Wednesday, December 31, 2025

वीडियो रेफरल यानी थर्ड अंपायर

खेलों में पहले रेफरी या अंपायर नहीं होते थे। सबसे पहले फुटबॉल में रेफरी बने। पहले टीमों के कप्तान मिलकर तय कर लेते थे कि गोल हुआ या नहीं। अब सभी खेलों में वीडियो रेफरल का चलन बढ़ रहा है और अंपायर के फैसलों को चुनौती देने की व्यवस्था भी है। फुटबॉल में इसे 2018 में मान्यता मिली, पर क्रिकेट और हॉकी में इसने पहले जगह बना ली थी। साठ के दशक में टीवी प्रसारण में ‘इंस्टेंट रिप्ले’ होते थे। इसी रिप्ले के सहारे क्रिकेट में थर्ड अंपायर की शुरुआत नवंबर 1992 में भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच डरबन टेस्ट मैच में हुई। मैच के दूसरे दिन थर्ड अंपायर के फैसले से सचिन तेंदुलकर रन आउट हुए थे। फिर डीआरएस (डिसीज़न रिव्यू सिस्टम) की ईज़ाद हुई और 2008 में भारत-श्रीलंका टेस्ट मैच में इसका परीक्षण हुआ। 23-26 जुलाई के बीच खेले गए टेस्ट मैच में वीरेंद्र सहवाग इस सिस्टम के तहत आउट पहले खिलाड़ी थे। नवंबर 2009 में ड्यूनेडिन में न्यूज़ीलैंड-पाकिस्तान टेस्ट में आधिकारिक रूप से इसे लागू किया गया। जनवरी 2011 में इंग्लैंड की टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गई, तब पहली बार एकदिनी मैचों में और 2017 में टी-20 में इसकी अनुमति मिली। इसमें तकनीकी सुधार होते गए और हो रहे हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 20 दिसंबर 2025 को प्रकाशित

Tuesday, December 30, 2025

सीएनएपी कॉलर आईडी

 

भारत में जल्द ही ऐसी व्यवस्था शुरू होने वाली है, जिससे आपके फोन पर आने वाली कॉलर का केवल नंबर ही नहीं उसका नाम भी आएगा, जिसपर सिम रजिस्टर हुआ है। यह वर्तमान कॉलिंग पहचान से आगे का कदम है, जिसमें केवल कॉल करने वाले का नंबर प्रदर्शित होता है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने इस कॉलर आईडी प्रणाली को लागू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसका नाम है कॉलिंग नेम प्रेजेंटेशन (सीएनएपी)। इस सुविधा का इन दिनों परीक्षण किया जा रहा है और आशा है कि 31 मार्च, 2026 तक देशभर में इसका रोल आउट हो जाएगा। कोई भी मोबाइल फोन धारक इस सुविधा का लाभ ले सकेगा और चाहे तो इसे हटा भी सकेगा। इसके लॉन्च होते ही यह दुनिया का सबसे बड़ा वैरीफाइड कॉलर आईडी सिस्टम होगा। इससे स्पैम और फर्जी कॉल रोकने में आसानी होगी। इसके बाद ट्रू कॉलर जैसे थर्ड पार्टी ऐप की जरूरत नहीं होगी। ट्रूकॉलर जैसी थर्ड पार्टी सेवाएँ क्राउड-सोर्स जानकारी पर निर्भर करती हैं और कई बार गलत भी होती हैं। सीएनएपी कॉलर के केवाईसी रिकॉर्ड के आधार पर उसका नाम कॉल रिसीव करने वाले को दिखाएगा।

 

 

 

 

Monday, December 29, 2025

भारत में आतंक-विरोधी कानून

 

देश में अस्सी के दशक में आतंकी गतिविधियाँ बढ़ने के बाद टैररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज़ एक्ट (टाडा)-1987 बनाया गया। इसके दुरुपयोग की शिकायतें मिलने के बाद 1995 में इसे लैप्स होने दिया गया। इस कानून में पुलिस के सामने कबूल की गई बातों को प्रमाण मान लिया जाता था। सन 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान के अपहरण और 2001 में संसद भवन पर हुए हमले के बाद प्रिवेंशन ऑफ टैररिज्म एक्ट (पोटा)-2002 बना। इसके दुरुपयोग की शिकायतों के बाद 2004 में इसे रद्द कर दिया गया। इन दोनों कानूनों के पहले देश में अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट (यूएपीए)-1967 का कानून भी था। सन 2008 में मुंबई हमले के बाद इस कानून में संशोधन करके इसका इस्तेमाल होने लगा। सन 2012 और 2019 में इसमें और संशोधन किया गया। इसमें आतंकवाद की परिभाषा में बड़े बदलाव किए गए। देश की अर्थव्यवस्था को धक्का पहुँचाने, जाली नोटों का प्रसार करने जैसी बातें भी इसमें शामिल की गईं। इसके अलावा राज्य स्तर के कानून भी हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका)। इनके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) (1980) का प्रयोग निवारक निरोध के लिए किया जाता है।

राजस्थान पत्रिका में 13 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित

 

 

 

Monday, December 22, 2025

स्विट्ज़रलैंड का लोकतंत्र

 

हालांकि स्विट्ज़रलैंड 1945 से संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं के मेजबान  देश के रूप में कार्य कर रहा है, लेकिन यह आधिकारिक रूप से 2002 में ही संयुक्त राष्ट्र में शामिल हुआ। इसके पहले देश में इस फैसले को लेकर एक जनमत संग्रह हुआ था, जिसमें 54.6 प्रतिशत नागरिकों ने संरा में शामिल होने के पक्ष में वोट दिया था। संयुक्त राष्ट्र के 193 देशों में से स्विट्ज़रलैंड 190वाँ देश था, जो इसमें शामिल हुआ।

स्विस तटस्थता (Swiss Neutrality) स्विट्ज़रलैंड की विदेश नीति का एक मूल सिद्धांत है, जिसके तहत यह देश किसी सशस्त्र संघर्ष या युद्ध में भाग नहीं लेता। यह दुनिया की सबसे पुरानी और स्थायी सैन्य तटस्थता नीति है, जो स्विट्ज़रलैंड की स्वतंत्रता, सुरक्षा और शांति को सुनिश्चित करने के लिए अपनाई गई है।

देश में काफी सीमा तक प्रत्यक्ष लोकतंत्र (डायरेक्ट डेमोक्रेसी) है, और यह दुनिया का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। यों इसे शुद्ध रूप से पूर्ण प्रत्यक्ष लोकतंत्र नहीं, बल्कि अर्ध-प्रत्यक्ष या सेमी-डायरेक्ट डेमोक्रेसी कहा जाता है, क्योंकि यह प्रतिनिधि-लोकतंत्र (representative democracy) के साथ संयोजित है। अलबत्ता यहाँ अक्सर जनमत संग्रह होते रहते हैं। 

Saturday, November 29, 2025

भारत में प्रशासनिक सेवाएँ

 

प्रशासनिक सेवा के अलावा पुलिस और विदेश सेवा को इसमें शामिल करते हैं। आज इसका काफी विस्तार हो चुका है। भारत में 1857 की लड़ाई के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थान पर अंग्रेजी सरकार का शासन स्थापित हुआ। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858 के तहत नागरिक सेवाओं के लिए नियुक्ति के नियम भी बने। इस सेवा को इंपीरियल सिविल सर्विस और बाद में इंडियन सिविल सर्विस का नाम दिया गया। शुरुआत में उनकी भरती की परीक्षाएँ लंदन में होती थीं। बाद में भारत में भी होने लगीं। 1923 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में स्थानीय भागीदारी के लिए आयोग बनाया गया, जिसके अध्यक्ष थे लॉर्ड ली ऑफ फेयरहैम। इसके पहले इंस्लिंगटन कमीशन और मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड आयोग ने भी भारतीयों की भागीदारी की सिफारिशें की थीं। ली आयोग ने 40 फीसदी स्थान ब्रिटिश, 40 फीसदी भारतीय सीधे और 20 फीसदी प्रादेशिक सेवाओं से प्रोन्नति देकर अफसरों को देने का सुझाव दिया। भरती के लिए लोक सेवा आयोग बनाने की सिफारिश भी की। इसके बाद 1926 में संघ लोकसेवा आयोग की स्थापना हुई। स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा ने अनुच्छेद 315 के तहत इसे एक स्वायत्त संस्था के रूप में संविधान में स्थान दिया।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 29 नवंबर, 2025 को प्रकाशित

Saturday, November 22, 2025

एंटी-मैटर क्या है?

एंटी-मैटर भी पदार्थ है जो सामान्य पदार्थ के विपरीत गुणों वाला होता है। यह सामान्य पदार्थ के कणों के समान होता है, लेकिन इसके कणों के विद्युत आवेश और अन्य गुण विपरीत होते हैं। इलेक्ट्रॉन का एंटी-कण पॉज़िट्रॉन होता है, जिसका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के बराबर होता है, लेकिन चार्ज धनात्मक होता है, जबकि इलेक्ट्रॉन का चार्ज ऋणात्मक होता है। जब एंटी-मैटर का कोई कण अपने समान सामान्य पदार्थ के कण से मिलता है (जैसे पॉज़िट्रॉन और इलेक्ट्रॉन), तो दोनों टकराकर नष्ट हो जाते हैं और उनकी ऊर्जा गामा किरणों के रूप में निकलती है। ब्रह्मांड में यह बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। एक मिलीग्राम एंटी मैटर बनाने में लाखों डॉलर लग सकते हैं, जिसके कारण यह पृथ्वी पर सबसे महंगी वस्तुओं में से एक है। चिकित्सा में, पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी पैटस्कैन में कैंसर जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। एंटी-मैटर का अध्ययन ब्रह्मांड की उत्पत्ति और भौतिक-नियमों को समझने में मदद करता है। बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड की शुरुआत में मैटर और एंटी-मैटर बराबर मात्रा में बने थे। आज एंटी-मैटर बहुत कम है। यह असंतुलन अनसुलझी पहेली है, जिसे ‘बेरियन असिमेट्री’ कहते हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 22 नवंबर 2025 को प्रकाशित

Sunday, November 16, 2025

सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक?

ये शब्द आमतौर पर जेट विमानों या मिसाइलों के लिए प्रयुक्त होते हैं। ‘सोनिक’ का मतलब है ध्वनि। सुपरसोनिक का अर्थ है ध्वनि से तेज़। जब कोई वस्तु ध्वनि की गति से ज्यादा तेज चलती है, तब उसे ‘मैक’ कहते हैं। हाइपरसोनिक का मतलब है ध्वनि से पाँच गुना (मैक 5) या उससे भी तेज गति। सभी हाइपरसोनिक गति सुपरसोनिक हैं, लेकिन सभी सुपरसोनिक, हाइपरसोनिक नहीं हैं। हाइपरसोनिक गति के साथ उच्च तापमान और अन्य जटिल भौतिकी प्रभाव होते हैं। पहले जेट इंजन के सिद्धांत को समझें। जेट शक्ति का विचार ईसा से करीब 150 वर्ष पहले पूर्व के एओलिपाइल के आविष्कार से सिद्ध हो चुका था, जिसमें दो नोजल के माध्यम से एक गोलाकार पात्र में मौजूद भाप की शक्ति का उपयोग किया जाता था। इससे गोला अपनी धुरी पर तेज़ी से घूमता था। इस सिद्धांत के बावज़ूद इसका उपयोग यांत्रिक शक्ति के लिए नहीं हुआ। बीसवीं सदी के शुरू में इस दिशा में काम हुआ और ब्रिटिश इंजीनियर सर फ्रैंक ह्विटल ने 1930 में अपने टर्बोजेट डिज़ाइन का पेटेंट कराया। आज जेट के अलावा रैमजेट और स्क्रैमजेट इंजन भी बन चुके हैं, जो हाइपरसोनिक गति प्रदान करते हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 15 नवंबर 2025 को प्रकाशित

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