Thursday, April 19, 2018

सीरिया में लड़ाई क्यों?

सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ पिछले सात साल से विद्रोह चल रहा है, जिसका इसरायल, सउदी अरब, तुर्की, अमेरिका और पश्चिमी देश अपने-अपने तरीके से समर्थन कर रहे हैं. दूसरी तरफ बशर-अल-असद की सरकार को ईरान और रूस का समर्थन प्राप्त है. यह बगावत गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है. इसमें अब तक 3 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल असद की जगह ली थी. सन 2011 में कई अरब देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था, जिसने गृहयुद्ध का रूप ले लिया है.

सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. यह संघर्ष साम्प्रदायिक रूप ले चुका है, जिसमें जेहादी ग्रुपों को पनपने का मौका मिला. इसी दौरान इराक में इस्लामिक स्टेट उभार शुरू हुआ, जिसने उत्तरी और पूर्वी सीरिया के काफी हिस्सों पर क़ब्ज़ा कर लिया. दूसरी तरफ ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरिया की सेना की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे हैं. सीरिया, इराक़ और तुर्की की सीमा पर बड़ी संख्या में कुर्दों की आबादी भी है. वे एक स्वतंत्र देश बनाने के लिए अलग लड़ रहे हैं.

इस प्रकार इस इलाके में कई तरह की ताकतें, कई तरह की ताकतों से लड़ रहीं हैं. पश्चिमी देशों का आरोप है कि सीरिया की सेना विद्रोहियों का दमन करने के लिए रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है. सीरिया पर पश्चिमी देशों के नवीनतम हमलों की वजह यह बताई जा रही है कि गत 7 अप्रैल को पूर्वी गोता इलाके के डूमा में सीरिया की सेना ने विद्रोहियों और राहत-कर्मियों पर रासायनिक हथियारों से हमला किया, जिसमें 40 लोग मारे गए.

बोआओ फोरम क्या है?

बोआओ फोरम एशिया (बीएफए) व्यापारिक सहयोग और विमर्श का फोरम है, जिसे दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तर्ज पर गठित किया गया है. इसका मुख्यालय चीन के हैनान प्रांत के बोआओ में है. सन 2001 से यहाँ एशिया की सरकारों और उद्योगों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हो रहा है. यह फोरम क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के इरादे से गठित किया गया है. इसमें एशिया के देशों को आर्थिक-विकास की राह पर चलते हुए अपनी अर्थ-व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का मौका मिलता है. इसे शुरू करने का विचार मूलतः फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वी रैमोस, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री बॉब हॉक और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री मोरीहीरो होसोकावा ने बनाया था.

इसका उद्घाटन 27 फरवरी 2001 को हुआ था. इसके लिए चीन ने खासतौर से पहल की. इसकी शुरूआत 26 देशों की भागीदारी के साथ हुई थी. इस वक्त इसके 29 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल हैं. इससे जुड़े संगठन की पहली बैठक 12-13 अप्रैल 2002 को हुई. हाल में 8 से 11 अप्रैल 2018 को फोरम का सालाना सम्मेलन हुआ. इसमें चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी भावी आर्थिक नीतियों की ओर इशारा किया. हालांकि भारत की ओर से इस सम्मेलन में कोई बड़ी राजनीतिक हस्ती उपस्थित नहीं थी. केवल उद्योग-व्यापार संगठन फिक्की के प्रतिनिधि इसमें उपस्थित थे.

बोआओ फोरम में आर्थिक एकीकरण के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय-प्रश्नों पर भी विचार किया जाता है. यह फोरम एक तरह से चीन और वैश्विक-व्यापार के बीच की कड़ी बना. सन 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य भी बना था.

डब्लूटीओ में कितने सदस्य हैं?

विश्व व्यापार संगठन में 164 सदस्य और 23 पर्यवेक्षक देश हैं. 14 जुलाई 2016 को लाइबेरिया इसका 163वाँ और 29 जुलाई 2016 को अफ़ग़ानिस्तान इसका 164वाँ सदस्य बना.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

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