Friday, May 6, 2016

कोलकाता है भारत का पहला आधुनिक विश्वविद्यालय

प्राचीन भारत के तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय दुनिया के प्राचीनतम विश्वविद्यालय हैं. पर आधुनिक विश्वविद्यालयों की बात करें तो भारत का पहला विश्वविद्यालय कोलकाता में खुला. इसकी स्थापना 24 जनवरी 1857 को हुई. उसी साल मद्रास और मुम्बई की प्रेसीडेंसियों में भी विश्वविद्यालय खुले थे. कोलकाता विश्वविद्यालय से जुड़े चार विद्वानों को नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं. इनके नाम हैं-रोनाल्ड रॉस, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, सीवी रामन और अमर्त्य सेन. इनमें रोनाल्ड रॉस के नाम से काफी लोग अपरिचित होंगे. उत्तरांचल के अल्मोड़ा शहर में जन्मे रोनाल्ड रॉस डॉक्टर थे और कोलकाता में उन्होंने मलेरिया रोग पर काम किया था. इसी काम के आधार पर उन्हें 1902 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला. नोबेल पुरस्कारों का वह दूसरा वर्ष था. कोलकाता विश्वविद्यालय के पहले स्नातकों में जदुनाथ बोस और बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय थे.

पश्चिम से आया दीक्षा समारोह का गाउन

दरअसल आधुनिक विश्वविद्यालय परम्परा यूरोप से आई है. कॉन्वोकेशन गाउन या रोब का विचार भी यूरोपीय है. इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों को विशिष्ट पहचान देना है. ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों ने यूरोप के 12वीं और 13वीं सदी के विश्वविद्यालयों के तर्ज पर इन्हें डिजाइन किया. हालांकि अब ये गाउन सिर्फ दीक्षा समारोह में नज़र आते हैं, पर पुराने ज़माने में ये रोज़ पहने जाते थे. यह परिधान परम्परा पादरियों, डॉक्टरों और दरबार के अधिकारियों तक जाती है.

इस परिधान में गाउन या रोब, हुड या कैप मुख्य होते हैं. इसके कई डिजाइन और रंग हैं, जो अलग-अलग विश्वविद्यालयों की पहचान बताते हैं और एक ही विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों के या विशेषज्ञता के अलग वर्गों को भी बताते हैं. यूरोप से निकल कर ये परिधान सारी दुनिया में पहुँच गए हैं.

नीदरलैंड नहीं, द नीदरलैंड्स

अंग्रेजी में कुछ संज्ञाओं के पहले आर्टिकल ए, एन या द लगाया जाता है ताकि उस वस्तु या स्थान को निश्चित या अनिश्चित रूप में पहचाना जा सके. ‘ए बॉय’ कोई एक लड़का होगा, पर ‘द बॉय’ कोई खास लड़का होगा. आपने अखबारों के नाम देखे होंगे-द टाइम्स, द पायनियर. यह विशिष्ट पहचान वाले नाम हैं. ऐसे ही कुछ देशों के नाम हैं. हॉलैंड को द नीदरलैंड्स लिखा जाता है. देश का नाम द नीदरलैंड्स ही है. नीदरलैंड्स का अर्थ है निचला इलाका. इस देश में लगभग 21 प्रतिशत ज़मीन समुद्र तल से नीची है. वह ज़मीन जो समुद्र तल से नीची है. इसमें देश के नाम का विवरण है. इसे नीदरलैंड्स भी लिखते हैं, पर औपचारिक रूप से द नीदरलैंड्स है. ज़मीन का बहुवचन रूप इसमें व्यक्त होता है. यह अकेला ऐसा नाम नहीं है. यूएसए भी द युनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका है. ऐसा ही नाम था द सोवियत यूनियन. द चेक रिपब्लिक, द फिलिपीन्स (अनेक द्वीप), द रिपब्लिक ऑफ लेबनॉन(पहाड़ियाँ), द रिपब्लिक ऑफ सूडान (रेगिस्तान) द मिडिल ईस्ट, द हेग, द बहामास. अब हम अर्जेंटाइना लिखते हैं. वर्ना वह भी द अर्जेंटाइन रिपब्लिक है.

जीवधारियों की बनाई सबसे बड़ी रचना ग्रेट बैरियर रीफ

ग्रेट बैरियर रीफ के बारे में जानने से पहले रीफ क्या होती है, इसे भी समझ लें. समुद्र में पानी के नीचे कई तरह की चट्टानें होती हैं. सामान्य पथरीली चट्टानों की तुलना में समु्द्री जीवों जैसे मूंगे की चट्टानों से बने रीफ एक प्रकार से सागर में एक जैविक व्यवस्था है. ग्रेट बैरियर रीफ उत्तर पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड के पास को कोरल सागर में हैं. इसमें 2900 अलग-अलग रीफ शामिल हैं, जो 2600 किलोमीटर की लम्बाई में फैली हैं. इसके अंतर्गत करीब 3,44,400 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आता है. अंतरिक्ष से पृथ्वी पर नजर आने वाली चीन की महान दीवार से भी यह बड़ी है. विश्व की यह सबसे बड़ी मूँगे की दीवार है. दुनिया में जीवधारियों द्वारा रची गई सबसे बड़ी रचना. इसकी महत्ता को देखते हुए युनेस्को ने 1981 में इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया.

इसे आधुनिक दुनिया के सात अजूबों में शामिल किया जाता है. ग्रेट बैरियर रीफ हम्पबैक ह्वेल्स का ब्रीडिंग एरिया माना जाता है, जो कि अंटार्कटिक से प्रवास के लिए यहां पहुंचती हैं. कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों का आवास भी यहाँ है जिनमें डुगॉन्ग (सी काउ) और लार्ज ग्रीन सी टर्टल शामिल हैं. पक्षियों की 215 प्रजातियां (जिनमें सीबर्ड की 22 प्रजातियां और शोरबर्ड्स की 32 प्रजातियां भी शामिल हैं) रीफ में घोंसला बनाने या बसेरा बनाने के लिए आती हैं. सांपों की सत्रह प्रजातियां यहाँ पाई गई हैं. 1,500 से ज्यादा मछलियों की प्रजातियां यहां मिलती हैं.

यों तो इस रीफ का ज्यादातर हिस्सा जलमग्न है, परंतु कहीं-कहीं जल के बाहर भी नजर आती है. महाद्वीप के तट से इसकी दूरी 10 से 150 मील तक है. समुद्री तूफान के समय अनेक पोत इससे टक्कर खाकर ध्वस्त हो जाते हैं. अलबत्ता यह पोतचालकों के लिए सहायक है, क्योंकि दीवार के भीतर की जलधारा तटगामी पोतों के लिए सुरक्षित रास्ता बनाती है. पोत इसमें से गुजरने पर खुले समुद्री तूफानों से बचे रहते हैं. पर ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण आ रहा जलवायु परिवर्तन इसे नुकसान पहुँचा रहा है. वैज्ञानिकों को अंदेशा है कि 2050 तक यह रीफ नष्ट हो जाएगी.    
                                                                                 
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

No comments:

Post a Comment