Thursday, April 28, 2016

छठी इंद्रिय या सिक्स्थ सेंस के क्या मायने हैं? क्या जानवरों में भी ऐसी अनुभूति होती है?

सिक्स्थ सेंस के कई अर्थ होते हैं. एक अर्थ है व्यक्ति की शारीरिक संतुलन सामर्थ्य. पर आपका आशय व्यक्ति की मानसिक शक्ति से है. किसी चीज़ की अनुभूति शारीरिक अंगों से न होकर मानसिक अनुभूति. पूर्वाभास, टेलीपैथी जैसे कई नाम इसे दिए जाते हैं. इसे अतीन्द्रिय अनुभूति भी कहते हैं. इसे यह नाम जर्मन मनोविज्ञानी रुडॉल्फ टिशनर ने दिया और ड्यूक विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी जेबी राइनर ने चलाया. बहुत लोगों की मान्यता है कि इस दृश्य जगत से परे भी एक लोक है. इस अनुभूति का सम्बन्ध उस लोक से जोड़ते हैं. इसे परामनोविज्ञान का नाम देकर इसका अध्ययन भी करते हैं. कुछ लोग ऐसी शक्तियाँ पास होने का दावा करते हैं. कुछ लोग भविष्य में होने वाली बातों को देख सकने की क्षमता का दावा करते हैं. कई बार सामान्य लोगों को भी अच्छी या बातों का पूर्वाभास हो जाता है. कुछ लोग जमीन पर कान लगाकर बता देते हैं कि नीचे पानी है या नहीं. है तो कितनी गहराई पर है.

मनुष्यों के अलावा अन्य प्राणियों में ऐसी अनुभूति होती है या नहीं ऐसा तभी कहा जा सकता है जब कोई प्राणी ऐसा दावा करे. अलबत्ता पशु-पक्षियों, मछलियों, कीड़ों, चींटियों और कई बार वनस्पतियों के व्यवहार से लोग अनुमान लगाते हैं कि कुछ होने वाला है. बाढ़, आँधी-पानी, भूकम्प और सुनामी की पूर्व जानकारी पक्षियों के व्यवहार से लगती है. कुछ पक्षियों में दिशा ज्ञान जबर्दस्त होता है. वे मौसम बदलने पर एक जगह से दूसरी जगह की हजारों मील की यात्रा करते हैं.

अमेरिका के एक अस्पताल में विचरण करने वाले बिल्ले के बारे में दावा किया गया कि उसे मरीज के मरने का आभास हो जाता है. न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसन ने जुलाई 2007 के अंक में रोड आयलैंड के स्टीयर हाउस नर्सिंग एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर में विचरण करने वाले ऑस्कर नाम के इस बिल्ले के बारे में जानकारी दी गई कि यह बिल्ला जिस मरीज के बिस्तरे के नीचे डेरा जमाता है उसकी मौत हो जाती है. कम से कम 25 मरीजों के साथ ऐसा हुआ. उसकी इस ख्याति पर लोगों ने उसे अपने कमरे में घुसने से रोकना शुरू किया. इसपर वह गुर्रा कर और शोर मचाकर अपने गुस्से का इज़हार भी करता था. इसी तरह भूकम्प के पहले चींटियों का निकलना, चूहों का भागना जैसी बातें हैं. इन बातों का तार्किक विवेचन यहाँ सम्भव नहीं है.

इन दिनों चर्चित ड्रोन हमलों से क्या तात्पर्य है?

ड्रोन छोटे-छोटे विमान होते हैं, जो सुदूर नियंत्रण से चलते हैं. यानी इनमें चालक नहीं होते. इन्हें चालक रहित विमान कह सकते हैं. कुछ विमान दूर नियंत्रित होते हैं और कुछ के कम्प्यूटर में मिशन पर जाने से पहले इस प्रकार के निर्देश दर्ज किए जाते हैं कि वे यात्रा मार्ग और काम पूरा करके फिर वहीं वापस लौट आते हैं. ड्रोन इस प्रकार पायलट रहित विमान हैं. ये विमान हथियार लेकर भी जाते हैं और टोही उड़ान पर भी जाते हैं. इनमें कैमरे लगे होते हैं.

आप इन दिनों जिन ड्रोन हमलों के बारे में सुनते हैं वे पाकिस्तान पश्चिमी सीमांत पर तालिबान और अल कायदा के खिलाफ अमेरिकी कारवाई है. सीआईए की स्पेशल एक्टिविटीज डिवीजन इसकी देख-रेख करती है. आमतौर पर एमक्यू1-प्रिडेटर और एमक्यू9-रीपर विमान इन हमलों में शामिल हो रहे हैं. हालांकि पाकिस्तान सरकार इन हमलों का निन्दा करती है, पर पाकिस्तान के शम्सी एयरफील्ड से ये ड्रोन उड़ान भरते हैं. इन विमानों का नियंत्रण अमेरिका के नेवादा स्थित क्रीच एयरफोर्स बेस से होता है.

बॉडी मास इंडेक्स क्या होता है? आदर्श बीएमआई 20.85 ही क्यों माना जाता है?

बॉडी मास इंडेक्स या बीएमआई व्यक्ति की ऊँचाई और वजन के संतुलन को बताता है. यह सिर्फ इस बात का संकेत देता है कि व्यक्ति का वजन कम या ज्यादा तो नहीं. इस संकेतक का आविष्कार बेल्जियम के वैज्ञानिक एडॉल्फ केटेलेट ने सन 1830 से 1850 के बीच कभी किया. उनके नाम पर इसे केटेलेट इंडेक्स भी कहते हैं. इसे निकालने का आसान तरीका है व्यक्ति अपने वजन को अपनी ऊँचाई के वर्ग मीटर से भाग दे तो जो प्राप्त होगा वह उसका बीएमआई है. आमतौर पर यह इंडेक्स 18.5 से 25 के बीच रहना चाहिए. 25 से ऊपर का अर्थ है व्यक्ति का वज़न ज्यादा है और 18.5 से कम का अर्थ है वज़न कम है. आपने जो संख्या लिखी है वह इन दो के बीच की संख्या है, इसलिए आदर्श है.

ड्रैगन क्या है? यह वास्तविक है या काल्पनिक?
ड्रैगन काल्पनिक प्राणी है. ज्यादातर सभी प्राचीन सभ्यताओं में ड्रैगन जैसे विशाल सर्प, अजगर या डायनोसौर जैसे प्राणी की परिकल्पना मिलती है. ड्रैगन शब्द लैटिन के ड्रैको से बना है. साँप, अजगर जैसे चकत्तेदार खाल वाले, मगरमच्छ और घोड़े जैसे मुख और छिपकली जैसे पैर वाले प्राणी की परिकल्पना यूरोप के अलावा चीनी, जापानी, फारसी और संस्कृत साहित्य में भी मिलती है. यूरोप के ड्रैगन के शरीर में चमगादड़ जैसे डैने भी होते हैं. इधर डायनोसौर जैसे शरीर वाले ड्रैगनों की तस्वीरों और खिलौनों की बाढ़ आई है. कुछ वास्तविकताओं और कुछ कल्पनाशीलता से बना ड्रैगन सम्भवतः: दुनिया का सबसे लोकप्रिय पात्र है.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Sunday, April 24, 2016

एलियन का कोई सटीक प्रमाण है या ये सिर्फ हवा-हवाई बातें हैं?

कोई वैज्ञानिक विश्वास के साथ नहीं कह सकता कि अंतरिक्ष में जीवन है। किसी के पास प्रमाण नहीं है। पर कार्ल सागां जैसे अमेरिकी वैज्ञानिक मानते रहे हैं कि अंतरिक्ष की विशालता और इनसान की जानकारी की सीमाओं को देखते हुए यह भी नहीं कहा जा सकता कि जीवन नहीं है। जीवन कहीं अंतरिक्ष में ही उपजा और करोड़ों साल पहले किसी तरह पृथ्वी पर उसके बीज गिरे और यहाँ वह विकसित हुआ। कार्ल सागां का अनुमान था कि हमारे पूरे सौर मंडल में बैक्टीरिया हैं। यह अनुमान ही है, किसी के पास बैक्टीरिया का नमूना नहीं है। आने वाले कुछ वर्षों में मंगल या चंद्रमा के नमूनों में बैक्टीरिया मिल जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

साठ के दशक में जब इनसान ने अपने यान धरती की कक्षा में पहुँचा दिए तब आसमान की खिड़की को और खोलने का मौका मिला। अमेरिका और रूस की आपस में प्रतियोगिता चल रही थी, पर दोनों देशों के दो वैज्ञानिकों ने मिलकर एक काम किया। कार्ल सागां और रूसी वैज्ञानिक आयसिफ श्क्लोवस्की ने मिलकर एक किताब लिखी इंटेलिजेंट लाइफ इन युनीवर्स। उसके पहले 1961 में सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस (सेटी) का पहला सम्मेलन हो चुका था। वैज्ञानिकों का निश्चय था कि दूर कोई है और समझदार भी है तो वह या तो हमें संकेत देगा या हमारा संकेत पकड़ेगा।

अमेरिका की मशहूर विज्ञान पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ ने सितम्बर 2006 में 10 ऐसी बातें गिनाईं जो इशारा करती हैं कि खोज जारी रखें तो अंतरिक्ष में जीवन होने के पक्के सुबूत भी मिल जाएंगे, बल्कि जीवन भी मिल जाएगा। दुनिया के वैज्ञानिकों ने निश्चय किया कि हमें मिलकर बड़ा काम करना चाहिए। 1961 में पहला सेटी सम्मेलन हुआ। फ्रैंक ड्रेक इसके प्रमुख सूत्रधार थे। ‘सेटी’ का काम मूलत: संकेत पकड़ना है। अनेक रेडियो फ्रीक्वेंसी अंतरिक्ष से धरती पर प्रवेश करती हैं। अंतरिक्ष में चल रहे प्राकृतिक घटनाक्रम का संदेश इन्हीं रेडियो तरंगों के सहारे मिलता है। यह खोज जारी है।

मिट्टी के बर्तन में पानी ठंडा क्यों रहता है?
जब किसी तरल पदार्थ का तापमान बढ़ता है तो भाप बनती है। भाप के साथ तरल पदार्थ की ऊष्मा भी बाहर जाती है। इससे तरल पदार्थ का तापमान कम रहता है। मिट्टी के बर्तन में रखा पानी उस बर्तन में बने असंख्य छिद्रों के सहारे बाहर निकल कर बाहरी गर्मी में भाप बनकर उड़ जाता है और अंदर के पानी को ठंडा रखता है। बरसात में वातावरण में आर्द्रता ज्यादा होने के कारण भाप बनने की यह क्रिया धीमी पड़ जाती है, इसलिए बरसात में यह असर दिखाई नहीं पड़ता।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Saturday, April 23, 2016

पाँच तरीके से लिखी गई पाँच किताबें

उत्साही और धुन के धनी लोग एक से एक कम करते रहते हैं और हम उनकी ओर ध्यान नहीं दे पाते हैं। मेरे पास पीयूष गोयल ने अपने कुछ कार्यों का विवरण भेजा है। मुझे यह रोचक लगा। मैं चाहता हूँ कि मेरे पाठक इसे भी देखें। 

उल्‍टे अक्षरों से लिख गई भागवत गीता ( Bhagwat Gita )

आप इस भाषा को देखेंगे तो एकबारगी भौचक्के रह जायेंगे। आपको समझ में नहीं आयेगा कि यह किताब किस भाषा शैली में लिखी हुई है। पर आप जैसे ही दर्पण ( शीशे‌ ) के सामने पहुंचेंगे तो यह किताब खुद-ब-खुद बोलने लगेगी। सारे अक्षर सीधे नजर आयेंगे। इस मिरर इमेज किताब को पीयूष गोयल ने लिखा है। पीयूष गोयल मिरर इमेज की भाषा शैली में कई किताबें लिख चुके हैं।

सुई से लिखी मधुशाला ( Madhushala )

पीयूष गोयल ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है कि देखने वालों आँखें खुली रह जाएगी और न देखने वालों के लिए एक स्पर्श मात्र ही बहुत है। पीयूष गोयल ने पूछने पर बताया कि सुई से पुस्तक लिखने का विचार क्यों आया ? उनका कहना है कि अक्सर मुझ से ये पूछा जाता था कि आपकी पुस्तकों को पढ़ने के लिए शीशे की जरूरत पड़ती है। पढ़ना उसके साथ शीशा, आखिर बहुत सोच समझने के बाद एक विचार दिमाग में आया क्यों न सूई से कुछ लिखा जाये सो मैंने सूई से स्वर्गीय श्री हरिवंशराय बच्चन जी की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'मधुशाला' को करीब 2 से ढाई महीने में पूरा किया। यह पुस्तक भी मिरर इमेज में लिखी गयी है और इसको पढ़ने लिए शीशे की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि रिवर्स में पेज पर शब्दों के इतने प्यारे मोतियों जैसे पृष्ठों को गुंथा गया है, जिसको पढ़ने में आसानी रहती हैं और यह सूई से लिखी 'मधुशाला' दुनिया की अब तक की पहली ऐसी पुस्तक है जो मिरर इमेज व सूई से लिखी गई है।

मेंहदी कोन से लिखी गई गीतांजलि ( Gitanjali )

पीयूष गोयल ने 1913 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता रविन्द्रनाथ टैगोर की विश्व प्रसिद्ध कृति 'गीतांजलि' को 'मेंहदी के कोन' से लिखा है। उन्होंने 8 जुलाई 2012 को मेंहदी से गीतांजलि लिखनी शुरू की और सभी 103 अध्याय 5 अगस्त 2012 को पूरे कर दिए।इसको लिखने में 17 कोन तथा दो नोट बुक प्रयोग में आई हैं। पीयूष ने श्री दुर्गा सप्त शती, अवधी में सुन्दरकांड, आरती संग्रह, हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में श्री साईं सत्चरित्र भी लिख चुके हैं। 'रामचरितमानस' ( दोहे, सोरठा और चौपाई ) को भी लिख चुके हैं। 

कील से लिखी 'पीयूष वाणी'

अब पीयूष गोयल ने अपनी ही लिखी पुस्तक 'पीयूष वाणी' को कील से ए-फोर साइज की एल्युमिनियम शीट पर लिखा है। पीयूष ने पूछने पर बताया कि कील से क्यों लिखा है ? तो उन्होंने बताया कि वे इससे पहले दुनिया की पहली सुई से स्वर्गीय श्री हरिवंशराय बच्चन जी की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'मधुशाला' को लिख चुके हैं। तो उन्हें विचार आया कि क्यों न कील से भी प्रयास किया जाये सो उन्होंने ए-फोर साइज के एल्युमिनियम शीट पर भी लिख डाला।

कार्बन पेपर की मदद से लिखी 'पंचतंत्र' ( Carbon paper written 'Panchatantra' )

गहन अध्ययन के बाद पीयूष ने कार्बन पेपर की सहायता से आचार्य विष्णुशर्मा द्वारा लिखी 'पंचतंत्र' के सभी ( पाँच तंत्र, 41 कथा ) को लिखा है। पीयूष गोयल ने कार्बन पेपर को (जिस पर लिखना है) के नीचे उल्टा करके लिखा जिससे पेपर के दूसरी और शब्द सीधे दिखाई देंगे यानी पेज के एक तरफ शब्द मिरर इमेज में और दूसरी तरफ सीधे।

 आप सम्पर्क करना चाहें तो पीयूष गोयल का फोन नम्बर है 9643579837

Friday, April 22, 2016

छुई-मुई के पौधे की पत्तियों को स्पर्श करने से वे पत्तियां आपस में सिकुड़ क्यों जाती हैं?

शैलेंद्र द्विवेदी, 32, कार्तिक चौकवराह माता गलीउज्जैन-456006 (म.प्र.)

लाजवंती को आमतौर पर छुई-मुई के नाम से जाना जाता है। इस पौधे का वानस्पतिक नाम मिमोसा प्यूडिका है। इस पौधे की पत्तियां अत्यंत संवेदनशील होती है। छुई-मुई की पत्तियां किसी बाहरी वस्तु के स्पर्श से मुरझाती हैं। ये पत्तियां कोई कीड़ालकड़ी यहां तक कि तेज हवा चलने और पानी की बूंदों के स्पर्श मात्र से ही मुरझा जाती है। आसपास ढोल बजाने से भी इसकी पत्तियाँ मुरझाने लगती है। यह संयुक्त पत्तियों वाला पौधा है। इसमे छोटी-छोटी पत्तियां या पर्णक होते हैं जिनको सामान्यतया पत्तियां ही समझा जाता है। ये छोटी-छोटी पत्तियां (पर्णक) मुख्य पत्ती के बीचों-बीच स्थित मध्य शिरा के दोनों तरफ लगी होती हैं। यह पौधा अपनी प्रतिक्रिया इन छोटी-छोटी पत्तियों को आपस में चिपका कर अथवा खोलकर व्यक्त करता है जिसे छुई-मुई का मुरझाना या शर्माना भी कहते हैं।

इसकी पत्तियाँ कई कोशिकाओं की बनी होती हैं। इनमें द्रव पदार्थ भरा रहता है। यह द्रव कोशिका की भित्ति को दृढ़ रखता है तथा पर्णवृन्त को खड़ा रखने में सहायक होता है। जब इन कोशिकाओं के द्रव का दाब कम ही जाता है तो पर्णवृन्त तथा पत्तियों की कोशिका को दृढ़ नहीं रख पाता। जैसे ही कोई व्यक्ति इसकी पत्तियों को छूता है एक संदेश पत्तियों और उनके आधार तक पहुँचता है। इससे पत्तियों के निचले भाग की कोशिकाओं में द्रव का दाब गिर जाता है जबकि ऊपरी भाग की कोशिका के दाब में कोई परिवर्तन नहीं होता हैअतः पत्तियाँ मुरझा जाती है।

देखा गया है कि इस पौधे में जहां पहले स्पर्श होता हैवहां की पत्तियां पहले बंद होती हैं।  इस गुण की वजह से छुई-मुई का पौधा पशुओं द्वारा चरने से बच जाता है क्योंकि पशु के किसी अंग के हल्के स्पर्श से ही पूरा पौधा मुरझा जाता है। इससे पशु पौधे को बेजान समझ कर आगे बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पौधा भी हमारी तरह रात को सोता है।

गेट वे ऑफ इंडिया व इंडिया गेट किसने बनवाए, इनका क्या इतिहास है?
ज्योत्सना छाजेड़ द्वारा: सुंदर लाल छाजेड़, डाकघर के पास, पुरानी लेन, पो.: गंगाशहर, जिला: बीकानेर-334401 (राज.)

इंडिया गेट दिल्ली में है और गेटवे ऑफ इंडिया मुंबई में। इंडिया गेट दिल्ली के राजपथ पर स्थित है। इसकी ऊँचाई 42 मीटर है। यह प्रथम विश्वयुद्ध और अफगान युद्ध में शहीद होने वाले भारतीय जवानों की याद में 1931 में तैयार किया गया था। इस पर इन जवानों के नाम भी उकेरे गए हैं। गेटवे ऑफ इंडिया मुंबई में समुद्र तट पर बना है। इसकी ऊँचाई 26 मीटर है जिसे ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम और रानी मैरी की भारत यात्रा की याद में बनाया गया था। इसकी बुनियाद 31 मार्च 1911 में रखी गई थी। इसके वास्तुविद् थे जॉर्ज विटेट। यह सन 1924 में बनकर तैयार हुआ था और आजादी के बाद अंतिम ब्रिटिश सेना इसी द्वार से होकर गई थी। यह संरचना पेरिस के आर्क डी ट्रायम्‍फ की प्रतिकृति है।

इंडिया गेट नई दिल्ली के राजपथ पर स्थित 43 मीटर ऊँचा द्वार है। इसे सर एडविन लुटियन ने डिजाइन किया था। इसकी बुनियाद ड्यूक ऑफ कनॉट ने 1921 में रखी थी और 1931 में तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया। मूल रूप से इस स्मारक का निर्माण उन 70,000 ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों की स्मृति में हुआ था जो प्रथम विश्वयुद्ध और अफ़ग़ान युद्धों में शहीद हुए थे। उनके नाम इस स्मारक में खुदे हुए हैं। यह स्मारक लाल और पीले बलुआ पत्थरों से बना हुआ है।

शुरु में इंडिया गेट के सामने अब खाली चंदवे के नीचे जॉर्ज पंचम की एक मूर्ति थी, लेकिन बाद में अन्य ब्रिटिश दौर की मूर्तियों के साथ इसे कॉरोनेशन पार्क में हटा दिया गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद, इंडिया गेट पर भारतीय सेना के अज्ञात सैनिक का स्मारक मकबरे भी बनाया गया। इसे अमर जवान ज्योति के रूप में जाना जाता है। सन 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के शहीद सैनिकों की स्मृति में यहाँ एक राइफ़ल के ऊपर सैनिक की टोपी सजाई गई है जिसके चार कोनों पर सदैव अमर जवान ज्योति जलती रहती है। इसकी दीवारों पर हजारों शहीद सैनिकों के नाम खुदे हैं।

उत्पत्ति और व्युत्पत्ति में क्या अंतर है?
अभ्युदय शर्मा, डी-301, बिल्डिंग नं.:10, मंगल मूर्ति कॉम्प्लेक्स, मानखुर्द घाटकोपर लिंक रोड, मानखुर्द (पश्चिम) मुंबई-400043

सामान्यतः उत्पत्ति शब्द का मतलब है जन्म या पैदाइश। इसी अर्थ के कुछ दूसरे शब्द हैं उद्गम, जन्म, उद्भव, सृष्टि और आरंभ वगैरह। व्युत्पत्ति के अर्थ में उसकी रचना प्रक्रिया भी जुड़ जाती है। किसी पदार्थ आदि की विशिष्ट उत्पत्ति। किसी चीज का मूल उद्गमन या उत्पत्ति स्थान। आमतौर पर यह शब्दों की व्युत्पत्ति के अर्थ में ज्यादा इस्तेमाल होता है। शब्द व्युत्पत्ति माने शब्द का मूल। शब्द का विकास।

भाषा के शब्दों के इतिहास के अध्ययन को व्युत्पत्ति शास्त्र (etymology) कहते हैं। यह शब्द यूनानी भाषा के यथार्थ अर्थ में प्रयुक्त Etum तथा लेखा-जोखा के अर्थ में प्रयुक्त Logos के योग से बना है, जिसका आशय शब्द के इतिहास का वास्तविक अर्थ सम्पुष्ट करना है| इसमें विचार किया जाता है कि कोई शब्द उस भाषा में कब और कैसे प्रविष्ट हुआ किस स्रोत से अथवा कहाँ से आया उसके स्वरूप और अर्थ में समय के साथ कैसे बदलाव हुआ वगैरह। 



कादम्बिनी के अप्रेल 2016 अंक में प्रकाशित

Thursday, April 21, 2016

क्रिकेट में नेल्सन अंक का क्या अर्थ है? यह कब से आरम्भ हुआ?

नेल्सन, डबल नेल्सन और ट्रिपल नेल्सन क्रिकेट में 111, 222 और 333 के स्कोर को कहते हैं. यह एक लोक प्रयोग हैं और इसे ब्रिटेन की नौसेना के अठारहवीं सदी के मशहूर एडमिरल लॉर्ड होरेशियो नेल्सन के नाम से जोड़ते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस बहादुर फौजी की एक आँख, एक हाथ और एक पैर लड़ाई में जाता रहा. यह तथ्य पूरी तरह सही नहीं है. उनकी एक आँख और एक हाथ वाली बात तक ठीक है, पर उनके दोनों पैर थे. बहरहाल नेल्सन स्कोर के साथ अंधविश्वास है कि इसपर विकेट गिरता है. हालांकि यह भी सच नहीं है. ‘द क्रिकेटर’ नाम की मशहूर मैगजीन ने पुराने स्कोर की पड़ताल की तो इन स्कोरों पर विकेट ज्यादा नहीं गिरे हैं. सबसे ज्यादा विकेट 0 के स्कोर पर गिरते हैं. बहरहाल प्रसिद्ध अम्पायर डेविड शेफर्ड ने नेल्सन स्कोर को प्रसिद्ध बनाया. वे इस स्कोर पर या तो एक पैर उठा देते थे या तब तक दोनों पैरों पर खड़े नहीं होते थे, जब तक स्कोर आगे न बढ़ जाए. वे उछलते रहते थे. नेल्सन स्कोर से मुकाबले ऑस्ट्रेलिया में 87 के स्कोर को लेकर अंधविश्वास है. 100 से 13 कम यानी 87 को खतरनाक माना जाता है. संयोग है कि ऑस्ट्रेलिया के काफी खिलाड़ी इस स्कोर पर आउट होते हैं.

सरकारी विज्ञापनों के नीचे डीएवीपी लिखा होता है. इसका अर्थ क्या है?
डीएवीपी का अंग्रेजी में पूरा नाम है डायरेक्टरेट ऑफ एडवर्टाइज़िंग एंड विज़ुअल पब्लिसिटी. भारत सरकार के सभी मंत्रालयों तथा कुछ स्वायत्त संस्थाओं के विज्ञापन और प्रचार का काम यह संस्था करती है. इसकी पृष्ठभूमि दूसरे विश्व युद्ध के बाद बन गई थी, जब भारत सरकार ने एक प्रेस एडवाइज़र की नियुक्ति की थी. उसके पास ही विज्ञापन की ज़िम्मेदारी आई. जून 1941 में उनके अधीन एडवर्टाइज़िंग कंसल्टेंट का पद बनाया गया. 1 मार्च 1942 से यह सूचना और प्रसारण विभाग की एक शाखा के रूप में काम करने लगा. 1 अक्टूबर 1955 से यह मंत्रालय से सीधे जुड़ गया और इसका यह नाम भी तभी मिला.

आकाश में ध्रुवतारा सदा एक ही स्थान पर दिखता है, जबकि अन्य तारे नहीं, क्यों?

ध्रुव तारे की स्थिति हमेशा उत्तरी ध्रुव पर रहती है. इसलिए उसका या उनका स्थान नहीं बदलता. यह एक तारा नहीं है, बल्कि तारामंडल है. धरती के अपनी धुरी पर घूमते वक्त यह उत्तरी ध्रुव की सीध में होने के कारण हमेशा उत्तर में दिखाई पड़ता है. इस वक्त जो ध्रुव तारा है उसका अंग्रेजी में नाम उर्सा माइनर तारामंडल है. जिस स्थान पर ध्रुव तारा है उसके आसपास के तारों की चमक कम है इसलिए यह अपेक्षाकृत ज्यादा चमकता प्रतीत होता है. धरती अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर परिक्रमा करती है, इसलिए ज्यादातर तारे पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए नज़र आते हैं. चूंकि ध्रुव तारा सीध में केवल मामूली झुकाव के साथ उत्तरी ध्रुव के ऊपर है इसलिए उसकी स्थिति हमेशा एक जैसी लगती है. स्थिति बदलती भी है तो वह इतनी कम होती है कि फर्क दिखाई नहीं पड़ता. पर यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी. हजारों साल बाद यह स्थिति बदल जाएगी, क्योंकि मंदाकिनियों के विस्तार और गतिशीलता के कारण और पृथ्वी तथा सौरमंडल की अपनी गति के कारण स्थिति बदलती रहती है. यह बदलाव सौ-दो सौ साल में भी स्पष्ट नहीं होता. आज से तीन हजार साल पहले उत्तरी ध्रुव तारा वही नहीं था जो आज है. उत्तर की तरह दक्षिणी ध्रुव पर भी तारामंडल हैं, पर वे इतने फीके हैं कि सामान्य आँख से नज़र नहीं आते. उत्तरी ध्रुव तारा भूमध्य रेखा के तनिक दक्षिण तक नज़र आता है. उसके बाद नाविकों को दिशा ज्ञान के लिए दूसरे तारों की मदद लेनी होती है.

दुनिया में समुद्रों का निर्माण कैसे हुआ?

धरती जब नई-नई थी तब वह बेहद गर्म थी. यानी अब से तकरीबन 4.5 अरब साल पहले धरती भीतर से तो गर्म थी ही उसकी सतह भी इतनी गर्म थी कि उस पर तरल जल बन नहीं पाता था. उस समय के वायुमंडल को हम आदि वायुमंडल (प्रोटो एटमॉस्फीयर) कहते हैं. उसमें भी भयानक गर्मी थी. पर पानी सृष्टि का हिस्सा है और सृष्टि के विकास के हर दौर में किसी न किसी रूप में मौजूद रहा है. धरती उस गर्म दौर में भी खनिजों के ऑक्साइड और वायुमंडल में धरती से निकली हाइड्रोजन के संयोग से गैस के रूप में पानी पैदा हो गया था. पर वह तरल बन नहीं सकता था.

धरती के वायुमंडल के धीरे-धीरे ठंडा होने पर इस भाप ने बादलों की शक्ल ली. इसके बाद लम्बे समय तक धरती पर मूसल धार बारिश होती रही. यह पानी भाप बनकर उठता और संघनित (कंडेंस्ड) होकर फिर बरसता. इसी दौरान धरती की सतह भी अपना रूपाकार धारण कर रही थी. ज्वालामुखी फूट रहे थे और धरती की पर्पटी या क्रस्ट तैयार हो रही थी. धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से पानी ने अपनी जगह बनानी शुरू की. धरती पर जीवन की शुरूआत के साथ पानी का भी रिश्ता है.

जहाँ तक महासागरों की बात है पृथ्वी की सतह का लगभग 72 फीसदी हिस्सा महासागरों के रूप में है. दो बड़े महासागर प्रशांत और अटलांटिक धरती को लम्बवत महाद्वीपों के रूप में बाँटते हैं. हिन्द महासागर दक्षिण एशिया को अंटार्कटिक से अलग करता है और ऑस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के बीच के क्षेत्र में फैला है. एक नज़र में देखें तो पृथ्वी विशाल महासागर है, जिसके बीच टापू जैसे महाद्वीप हैं. इन महाद्वीपों का जन्म भी धरती की संरचना में लगातार बदलाव के कारण हुआ.  प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Wednesday, April 20, 2016

फोन पर बात करने से पहले ‘हैलो’ क्यों कहते हैं?

कुसुम राजावत, प्लॉट नं.1, श्रीराम कॉलोनी, कारोठ रोड, राजगढ़ (अलवर)-301408

ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसार हैलो शब्द पुराने जर्मन शब्द हाला, होला से बना है, जिसका इस्तेमाल नाविक करते थे। हैलो या हलो मूलतः अपनी तरफ ध्यान खींचने वाला शब्द है। काफी लोगों का कहना है कि यह शब्द पुराने फ्रांसीसी या जर्मन शब्द होला से निकला है। इसका मतलब होता है 'कैसे हो' यानी, हाल कैसा है जनाब का? और यह शब्द 1066 ईस्वी के नॉरमन हमले के समय इंग्लैंड पहुंचा था। अंग्रेज कवि चॉसर के ज़माने में यानी 1300 के बाद यह शब्द हालो (Hallow) बन चुका था। इसके दो सौ साल बाद यानी शेक्सपियर के ज़माने में हालू (Halloo) बन गया। फिर यह शिकारियों और मल्लाहों के इस्तेमाल से कुछ और बदला और Hallloa, Hallooa, Hollo बना।

शब्दों के सफर की खोज करने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने एक-दूसरे का ध्यानाकर्षण करने के लिए जिन ध्वनियों का प्रयोग किया, दुनियाभर में उनमें आश्चर्यजनक समानता है। ज्यादातर कण्ठ्य ध्वनियां हैं जो सीधे गले से निकलती हैं। जिसके लिए जीभ, दांत अथवा तालू का कोई काम नहीं है जैसे अ-आ अथवा ह। एक अन्य दिलचस्प समानता यह भी है कि यह शब्दावली पूर्व में भी और पश्चिम में भी मल्लाहों द्वारा बनाई गई है। भारत के ज्यादातर मांझी या मल्लाह ओSSSSहैSS या, हैया होSSS जैसी ध्वनियों का प्रयोग करते हैं।

अरबी, फारसी, उर्दू में शोर-गुल के लिए “हल्ला” शब्द प्रचलित है जिसका रिश्ता भी इन्हीं ध्वनियों से है। इसे ही “हो-हल्ला” या “हुल्लड़” कहते हैं। यूरोप में भी नाविकों के बीच ध्यानाकर्षण का प्रचलित ध्वनि-संकेत था ahoy यानी हॉय। ये आदिम ध्वनियां हैं और मनुष्य के कंठ में भाषा का संस्कार आने से पहले से पैठी हुई हैं। आप्टे के संस्कृत कोश में हंहो शब्द का उल्लेख है जिसका प्रयोग प्राचीन काल में था। बहरहाल वर्ष 1800 तक इस शब्द का एक विशेष रूप तय हो चुका था और वह था हलो (Hullo)।

बहरहाल जब टेलीफोन का आविष्कार हुआ तो शुरूआत में लोग फोन पर बजाए पूछा करते थे आर यू देयर?’(Are you there)? तब उन्हें यह विश्वास नहीं था कि उनकी आवाज़ दूसरी ओर पहुंच रही है। लेकिन अमेरिकी आविष्कारक टॉमस एडीसन को इतना लंबा वाक्य पसंद नहीं था। उन्होंने जब पहली बार फ़ोन किया तो उन्हें य़कीन था कि दूसरी ओर उनकी आवाज़ पहुंच रही है। चुनांचे उन्होंने कहा, हलो। 10 मार्च 1876 को अलेक्जेंडर ग्राहम बैल के टेलीफोन आविष्कार को पेटेंट मिला। वे शुरू में टेलीफोन पर बात शुरू करने के लिए नाविकों के शब्द हॉय का इस्तेमाल करते थे। सन 1877 में टॉमस एडीसन ने पिट्सबर्ग की सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट एंड प्रिंटिंग टेलीग्राफ कम्पनी के अध्यक्ष टीबीए स्मिथ को लिखा कि टेलीफोन पर स्वागत शब्द के रूप में हैलो का इस्तेमाल करना चाहिए। उनकी सलाह को अंततः सभी ने मान लिया। उन दिनों टेलीफोन एक्सचेंज में काम करने वाली ऑपरेटरों को हैलो गर्ल्स कहा जाता था।

क्या हमारे राष्ट्रीय चिह्नों की तरह, हर राज्य के अलग-अलग प्रतीक राजकीय चिह्न हैं?
शिखा जैन, 19, अबुल फजल रोड, बंगाली मार्केट, नई दिल्ली-110001

जिस तरह हमारे राष्ट्रीय चिह्न हैं लगभग उसी तर्ज पर कुछ राज्यों ने भी अपने राजचिह्न बनाए हैं और दूसरे प्रतीक भी तय किए हैं। कुछ राज्यों में अशोक चिह्न को राज्य का चिह्न बनाया है। उत्तर प्रदेश के राजकीय चिह्न में दो मछलियाँ, तीर कमान तथा दो नदियों का संगम दिखाया गया है। बिहार में दो स्वस्तिक चिह्नों के बीच बोधिवृक्ष राजचिह्न है। मध्य प्रदेश के राजचिह्न में अशोक स्तम्भ के साथ वटवृक्ष है। महाराष्ट्र के चिह्न में दीपाधार है। तमिलनाडु का राजचिह्न है श्रीविल्लिपुत्तूर अंडाल मंदिर।  इसी तरह राज्यों के अलग-अलग पक्षी, पशु, वृक्ष, फूल वगैरह हैं। कर्नाटक का अपना राज्य नृत्य यक्षगान और राज्य गान भी है।

आंख के चश्मे की खोज कब हुई? पहला चश्मा किस देश ने बनाया?
बद्री प्रसाद वर्मा अंजान, गल्लामंडी, गोलाबाजार-273408 गोरखपुर (उ.प्र.)

आँख के चश्मे या तो नज़र ठीक करने के लिए पहने जाते हैं या फिर धूप, धूल या औद्योगिक कार्यों में उड़ती चीजों से आँखों को बचाने के लिए भी इन्हें पहना जाता है। शौकिया फैशन के लिए भी। स्टीरियोस्कोपी जैसे कुछ विशेष उपकरण भी होते हैं, जो कला, शिक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान में काम करते हैं। सामान्यतः ज्यादा उम्र के लोगों को पढ़ने और नजदीक देखने के लिए चश्मा लगाने की जरूरत होती है।

सम्भवतः सबसे पहले 13वीं सदी में इटली में नजर के चश्मे पहने गए। पर उसके पहले अरब वैज्ञानिक अल्हाज़न बता चुके थे कि हम इसलिए देख पाते हैं, क्योंकि वस्तु से निकला प्रकाश हमारी आँख तक पहुँचता है न कि आँखों से निकला प्रकाश वस्तु तक पहुँचता है। सन 1021 के आसपास लिखी गई उनकी किताब अल-मनाज़िर किसी छवि को बड़ा करके देखने के लिए उत्तल(कॉनवेक्स) लेंस के इस्तेमाल का जिक्र था। बारहवीं सदी में इस किताब का अरबी से लैटिन में अनुवाद हुआ। इसके बाद इटली में चश्मे बने।

अंग्रेज वैज्ञानिक रॉबर्ट ग्रोसेटेस्ट की रचना ऑन द रेनबो में बताया गया है कि किस प्रकाश ऑप्टिक्स की मदद से महीन अक्षरों को दूर से पढ़ा जा सकता है। यह रचना 1220 से 1235 के बीच की है। सन 1262 में रोजर बेकन ने वस्तुओं को बड़ा करके दिखाने वाले लेंस के बारे में लिखा। बारहवीं सदी में ही चीन में धूप की चमक से बचने के लिए आँखों के आगे धुंधले क्वार्ट्ज पहनने का चलन शुरू हो गया था। बहरहाल इतना प्रमाण मिलता है कि सबसे पहले सन 1286 में इटली में चश्मा पहना गया। यह स्पष्ट नहीं है कि उसका आविष्कार किसने किया। चौदहवीं सदी की पेंटिंगों में एक या दोनों आँखों के चश्मा धारण किए पात्रों के चित्र मिलते हैं। 
कादम्बिनी के मार्च 2016 अंक में प्रकाशित

Tuesday, April 19, 2016

टैक्स हेवन क्या हैं?

हाल में ‘पनामा पेपर्स’ के संदर्भ में बार-बार ‘टैक्स हेवन’ का जिक्र आया है। अंग्रेजी में हेवन शब्द का सामान्य अर्थ होता है शरणस्थल या अभय क्षेत्र। इस माने में टैक्स हेवन्स उन देशों को कहा जाता है जहाँ पर कई तरह के टैक्स या तो बहुत कम होते हैं या होते ही नहीं। इन देशों में वित्तीय गोपनीयता इस हद तक होती है कि दूर देशों के लोग वहाँ अपना पैसा रखना पसंद करते हैं। यहाँ की सरकारें भी इस गोपनीयता की रक्षा करती हैं। इसके अलावा इन देशों में राजनीतिक स्थिरता भी होती है जो इस आर्थिक व्यवस्था की रक्षा करती है। ये सभी टैक्स हेवन बहुत छोटे देश हैं। जितना छोटा देश, सरकारों को हैंडल करना उतना ही आसान।

पनामा महत्वपूर्ण क्यों?

उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका को जोड़ने वाला एक छोटा-सा देश है पनामा। उत्तर में कोस्टारिका और दक्षिण में कोलंबिया उसका पड़ोसी है। दो महाद्वीपों के अलावा दो महासागरों (प्रशांत और अटलांटिक) को भी जोड़ता है पनामा। 77 किलोमीटर लंबी पनामा नहर में दिनभर बड़े जहाज चलते रहते हैं। पनामा के लिए टैक्स हेवन देशों की श्रेणी में शामिल होना मुनाफे का सौदा है।

उसकी भौगोलिक स्थिति भी इसमें उसके लिए फायदेमंद साबित हुई। एक तरफ अमेरिकी महाद्वीप था, दूसरी तरफ खुशगवार मौसम वाले कैरीबियाई द्वीप। अमेरिका के अमीर यहां पर ऑफशोर टैक्स हेवन की संभावनाओं को लेकर लालायित रहते थे। पनामा को इसलिए भी टैक्स हेवन कहा जाता है क्योंकि यहां के टैक्स सिस्टम के अनुसार स्थानीय और बाहरी कंपनियों से तभी टैक्स वसूला जाता है, जब आय देश के भीतर से आई हो। यहां कॉर्पोरेशन टैक्स सिस्टम भी है, पर विदेशी निवेश पर टैक्स नहीं लगता।

ऑफशोर कम्पनियाँ

ऑफशोर कम्पनियां टैक्स बचाने तथा वित्तीय और कानूनी फायदे के लिए टैक्स हेवन देशों में गुप्त रूप से काम करती हैं। ये कम्पनियाँ कॉरपोरेट टैक्स, इनकम टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स जैसे कई प्रकार के टैक्स से बच जाती हैं। पनामा में 3,50,000 से ज्यादा गोपनीय अंतरराष्ट्रीय कम्पनियाँ रजिस्टर्ड बताई जाती हैं।

स्विट्ज़रलैंड, हांगकांग, मॉरिशस, मोनेको, पनामा, अंडोरा, बहामास, बरमूडा, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स, बेलीज, कैमेन आइलैंड, चैनल आइलैंड, कुक आइलैंड, लाइशेंश्टाइन जैसे देश टैक्स हेवन देशों की सूची में आते हैं। इन टैक्स हेवन के खिलाफ बने प्रेशर ग्रुप ‘टैक्स जस्टिस नेटवर्क’ की सन 2012 की रिपोर्ट के अनुसार इन देशों में 21 ट्रिलियन से 32 ट्रिलियन के बीच की राशि टैक्स बचाकर रखी गई है।

भारतीय पैसा

अमेरिका स्थित प्रतिष्ठित थिंक टैंक ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी काउंसिल का कुछ साल पहले का अनुमान था कि इसमें से 450 अरब डॉलर यानी करीब बीस से बाईस लाख करोड़ रुपया भारतीय है। यह रकम भारतीय जीडीपी की एक चौथाई के आसपास है। संस्था के अनुसार अकेले 2015 में भारतीयों ने अवैध रूप से 83 अरब डॉलर की रकम विदेशों में भिजवाई है।

अभी पनामा पेपर्स के पूरे निहितार्थ स्पष्ट नहीं हैं। कुछ लोगों का कहना है कि बाहर कानूनन सही तरीके से पैसा भेजा गया। इसकी जानकारी आयकर विभाग को भी दी गई। पिछले कुछ समय से रिजर्व बैंक ने एक सीमित राशि विदेश ले जाने की अनुमति दी है। पर सच यह है कि ये टैक्स हेवन भारत से बाहर गए पैसे को सफेद बनाकर लाने का काम भी करते हैं। आश्चर्य नहीं कि 2015 में जिन देशों से सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भारत आया, उनमें मॉरिशस और सिंगापुर शीर्ष पर थे। कोई वजह है कि पनामा, बरमूडा, कैमेन आइलैंड्स, लाइशेंश्टाइन जैसे दूर बसे देशों में भी भारतीय कम्पनियाँ सक्रिय हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...