Thursday, April 21, 2016

क्रिकेट में नेल्सन अंक का क्या अर्थ है? यह कब से आरम्भ हुआ?

नेल्सन, डबल नेल्सन और ट्रिपल नेल्सन क्रिकेट में 111, 222 और 333 के स्कोर को कहते हैं. यह एक लोक प्रयोग हैं और इसे ब्रिटेन की नौसेना के अठारहवीं सदी के मशहूर एडमिरल लॉर्ड होरेशियो नेल्सन के नाम से जोड़ते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस बहादुर फौजी की एक आँख, एक हाथ और एक पैर लड़ाई में जाता रहा. यह तथ्य पूरी तरह सही नहीं है. उनकी एक आँख और एक हाथ वाली बात तक ठीक है, पर उनके दोनों पैर थे. बहरहाल नेल्सन स्कोर के साथ अंधविश्वास है कि इसपर विकेट गिरता है. हालांकि यह भी सच नहीं है. ‘द क्रिकेटर’ नाम की मशहूर मैगजीन ने पुराने स्कोर की पड़ताल की तो इन स्कोरों पर विकेट ज्यादा नहीं गिरे हैं. सबसे ज्यादा विकेट 0 के स्कोर पर गिरते हैं. बहरहाल प्रसिद्ध अम्पायर डेविड शेफर्ड ने नेल्सन स्कोर को प्रसिद्ध बनाया. वे इस स्कोर पर या तो एक पैर उठा देते थे या तब तक दोनों पैरों पर खड़े नहीं होते थे, जब तक स्कोर आगे न बढ़ जाए. वे उछलते रहते थे. नेल्सन स्कोर से मुकाबले ऑस्ट्रेलिया में 87 के स्कोर को लेकर अंधविश्वास है. 100 से 13 कम यानी 87 को खतरनाक माना जाता है. संयोग है कि ऑस्ट्रेलिया के काफी खिलाड़ी इस स्कोर पर आउट होते हैं.

सरकारी विज्ञापनों के नीचे डीएवीपी लिखा होता है. इसका अर्थ क्या है?
डीएवीपी का अंग्रेजी में पूरा नाम है डायरेक्टरेट ऑफ एडवर्टाइज़िंग एंड विज़ुअल पब्लिसिटी. भारत सरकार के सभी मंत्रालयों तथा कुछ स्वायत्त संस्थाओं के विज्ञापन और प्रचार का काम यह संस्था करती है. इसकी पृष्ठभूमि दूसरे विश्व युद्ध के बाद बन गई थी, जब भारत सरकार ने एक प्रेस एडवाइज़र की नियुक्ति की थी. उसके पास ही विज्ञापन की ज़िम्मेदारी आई. जून 1941 में उनके अधीन एडवर्टाइज़िंग कंसल्टेंट का पद बनाया गया. 1 मार्च 1942 से यह सूचना और प्रसारण विभाग की एक शाखा के रूप में काम करने लगा. 1 अक्टूबर 1955 से यह मंत्रालय से सीधे जुड़ गया और इसका यह नाम भी तभी मिला.

आकाश में ध्रुवतारा सदा एक ही स्थान पर दिखता है, जबकि अन्य तारे नहीं, क्यों?

ध्रुव तारे की स्थिति हमेशा उत्तरी ध्रुव पर रहती है. इसलिए उसका या उनका स्थान नहीं बदलता. यह एक तारा नहीं है, बल्कि तारामंडल है. धरती के अपनी धुरी पर घूमते वक्त यह उत्तरी ध्रुव की सीध में होने के कारण हमेशा उत्तर में दिखाई पड़ता है. इस वक्त जो ध्रुव तारा है उसका अंग्रेजी में नाम उर्सा माइनर तारामंडल है. जिस स्थान पर ध्रुव तारा है उसके आसपास के तारों की चमक कम है इसलिए यह अपेक्षाकृत ज्यादा चमकता प्रतीत होता है. धरती अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर परिक्रमा करती है, इसलिए ज्यादातर तारे पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए नज़र आते हैं. चूंकि ध्रुव तारा सीध में केवल मामूली झुकाव के साथ उत्तरी ध्रुव के ऊपर है इसलिए उसकी स्थिति हमेशा एक जैसी लगती है. स्थिति बदलती भी है तो वह इतनी कम होती है कि फर्क दिखाई नहीं पड़ता. पर यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी. हजारों साल बाद यह स्थिति बदल जाएगी, क्योंकि मंदाकिनियों के विस्तार और गतिशीलता के कारण और पृथ्वी तथा सौरमंडल की अपनी गति के कारण स्थिति बदलती रहती है. यह बदलाव सौ-दो सौ साल में भी स्पष्ट नहीं होता. आज से तीन हजार साल पहले उत्तरी ध्रुव तारा वही नहीं था जो आज है. उत्तर की तरह दक्षिणी ध्रुव पर भी तारामंडल हैं, पर वे इतने फीके हैं कि सामान्य आँख से नज़र नहीं आते. उत्तरी ध्रुव तारा भूमध्य रेखा के तनिक दक्षिण तक नज़र आता है. उसके बाद नाविकों को दिशा ज्ञान के लिए दूसरे तारों की मदद लेनी होती है.

दुनिया में समुद्रों का निर्माण कैसे हुआ?

धरती जब नई-नई थी तब वह बेहद गर्म थी. यानी अब से तकरीबन 4.5 अरब साल पहले धरती भीतर से तो गर्म थी ही उसकी सतह भी इतनी गर्म थी कि उस पर तरल जल बन नहीं पाता था. उस समय के वायुमंडल को हम आदि वायुमंडल (प्रोटो एटमॉस्फीयर) कहते हैं. उसमें भी भयानक गर्मी थी. पर पानी सृष्टि का हिस्सा है और सृष्टि के विकास के हर दौर में किसी न किसी रूप में मौजूद रहा है. धरती उस गर्म दौर में भी खनिजों के ऑक्साइड और वायुमंडल में धरती से निकली हाइड्रोजन के संयोग से गैस के रूप में पानी पैदा हो गया था. पर वह तरल बन नहीं सकता था.

धरती के वायुमंडल के धीरे-धीरे ठंडा होने पर इस भाप ने बादलों की शक्ल ली. इसके बाद लम्बे समय तक धरती पर मूसल धार बारिश होती रही. यह पानी भाप बनकर उठता और संघनित (कंडेंस्ड) होकर फिर बरसता. इसी दौरान धरती की सतह भी अपना रूपाकार धारण कर रही थी. ज्वालामुखी फूट रहे थे और धरती की पर्पटी या क्रस्ट तैयार हो रही थी. धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से पानी ने अपनी जगह बनानी शुरू की. धरती पर जीवन की शुरूआत के साथ पानी का भी रिश्ता है.

जहाँ तक महासागरों की बात है पृथ्वी की सतह का लगभग 72 फीसदी हिस्सा महासागरों के रूप में है. दो बड़े महासागर प्रशांत और अटलांटिक धरती को लम्बवत महाद्वीपों के रूप में बाँटते हैं. हिन्द महासागर दक्षिण एशिया को अंटार्कटिक से अलग करता है और ऑस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के बीच के क्षेत्र में फैला है. एक नज़र में देखें तो पृथ्वी विशाल महासागर है, जिसके बीच टापू जैसे महाद्वीप हैं. इन महाद्वीपों का जन्म भी धरती की संरचना में लगातार बदलाव के कारण हुआ.  प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

1 comment:

  1. नेल्सन अंक के बारे में रोचक जानकारी प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!

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