Thursday, March 3, 2016

रुपये का गिरना या डूबना क्या होता है?

जिस चीज का मूल्य होता है वह धन है। सिक्के, नोट और बैंकिग दस्तावेज एक मूल्य को दर्शाते हैं। यह मूल्य हजारों साल पहले वस्तु के विनिमय से तय होता था। मसलन एक बोरा धान के बदले कपड़ा, बर्तन या कोई दूसरी चीज। विनिमय को थोड़ा आसान करने के लिए मुद्रा का जन्म हुआ। आपका सवाल इन मुद्राओं के विनिमय की दर को लेकर है। इसका गणित जटिल है, पर उसके कारकों को समझना दिक्कत तलब नहीं है। जैसे वस्तुओं की कीमत उसकी माँग से तय होती है उसी तरह मुद्रा की कीमत भी उसकी माँग से तय होती है।

जब हम अंतरराष्ट्रीय बाजार में व्यापार करने निकलते हैं तब किसी न किसी मुद्रा के बरक्स हमारी मुद्रा का मूल्य तय होता है तभी व्यापार हो पाता है। प्रायः हम डॉलर के बरक्स अपनी मुद्रा की कीमत को देखते हैं, क्योंकि डॉलर दुनिया की कुछ उन हार्ड करेंसियों में सबसे आगे है जिनके माध्यम से दुनिया में कारोबार होता है। एकाध देशों के साथ हम रुपए में लेन-देन भी करते हैं। दरअसल जिसे हम रुपए की कीमत गिरना कहते हैं वह डॉलर की कीमत बढ़ना है। पिछले कुछ वर्षों से डॉलर की माँग बढ़ने का कारण उसकी कीमत बढ़ने लगी है, क्योंकि उसकी माँग बढ़ रही है। मुद्रा की कीमत तय होने का एकमात्र कारण यही नहीं है। सबसे बड़ा कारण है मुद्रा प्रसार के कारण वस्तुओं की कीमतें बढ़ना। जैसे ही किसी अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है लोगों की आय बढ़ने लगती है। इससे चीजों की माँग बढ़ती है। यदि उनकी सप्लाई पर्याप्त न हो तो चीजों के दाम बढ़ते हैं। यह मुद्रास्फीति है। इससे मुद्रा की कीमत भी कम होती है। मसलन पहले 100 रुपए में जितना अनाज मिलता था, वह 110 रुपए में मिलने लगा।

अर्थव्यवस्था की अंदरूनी ताकत भी मुद्रा की ताकत को कम या ज्यादा करती है, पर वह भी एकमात्र कारण नहीं है। और मुद्रा की कीमत कम होना हमेशा नुकसानदेह भी नहीं होता। मसलन चीन चूंकि काफी निर्यात करने वाला देश है उसे डॉलर की कीमत बढ़ने से फायदा होना चाहिए, क्योंकि उसका माल अमेरिकी बाजार में और सस्ता हो जाएगा। हाल में चीन ने अपनी मुद्रा की कीमत कम की है।

बैंकिंग प्रणाली में आरटीजीएस और आईएफएससी कोड क्या है? यह किस तरह काम करते हैं, इससे आम आदमी को कोई फायदा होता है?
यह बैंकों के धनराशि लेन-देन की व्यवस्था है। भारतीय बैंक रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (आरटीजीएस) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर प्रणाली के मार्फत काम करते हैं। आमतौर पर धनराशि का ट्रांसफर इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग सर्विसेज (ईसीएस) के मार्फत होता है। इस व्यवस्था के तहत बैंकों की ब्रांचों के इंडियन फाइनेंशियल सिस्टम कोड (आईएफएससी) प्रदान किए गए हैं। यह कोड चेक पर लिखा रहता है। आम आदमी को जल्द और सही सेवा देने के लिए ही इन्हें बनाया गया है।

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इसमें गांधी का मतलब क्या है? इन्हें महात्मा और बापू किसने कहा?

गांधी का मतलब परचूनी, पंसारी से लेकर इत्र फरोश यानी गंध बेचने वाला तक है। गांधी एक कारोबारी परिवार से आते थे और उनके पिता का नाम करमचंद गांधी था। उनके पिता हिन्दू मोढ़ समुदाय से ताल्लुक रखते थे। उन्हें महात्मा की उपाधि सन 1915 में भारत आने के बाद ही कभी दी गई। आमतौर पर माना जाता है कि उन्हें सबसे पहले रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने महात्मा कहकर संबोधित किया। पर ऐसे प्रमाण मिलते है कि 21 जनवरी 1915 को गुजरात में जतपुर के नगरसेठ नौतमलाल भगवानजी मेहता ने उन्हें महात्मा कहा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर से गांधी की पहली मुलाकात इसके बाद अप्रेल 1915 में हुई। सम्भव है यह शब्द इसके भी पहले जनता के बीच से आया हो जैसे कि बापू। पिता के लिए यह भारत में सबसे ज्यादा प्रचलित अभिव्यक्ति है।

शंख क्या है? इसका धार्मिक महत्व क्यों है?

शंख एक सामान्य नाम है जो बड़े आकार के समुद्री घोंघे का खोल या शैल होता है। विज्ञान की शब्दावली में ये स्ट्रॉम्बिडा परिवार के गैस्ट्रोपोड मोलस्क हैं। इनमें से अनेक शंख स्ट्रॉम्बिडा परिवार से ताल्लुक नहीं रखते। इनमें पवित्र शंख भी शामिल है, जिसे टर्बिनेला पायरम कहते हैं, जिनका ताल्लुक टर्बिनेलाइडा परिवार से है। जीवित शंख या घोंघे की तमाम छोटी-बड़ी प्रजातियों को पूर्वी एशिया तथा दुनिया के अन्य देशों में सीफूड के रूप में खाया भी जाता है। शंख की विशेषता है उसका सर्पिल शिखर स्वरूप। उसके शिखर पर छेद करके इसका इस्तेमाल फूँकवाद्य के रूप में भी किया जाता है। पर सभी शंखों से आवाज नहीं निकलती। छोटे-बड़े शंखों का इस्तेमाल सजावट के लिए भी किया जाता है। इससे गहने भी बनाए जाते हैं।

हिन्दू मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में एक रत्न शंख है। समुद्र मंथन के समय आठवें स्थान पर वह प्राप्त हुआ था। लक्ष्मी के समान शंख भी सागर से उत्पन्न हुआ है इसलिए इसे लक्ष्मी का भाई भी कहा जाता है। लक्ष्मी और विष्णु दोनों ही अपने हाथों में शंख धारण करते हैं। महाभारत के युद्ध की शुरूआत अलग-अलग योद्धाओं की शंख-ध्वनि से होती है। वेदों के अनुसार शंख घोष विजय का प्रतीक है। कृष्ण ने पांचजन्य, युधिष्ठिर ने अनन्तविजय, भीम ने पौण्ड्र, अर्जुन ने देवदत्त, नकुल ने सुघोष एवं सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंखों का नाद किया। भीष्म के शंख का नाम गंगनाभ, दुर्योधन का विदारक और कर्ण का शंख हिरण्यगर्भ था।

ऐसी धारणा है कि, जिस घर में शंख होता है उस घर में सुख-समृद्धि आती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। आमतौर पर शंख उल्टे हाथ के तरफ खुलते हैं। लक्ष्मी का शंख दक्षिणावर्ती अर्थात सीधे हाथ की तरफ खुलने वाले होते हैं। वामावर्ती शंख को जहां विष्णु का स्वरुप माना जाता है वहीं दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का स्वरुप माना जाता है। एक और शंख मध्यावर्ती होता है-मध्य में खुला। इसके अलावा हेममुख, पुन्जिका एवं नारायण शंख भी होते हैं। हेममुख एवं नारायण शंख में मुँह कटा नहीं होता है। नारायण शंख भी दक्षिणावर्ती ही होता है। किन्तु इसमें पांच या इससे अधिक वक्र चाप होते है। पांच से कम चाप वाले को दक्षिणावर्ती शंख कहते है। इनके अलावा और भी अनेक प्रकार के शंख पाए जाते हैं जैसे लक्ष्मी शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, गोमुखी शंख, देव शंख, राक्षस शंख, विष्णु शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, शनि शंख, राहु एवं केतु शंख। आयुर्वेद में शंखभस्म औषधि के रूप में प्रयुक्त होती है।



प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

1 comment:

  1. आपकी पोस्ट को आज की बुलेटिन राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

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