Saturday, May 28, 2016

पुदुच्चेरी के शहर एक-दूसरे से जुड़े क्यों नहीं हैं?

हाल में पाँच विधान सभाओं के चुनाव हुए, जिनमें पुदुच्चेरी भी है. क्या आपने पुदुच्चेरी का नक्शा देखा है? पुदुच्चेरीजिसे पहले पॉन्डिचेरी कहते थेअपने किस्म का निराला क्षेत्र है जिसके चारों जिले एक-दूसरे से जुड़े नहीं हैं. ये जिले हैं पुदुच्चेरी और कराइकल जो तमिलनाडु से घिरे हैंयनम आन्ध्र प्रदेश में और माहे केरल में है. पुदुच्चेरी और कराइकल इनमें सबसे बड़े जिले हैं. पुदुच्चेरी फ्रांसीसी उपनिवेश था जिसमें चार जिले होते थे. सबसे बड़े जिले के नाम पर इसका नाम पुदुच्चेरी पड़ा. यह क्षेत्र लगभग 300 साल तक फ्रांसीसी अधिकार में रहा. आज भी यहाँ के कुछ निवासियों को फ्रांस की नागरिकता प्राप्त है.

तमिलतेलुगुमलयालमऔर फ्रांसीसी यहाँ की आधिकारिक भाषाएँ है. प्रत्येक जिले के साथ-साथ हर भाषा की स्थिति भिन्न है. विभिन्न जिलों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए आमतौर पर अंग्रेज़ी का उपयोग किया जाता है. चूंकि इनकी सांस्कृतिक स्थिति एक सी है इसलिए इनका एक केन्द्र शासित क्षेत्र बनाया गया. देखें साथ का नक्शा

देश के पूर्व में है, पर नाम पश्चिम बंगाल क्यों?

आज हम जिसे पश्चिम बंगाल कहते हैं वह समूचे बंगाल का एक हिस्सा है. सन 1757 की प्लासी लड़ाई में ईस्ट इंडिया कम्पनी की जीत से अंग्रेजी शासन को बुनियादी आधार मिला. अंग्रेजी शासन ने शुरू में कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया. बीसवीं सदी के प्रारम्भ में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक कारणों से बंगाल को दो हिस्सों में बाँटने का फैसला किया. इसके पीछे जो भी कारण रहा हो, पर यह स्पष्ट था कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र पूर्वी बंगाल बना और हिन्दू बहुल क्षेत्र पश्चिमी बंगाल. 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल का विभाजन हुआ. 1947 में देश के विभाजन के बाद भी बंगाल विभाजित रहा. पूर्वी बंगाल, पूर्वी पाकिस्तान बना और पश्चिमी बंगाल भारत में रहा. वह नाम अबतक चला आ रहा है. यह नियम पंजाब पर लागू नहीं हुआ, जबकि पूर्वी पंजाब भारत में है और पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान में.     

जीएसएम, जीपीआरएस और सीडीएमए

जीएसएम यानी ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल. यह मोबाइल टेलीफोनी की सबसे ज्यादा प्रचलित पद्धति है. जीएसएम एसोसिएशन दुनियाभर में इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले संगठनों की संस्था है. इनका दुनियाभर में नेटवर्क जिससे अधिकतर देशों में इसकी रोमिंग सुविधा उपलब्ध है. जीपीआरएस यानी जनरल पैकेट रेडियो सर्विस एक प्रकार की डेटा सर्विस है जैसे फिक्स्ड लाइन पर ब्रॉडबैंड होती है. सीडीएमए कोड डिवीज़न मल्टीपल एक्सेस भी जीएसएम की मोबाइल टेलीफोनी की एक पद्धति है, जिसे चैनल एक्सस मैथड कहते हैं. आमतौर पर सीडीएमए 2000 को सीडीएमए कहते हैं.

वेस्टइंडीज कोई देश नहीं है
टी-20 विश्व कप प्रतियोगिता में जीत के बाद कई लोगों के मन में यह सवाल आया कि क्या वेस्टइंडीज कोई देश है? उत्तरी अटलांटिक महासागर के कैरीबियन बेसिन से जुड़े इलाके के अनेक द्वीपों को वेस्टइंडीज कहते हैं. इस इलाके के अलग-अलग द्वीप सत्रहवीं से उन्नीसवीं सदी तक ब्रिटिश, डेनिश, नीदरलैंड्स और स्पेनिश उपनिवेश रहे. सन 1958 से 1962 के बीच युनाइटेड किंगडम ने एक स्वतंत्र देश के रूप में वेस्टइंडीज संघ भी बनाया, पर 1963 में यह संघ भंग हो गया और नौ स्वतंत्र देश और चार ब्रिटिश ओवरसीज टेरीटरी बन गईं. वेस्टइंडीज़ संघ भंग होने के बाद स्वतंत्र हुए देश इस प्रकार थे: बारबेडस-1966, ग्रेनेडा-1974, डोमिनिका-1978, सेंट लूसिया-1979, सेंट विनसेंट और ग्रेनेडाइंस-1979, एंटीगुआ और बारबुडा-1981, सेंट किट्स और नेविस-1983.

चूंकि वेस्टइंडीज एक नहीं अनेक देशों की टीम है इसलिए वह अपना अलग ध्वज इस्तेमाल करती है, जिसमें एक द्वीप में क्रिकेट स्टम्प और ताड़ का एक पेड़ बना है. यह अनेक देशों की टीम है इसलिए किसी एक देश के राष्ट्रगान के बजाय इसके लिए एक विशेष गीत लिखा गया है, जिसकी शुरूआती पंक्तियाँ हैं रैली राउंड द वेस्टइंडीज. इसे डेविड रडर ने लिखा है.

Sunday, May 22, 2016

क्या होती है कौड़ी? इसका प्रयोग मुद्रा के रूप में कैसे और कब से है?

कौड़ी शंख की तरह एक प्रकार का छोटा समुद्री घोंघा है। कौड़ी को इतालवी भाषा में पोर्सेलाना कहा जाता है। अपनी चमक के कारण पोर्सलीन शब्द इसी पोर्सेलाना यानी कौड़ी से बना है। हमारे यहाँ शंख को लक्ष्मी का भाई माना जाता है। शंख की ही तरह कौड़ी भी समुद्र से उत्पन्न हुई है। इसलिए वह लक्ष्मी की बहन है। उसे लक्ष्मी का प्रतीक मानते हैं। चौपड़ खेलने के लिए पाँसो की जगह कौड़ी का इस्तेमाल होता है। दरवाज़े पर मांगलिक कौड़ी की झालरें लगाई जाती हैं। दीपावली के दिन चांदी के सिक्कों के साथ कौड़ी को भी दूध आदि से नहलाकर पूजा की जाती है। मुद्रा के चलन से पहले विनिमय में कौडि़यों का प्रयोग भी होता था। बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत में एक पैसा सोलह कौड़ियों के बराबर था। 

मनुष्य ने व्यापार-व्यवसाय पहले शुरू किया फिर विनिमय के साधन खोजे। मुद्रा के रूप में कौड़ियों और सीपों वगैरह का इस्तेमाल दुनिया के प्रायः सभी समाजों में होता था। इसे शैल मनी कहते हैं। ईसा से तकरीबन डेढ़ हजार साल पहले चीन में कौड़ी का मुद्रा के तौर पर चलन शुरू होने के प्रमाण मिले हैं। कौड़ी को ही मुद्रा के रूप में क्यों चुना गया? कौड़ी में वे सारे गुण पाए गे जो अच्छी मुद्रा में होने चाहिए। इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। ये नष्ट नहीं होती। गिनने में आसानी रहती है। नकली कौड़ी नहीं बन सकती। आज भी अफ्रीका के कुछ भागों में कौड़ी की मुद्रा चलती है। जहाँ-जहाँ भी ऐतिहासिक खुदाइयां हुई हैं,वहां कौड़ी भी मिली हैं।

डिक्शनरी डॉट कॉम के अनुसार अंग्रेजी शब्द Cowrie भी कौड़ी से बना है। हिन्दी शब्दों की व्युत्पत्ति पर शोध करने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार कौड़ी शब्द बना है संस्कृत के कपर्दिका से जिसका क्रम इस प्रकार रहा -कपर्दिका>कअडिका>कअडिआ>कौडिआ>कौड़ी। कौड़ी मुद्रा चीन के बाद भारत से होते हुए लगभग समूची दुनिया में प्रचलित हो गई। पुरानी मुद्रा व्यवस्था में कौड़ी सबसे छोटी इकाई थी। हमारे यहाँ उल्लेख मिलते हैं जिनके अनुसार दस कौड़ी मिलाकर एक दमड़ी बनती थी। एक गाय खरीदने के लिए पच्चीस हजार कौड़ियों की ज़रूरत पड़ती थी। कौड़ी की अल्प क्रय शक्ति को देखते हुए ही मुहावरों की दुनिया में कौड़ी तुच्छता के भाव में भी शामिल हो गई। दाम के छठे हिस्से को छदाम कहा गया जो छह+द्रम्म के मेल से बना। दो दमड़ी मिलाकर एक छदाम बनता था। अर्थात एक छदाम यानी बीस कौड़ी। हालांकि दाशमिक गणना पद्धति भारत की देन है, पर पुराने ज़माने में मुद्रा, माप, वज़न आदि की कई तरह की पद्धतियाँ चलती थीं। मन, सेर, पाव, छटांक, तोला, माशा और रत्ती वगैरह। इसी तरह सोलह आने या चौंसठ पैसे का रुपया। छदाम भी प्राचीन मुद्रा का ही नाम है। मौर्य काल में यूनानी मुद्रा द्रख्म का भारत में भी चलन था। संस्कृत में इसे ही द्रम्मम् कहा गया है जिसका अपभ्रंश हुआ दम्म, दाम , दमड़ी आदि। मुग़लकाल में एक रुपए का मूल्य चालीस दाम के बराबर थी। दाम के छठे हिस्से को छदाम कहा गया जो छह+द्रम्म के मेल से बना। दो दमड़ी मिलाकर एक छदाम बनता था। अर्थात एक छदाम यानी बीस कौड़ी।

राइट टु रिकॉल क्या है?
राइट टु रिकॉल का मतलब है चुने हुए प्रतिनिधि को वापस बुलाना। एथेंस के नगर लोकतंत्र में यह व्यवस्था थी। अमेरिका की राज्य क्रांति के मूल तत्वों में नागरिक के इस अधिकार का ज़िक्र भी है। पर संविधान में इसकी व्यवस्था नहीं है। फिर भी देश के 18 राज्यों में इसकी व्यवस्था है। सन 2011 में 150 रिकॉल चुनाव हुए, जिनमें 75 पदाधिकारियों को उनके पद से हटाया गया। ये रिकॉल सिटी काउंसिल, मेयर, स्कूल बोर्ड वगैरह में हुए हैं। कनाडा के ब्रिटिश कोलम्बिया प्रांत में इसकी व्यवस्था है। स्विट्ज़रलैंड में संघीय स्तर पर तो नहीं, पर छह कैंटनों में इसकी व्यवस्था है। वेनेजुएला में सन 2004 में राष्ट्रपति ह्यूगो शावेस को हटाने के लिए जनमत संग्रह हुआ था, जिसमें जनता ने उन्हें अपने पद पर बने रहने का आदेश दिया। भारत में भी इस अधिकार की माँग की जा रही है। इस अधिकार के साथ अनेक दिक्कतें जुड़ीं हैं। राजनीति में आरोप लगाना आसान होता है। भारत जैसे देश में हम इसका उदाहरण रोज-बरोज देख सकते हैं। इसके प्रयोग हमें गाँव या स्कूल के स्तर पर करके देखना चाहिए।


जेनेटिकली मोडीफाइड फूड्स क्या हैं?

जेनेटिकली मोडीफाइड या बायोटेक फूड्स से आशय उस खाद्य सामग्री से है, जिसे उगाने के लिए प्रयुक्त बीजों के डीएनए में बदलाव किया जाता है। यह बदलाव उपज बढ़ाने के अलावा रोगों से लड़ने, खास परिस्थितियों जैसे की ज्यादा पानी या कम पानी में फसल उगाने आदि के काम आता है। हमारे देश में अभी तक इस प्रकार की खाद्य सामग्री की अनुमति नहीं है।

2008 के मुम्बई हमले के बाद बनी थी एनआईए

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी एनआईए
भारत में आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित यह संघीय जाँच एजेंसी है. यह केन्द्रीय आतंकवाद विरोधी कानून प्रवर्तन एजेंसी के रूप में कार्य करती है. एजेंसी राज्यों से विशेष अनुमति के बिना राज्यों में आतंक संबंधी अपराधों से निपटने में समर्थ है. एजेंसी 31 दिसम्बर 2008 को भारत की संसद द्वारा पारित अधिनियम राष्ट्रीय जाँच एजेंसी विधेयक 2008 के लागू होने के साथ अस्तित्व में आई थी. इसकी स्थापना 2008 के मुंबई हमले के बाद की गई थी. इस घटना के बाद आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक विशेष केंद्रीय एजेंसी की जरूरत महसूस की गई. इसके संस्थापक महानिदेशक राधा विनोद राजू थे. आतंकी हमलों की घटनाओं, आतंकवाद को धन उपलब्ध कराने एवं अन्य आतंक संबंधित अपराधों का अन्वेषण के लिए एनआईए का गठन किया गया जबकि सीबीआई आतंकवाद को छोड़ भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराधों एवं गंभीर तथा संगठित अपराधों का अन्वेषण करती है.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय
संक्षेप में जेएनयू, नई दिल्ली में स्थित केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। यह समाज विज्ञान, विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय अध्ययन आदि विषयों में उच्च स्तर की शिक्षा और शोध कार्य में संलग्न भारत के अग्रणी संस्थानों में से है. जेएनयू को नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (NACC) ने जुलाई 2012 में किए गए सर्वे में भारत का सबसे अच्छा विश्वविद्यालय माना. इस विश्वविद्यालय की स्थापना जेएनयू अधिनियम 1966 के अन्तर्गत भारतीय संसद द्वारा 22 दिसम्बर 1966 में की गई थी. रक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अनुसंधान से जुड़े अनेक संस्थान जेएनयू से सम्बद्ध हैं. इनमें आर्मी कैडेट कॉलेज, देहरादून, कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग, पुणे, नेशनल डिफेंस एकेडमी, पुणे, नेवल कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, लोनावाल, लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट, लखनऊ, रामन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बेंगलुरु वगैरह शामिल हैं. यह सूची काफी लम्बी है.

बोम्मई केस
वर्ष 1994 में एसआर. बोम्मई बनाम भारत सरकार के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की सरकारों को बर्खास्त संबंधी अनुच्छेद की व्याख्या की और कहा कि अनुच्छेद 356 के तहत यदि केंद्र सरकार राज्य में चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करती है तो सुप्रीम कोर्ट सरकार बर्खास्त करने के कारणों की समीक्षा कर सकता है. एसआर बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे. सन 1988 में  उनकी सरकार को केंद्र ने राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर अनुच्छेद 356 के तहत बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था. यह मामला अंततः 9 जजों की सुप्रीम कोर्ट बेंच के सामने गया, जिसने 11 मार्च 1994 को अपने फैसले में कहा कि अनुच्छेद 356(1) के तहत की गई घोषणा की न्यायिक समीक्षा हो सकती है और कोर्ट केंद्र से उस सामग्री को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कह सकता जिसके आधार पर राज्य की सरकार को बर्खास्त किया गया है. साथ ही मंत्रिपरिषद को बहुमत का समर्थन प्राप्त है या नहीं इसका फैसला सदन के भीतर ही हो सकता है.

सोने की खोज

सोना और चाँदी दोनों ही ताम्रयुग में मौज़ूद थे. यानी ईसा से पाँच हज़ार साल पहले मनुष्य ने बालू-रेत और पत्थरों में कण के रूप में उपस्थित इन दोनों धातुओं को हासिल कर लिया था. भारत में सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेषों में सोने-चाँदी और ताँबे के आभूषण मिले हैं. प्राचीन मिस्र में भी दोनों धातु मिलते हैं. दोनों धातुओं की खासियत है इनका बेहद नरम होना. सोना इतना नरम होता है कि उसके एक ग्राम के टुकड़े से एक वर्ग मीटर की शीट बनाई जा सकती है.

हम जम्हाई क्यों लेते हैं?

जम्हाई मनुष्य ही नहीं जानवर भी लेते हैं. इसके शारीरिक और मानसिक कारणों पर अनुसंधान चल ही रहा है. यह एक प्रकार का रिफ्लेक्स है, जिसमें शरीर में खिंचाव आता है. हाथ-पैर से लेकर चेहरे तक पर इसका असर होता है. मुँह खोलकर व्यक्ति हवा खींचता है. जबड़े से लेकर कान के ड्रम तक खिंचते हैं. एक क्षण बाद व्यक्ति हवा छोड़ता है और शरीर सामान्य हो जाता है. आमतौर पर काफी काम करने के बाद, तनाव में, नर्वस होने पर या भूख न लगने या ऊबने पर जम्हाई आती है. ब्रेन के न्यूरोट्रांसमिटर्स के सक्रिय होने पर जम्हाई आती है. बहरहाल इसका भावनाओं, मूड और भूख से सम्बन्ध है. जम्हाई शरीर को सजग करती है और नर्वसनेस से लड़ती है.

रोमन लिपि में ‘कैपिटल लेटर’ और ‘स्मॉल लेटर’ क्यों होते हैं?

रोमन के अलावा ग्रीक, सिरिलिक, आर्मेनियाई और कॉप्टिक वर्णमालाओं में दो तरह से अक्षर लिखने की परम्परा है. प्राचीन ग्रीक में दोनों तरह के अक्षरों का इस्तेमाल होता था, अन्यथा शेष भाषाएं छापाखाने के आविष्कार के पहले तक हाथ के लिखे लेख में एक तरह के अक्षरों का इस्तेमाल ही करती थीं. पुराने जमाने में रोमन स्क्वायर कैपिटल्स का इस्तेमाल इमारतों, भित्तियों या प्रस्तर लेखों में होता था. दोनों तरह के वर्ण होने पर भी हस्तलेख में कर्सिव शैली का इस्तेमाल होता था. पन्द्रहवीं सदी में छापाखाने का आविष्कार होने और गुटेनबर्ग के मूवेबल टाइप बन जाने के बाद छपाई में दोनों तरह अक्षर इस्तेमाल में आने लगे. दोनों तरह के टाइपों को साथ रखने के लिए दो तरह के केस बने. ऊपर रखे केस को अपर और नीचे रखे केस को लोअर कहते थे. दोनों केस के टाइपों का इस्तेमाल समय के साथ नए-नए ढंग से होता रहा. यह प्रयोग चल ही रहा है. अब आप अंग्रेजी के फॉर के लिए 4 का इस्तेमाल देख रहे हैं.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Thursday, May 12, 2016

चीन का विगुर आंदोलन

चीन के शेनजियांग प्रांत में विगुर अलगाववादी आंदोलन चल रहा है. हिन्दी में इसे उइगुर भी लिखा जा रहा है. हाल में इस आंदोलन के नेता दोल्कुन इसा को भारत का वीजा मिलने और फिर रद्द होने के कारण यह इलाका खबरों में आया. दूसरी वजह है चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर. शेनजियांग से पाकिस्तान के बंदरगाह ग्वादर तक चीन कॉरिडोर बना रहा है, जिसमें राजमार्ग, रेलमार्ग और बिजलीघर वगैरह बनेंगे. शेनजियांग की राजधानी उरुमछी है. इसका सबसे बड़ा नगर काशगर है. चीन में जातिगत हिंसा और सन 2009 में कर्फ़्यू लगने के बाद इसका जिक्र बढ़ा. तिब्बत से भी बड़ा प्रतिरोध शेनजियांग प्रांत में है. यहाँ के लोग पश्चिम में तुर्की की ओर से और उत्तर में मंगोलिया से आए हैं. सन 1933 और 1944 में दो बार यहाँ पूर्वी तुर्किस्तान नाम के स्वतंत्र देश बन चुका है. राजनीतिक शक्ति न होने और सोवियत संघ के दबाव में दोनों बार यह विफल रहा.

बायो टॉयलेट

बायो टॉयलेट मोटे तौर पर ड्राई टॉयलेट हैं जिनमें मल निस्तारण के लिए कम से कम पानी का इस्तेमाल होता है. इसके लिए कई तरह की तकनीकें प्रचलित हैं. डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) ने जो टॉयलेट विकसित किया है उसमें शौचालय के नीचे बायो डाइजेस्टर कंटेनर में एनेरोबिक बैक्टीरिया होते हैं जो मानव मल को पानी और गैसों में तब्दील कर देते हैं. इन गैसों को वातावरण में छोड़ दिया जाता है जबकि दूषित जल को क्लोरिनेशन के छोड़ दिया जाता है. इसे खेती या कंस्ट्रक्शन के काम में इस्तेमाल किया जा सकता है.

किताब का अंतरराष्ट्रीय नम्बर आईएसबीएन

आईएसबीएन (ISBN) नम्बर किताबों की पहचान का नम्बर है. इसे इंटरनेशनल स्टैंडर्ड बुक नम्बर कहते हैं. हर प्रकाशित पुस्तक का एक खास नम्बर होता है. यह प्रकाशकों, पुस्तकालयों और वितरकों के लिए उपयोगी है. सन 1966 में पुस्तक विक्रेता डब्ल्यूएच स्मिथ ने ट्रिनिटी कॉलेज, डबलिन के प्रोफेसर गॉर्डन फॉस्टर से 9 डिजिट का नम्बर तैयार कराया था. इसके बाद इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर स्टैंडर्डाइजेशन ने सारी दुनिया के प्रकाशकों के लिए यूनीक नम्बर की ज़रूरत महसूस की. 1970 से 10 डिजिट का अंतरराष्ट्रीय नम्बर शुरू हो गया. जनवरी 2007 से 13 डिजिट का आईएसबीएन शुरू हुआ जो आजकल प्रचलन में है. आपको 10 और 13 डिजिट के दोनों नम्बर इस्तेमाल में मिलेंगे. सारे प्रकाशक अभी इसे ढंग से लागू कर भी नहीं रहे हैं.

हिंदी में फुल स्टॉप
हिन्दी में जिन विराम चिह्नों का प्रयोग होता है उनमें अधिकतर यूरोप से आए हैं. संस्कृत से हमें केवल एक विराम चिह्न मिला है वह है खड़ी पाई. अल्प विराम, कोलन, सेमी कोलन, डैश और उद्धरण चिह्न इनवर्टेड कॉमा हमने बाहर से लिए हैं. पूर्ण विराम के रूप में खड़ी पाई का इस्तेमाल हम काफी समय से करते आए हैं और आज भी यह सबसे ज्यादा प्रचलित है. हमने अंकों के लिए रोमन को संवैधानिक रूप से स्वीकार कर लिया है इस वजह से 1 और विराम चिह्न ‘।’ में टकराव होने लगा है. हाथ से लिखने पर कभी वाक्य 101 पर खत्म हो तो 101 को ‘101।.’ यानी एक हजार ग्यारह भी पढ़ा जा सकता है. यह सही है या गलत कहने का कोई मतलब नहीं. इस समय दोनों रूप चल रहे हैं.

यूनिसेफ के काम

दूसरे विश्वयुद्ध में तमाम देशों में बरबादी हुई. खासतौर से बच्चों का जीवन कष्टमय हो गया. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसम्बर 1946 को युनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल चिल्ड्रंस इमर्जेंसी फंड की स्थापना की. इस संस्था ने बहुत अच्छा काम किया. अंतत: 1953 में इसे एक स्थायी संस्था बना दिया गया जिसका नाम छोटा कर दिया गया. नया नाम था युनाइटेड नेशंस चिल्ड्रंस फंड. इसे संक्षेप में अब भी युनीसेफ ही कहते हैं. युनीसेफ को 1965 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया और 2006 में प्रिंस ऑफ ऑस्तुरियाज़ अवॉर्ड ऑव कॉनकॉर्ड दिया गया.

सिलाई मशीन का आविष्कार

सिलाई मशीन पहली औद्योगिक क्रांति की देन है. इसका जब पहली बार आविष्कार हुआ तब यह ऐसी नहीं थी जैसी आज है. सन 1791 में पहली बार ब्रिटिश आविष्कारक टॉमस सेंट ने एक सिलाई मशीन को पेटेंट कराया. इसे सिर्फ पेटेंट ही कराया गया. इसका व्यावहारिक मॉडल कभी नहीं बना. 1830 में फ्रांस के टेलर बार्थेल्मी तिमोने ऐसी मशीन बना पाए जो कपड़ों की सिलाई करती थी. वे फ़्रांसीसी सेना के लिए वर्दियाँ तैयार करते थे. इसके बाद कई तरह की मशीनें बनीं, पर सबसे महत्वपूर्ण काम अमेरिकी आविष्कारक, अभिनेता और उद्यमी आइजक मैरिट सिंगर ने किया. उन्होंने जो मशीन तैयार की उसकी सूई लम्बवत थी जैसी आज की मशीनों में होती है. आज हालांकि तमाम तरह की मशीनें हैं, पर इनमें ज्यादातर तत्व सिंगर के हैं. 

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Monday, May 9, 2016

बैंकिंग प्रणाली में आरटीजीएस और आईएफएससी कोड क्या है?

यह बैंकों के धनराशि लेन-देन की व्यवस्था है। भारतीय बैंक रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (आरटीजीएस) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर प्रणाली के मार्फत काम करते हैं। आमतौर पर धनराशि का ट्रांसफर इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग सर्विसेज (ईसीएस) के मार्फत होता है। इस व्यवस्था के तहत बैंकों की ब्रांचों के इंडियन फाइनेंशियल सिस्टम कोड (आईएफएससी) परदान किए गए हैं। यह कोड चेक पर लिखा रहता है। आम आदमी को जल्द और सही सेवा देने के लिए ही इन्हें बनाया गया है।

प्लास्टिक सर्जरी क्या है?

प्लास्टिक सर्जरी का मतलब है, शरीर के किसी हिस्से को ठीक करना या पुनर्जीवित करना। इसमें प्लास्टिक शब्द-ग्रीक शब्द "प्लास्टिको" से आया है। ग्रीक में प्लास्टिको का अर्थ होता है बनाना या तैयार करना। प्लास्टिक सर्जरी  में सर्जन शरीर के किसी हिस्से के सेल निकालकर दूसरे हिस्से में जोड़ता है और वे स्वयं उस अंग की जगह ले लेते हैं। प्रायः दुर्घटना या किसी कारण से अंग भंग होने पर इसका इस्तेमाल होता है। हाथ-पैर कट जाने, चेहरे, नाक, कान वगैरह में विकृति आने पर इसकी मदद ली जाती है। प्लास्टिक सर्जरी का श्रेय छठी शताब्दी ईसा पूर्व के भारतीय शल्य चिकित्सक सुश्रुत को जाता है। 

मार्टिन लूथर किंग कौन थे?
दो प्रसिद्ध मार्टिन लूथर हुए हैं। पहले हैं मार्टिन लूथर (1483-1546), जो ईसाई धर्म में प्रोटेस्टवाद नामक सुधारात्मक आन्दोलन चलाने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे जर्मन भिक्षु, धर्मशास्त्री, विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, पादरी एवं चर्च-सुधारक थे जिनके विचारों के द्वारा प्रोटेस्टिज्म सुधारान्दोलन आरम्भ हुआ जिसने पश्चिमी यूरोप के विकास की दिशा बदल दी। दूसरे हैं डॉ. मार्टिन लूथर किंग (15 जनवरी 1929 से 4 अप्रैल 1968) अमेरिका के एक पादरी, आन्दोलनकारी (ऍक्टिविस्ट) एवं अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिक अधिकारों के संघर्ष के प्रमुख नेता थे। उन्हें अमेरिका का गांधी भी कहा जाता है। उनके प्रयत्नों से अमेरिका में नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में प्रगति हुई; इसलिए उन्हें आज मानव अधिकारों के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। इनका जन्म का नाम माइकेल किंग जूनियर था। इनके पिता का नाम भी माइकेल किंग था। बेटे का नाम हुआ माइकेल किंग जूनियर। इनका परिवार 1934 में यूरोप की यात्रा पर गया और वहाँ प्रोटेस्टेंट आंदोलन के नेता मार्टिन लूथर के कार्यों से परिचित होने के बाद इनके पिता ने अपने बेटे का नाम मार्टिन लूथर रख दिया।

विश्व का सबसे प्राचीन खेल कौन सा है और किस देश में खेला जाता है?

प्राचीन गुफा चित्रों को देखें तो शिकार को पहला खेल माना जा सकते है। यदि इसे खेल न मानें तो दौड़ना, तैराकी और कुश्ती को दुनिया के प्राचीनतम खेल कहा जा सकता है। इसमें फेंकना या थ्रो को भी शामिल कर सकते हैं। फेंकने में भाला, चक्का और गोला फेंकना शामिल है। आज ये खेल सभी देशों में खेले जाते हैं। यह क्रीड़ा है। इसके अलावा आदि मानव ने गुफाओं में कालिख से लकीरें खींचकर भी खेल खेले हैं। मिस्र की प्राचीन सभ्यता के अवशेषों में छोटे-छोटे रंगीन पत्थर और हाथी तथा अन्य पशुओं की आकृतियाँ मिली हैं, जिनसे लगता है कि वे बोर्ड गेम खेलते थे।


कुओं की खुदाई गोल और पोखरों की खुदाई चौकोर क्यों होती है?
कुओं के निर्माण को साथ यह बात जुड़ी होती है कि उनकी दीवार भीतर से मज़बूत हो। गोलाकार या आर्च के आकार की दीवार काफी मजबूत होती है। पुराने ज़माने में जब लिंटेल नहीं होते थे या आरसीसी निर्माण नहीं होता था आर्च के सहारे बड़े-बड़े हॉल और पुल बनते थे। चौकोर कुआं बनाने पर चारों दीवारों की मजबूती के मुकाबले गोलाकार दीवार कहीं मजबूत होगी। पोखरों का आकार बड़ा होता है और उनपर यह बात लागू नहीं होती। बावज़ूद इसके दुनिया के कई मशहूर बाँध जैसे हूवर बाँध अर्ध गोलाकार हैं। ऐसे बाँधों को आर्च डैम कहते है।
  
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Friday, May 6, 2016

कोलकाता है भारत का पहला आधुनिक विश्वविद्यालय

प्राचीन भारत के तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय दुनिया के प्राचीनतम विश्वविद्यालय हैं. पर आधुनिक विश्वविद्यालयों की बात करें तो भारत का पहला विश्वविद्यालय कोलकाता में खुला. इसकी स्थापना 24 जनवरी 1857 को हुई. उसी साल मद्रास और मुम्बई की प्रेसीडेंसियों में भी विश्वविद्यालय खुले थे. कोलकाता विश्वविद्यालय से जुड़े चार विद्वानों को नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं. इनके नाम हैं-रोनाल्ड रॉस, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, सीवी रामन और अमर्त्य सेन. इनमें रोनाल्ड रॉस के नाम से काफी लोग अपरिचित होंगे. उत्तरांचल के अल्मोड़ा शहर में जन्मे रोनाल्ड रॉस डॉक्टर थे और कोलकाता में उन्होंने मलेरिया रोग पर काम किया था. इसी काम के आधार पर उन्हें 1902 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला. नोबेल पुरस्कारों का वह दूसरा वर्ष था. कोलकाता विश्वविद्यालय के पहले स्नातकों में जदुनाथ बोस और बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय थे.

पश्चिम से आया दीक्षा समारोह का गाउन

दरअसल आधुनिक विश्वविद्यालय परम्परा यूरोप से आई है. कॉन्वोकेशन गाउन या रोब का विचार भी यूरोपीय है. इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों को विशिष्ट पहचान देना है. ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों ने यूरोप के 12वीं और 13वीं सदी के विश्वविद्यालयों के तर्ज पर इन्हें डिजाइन किया. हालांकि अब ये गाउन सिर्फ दीक्षा समारोह में नज़र आते हैं, पर पुराने ज़माने में ये रोज़ पहने जाते थे. यह परिधान परम्परा पादरियों, डॉक्टरों और दरबार के अधिकारियों तक जाती है.

इस परिधान में गाउन या रोब, हुड या कैप मुख्य होते हैं. इसके कई डिजाइन और रंग हैं, जो अलग-अलग विश्वविद्यालयों की पहचान बताते हैं और एक ही विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों के या विशेषज्ञता के अलग वर्गों को भी बताते हैं. यूरोप से निकल कर ये परिधान सारी दुनिया में पहुँच गए हैं.

नीदरलैंड नहीं, द नीदरलैंड्स

अंग्रेजी में कुछ संज्ञाओं के पहले आर्टिकल ए, एन या द लगाया जाता है ताकि उस वस्तु या स्थान को निश्चित या अनिश्चित रूप में पहचाना जा सके. ‘ए बॉय’ कोई एक लड़का होगा, पर ‘द बॉय’ कोई खास लड़का होगा. आपने अखबारों के नाम देखे होंगे-द टाइम्स, द पायनियर. यह विशिष्ट पहचान वाले नाम हैं. ऐसे ही कुछ देशों के नाम हैं. हॉलैंड को द नीदरलैंड्स लिखा जाता है. देश का नाम द नीदरलैंड्स ही है. नीदरलैंड्स का अर्थ है निचला इलाका. इस देश में लगभग 21 प्रतिशत ज़मीन समुद्र तल से नीची है. वह ज़मीन जो समुद्र तल से नीची है. इसमें देश के नाम का विवरण है. इसे नीदरलैंड्स भी लिखते हैं, पर औपचारिक रूप से द नीदरलैंड्स है. ज़मीन का बहुवचन रूप इसमें व्यक्त होता है. यह अकेला ऐसा नाम नहीं है. यूएसए भी द युनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका है. ऐसा ही नाम था द सोवियत यूनियन. द चेक रिपब्लिक, द फिलिपीन्स (अनेक द्वीप), द रिपब्लिक ऑफ लेबनॉन(पहाड़ियाँ), द रिपब्लिक ऑफ सूडान (रेगिस्तान) द मिडिल ईस्ट, द हेग, द बहामास. अब हम अर्जेंटाइना लिखते हैं. वर्ना वह भी द अर्जेंटाइन रिपब्लिक है.

जीवधारियों की बनाई सबसे बड़ी रचना ग्रेट बैरियर रीफ

ग्रेट बैरियर रीफ के बारे में जानने से पहले रीफ क्या होती है, इसे भी समझ लें. समुद्र में पानी के नीचे कई तरह की चट्टानें होती हैं. सामान्य पथरीली चट्टानों की तुलना में समु्द्री जीवों जैसे मूंगे की चट्टानों से बने रीफ एक प्रकार से सागर में एक जैविक व्यवस्था है. ग्रेट बैरियर रीफ उत्तर पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड के पास को कोरल सागर में हैं. इसमें 2900 अलग-अलग रीफ शामिल हैं, जो 2600 किलोमीटर की लम्बाई में फैली हैं. इसके अंतर्गत करीब 3,44,400 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आता है. अंतरिक्ष से पृथ्वी पर नजर आने वाली चीन की महान दीवार से भी यह बड़ी है. विश्व की यह सबसे बड़ी मूँगे की दीवार है. दुनिया में जीवधारियों द्वारा रची गई सबसे बड़ी रचना. इसकी महत्ता को देखते हुए युनेस्को ने 1981 में इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया.

इसे आधुनिक दुनिया के सात अजूबों में शामिल किया जाता है. ग्रेट बैरियर रीफ हम्पबैक ह्वेल्स का ब्रीडिंग एरिया माना जाता है, जो कि अंटार्कटिक से प्रवास के लिए यहां पहुंचती हैं. कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों का आवास भी यहाँ है जिनमें डुगॉन्ग (सी काउ) और लार्ज ग्रीन सी टर्टल शामिल हैं. पक्षियों की 215 प्रजातियां (जिनमें सीबर्ड की 22 प्रजातियां और शोरबर्ड्स की 32 प्रजातियां भी शामिल हैं) रीफ में घोंसला बनाने या बसेरा बनाने के लिए आती हैं. सांपों की सत्रह प्रजातियां यहाँ पाई गई हैं. 1,500 से ज्यादा मछलियों की प्रजातियां यहां मिलती हैं.

यों तो इस रीफ का ज्यादातर हिस्सा जलमग्न है, परंतु कहीं-कहीं जल के बाहर भी नजर आती है. महाद्वीप के तट से इसकी दूरी 10 से 150 मील तक है. समुद्री तूफान के समय अनेक पोत इससे टक्कर खाकर ध्वस्त हो जाते हैं. अलबत्ता यह पोतचालकों के लिए सहायक है, क्योंकि दीवार के भीतर की जलधारा तटगामी पोतों के लिए सुरक्षित रास्ता बनाती है. पोत इसमें से गुजरने पर खुले समुद्री तूफानों से बचे रहते हैं. पर ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण आ रहा जलवायु परिवर्तन इसे नुकसान पहुँचा रहा है. वैज्ञानिकों को अंदेशा है कि 2050 तक यह रीफ नष्ट हो जाएगी.    
                                                                                 
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित