Thursday, July 9, 2015

एस्ट्रोनॉट्स स्पेस में क्या या कैसा खाना खाते हैं?

अब अंतरिक्ष यात्राएं काफी लम्बी होने लगी हैं. कई-कई महीने तक यात्रियों को अंतरिक्ष स्टेशन पर रहना पड़ता है. उनके लिए खाने की व्यवस्था करने के पहले देखना पड़ता है कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मुक्त स्पेस में उनके शरीर को किस प्रकार के भोजन की जरूरत है. साथ ही उसे स्टोर किस तरह से किया जाए. सबसे पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गागारिन को भोजन के रूप में टूथपेस्ट जैसी ट्यूब में कुछ पौष्टिक वस्तुएं दी गईं थीं। उन्हें गोश्त का पेस्ट और चॉकलेट सॉस भी दिया गया. 1962 में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री जॉन ग्लेन ने भारहीनता की स्थिति में भोजन करने का प्रयोग किया था. शुरू में लगता था कि भारहीनता में इंसान भोजन को निगल पाएगा या नहीं. इसके बाद अंतरिक्ष यात्रियों के लिए टेबलेट और तरल रूप में भोजन बनाया गया. धीरे-धीरे उनके भोजन पर रिसर्च होती रही. उन्हें सैंडविच और टोस्ट दिए जाने लगे. अब उन्हें कई तरह के पेय पदार्थ और खाने की चीजें भेजी जाती हैं. अलबत्ता वहाँ स्वाद की समस्या होती है. भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स हाल में जब कुछ साल पहले भारत आईं थी तो उन्होंने बताया था कि वे अंतरिक्ष में समोसे लेकर गई थीं। साथ ही वे पढ़ने के लिए उपनिषद और गीता भी लेकर गईं थी. 

सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करने वाला पेड़ या पौधा कौन सा है?
पेड़ या पौधे ऑक्सीजन तैयार नहीं करते बल्कि वे फोटो सिंथेसिस या प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करते हैं और उसके दो बुनियादी तत्वों को अलग करके ऑक्सीजन को वातावरण में फैलाते हैं. एक माने में वातावरण को इंसान के रहने लायक बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं. कौन सा पेड़ सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करते है? इसे लेकर अधिकार के साथ कहना मुश्किल है, पर तुलसी, पीपल, नीम और बरगद के पेड़ काफी ऑक्सीजन तैयार करते हैं और हमारे परम्परागत समाज में इनकी पूजा होती है. यों पेड़ों के मुकाबले काई ज्यादा ऑक्सीजन तैयार करती है.

प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है जिसमें पौधे अपने हरे रंग वाले अंगों जैसे पत्ती, द्वारा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बन डाइऑक्साइड तथा भूमि से जल लेकर जटिल कार्बनिक खाद्य पदार्थों जैसे कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं. इस प्रक्रिया में आक्सीजन एवं ऊर्जा से भरपूर कार्बोहाइड्रेट (सक्रोज, ग्लूकोज, स्टार्च आदि) का निर्माण होता है तथा आक्सीजन गैस बाहर निकलती है. प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रियाओं में से एक है. सीधे या परोक्ष रूप से दुनिया के सभी सजीव इस पर आश्रित हैं.

शीशे का आविष्कार कब और कैसे हुआ और इसका पहली बार किस रूप में उपयोग किया गया?

शीशे से आपका आशय दर्पण से है तो वह प्रकृति ने हमें ठहरे हुए पानी के रूप में दिया था. पत्थर युग में चिकने पत्थर में भी इंसान को अपना प्रतिबिंब नज़र आने लगा था. इसके बाद यूनान, मिस्र, रोम, चीन और भारत की सभ्यताओं में धातु को चमकदार बनाकर उसका इस्तेमाल दर्पण की तरह करने की परंपरा शुरू हुई. पर प्रकृति ने उससे पहले उन्हें एक दर्पण बनाकर दे दिया था. यह था ऑब्सीडियन. ज्वालामुखी के लावा के जमने के बाद बने कुछ काले चमकदार पत्थर एकदम दर्पण का काम करते थे. बहरहाल धातु युग में इंसान ने ताँबे की प्लेटों को चमकाकर दर्पण बना लिए. प्राचीन सभ्यताओं को शीशा बनाने की कला भी आती थी. ईसा की पाँचवीं सदी में चीन के लोगों ने चाँदी और मरकरी से शीशे के एक ओर कोटिंग करके दर्पण बना लिए थे. हमारे यहाँ स्त्रियों के गहनों में आरसी भी एक गहना है, जो वस्तुतः चेहरा देखने वाला दर्पण है.

हिंदी फिल्मों का सबसे लम्बा गाना कौन सा है?

अभी तक माना जाता था कि सन 1958 में बनी फिल्म अल हिलाल की कव्वाली ‘हमें तो लूट लिया मिल के हुस्न वालों ने’ सबसे लम्बा गीत है. यह 11 मिनट का गाना था. पर 2012  में फिल्म मस्तान में 21 मिनट का गाना 'मोरा मन मान ना' िरकॉर्ड किया गया. जयपुर मूल के संगीतकार तोषी साबरी ने अपनी फिल्म "मस्तान" के लिए 21 मिनट लम्बा गीत रिकॉर्ड किया है. रॉकी खन्ना के निर्देशन में बनी इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और उनका छोटा बेटा वीवान एक साथ काम कर रहे हैं. हाल में पता लगा है कि ‘अब तुम्हारे हवाले वतन सारा’ नाम की फिल्म में 20 मिनट का गीत है, जिसे कैलाश खेर, सोनू निगम, अलका याग्निक और उदित नारायण ने गाया है.

कहते हैं कि नॉर्वे में आधी रात तक सूरज चमकता है. क्या यह बात सही है?

नॉर्वे उत्तरी ध्रुव के काफी करीब है. इस इलाके में गर्मियों में रात के बारह बजे के बाद तक सूरज चमकता है. रातें कुछ घंटे की होती हैं, उस दौरान भी सूरज क्षितिज के करीब होता है इसलिए रातें अंधियारी नहीं होतीं. इसलिए इसे अर्धरात्रि के सूर्य वाला देश कहते हैं.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

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