Thursday, January 8, 2015

शार्क मछलियाँ काट रहीं हैं समुद्र में बिछे केबल


हाल में कहीं पढ़ा था कि शार्क मछलियाँ समुद्र के भीतर पड़े केबल तारों को काट रही हैं। समुद्र के भीतर कैसे केबल तार हैं और मछलियाँ उन्हें क्यों काट रहीं हैं? कृपया जानकारी दें।
तमाम किस्म के संचार सम्पर्क का सबसे सफल और व्यावहारिक तरीका केबल वायर है। यह केबल वायर अब फाइबर ऑप्टिक तकनीक पर आधारित हैं। इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के साथ केबल वायर तकनीक में भी क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है। टेलीग्राफी के आविष्कार के बाद से दुनिया में संचार केबल बिछाने का काम शुरू हुआ। इसके बाद टेलीफोन और डेटा लाइनों के केबल डाले गए। हाल में इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के बाद से डिजिटल सामग्री के आदान-प्रदान में इनकी भूमिका बढ़ गई है। आप इतना समझ लें कि गीत, संगीत, वीडियो से लेकर तमाम तरह के सैनिक सम्पर्क इन केबलों की मदद से होता है। यह सम्पर्क सैटेलाइटों के साथ-साथ समुद्र के अंदर बिछे केबल के सहारे होता है। दुनिया में अंटार्कटिका को छोड़कर सारे महाद्वीप केबल वायर से जुड़े हैं। हाल में गूगल और पाँच अन्य टेली-कम्पनियों ने मिलकर अमेरिका को जापान से जोड़ने वाले ट्रांस-पैसिफिक केबल नेटवर्क स्थापित करने का फैसला किया है। इसमें 3000 किमी लम्बा केबल नेटवर्क होगा।
ये केबल ज़मीन के नीचे भी बिछाए जाते हैं, पर समुद्र पार इलाकों तक ले जाने के लिए समुद्र के पानी में गहराई पर इन्हें बिछाने की शुरूआत भी काफी पहले हो गई थी। यूरोप को अमेरिकी महाद्वीप से जोड़ने वाले पहला ट्रांस-अटलांटिक केबल 1858 में बिछाया गया था। इसके सहारे 16 अगस्त 1858 को पहली बार इंग्लैंड की रानी विक्टोरिया ने अमेरिका के राष्ट्रपति जेम्स बुकैनन को बधाई संदेश भेजा था। भारत सन 1863 में केबल से जुड़ा जब मुम्बई (तब बॉम्बे) को सऊदी अरब से जोड़ने वाला केबल चालू हुआ। सन 1870 में मुम्बई बाकायदा लंदन से जुड़ गया था।
आधुनिक केबल सामान्यतः 69 मिमी (2,7 इंच) व्यास का होता है। इसके केंद्र में ऑप्टिकल फाइबर होता है और उसकी रक्षा के लिए ताँबे, पॉली कार्बोनेट, नायलन, स्टील की जाली और पॉलीयूरेथेन कवर होते हैं। एक मीटर केबल का वज़न सामान्यतः 10 किलोग्राम के बराबर होता है। नए केबल अत्यधिक तेज गति के हैं। जो नए केबल बिछाए जा रहे हैं वे 3 टेराबिट प्रति सेकंड या उससे ज्यादा स्पीड से डेटा भेजने में समर्थ हैं।

1980 के दशक से खबरें मिल रहीं है कि शार्क मछलियाँ इन केबल नेटवर्क को अपने तेज दाँतों से काट देती हैं। हाल में गूगल ने जिस फास्टर नाम के ट्रांस-पैसिफिक नेटवर्क की योजना बनाई है उसमें शार्क मछलियों से बचाव की व्यवस्था भी की गई है। इन केबलों के चारों और ऐसा पदार्थ लपेटा जाएगा कि मछलियाँ काट न पाएं। 
राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट में 14 सितम्बर 2014 को प्रकाशित

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