Sunday, December 25, 2022

हैलोवीन क्या होता है?

 

हैलोवीन अमेरिका और यूरोप में 31 अक्तूबर को मनाया जाने वाला एक अवकाश है। अब भारत समेत दुनिया के बहुत से देशों में इसे मनाने लगे हैं। इस दिन लोग विचित्र किस्म की पोशाकें पहनते हैं। डरावनी फिल्में देखते हैं। भूत-प्रेत के खेल-खेलते हैं। खासतौर से कद्दू या सीताफल को काटकर उससे इंसान का चेहरा बनाकर उसके भीतर मोमबत्ती जलाते हैं। मैदान में होली की तरह से आग जलाते हैं। बच्चे घर-घर जाकर उपहार प्राप्त करते हैं। मोटे तौर पर गर्मी की समाप्ति और सर्दी के आगमन के इस पर्व में दुष्टात्माओं से छुटकारा पाने की कामना होती है। लौह युग की यूरोपीय सेल्टिक-संस्कृति में इसकी शुरुआत हुई थी।

जुगनू क्यों चमकते हैं?

जुगनू एक प्रकार का उड़ने वाला कीड़ा है, जिसके पेट में रासायनिक क्रिया से रोशनी पैदा होती है। इसे बायोल्युमिनेसेंस कहते हैं। इसके शरीर में ल्यूसिफेरिन नामक जटिल कार्बनिक यौगिक तथा ल्यूसिफेरेज नामक एन्जाइम पाया जाता है। इस एन्जाइम, और ऑक्सीजन तथा मैग्नीशियम आयन की उपस्थिति में ल्यूसिफेरिन पदार्थ से प्रकाश पैदा होता है। जीवधारियों के शरीर से प्रकाश  उत्पन्न होना बायोल्युमिनेसेंस कहलाता है। यह कोल्ड लाइट कही जाती है इसमें इंफ्रा रेड और अल्ट्रा वॉयलेट देनों फ्रीक्वेंसी नहीं होतीं।

एक ओवर में छह गेंदें ही क्यों?

सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सन 1979-80 के बाद से ही सारी दुनिया में छह गेंदों के मानक ओवर का चलन शुरू हुआ है। उसके पहले अलग-अलग समय और अलग-अलग देशों में चार, पाँच और आठ गेंदों के ओवर भी होते रहे हैं। क्रिकेट के ज्ञात इतिहास में इंग्लैंड में सन 1889 तक चार गेंदों का एक ओवर होता था। उसके बाद 1899 तक पाँच गेंद का ओवर हो गया। इसके बाद सन 1900 में एक पहल के बाद छह गेंदों के ओवर की शुरूआत हुई। शुरूआती वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में भी चार गेंद का ओवर होता था। इसके बाद जब इंग्लैंड में छह गेंद का ओवर हुआ तो वहाँ भी छह गेंद का ओवर हो गया। पर 1922-23 के सीज़न से ऑस्ट्रेलिया ने आठ गेंदों का एक ओवर करने का फैसला किया।

ऑस्ट्रेलिया की देखा-देखी इंग्लैंड ने भी सन 1939 में अपने घरेलू क्रिकेट में दो साल के लिए आठ गेंदों के ओवर का प्रयोग किया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब इंग्लैंड में नियमित रूप से क्रिकेट का सीज़न जब शुरू हुआ तब छह गेंदों के ओवर की वापसी हो गई। दक्षिण अफ्रीका में 1938-39 और फिर 1957-58 में आठ गेंद का ओवर चला। इसी तरह पाकिस्तान में 1974-75 और 1977-78 में आठ गेंद का ओवर रहा। गेंदों की संख्या घटाने और बढ़ाने के कारणों का विवरण दस्तावेजों में नहीं मिलता। इतना अनुमान है कि चार गेंदों का ओवर काफी छोटा लगा। उसे कुछ और बड़ा करने के प्रयास में यह संख्या आठ तक पहुँच गई।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 5 नवंबर, 2022 को प्रकाशित


Saturday, December 24, 2022

आइफ़िल टावर क्या है?

फ़्रांस की राजधानी पेरिस में कैम्प डि मार्स पर बनी मीनार है आइफ़िल टावर। लोहे की इस मीनार की ऊँचाई 986 फुट है। उसपर लगे टीवी एंटीना को भी जोड़ लिया जाए तो 1058 फ़ुट है। 1889 में जब यह बनकर तैयार हुई तो दुनिया की सबसे ऊंची इमारत थी। इसका निर्माण फ़्रांस की क्रान्ति की शताब्दी मनाने के लिए किया गया था।

बारह राशियाँ क्या हैं?

आमतौर पर हम अंतरिक्ष का अध्ययन करने के लिए हम एक काल्पनिक गोला मानकर चलते हैं, जो पृथ्वी केंद्रित है। इसे खगोल कहते हैं। पृथ्वी की भूमध्य रेखा और दोनों ध्रुवों के समांतर इस खगोल की भी मध्य रेखा और ध्रुव मानते हैं। इस खगोल में सूर्य का एक विचरण पथ है, जिसे सूरज का क्रांतिवृत्त या एक्लिप्टिक कहते हैं। पूरे साल में सूर्य इससे होकर गुजरता है। हालांकि अंतरिक्ष में हर वस्तु गतिमान है, पर यह गति इस प्रकार है कि हमें तमाम नक्षत्र स्थिर लगते हैं। इन्हें हमने अलग-अलग तारामंडलों के नाम दिए हैं। 

सूर्य के इस यात्रा पथ को एक काल्पनिक लकीर बनाकर देखें तो पता लगेगा कि पृथ्वी और सभी ग्रहों के चारों ओर नक्षत्रों की एक पेटी जैसी बन जाती है। इस पेटी को बारह बराबर भागों में बाँटने पर बारह राशियाँ बनतीं हैं, जो बारह तारा समूहों को भी व्यक्त करतीं हैं। इनके नाम हैं मेष, बृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन। सूर्य की परिक्रमा करते हुए धरती और सारे ग्रह इन तारा समूहों से गुजरते हैं। सालभर में सूर्य इन बारह राशियों का दौरा करके फिर अपनी यात्रा शुरू करता है। अंतरिक्ष विज्ञानी इसके आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालते। इसे केवल फलित ज्योतिष ही मानता है।   

बादल फटना क्या होता है?

बादल फटने का मतलब एक छोटे से इलाके में कुछ मिनटों के भीतर भारी बरसात होना है। मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा पहाड़ी क्षेत्रों में बादल ज्यादा फटते हैं। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रति घंटा 100 मिलीमीटर (3.94 इंच) के बराबर या उससे ज्यादा बारिश होना बादल फटना है। इस दौरान जो बादल बनता है वह जमीन से 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक जा सकता है। बादल फटने के दौरान कुछ मिनटों में 20 मिलीमीटर से ज्यादा बरसात हो सकती है। जब वातावरण में बहुत ज्यादा नमी हो और बादलों को आगे बढ़ने की जगह न मिले तब ऐसा होता है। भारी मात्रा के साथ क्यूम्यूलोनिम्बस या कपासी वर्षी बादल जब ऊपर उठते हैं और उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिलता तो उनमें मौजूद पानी नीचे गिर जाता है। यह एक तरीके से पानी भरे बैलून की तरह पानी भरे बादलों का फटना है। इसकी दूसरी वजहें भी होती हैं। जैसे कि सर्द और गर्म हवाओं का टकराना। या पहाड़ रास्ते में आने की वजह से बादल का रुक जाना वगैरह।

 राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 22 अक्तूबर, 2022 को प्रकाशित


Friday, December 23, 2022

चुनाव आचार संहिता कब बनी?

चुनाव आचार संहिता का मतलब है चुनाव आयोग के वे निर्देश जिनका पालन चुनाव खत्म होने तक हर पार्टी और उसके उम्मीदवार को करना होता है। चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही चुनाव आचार संहिता भी लागू हो जाती हैं। चुनाव आचार संहिता के लागू होते ही सरकार और प्रशासन पर कई अंकुश लग जाते है। देश में आदर्श आचार संहिता की शुरुआत सन 1960 के केरल विधानसभा चुनाव से हुई। शुरू में यह सामान्य से दिशा-निर्देश थे कि क्या करें और क्या न करें। उस समय देश के मुख्य चुनाव आयुक्त थे केवीके सुन्दरम। कल्याण सुन्दरम देश के पहले विधि सचिव और दूसरे चुनाव आयुक्त थे। सन 1962 के आम चुनाव में आयोग ने इस कोड को सभी मान्यता प्राप्त दलों को सौंपा। साथ ही सभी राज्य सरकारों के पास इसकी प्रति भेजी गई और अनुरोध किया गया कि इसपर राजनीतिक दलों की स्वीकृति प्राप्त करें। धीरे-धीरे यह परम्परा पुष्ट होती गई।

 पृथ्वी का सूर्य-परिक्रमा पथ गोल है या अंडाकार?

अंतरिक्ष में पूरी तरह वृत्ताकार कक्षा कहीं नहीं मिलती। पूरी तरह वृत्ताकार न तो ग्रह होते हैं और न नक्षत्र। तमाम अंतरिक्षीय पिंड एक-दूसरे की गुरुत्व शक्ति से प्रभावित होते हैं। पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी पूरी परिक्रमा के दौरान घटती-बढ़ती रहती है। दोनों के बीच न्यूनतम दूरी 14 करोड़ 71 लाख 66 हजार 462 किमी जिसे रविनीच या पेरिहेलियोन (perihelion) कहते हैं। अधिकतम दूरी 15,21,71,522 किमी होती है, जिसे अफेलियोन या सूर्योच्च (aphelion) कहते हैं।

पानी की बूँदें गोल क्यों होती हैं?

बूँदों के गोल होने का कारण पृष्ठ तनाव है। यों तो पानी जिस पात्र में रखा जाता है उसका आकार ले लेता है, पर जब वह स्वतंत्र रूप से गिरता है तो धार जैसा लगता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण जैसे–जैसे उसकी मात्रा धरती की ओर जाती है उसी क्रम में आकार लेती है। इसके अलावा पानी के मॉलीक्यूल एक-दूसरे को अपनी ओर खींचते हैं और यह क्रिया केन्द्र की ओर होती है, इसलिए पानी टूटता नहीं। जैसे-जैसे पानी की बूँद का आकार छोटा होता है, वह गोल होती जाती है। यों आपने कुछ बड़ी बूँद को हल्का सा नीचे की ओर लटका हुआ भी पाया होगा। ऐसा गुरुत्वाकर्षण के कारण होता है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 8 अक्तूबर, 2022 को प्रकाशित 

Thursday, December 22, 2022

भारत में स्पीड पोस्ट सेवा कब शुरू हुई?

भारत में स्पीड पोस्ट सेवा 1 अगस्त1986 को शुरू की गई थी. इस सेवा के अंतर्गत पत्रोंदस्तावेजों और पार्सलों की डिलीवरी एक निश्‍चित अवधि के भीतर  की जाती है। यह सेवा अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भी 97 देशों में उपलब्ध है। इंटरनेट आधारित ट्रैक एंड ट्रेस सर्विस स्‍पीड नेट 3 जनवरी2002 को शुरू की गई। 

फीफा रैंकिंग क्या है?

अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल एसोसिएशन का संक्षेप नाम है फीफा। यह संगठन अपने सदस्य देशों की टीमों के प्रदर्शन के आधार पर हर महीने उनके पॉइंट्स घोषित करता है ये पॉइंट टीम के पिछले चार साल के प्रदर्शन के आधार पर होते हैं। इस रैंकिंग की शुरुआत सन 1992 में हुई थी। जबसे रैंकिंग की शुरुआत हुई है दुनिया की पहली आठ-नौ टीमें आमतौर पर अर्जेंटीना, बेल्जियम, ब्राज़ील, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स, इंग्लैंड और स्पेन रहती हैं। इनके क्रम में फर्क पड़ता है। इस साल 25 अगस्त को घोषित रैंकिंग में 1837.56 अंक के साथ ब्राजील एक पर और 1821.92 अंक के साथ बेल्जियम दूसरे नम्बर पर है। भारत की टीम के पास 1198.65 अंक हैं, जिनके आधार पर उसका रैंक 104 है। यह पुरुषों की रैंक है। महिलाओं की रैंक में नंबर एक टीम अमेरिका की है, जिसके 2111.47 अंक हैं। भारत की महिलाओं की रैंक 1425.51 अंक के साथ 58वीं है। 

(6 अक्तूबर, 2022 की रैंक के अनुसार पुरुषों में 1841.3 अंक के साथ ब्राजील नंबर एक पर और 1192.09 अंक के साथ भारत का रैंक 106 है। महिलाओं की रैंक में नंबर एक टीम अमेरिका की है, जिसके 2078.50 अंक हैं। भारत की महिलाओं की रैंक 1405.79 अंक के साथ 61वीं है।

डकार क्यों आती है?

डकार को अंग्रेजी में बर्पिंग, बेल्चिंग और इरक्टेशन वगैरह कहते हैं। यह मूलतः पेट के पाचन मार्ग से गैस या हवा का मुँह के रास्ते बाहर निकलना है। कंठ के पास मार्ग सँकरा होता है और यदि गैस ज्यादा हो तो एक आवाज निकलती है वही डकार है। प्रायः हम भोजन करते वक्त हवा या गैस बनाने वाली वस्तुओं का सेवन करते हैं, जिसके कारण अतिरिक्त हवा बाहर निकलती है। ऐसा कार्बोनेटेड पेय, सॉफ्ट ड्रिंक, बीयर और शैम्पेन वगैरह पीने के बाद भी होता है। पेय से निकली कार्बन डाई ऑक्साइड डकार के रूप में बाहर आती है। पेट में अल्सर या भोजन की एलर्जी होने पर खट्टी डकारें भी आती हैं। नवजात शिशुओं को दूध पिलाने के बाद उनके पेट में हवा जमा हो जाती है, उसे थपकी देकर निकाला जाता है। केवल मनुष्यों को ही नहीं जानवरों को भी डकार आती हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर पर 24 सितंबर, 2022 को प्रकाशित

Wednesday, December 21, 2022

डॉक्टर के पर्चे में BD और OD का मतलब क्या होता है?

डॉक्टर के नुस्खे में कई तरह के संकेत संक्षेप में लिखे होते हैं, जो मूल रूप से लैटिन संकेताक्षर हैं। इनमें से सामान्यतः सबसे ज्यादा BD, OD और TDS का इस्तेमाल होता है। OD का लैटिन में पूरा रूप है ओम्नी डाय, जिसे अंग्रेजी में कहेंगे वंस ए डे यानी दिन में एकबार। BD यानी बिस इन डाय यानी दिन में दो बार। TDS का मतलब है टर्डी सुमेंडम माने दिन में तीन बार। QID माने क्वार्टर इन डाय यानी दिन में चार बार। Q2H मतलब हरेक दो घंटे में। इसी तरह SOS का मतलब है सी ओपस सिट माने जरूरत पड़ने पर। जैसे दर्द हो वगैरह।

भारत में राजनीतिक दलों की संख्या

सन 1951 के चुनाव में हमारे यहाँ 14 राष्ट्रीय और 39 अन्य मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं। सन 2009 के लोकसभा चुनाव में 363 पार्टियाँ उतरीं थीं। इनमें 7 राष्ट्रीय, 34 प्रादेशिक और 242 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं। सन 2014 के लोकसभा चुनाव में जिन दलों ने हिस्सा लिया उनकी संख्या इस प्रकार थी-राष्ट्रीय दल 6 भाजपा, बसपा, भाकपा, माकपा, कांग्रेस और राकांपा. राज्य स्तर के दल 46 और पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त पार्टियाँ 464। चुनाव आयोग की नवीनतम सूचना 23 सितंबर 2021 के अनुसार देश में पंजीकृत राजनीतिक दलों की कुल संख्या 2858 है। इनमें आठ राष्ट्रीय दल, 54 राज्यों के दल और 2796 गैर-मान्यता प्राप्त दल हैं।

जैरॉक्स मशीन की खोज किसने की?

जैरॉक्स कॉरपोरेशन ग्लोबल डॉक्यूमेंट मैनेजमेंट कम्पनी है। यह 1906 में बनी थी. तब इसका नाम हैलॉइड फोटोग्राफिक कम्पनी था। यह फोटोग्राफिक पेपर और फोटोग्राफी के अन्य उपकरण बनाती थी। 1958 में इस कम्पनी का नाम हैलॉइड जैरॉक्स कॉरपोरेशन हो गया और 1961 में सिर्फ जैरॉक्स. इस कम्पनी ने 1961 में जैरॉक्स 914 के नाम से दुनिया का पहला प्लेन पेपर कॉपियर बनाया। यह एक प्रकार की क्रांति थी. इसने फोटोकॉपी या जैरोग्राफी का एक नया संसार खोल दिया। इसके बाद तमाम कम्पनियों ने पेपर कॉपियर बनाए, पर हम लोग सबको जैरॉक्स बोलते हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 10सितंबर, 2022 को प्रकाशित

Tuesday, December 20, 2022

एसएसएलवी किसे कहते हैं?

स्मॉल सैटेलाइट लांच वेहिकल का अंग्रेजी संक्षिप्त रूप है एसएसएलवी। हाल में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने पहले एसएसएलवी का प्रक्षेपण किया था। यह रॉकेट छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए बनाया गया है। यह 500 किलोग्राम के उपग्रह को निम्न-भू कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) पर या 300 किलोग्राम के उपग्रह को सूर्य-तुल्यकालिक (सन सिंक्रोनस) कक्षा पर स्थापित कर सकता है। इस रॉकेट को काफी कम समय में तैयार किया जा सकता है और इसकी लागत भी काफी कम है। इसे पाँच-छह लोगों की टीम 72 घंटे में तैयार कर सकती है, जबकि पीएसएलवी और जीएसएलवी को तैयार करने में 70-80 दिन लगते हैं।

भारत के एसएसएलवी की पहली परीक्षण उड़ान गत 7 अगस्त को हुई थी। हालांकि इसका प्रक्षेपण सही हुआ, पर कुछ कारणों से यह अपने उपग्रहों को सही कक्षा में स्थापित नहीं कर पाया। इसका पहला प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा से किया गया, पर इन रॉकेटों के प्रक्षेपण के लिए तमिलनाडु में कुलशेखरपत्तनम के पास एक नया एसएसएलवी लांच कांप्लेक्स बनाया जा रहा है। ऐसे रॉकेटों के प्रक्षेपण के लिए न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड नाम से एक नया कंसोर्शियम भी बनाया गया है। आज कल दुनिया में 90 फीसदी से ज्यादा छोटे उपग्रहों का प्रक्षेपण हो रहा है, इसलिए इस छोटे रॉकेट को गेमचेंजर बताया जा रहा है। अमेरिका के स्पेसएक्स ऐसे उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रहा है।

अंतरिक्ष में सबसे भारी यान कौन सा है?

इस वक्त पृथ्वी की कक्षा में धरती से भेजा गया सबसे भारी उपग्रह अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन है, जिसका वज़न 4,40,725 किलोग्राम है, जो 2020 में पूरा हुआ। इस पूरे स्पेस स्टेशन को एकसाथ अंतरिक्ष में नहीं भेजा गया है। इसके सबसे पहले हिस्से को सन 1998 में अंतरिक्ष में स्थापित किया गया था। तब से  सामान्यतः यह स्टेशन धरती से सामान्यतः 330 से 435 किलोमीटर की दूरी पर रहते हुए अपनी परिक्रमा पूरी करता है। यह हर रोज धरती के 15.54 चक्कर पूरे करता है।

श्री और सर्वश्री

श्री एक व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होगा. मसलन श्री राजीव कुमार जब हम कई नाम एकसाथ लिखें तो शुरू में सर्वश्री लिखकर काम चलाते हैं। आशय है कि सभी श्री। मसलन सर्वश्री रमेश, सुरेश, महेश और राकेश।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 27 अगस्त, 2022 को प्रकाशित


Monday, December 19, 2022

ताजमहल का आर्किटेक्ट कौन था?

ताजमहल का वास्तुकार कौन है यह दावे के साथ आज भी नहीं कहा जा सकता। इतना जरूर समझ में आता है कि वास्तुकारों और निर्माण विशेषज्ञों के समूह के साथ शाहजहाँ स्वयं भी सक्रिय रूप से इसमें शामिल थे। उस्ताद अहमद लाहौरी को इसका श्रेय देने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति माना जाता है, एक प्रधान वास्तुकार के रूप में। यह भी माना जाता है कि तुर्किये के इस्माइल अफांदी या उस्ताद ईसा से भी सलाह ली गई थी। 

वाशिंगटन डीसी में ‘डीसी’ क्या है?

वॉशिंगटन डीसी का अर्थ है वॉशिंगटन डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलम्बिया। अमेरिकी संविधान के अनुसार संघीय राजधानी एक अलग डिस्ट्रिक्ट के रूप में बनाई जा सकती है, जो किसी राज्य का हिस्सा न हो। यह शहर जॉर्ज वॉशिंगटन की स्मृति में बसाया गया है। अमेरिका में एक राज्य भी वॉशिंगटन है। उसका वॉशिंगटन डीसी से कोई सम्बन्ध नहीं है।

नैनो सैटेलाइट क्या होते हैं?

नैनो सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले लघु उपग्रहों को कहते हैं। सामान्यतः 1 किलोग्राम से 500 किलोग्राम तक के सैटेलाइट को नैनो की परिभाषा में रखा जाता है। इन छोटे उपग्रहों की अपनी भूमिका है। मसलन अंतरिक्ष के अनेक बिन्दुओं से जानकारी एकत्र करनी हो तो अनेक उपग्रहों की जरूरत होगी। ऐसे में एक बड़े वज़नी उपग्रह के बजाय अनेक छोटे उपग्रहों की सेवाएं ली जाती हैं। लघु उपग्रह, विशेष रूप से बड़ी संख्या में, कुछ उद्देश्यों के लिए कम, बड़े उपग्रहों की तुलना में अधिक उपयोगी हो सकते हैं-उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक डेटा एकत्र करना और रेडियो रिले वगैरह। इन दिनों कम्युनिकेशन कंपनियाँ ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाओं के लिए छोटे उपग्रहों का नेटवर्क बना रही हैं। इनमें स्टारलिंक और वनवैब जैसे नाम हैं। कई बार बड़े उपग्रहों की निगरानी के लिए भी छोटे उपग्रहों की जरूरत होती है। विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को उपग्रह विज्ञान की बुनियादी जानकारी देने के लिए भी इनका इस्तेमाल होता है। हाल के वर्षों में 1 से 50 किलो वज़न के उपग्रहों का चलन बढ़ा है। अब अंतरिक्ष प्रक्षेपण कम्पनियाँ छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण में अलग से विशेषज्ञता प्राप्त करने की कोशिश कर रहीं है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 13 अगस्त, 2022 को प्रकाशित

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