई है। इसलिए वह लक्ष्मी की बहन है। उसे लक्ष्मी का प्रतीक मानते हैं। चौपड़ खेलने के लिए पाँसो की जगह कौड़ी का इस्तेमाल होता है। दरवाज़े पर मांगलिक कौड़ी की झालरें लगाई जाती हैं। दीपावली के दिन चांदी के सिक्कों के साथ कौड़ी को भी दूध आदि से नहलाकर पूजा की जाती है। मुद्रा के चलन से पहले विनिमय में कौडि़यों का प्रयोग भी होता था। बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत में एक पैसा सोलह कौड़ियों के बराबर था।

मनुष्य ने व्यापार-व्यवसाय पहले शुरू किया फिर विनिमय के साधन खोजे। मुद्रा के रूप में कौड़ियों और सीपों वगैरह का इस्तेमाल दुनिया के प्रायः सभी समाजों में होता था। इसे शैल मनी कहते हैं। ईसा से तकरीबन डेढ़ हजार साल पहले चीन में कौड़ी का मुद्रा के तौर पर चलन शुरू होने के प्रमाण मिले हैं। कौड़ी को ही मुद्रा के रूप में क्यों चुना गया? कौड़ी में वे सारे गुण पाए गए जो अच्छी मुद्रा में होने चाहिए। इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। ये नष्ट नहीं होती। गिनने में आसानी रहती है। नकली कौड़ी नहीं बन सकती। आज भी अफ्रीका के कुछ भागों में कौड़ी की मुद्रा चलती है। जहाँ-जहाँ भी ऐतिहासिक खुदाइयां हुई हैं,वहां कौड़ी भी मिली हैं।

हमारे यहाँ उल्लेख मिलते हैं जिनके अनुसार दस कौड़ी मिलाकर एक दमड़ी बनती थी। एक गाय खरीदने के लिए पच्चीस हजार कौड़ियों की ज़रूरत पड़ती थी। कौड़ी की अल्प क्रय शक्ति को देखते हुए ही मुहावरों की दुनिया में कौड़ी तुच्छता के भाव में भी शामिल हो गई। दाम के छठे हिस्से को छदाम कहा गया जो छह+द्रम्म के मेल से बना। दो दमड़ी मिलाकर एक छदाम बनता था। अर्थात एक छदाम यानी बीस कौड़ी।
   
राइट टु रिकॉल क्या है? इसके बारे में विस्तार से बताएं। यह किन-किन देशों में लागू है
राइट टु रिकॉल का मतलब है चुने हुए प्रतिनिधि को वापस बुलाना। एथेंस के नगर लोकतंत्र में यह व्यवस्था थी। अमेरिका की राज्य क्रांति के मूल तत्वों में नागरिक के इस अधिकार का ज़िक्र भी है। पर संविधान में इसकी व्यवस्था नहीं है। फिर भी देश के 18 राज्यों में इसकी व्यवस्था है। सन 2011 में 150 रिकॉल चुनाव हुए, जिनमें 75 पदाधिकारियों को उनके पद से हटाया गया। ये रिकॉल सिटी काउंसिल, मेयर, स्कूल बोर्ड वगैरह में हुए हैं। कनाडा के ब्रिटिश कोलम्बिया प्रांत में इसकी व्यवस्था है। स्विट्ज़रलैंड में संघीय स्तर पर तो नहीं, पर छह कैंटनों में इसकी व्यवस्था है। वेनेजुएला में सन 2004 में राष्ट्रपति ह्यूगो शावेस को हटाने के लिए जनमत संग्रह हुआ था, जिसमें जनता ने उन्हें अपने पद पर बने रहने का आदेश दिया। भारत में भी इस अधिकार की माँग की जा रही है। इस अधिकार के साथ अनेक दिक्कतें जुड़ीं हैं। राजनीति में आरोप लगाना आसान होता है। भारत जैसे देश में हम इसका उदाहरण रोज-बरोज देख सकते हैं। इसके प्रयोग हमें गाँव या स्कूल के स्तर पर करके देखना चाहिए।

कुओं की खुदाई गोल और पोखरों की खुदाई चौकोर क्यों होती है?
कुओं के निर्माण को साथ यह बात जुड़ी होती है कि उनकी दीवार भीतर से मज़बूत हो। गोलाकार या आर्च के आकार की दीवार काफी मजबूत होती है। पुराने ज़माने में जब लिंटेल नहीं होते थे या आरसीसी निर्माण नहीं होता था आर्च के सहारे बड़े-बड़े हॉल और पुल बनते थे। चौकोर कुआं बनाने पर चारों दीवारों की मजबूती के मुकाबले गोलाकार दीवार कहीं मजबूत होगी। पोखरों का आकार बड़ा होता है और उनपर यह बात लागू नहीं होती। बावज़ूद इसके दुनिया के कई मशहूर बाँध जैसे हूवर बाँध अर्ध गोलाकार हैं। ऐसे बाँधों को आर्च डैम कहते है।


1 comment:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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