Tuesday, April 19, 2016

टैक्स हेवन क्या हैं?

हाल में ‘पनामा पेपर्स’ के संदर्भ में बार-बार ‘टैक्स हेवन’ का जिक्र आया है। अंग्रेजी में हेवन शब्द का सामान्य अर्थ होता है शरणस्थल या अभय क्षेत्र। इस माने में टैक्स हेवन्स उन देशों को कहा जाता है जहाँ पर कई तरह के टैक्स या तो बहुत कम होते हैं या होते ही नहीं। इन देशों में वित्तीय गोपनीयता इस हद तक होती है कि दूर देशों के लोग वहाँ अपना पैसा रखना पसंद करते हैं। यहाँ की सरकारें भी इस गोपनीयता की रक्षा करती हैं। इसके अलावा इन देशों में राजनीतिक स्थिरता भी होती है जो इस आर्थिक व्यवस्था की रक्षा करती है। ये सभी टैक्स हेवन बहुत छोटे देश हैं। जितना छोटा देश, सरकारों को हैंडल करना उतना ही आसान।

पनामा महत्वपूर्ण क्यों?

उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका को जोड़ने वाला एक छोटा-सा देश है पनामा। उत्तर में कोस्टारिका और दक्षिण में कोलंबिया उसका पड़ोसी है। दो महाद्वीपों के अलावा दो महासागरों (प्रशांत और अटलांटिक) को भी जोड़ता है पनामा। 77 किलोमीटर लंबी पनामा नहर में दिनभर बड़े जहाज चलते रहते हैं। पनामा के लिए टैक्स हेवन देशों की श्रेणी में शामिल होना मुनाफे का सौदा है।

उसकी भौगोलिक स्थिति भी इसमें उसके लिए फायदेमंद साबित हुई। एक तरफ अमेरिकी महाद्वीप था, दूसरी तरफ खुशगवार मौसम वाले कैरीबियाई द्वीप। अमेरिका के अमीर यहां पर ऑफशोर टैक्स हेवन की संभावनाओं को लेकर लालायित रहते थे। पनामा को इसलिए भी टैक्स हेवन कहा जाता है क्योंकि यहां के टैक्स सिस्टम के अनुसार स्थानीय और बाहरी कंपनियों से तभी टैक्स वसूला जाता है, जब आय देश के भीतर से आई हो। यहां कॉर्पोरेशन टैक्स सिस्टम भी है, पर विदेशी निवेश पर टैक्स नहीं लगता।

ऑफशोर कम्पनियाँ

ऑफशोर कम्पनियां टैक्स बचाने तथा वित्तीय और कानूनी फायदे के लिए टैक्स हेवन देशों में गुप्त रूप से काम करती हैं। ये कम्पनियाँ कॉरपोरेट टैक्स, इनकम टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स जैसे कई प्रकार के टैक्स से बच जाती हैं। पनामा में 3,50,000 से ज्यादा गोपनीय अंतरराष्ट्रीय कम्पनियाँ रजिस्टर्ड बताई जाती हैं।

स्विट्ज़रलैंड, हांगकांग, मॉरिशस, मोनेको, पनामा, अंडोरा, बहामास, बरमूडा, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स, बेलीज, कैमेन आइलैंड, चैनल आइलैंड, कुक आइलैंड, लाइशेंश्टाइन जैसे देश टैक्स हेवन देशों की सूची में आते हैं। इन टैक्स हेवन के खिलाफ बने प्रेशर ग्रुप ‘टैक्स जस्टिस नेटवर्क’ की सन 2012 की रिपोर्ट के अनुसार इन देशों में 21 ट्रिलियन से 32 ट्रिलियन के बीच की राशि टैक्स बचाकर रखी गई है।

भारतीय पैसा

अमेरिका स्थित प्रतिष्ठित थिंक टैंक ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी काउंसिल का कुछ साल पहले का अनुमान था कि इसमें से 450 अरब डॉलर यानी करीब बीस से बाईस लाख करोड़ रुपया भारतीय है। यह रकम भारतीय जीडीपी की एक चौथाई के आसपास है। संस्था के अनुसार अकेले 2015 में भारतीयों ने अवैध रूप से 83 अरब डॉलर की रकम विदेशों में भिजवाई है।

अभी पनामा पेपर्स के पूरे निहितार्थ स्पष्ट नहीं हैं। कुछ लोगों का कहना है कि बाहर कानूनन सही तरीके से पैसा भेजा गया। इसकी जानकारी आयकर विभाग को भी दी गई। पिछले कुछ समय से रिजर्व बैंक ने एक सीमित राशि विदेश ले जाने की अनुमति दी है। पर सच यह है कि ये टैक्स हेवन भारत से बाहर गए पैसे को सफेद बनाकर लाने का काम भी करते हैं। आश्चर्य नहीं कि 2015 में जिन देशों से सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भारत आया, उनमें मॉरिशस और सिंगापुर शीर्ष पर थे। कोई वजह है कि पनामा, बरमूडा, कैमेन आइलैंड्स, लाइशेंश्टाइन जैसे दूर बसे देशों में भी भारतीय कम्पनियाँ सक्रिय हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (20 -04-2016) को "सूखा लोगों द्वारा ही पैदा किया गया?" (चर्चा अंक-2318) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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